विवेचन सारांश
भक्तों के लक्षण

ID: 5595
हिन्दी
शनिवार, 28 सितंबर 2024
अध्याय 12: भक्तियोग
2/2 (श्लोक 12-20)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


इन्दिरा एकादशी के शुभ दिन, वैदिक परम्परा के अनुसार दीप प्रज्वलन, देश भक्ति गीत, हनुमान चालीसा पाठ, गुरु वन्दना एवं आरम्भिक प्रार्थना के साथ सत्र का प्रारम्भ हुआ। पूर्वार्द्ध में हमने दो प्रकार के भक्तों के लक्षण देखे- सगुण और निर्गुण। आज के सत्र में बहुत ही आनन्द आने वाला है। आज हमें सभी बातें बड़े ध्यानपूर्वक सुननी है। हम ध्यान से सुनेंगे तो ही समझ पाएँगे और तभी हम स्वयं को अङ्क दे पाएंगे। आज उनतालीस पेपर ओपन होने वाले हैं। सत्र को रोचक बनाने के लिए, बच्चों में उत्साहवर्धन करने के लिए, संवाद परक विवेचन किया गया।

प्रश्न- पहले सत्र में कितने प्रकार के भक्तों, उपासकों, साधकों की बात हुई थी?
उत्तर- दो प्रकार के भक्त- सगुण भक्त और निर्गुण भक्त की बात हुई थी। साठ प्रतिशत बच्चों ने सही उत्तर दिया।



12.12

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्, ज्ञानाद्ध्यानं(व्ँ) विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्याग:(स्),त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्॥12.12॥

अभ्यास से शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है (और) ध्यान से (भी) सब कर्मों के फल की इच्छा का त्याग (श्रेष्ठ है)। क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त हो जाती है।

विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् कहते हैं कि अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है तथा ध्यान से सभी कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है। इसे थोड़ा सरलता से समझते हैं। अभ्यास अर्थात् जो हम बार-बार करते हैं। कोई भी नया कार्य जब हम सीखते हैं, उसका बार-बार अभ्यास (practice) करते हैं।

गणित हो, विज्ञान हो या कोई भाषा (language) हम सीखते हैं। बार-बार अभ्यास कर रहे हैं पर समझ में नहीं आ रहा है कि यह क्या है? उसका व्यवहारिक रूप में उपयोग (practical implementation)क्या है, तो उसका कोई लाभ नहीं है।

उदाहरण के लिए हम क्षेत्रफल (Area) का सूत्र पढ़ते हैं, यदि हमें पता ही नहीं है कि क्षेत्रफल का अर्थ क्या है और इसे कहाँ उपयोग में लाते हैं, तो उसका कोई लाभ नहीं होगा। गहरा ज्ञान(Deep knowledge)नहीं होगा तो बार-बार रटने से भी कोई लाभ नहीं होगा। इसलिये कहा गया है अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है।

Knowledge is better than practice.

ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है। श्रीभगवान् का ध्यान करते समय उनका स्वरूप हमारे ध्यान में आना चाहिए। वे कैसे दिखते हैं? वे कितने सुन्दर हैं? उनका ही चिन्तन करना, उसे ध्यान कहते हैं। ध्यान से भी श्रेष्ठ है, कर्मों के फल का त्याग। जो भी कार्य हम करते हैं, हमने पढ़ाई की, परीक्षा दी और उसका जो परिणाम (फल) आया। उस परिणाम को, जो भी आता है, उसको त्याग देना, उसमें आसक्ति नहीं होना कि यही परिणाम आना चाहिए।

अगले श्लोक पर जाने से पहले हम पता करते हैं कि आप ध्यान से सुन रहे हैं या नहीं।

प्रश्न-आज कितने पेपर खुलने (open) वाले हैं?
उत्तर- आज उनतालीस‌ (39) पेपर खुलने (open) वाले हैं।
श्रीभगवान् के प्रिय भक्तों में ये उनतालीस (39) लक्षण या गुण होने चाहिए।


        


12.13

अद्वेष्टा सर्वभूतानां(म्), मैत्रः(ख्) करुण एव च|
निर्ममो निरहङ्कारः(स्), समदुःखसुखः क्षमी||13||

सब प्राणियों में द्वेषभाव से रहित और मित्र भाव वाला (तथा) दयालु भी (और) ममता रहित, अहंकार रहित, सुख दुःख की प्राप्ति में सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीर को वश में किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला, मुझ में अर्पित मन बुद्धि वाला जो मेरा भक्त है, वह मुझे प्रिय है। (12.13-12.14)

विवेचन- 
अद्वेष्टा -
 अर्थात् द्वेष न करना। किसी के लिए भी मन में बुरा भाव नहीं रखना। किसी से भी घृणा नहीं करना। सभी से मित्रता का भाव रखना। सभी से मित्रता रखनी है, शत्रुता नहीं। आप स्वयं को दस में से अङ्क (नम्बर) दीजिए। कुछ लोग ऐसे होंगे, जो हमें बहुत प्रिय होंगे और कुछ ऐसे होंगे, जो हमें अप्रिय होंगे। अगर हम किसी से घृणा करते हैं तो अद्वेष्टा का गुण हममें नहीं है।

सर्वभूतानां‌‌ -
 सभी से मित्रता रखना। सभी के लिए मन में समान भाव रखना। किसी ने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया तो वह हमारा शत्रु बन गया, ऐसा नहीं होना चाहिए। जैसे स्कूल में हम समूह (ग्रुप) बना लेते हैं। एक समूह के लोग दूसरे समूह (ग्रुप) के बच्चों के साथ झगड़ा करते हैं, दोस्ती नहीं रखते, बात नहीं करते पर अच्छे बच्चे, जो गीता पढ़ते हैं वे ऐसा नहीं करते। यदि हमें श्रीभगवान् के प्रिय भक्त बनना है तो हमें सबसे मित्रता रखनी है।

करुण - हम कितने दयालु हैं? कोई जानवर जा रहा है। गाय, कुत्ता उसे कुछ चीज फेंक कर मार दिया, ऐसा नहीं करना चाहिए। बड़े बच्चे छोटे बच्चों को तङ्ग करते हैं, ऐसा नहीं करना चाहिए। जैसे मच्छर आ जाते हैं, वे भी जीव हैं पर हम उन्हें हाथ से मार देते है, तो हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। आप स्वयं को अङ्क (नम्बर) दीजिए कि आपमें कितनी दयालुता है।




निर्मम् - अर्थात् मैं की भावना से रहित। यह मेरा, वह तेरा, तेरा-मेरा करते हैं। स्वार्थी हो जाते हैं। हमारी वस्तुएँ, हमारे भाई-बहन उपयोग में ला सकते हैं। यह मेरा बैग है। यह मेरा पेन है। यह मैं नहीं दूॅंगी/दूँगा ऐसा नहीं करना चाहिए। हमें बहुत स्वार्थी नहीं होना चाहिए। अब इसमें आपको कितने अङ्क मिले। 


अब आता है पाॅंचवाँ लक्षण - निरहङ्कार अर्थात् अहङ्कार रहित। हम किसी प्रतिस्पर्धा में प्रथम आ गए। हमें बहुत घमण्ड होने लगता हैं कि हम प्रथम आए। अपनी उपलब्धि पर सन्तोष होना, यह अच्छी बात है, लेकिन उस पर अहङकार करना, यह अच्छी बात नहीं है।

सम दु:ख-सुख: - सुख-दु:ख में समान रहना। हमें बहुत अधिक प्रसन्न भी नहीं होना है। जब हमारे मन का न हो तो हमें बहुत अधिक दु:खी भी नहीं होना है। यह हमारा छठे नम्बर का पेपर था। 
 
क्षमी - अर्थात् क्षमा कर देना। इसमें यह ध्यान रखने की बात है कि हम कह तो देते हैं क्षमा किया, पर भूल नहीं पाते हैं कि उसने हमारे साथ बुरा किया था। Forgive and forget. उसने हमारे साथ बुरा किया है, यह बात हमें भूल जानी है। जब हम दूसरों को क्षमा कर देते हैं, तो हम श्रीभगवान् के प्रिय भक्तों की श्रेणी में आ जाते हैं। 

12.14

सन्तुष्टः(स्) सततं(य्ँ) योगी, यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धि:(र्), यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः॥12.14॥

विवेचन- आठवाँ लक्षण है सन्तुष्ट रहना - तत्कालीन रूप से सन्तुष्ट नहीं, निरन्तर सन्तुष्ट रहना। हमारी  कोई वस्तु पुरानी हो गई तो हमें नई चाहिए।

एक सच्ची घटना है देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जी के जीवन की। उनके पास जो भी वस्तु होती थी, वे उसे उपयोग योग्य रहने तक काम में लेते थे। एक बार उनके जूते के तलवे पूरी तरह से घिस चुके थे तो भी वे उसका उपयोग कर रहे थे। उनके सहायक ने उनके लिए नए जूते लाने की अनुमति माँगी। उन्होंने मना कर दिया। जब तक उनके जूते पूरी तरह से टूट नहीं गए, वे उन्हीं का उपयोग करते रहे। उनकी यही विशेषता थी कि जो भी वस्तु उनके पास होती थी वे उसे उपयोग योग्य रहने तक काम में लेते थे। हमें भी ऐसा ही करना चाहिए। जब तक वस्तु उपयोग योग्य हो, नई वस्तु नहीं लेनी चाहिए। 

यतात्मा - अर्थात् स्वयं पर नियन्त्रण। जैसे घर में एक टीवी होता है। सब भाई-बहन आपस में लड़ने लग जाते हैं। एक बोलेगा मुझे डोरेमोन देखना है। दूसरा बोलेगा मुझे तो बेनटेन ही देखना है। किसी दूसरे को दूसरा कार्टून देखना है। कोई बात हमें बुरी लगी तो, उस समय हमें स्वयं पर नियन्त्रण रखना है। बुरा नहीं मानना है, झगड़ना नहीं है। जैसे कक्षा में शिक्षक का प्रिय बनने के लिए हम गृहकार्य समय पर करते हैं। हमें मन लगाकर पढ़ाई करनी पड़ती है, अङ्क भी अच्छे लाने पड़ते हैं, समय से कार्य भी करना पड़ता है। जितना हम आत्म नियन्त्रण करते हैं उतने ही हम श्रीभगवान् के लिए प्रिय होते जाते हैं।



अब हम दसवाँ पेपर देखते हैं। वह है - दृढ़ निश्चय- हम जो सङ्कल्प लेते हैं, हमने जो सोचा, वह हमें पूरा करना चाहिए। एक कहावत है "जमी टल्लत, जमा टल्लत मगर बन्दा नहीं टल्लत"। टल्लत का अर्थ होता है टालना। हमें अपनी बात पर अटल रहना है। स्वामी जी ने कहा है, यदि हम टाल रहे हैं, कह रहे हैं कल से (tomorrow) करेंगें तो हमें अपने गाल पर दो चाँटे (two मारो) मारना है। tomorrow नहीं करना है।

मय्यर्पित - ईश्वर में मन और बुद्धि को समर्पित करना। परमपिता में अपना मन लगाना है। जो भी कार्य करें, श्रीभगवान् को समर्पित करते हुए करें। उनका स्मरण करते हुए करें। श्रीभगवान् कहते हैं, ऐसे भक्त मुझे बहुत प्रिय हैं।


12.15

यस्मान्नोद्विजते लोको, लोकान्नोद्विजते च यः|
हर्षामर्षभयोद्वेगै:(र्), मुक्तो यः(स्) स च मे प्रियः||15||

जिससे कोई भी प्राणी उद्विग्न (क्षुब्ध) नहीं होता और जो स्वयं भी किसी प्राणी से उद्विग्न नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेग (हलचल) से रहित है, वह मुझे प्रिय है।

विवेचन-
न्नोद्विज
- न किसी को व्याकुल (परेशान) करना और न किसी से परेशान होना। कोई हमें चिढ़ाए या हम किसी को चिढ़ाएँ यह अच्छी बात नहीं है।

अगला है हर्ष रहित - हर्ष अर्थात प्रसन्न होना, खुश रहना। अब आप सोचेंगे अपनी उपलब्धि (achievement) पर प्रसन्न नहीं होना, खुश नहीं होना, ऐसा नहीं है। प्रसन्न होना है, खुश होना है, पर बहुत अधिक नहीं, सामान्य रहना है। अत्यधिक प्रसन्न नहीं होना है।

अमर्ष - किसी से भी ईर्ष्या नहीं करना है। कोई स्पर्धा में जीत गया, किसी की प्रशँसा हुई, तो उससे हमें ईर्ष्या नहीं करनी है। ये हमारे सोलह पेपर हो गए, अर्थात् भक्त के सोलह गुण।



यह सत्रहवें नम्बर का पेपर है - भयरहित होना। ऐसा नहीं है कि शेर आ जाए तो हम डरें नहीं। हमें बिना बात नहीं डरना चाहिए। हम चूहे से डरते हैं, कॉकरोच से डरते हैं, छिपकली से डर लगता है, हमें अँधेरे से डर लगता है। हम भयरहित कैसे हो सकते हैं? उदाहरण के लिए हम कल्पना (imagine) कर सकते हैं कि छिपकली ने टोपी पहनी है, काले रङ्ग की फ्रॉक पहनी है, उसके गुलाबी गाल हैं। ऐसी कल्पना करें, तो वह हमें सुन्दर दिखाई देने लगती है, हमारा डर दूर हो जाता है। कितनी सुन्दर छिपकली है। इसी तरह, कॉकरोच के बारे में सोचें कि कॉकरोच की कितनी बड़ी-बड़ी मूँछें है। उसने कितना सुन्दर काला चश्मा पहना है। ऐसा हम माने तो फिर हमें डर नहीं लगेगा। 

उद्वेग रहित अर्थात् शीघ्र क्रोधित (aggressive) नहीं होना। छोटी-छोटी बात पर हम क्रोधित हो जाते हैं। aggressive हो जाते हैं। जिनमें ये गुण नहीं होते हैं, वे प्रिय भक्त नहीं बन पााते हैैंनहीं



12.16

अनपेक्षः(श्) शुचिर्दक्ष, उदासीनो गतव्यथः|
सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः||16||

जो अपेक्षा (आवश्यकता) से रहित, (बाहर-भीतर से) पवित्र, चतुर, उदासीन, व्यथा से रहित (औरः सभी आरम्भों का अर्थात् नये-नये कर्मों के आरम्भ का सर्वथा त्यागी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

विवेचन-
अनपेक्ष 
- किसी से अपेक्षा न रखना। परीक्षा में नब्बे प्रतिशत (90%) आने चाहिए, अस्सी प्रतिशत (80%) आने चाहिए। अपेक्षा तो करें परन्तु उसमें बहुत अधिक आसक्त न हों। आज मेरे मित्र को मुझे फोन करना चाहिए था। फिर यदि उसने आपको फोन नहीं किया तो आप दु:खी हो जाते हैं इसलिये हमें अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए।

अगला बीसवें नम्बर का पेपर है। वह है- शुचि - बाहर और अन्दर की शुद्धता। जैसे सड़क पर कचरा फेंक दिया। टॉफी खाकर रैपर फेङ्क दिया, ऐसा नहीं करना चाहिए। ठीक तरह से कचरा पात्र (डस्टबिन) में डालना चाहिए। स्कूल से आए तो हाथ धोकर शुद्धता से भोजन करना चाहिए। साफ-सफाई रखनी चाहिए। प्रतिदिन स्नान करना चाहिए।

अन्दर की शुद्धता अर्थात् निश्छलता। हमारे मन में बुरे विचार तो नहीं आ रहे। हम किसी के लिए बुरा तो नहीं सोच रहे। मन की शुद्धता के लिए, जब हम श्रीभगवान् में ध्यान लगाते हैं तो हमारे मन की अपने आप सफाई हो जाती है। 





दक्ष - 
अर्थात् हम कितनी कुशलता से कार्य करते हैं। कितने सावधान होकर हम अपना कार्य करते हैं। कुछ बच्चे बड़ी सुन्दरता से लिखते हैं, उनकी लिखाई बहुत सुन्दर होती है। वे बहुत सुन्दर अक्षर लिखते हैं। किसी की चित्रकला बहुत अच्छी होती है तो यह उनकी कुशलता होती है। यदि हमें किसी कार्य में दक्ष होना है तो बड़े ध्यान से, एकाग्रता से कार्य करना होगा। अभ्यास से कुशलता आती है।

उदासीन - अर्थात् तटस्थ (neutral)। कुछ अच्छा होता है तो प्रसन्नता से उछलना नहीं है, अधिक खुश नहीं होना है। यदि कुछ बुरा होता है तो उदास भी नहीं होना है, अधिक दु:खी नहीं होना है। 

गतव्यथ: - जिसके सारे दु:ख समाप्त हो गए। मन में कोई भी दु:ख न रहना। छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करना अच्छी बात नहीं है। 

मान लो हमें रसगुल्ला खाना है तो स्वयं से पैसे लिए और जाकर खा लिया। हमारा मन हुआ और हम स्वयं जाकर ले आए और खा लिया, ऐसा नहीं करना है। इसका मतलब यह नहीं है कि जब तक हमें कोई काम करने का नहीं कहेगा हम नहीं करेंगे।




चलो अब देखते हैं कि आप लोग ध्यान से सुन भी रहे हैं या नहीं।

प्रश्न -बारहवें अध्याय का नाम क्या है?
उत्तर- बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है।
(96%) छियानवे प्रतिशत, ज्यादातर बच्चों ने सही उत्तर दिया। जिन गुणों की अभी हमने चर्चा की है, यदि यह गुण हममें होते हैं, तो हम श्रीभगवान् के प्रिय भक्त बनते जाते हैं।

12.17

यो न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति|
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्यः(स्) स मे प्रियः||17||

जो न (कभी) हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है (और) जो शुभ-अशुभ कर्मों से ऊँचा उठा हुआ (राग-द्वेष रहित) है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

विवेचन- हमें बहुत अधिक खुश नहीं होना है। नाचने लगते हैं, गाना गाने लगते हैं ऐसा नहीं करना है।

द्वेष्टि 
- किसी से द्वेष नहीं रखना है।






शोचति - अधिक दु:खी नहीं होना है। हमारे अनुकूल कोई बात नहीं हुई तो हम बहुत दु:खी हो जाते हैं, ऐसा नहीं करना है। जैसे हमने सोचा था हमारे (90%) नब्बे प्रतिशत आएँगे और (50%) पचास प्रतिशत आए तो हम बहुत अधिक दु:खी हो जाते हैं। रोने लगते हैं, भोजन नहीं करते हैं। पूरा दिन खराब हो जाता है। यदि हम अत्यधिक दु:ख करेंगे तो श्रीभगवान् के प्रिय भक्त नहीं बन पाएँगे। 

न काङ्क्षति- अर्थात् जो कामना नहीं करता। 

उनतीस और तीस शुभ और अशुभ कर्मों का त्याग। अशुभ कर्म जैसे झूठ बोलना, चोरी करना। ये सब तो हमें नहीं करना है। सोना बुरी बात नहीं है लेकिन कई-कई घण्टों तक सोना बुरी बात है। चॉकलेट खाना बुरी बात नहीं है परन्तु बहुत ज्यादा चॉकलेट खाना बुरी बात है। 

12.18

समः(श्) शत्रौ च मित्रे च, तथा मानापमानयोः|
शीतोष्णसुखदुःखेषु, समः(स्) सङ्गविवर्जितः||18||

(जो) शत्रु और मित्र में तथा मान-अपमान में सम है (और) शीत-उष्ण (शरीर की अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःख (मन बुद्धि की अनुकूलता-प्रतिकूलता) में सम है एवं आसक्ति रहित है (और) जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला, मननशील, जिस किसी प्रकार से भी (शरीर का निर्वाह होने न होने में) संतुष्ट, रहने के स्थान तथा शरीर में ममता आसक्ति से रहित (और) स्थिर बुद्धिवाला है, (वह) भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है। (12.18-12.19)

विवेचन- शत्रु और मित्र में सम भाव। जो हमें अप्रिय हैं हम उनसे बात भी नहीं करते, ऐसा नहीं करना चाहिए। यह अच्छी बात नहीं है। जैसे हमारा जन्मदिन आता है तो हम अपने मित्रों को बुलाना चाहते हैं, परन्तु उनमें कोई ऐसा होता है जिसे मम्मी बुलाना चाहती है और वह हमें पसन्द नहीं है तो हम अजीब सा मुँह बनाने लगते हैं।

 मान - कभी हमारी बहुत प्रशंसा होती है, तो हम बहुत खुश हो जाते हैं। सबको बताते हैं।

अपमान - कभी ऐसा भी हो जाता है कि हम वह काम कर देते हैं जो हमें नहीं करना चाहिए, तो हमें सजा मिलती है। दोनों ही परिस्थितियों में, न हमें अधिक प्रसन्न होना है, और न अधिक दु:खी होना है।

शीत का अर्थ होता है ठण्ड और उष्ण का अर्थ होता है गर्मी। बहुत अधिक सर्दी और बहुत अधिक गर्मी को सम भाव से सहन करना चाहिए। हम जैसा सोचते हैं वैसा अनुभव करने लगते हैं।

सङ्गविवर्जित: - विषयों में आसक्ति न रखना। वस्तुओं से, क्रियाओं से हमें आसक्ति नहीं रखनी है। प्रतिदिन कार्टून ही देखना है। उसके बिना हम रह नहीं सकते हैं या प्रतिदिन मोबाइल का उपयोग करना ही है, ऐसा नहीं करना चाहिए।

12.19

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी, सन्तुष्टो येन केनचित्|
अनिकेतः(स्) स्थिरमति:(र्), भक्तिमान्मे प्रियो नरः||19||

विवेचन-
तुल्यनिन्दास्तुति
: - कभी ऐसा होता है कि हमारे मित्र तो हमारी प्रशंसा करते हैं और जो हमारे मित्र नहीं होते वे कभी हमारी बुराई कर देते हैं, तो ऐसे समय में भी हमें समान भाव रखना है। निन्दा और प्रशंसा में एक ही भाव रखना है। यहाॅं हमारे पैंतीस गुण पूरे हुए। 

मौनी - अर्थात् मननशील। अच्छी बातों का मन में मनन, चिन्तन करना। हमारे मन में अच्छे-अच्छे विचार आएँगे तो हमारा पूरा दिन अच्छा जाएगा।

सैंतीस नम्बर का पेपर है सन्तुष्ट - जो हमारे पास है या जो हमें मिला है उसमें सन्तुष्ट रहें।

 अड़तीस नम्बर का पेपर है अनिकेत - निकेत का अर्थ है घर। कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो स्कूल नहीं जाना चाहते, घर को छोड़कर स्कूल जाते समय बहुत रोते हैं।

स्थिरमति - हमारी बुद्धि स्थिर होनी चाहिए। हमारी बुद्धि एकाग्रचित्त हो।

12.20

ये तु धर्म्यामृतमिदं(य्ँ), यथोक्तं(म्) पर्युपासते।
श्रद्दधाना मत्परमा, भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥12.20॥

परन्तु जो (मुझ में) श्रद्धा रखने वाले (और) मेरे परायण हुए भक्त इस धर्ममय अमृत का जैसा कहा कहा है, (वैसा ही) भली भांति सेवन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।

विवेचन- अन्त मे श्रीभगवान् कहते हैं, जो बिना संशय के इन सब लक्षणों का, गुणों का, पालन करते हैं वे मुझे अत्यधिक प्रिय होते हैं।
 प्रिय भक्त के क्या लक्षण होते हैं। वह हमने इस अध्याय में देखा।

पुष्पिका - यह अध्याय की भूमिका या प्रस्तावना होती है। इसमें क्या लिखा है, क्यों लिखा है, कहाँ पर लिखा गया है, किसने लिखा? वह होता है। इसमें यह है कि श्रीकृष्ण भगवान् और अर्जुन के बीच संवाद हो रहा है। इस अध्याय का नाम है भक्तियोग। आज हमने यहाँ पर उनतालीस पेपर्स देखें और इन पेपर्स का स्कोर हुआ तीन सौ नब्बे।

श्रीभगवान् के नाम सङ्कीर्तन के साथ सत्र का समापन हुआ।

 कौन बनेगा ज्ञानपति क्विज के परिणाम  की घोषणा की गयी। Result  announcement किया  गया।
 गहना दीदी  प्रथम आई। उन्हें शत प्रतिशत (सौ में से सौ) (100/ 100) अङ्क प्राप्त हुए।

 विचार मन्थन(प्रश्नोत्तर)-

 प्रश्नकर्ता - उत्कर्ष भैया
 प्रश्न -उपनिषत्सु का क्या अर्थ है?
 उत्तर- इसका अर्थ है, उपनिषद में।
 
प्रश्नकर्ता - उत्सव भैया 
 प्रश्न - गीता परिवार का लोगो(Logo) स्वामी विवेकानन्द जी का क्यों है।
 उत्तर- स्वामी विवेकानन्द जी में वे सब गुण हैं जो स्वामी जी हम सब में लाना चाहते हैं। भगवत् -भक्ति, भगवद्गीता, देश- प्रेम आदि।
               

                               ।।श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः॥

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘भक्तियोग’ नामक बारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।