विवेचन सारांश
श्रद्धायुक्त कार्य की महत्ता
हरि सङ्कीर्तन, श्रीकृष्ण वन्दना, ईश्वर भक्ति भाव से बहती संस्कारों की धारा इस भाव पूर्ण गीत एवम् दीप प्रज्जवलन के साथ सत्र का प्रारम्भ हुआ।
पिछले सत्र में सत्रहवें अध्याय के पूर्वार्द्ध में श्रद्धा के बारे में चर्चा की गयी। व्यक्ति जैसा भाव रखता है, वैसा ही बन जाता है। अगर खेल में विशेष रुचि होगी तो खिलाड़ी बन जाएगा। मोबाइल में कई बच्चों और बड़ो को यूट्यूब देखना पसंद है, तो वे यूट्यूबर बन जाएँगे। किसी किसी में ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है, तो वे लोग ज्ञानी बन जाते है। भगवान में श्रद्धा होती है, तो भक्त बन जाते हैं। किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान के लिए मन में सन्देह रहित भाव को ही श्रद्धा कहते हैं। उसका प्रभाव भी ऐसा होता है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व और स्वभाव भी तदनुरूप बन जाता है।
भोजन और यज्ञ के बारे में जाना कि भोजन और यज्ञ भी तीन प्रकार के होते हैं, सात्त्विक, राजसी और तामसी।
अब तप और दान की बात करेंगे।
श्रद्धा तीन तरह की होती है, जिस भाव से दान करते हैं, वैसा ही दान कहलाता है। दान भी सात्विक, राजसी और तामसी हो जाता है।
बच्चों के लिए विशेष सत्र होने के कारण, सत्र को रुचिकर बनाने के लिए कुछ प्रश्नों को पूछा गया। पूर्वार्द्ध में चर्चा में आये हुए विषय को दोहराने के लिए सभी से पूछा गया कि कुछ अध्यायों के नाम और उनके साथ श्लोकों की सङ्ख्या लिखी हुई है, बीस, चौबीस, अट्ठाईस आदि। उन सङ्ख्याओं में से उस अध्याय की श्लोक सङ्ख्या बतानी है।
प्रश्न
अध्याय श्लोक सङ्ख्या दैवासुरसम्पद्विविभाग योग — बीस, चौबीस, अट्ठाईस
भक्ति योग — बीस, चौबीस, या पन्द्रह
पुरुषोत्तम योग — बीस, चौबीस, अट्ठाईस
श्रद्धात्रयविभाग योग — बीस, चौबीस, अट्ठाईस
उत्तर-
दैवासुरसम्पद्विविभाग योग — सोलहवाँ अध्याय चौबीस श्लोक
भक्ति योग — बारहवाँ अध्याय बीस श्लोक
पुरुषोत्तम योग — पन्द्रहवाँ अध्याय बीस श्लोक
श्रद्धात्रयविभाग योग — सत्रहवाँ अध्याय अट्ठाईस श्लोक
सभी बच्चों ने सही उत्तर दिए हैं।
पिछले सत्र में सत्रहवें अध्याय के पूर्वार्द्ध में श्रद्धा के बारे में चर्चा की गयी। व्यक्ति जैसा भाव रखता है, वैसा ही बन जाता है। अगर खेल में विशेष रुचि होगी तो खिलाड़ी बन जाएगा। मोबाइल में कई बच्चों और बड़ो को यूट्यूब देखना पसंद है, तो वे यूट्यूबर बन जाएँगे। किसी किसी में ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है, तो वे लोग ज्ञानी बन जाते है। भगवान में श्रद्धा होती है, तो भक्त बन जाते हैं। किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान के लिए मन में सन्देह रहित भाव को ही श्रद्धा कहते हैं। उसका प्रभाव भी ऐसा होता है कि व्यक्ति का व्यक्तित्व और स्वभाव भी तदनुरूप बन जाता है।
भोजन और यज्ञ के बारे में जाना कि भोजन और यज्ञ भी तीन प्रकार के होते हैं, सात्त्विक, राजसी और तामसी।
अब तप और दान की बात करेंगे।
श्रद्धा तीन तरह की होती है, जिस भाव से दान करते हैं, वैसा ही दान कहलाता है। दान भी सात्विक, राजसी और तामसी हो जाता है।
बच्चों के लिए विशेष सत्र होने के कारण, सत्र को रुचिकर बनाने के लिए कुछ प्रश्नों को पूछा गया। पूर्वार्द्ध में चर्चा में आये हुए विषय को दोहराने के लिए सभी से पूछा गया कि कुछ अध्यायों के नाम और उनके साथ श्लोकों की सङ्ख्या लिखी हुई है, बीस, चौबीस, अट्ठाईस आदि। उन सङ्ख्याओं में से उस अध्याय की श्लोक सङ्ख्या बतानी है।
प्रश्न
अध्याय श्लोक सङ्ख्या
भक्ति योग — बीस, चौबीस, या पन्द्रह
पुरुषोत्तम योग — बीस, चौबीस, अट्ठाईस
श्रद्धात्रयविभाग योग — बीस, चौबीस, अट्ठाईस
उत्तर-
दैवासुरसम्पद्विविभाग योग — सोलहवाँ अध्याय चौबीस श्लोक
भक्ति योग — बारहवाँ अध्याय बीस श्लोक
पुरुषोत्तम योग — पन्द्रहवाँ अध्याय बीस श्लोक
श्रद्धात्रयविभाग योग — सत्रहवाँ अध्याय अट्ठाईस श्लोक
सभी बच्चों ने सही उत्तर दिए हैं।
17.14
देवद्विजगुरुप्राज्ञ, पूजनं(म्) शौचमार्जवम्|
ब्रह्मचर्यमहिंसा च, शारीरं(न्) तप उच्यते||17.14||
देवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुष का यथायोग्य पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना और हिंसा न करना - (यह) शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
विवेचन- विवेचन के साथ साथ श्लोक पढ़ने से उच्चारण शुद्ध होते हैं।
इस श्लोक में श्रीभगवान ने शारीरिक तप के लक्षण बताये हैं। देवता, भगवान, द्विज, गुरु, प्राज्ञ का पूजन श्रद्धापूर्वक करना शारीरिक तप है।
देवता यानी अग्निदेव, इन्द्रदेव आदि।
द्विज यानी ब्राह्मण जो पूजा करवाने आते हैं। गुरुजन माता, पिता, अपने अध्यापक जो हमें पढ़ाते हैं, जो अधिक जानते हैं।
प्राज्ञ, जो विद्वान हैं, इन सबका पूजन करना शारीरिक तप है। पूजन भी श्रद्धा से किया जाना चाहिए। इसके विपरीत श्रद्धा के बिना किया हुआ पूजन शारीरिक तप नहीं हुआ।
इसके बाद शौच की बात आयी है। इसकी चर्चा सोलहवें अध्याय में आ चुकी है। शौच यानी पवित्रता। पवित्रता, भीतर, बाहर दोनों की होनी चाहिए। हमने अपना कमरा, वस्त्र, थैला तो साफ़ सुथरा रख लिया, उससे ही नहीं होगा, वातावरण भी स्वस्थ और पवित्र रखना होगा। इसी तरह
आर्जवम् - सोलहवें अध्याय के प्रथम श्लोक में देखा था-
उदाहरण-
चलचित्र में किसी कार्टून के दृश्यों को देख रहे हैं, तभी यदि कोई बड़ा आ गया तो तुरन्त उसे बदलकर भगवान का चैनल चला दें तो वह आर्जवम् नहीं हुआ।
ब्रह्मचर्य
यानी अपनी क्रियाओं पर नियन्त्रण रहना। पढ़ाई के समय केवल पढ़ना, खेलने नहीं जाना, अपनी क्रियाओं पर नियन्त्रण ही ब्रह्मचर्य है।
अहिंसा
सोलहवें अध्याय में अहिंसा की चर्चा भी आयी थी। किसी को भी किसी प्रकार का कष्ट नहीं देना, तङ्ग नहीं करना ही अहिंसा है। चाँटा भी मार दिया तो वह भी हिंसा ही हुई।
बड़ों का आदर करना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना, अहिंसा करना शारीरिक तप कहलाता है।
बच्चों का सत्र होने के कारण गूढ़ विषयों को भी बच्चों को समझ आने वाली, उनके जीवन में होने वाली गतिविधियों को ही उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
बच्चों की रुचि बनाए रखने हेतु पुनः प्रश्न पूछे गए -
प्रश्न
आर्जवम् का क्या अर्थ होता है। चार उत्तर लिखे गए हैं, प्रसन्नता, दान, सरलता, अर्चना। जिसने ध्यान से सुना होगा, वही उत्तर दे पाएगा।
उत्तर
सरलता
वाणी का तप-
बोलते तो सही हैं, पर कठोर शब्द बोलते हैं, उससे सामने वाले को यदि दुःख होता है तो वह भी हिंसा है।
इस श्लोक में श्रीभगवान ने शारीरिक तप के लक्षण बताये हैं। देवता, भगवान, द्विज, गुरु, प्राज्ञ का पूजन श्रद्धापूर्वक करना शारीरिक तप है।
देवता यानी अग्निदेव, इन्द्रदेव आदि।
द्विज यानी ब्राह्मण जो पूजा करवाने आते हैं। गुरुजन माता, पिता, अपने अध्यापक जो हमें पढ़ाते हैं, जो अधिक जानते हैं।
प्राज्ञ, जो विद्वान हैं, इन सबका पूजन करना शारीरिक तप है। पूजन भी श्रद्धा से किया जाना चाहिए। इसके विपरीत श्रद्धा के बिना किया हुआ पूजन शारीरिक तप नहीं हुआ।
इसके बाद शौच की बात आयी है। इसकी चर्चा सोलहवें अध्याय में आ चुकी है। शौच यानी पवित्रता। पवित्रता, भीतर, बाहर दोनों की होनी चाहिए। हमने अपना कमरा, वस्त्र, थैला तो साफ़ सुथरा रख लिया, उससे ही नहीं होगा, वातावरण भी स्वस्थ और पवित्र रखना होगा। इसी तरह
आर्जवम् - सोलहवें अध्याय के प्रथम श्लोक में देखा था-
अभयं सत्त्व संशुद्धिर्ज्ञानयोग व्यवस्थिति:।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्याय स्तप आर्जवम्।। 16•01।।
आर्जवम् यानी सरलता। भीतर और बाहर दोनों तरह से हम सरल रहें, एक जैसे रहें। बोलते कुछ हैं, करते कुछ और हैं, तो यह सरलता नहीं हुई।दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्याय स्तप आर्जवम्।। 16•01।।
उदाहरण-
चलचित्र में किसी कार्टून के दृश्यों को देख रहे हैं, तभी यदि कोई बड़ा आ गया तो तुरन्त उसे बदलकर भगवान का चैनल चला दें तो वह आर्जवम् नहीं हुआ।
ब्रह्मचर्य
यानी अपनी क्रियाओं पर नियन्त्रण रहना। पढ़ाई के समय केवल पढ़ना, खेलने नहीं जाना, अपनी क्रियाओं पर नियन्त्रण ही ब्रह्मचर्य है।
अहिंसा
सोलहवें अध्याय में अहिंसा की चर्चा भी आयी थी। किसी को भी किसी प्रकार का कष्ट नहीं देना, तङ्ग नहीं करना ही अहिंसा है। चाँटा भी मार दिया तो वह भी हिंसा ही हुई।
बड़ों का आदर करना, सरलता, ब्रह्मचर्य का पालन करना, अहिंसा करना शारीरिक तप कहलाता है।
बच्चों का सत्र होने के कारण गूढ़ विषयों को भी बच्चों को समझ आने वाली, उनके जीवन में होने वाली गतिविधियों को ही उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
बच्चों की रुचि बनाए रखने हेतु पुनः प्रश्न पूछे गए -
प्रश्न
आर्जवम् का क्या अर्थ होता है। चार उत्तर लिखे गए हैं, प्रसन्नता, दान, सरलता, अर्चना। जिसने ध्यान से सुना होगा, वही उत्तर दे पाएगा।
उत्तर
सरलता
वाणी का तप-
बोलते तो सही हैं, पर कठोर शब्द बोलते हैं, उससे सामने वाले को यदि दुःख होता है तो वह भी हिंसा है।
अनुद्वेगकरं(म्) वाक्यं(म्), सत्यं(म्) प्रियहितं(ञ्) च यत्|
स्वाध्यायाभ्यसनं(ञ्) चैव, वाङ्मयं(न्) तप उच्यते||17.15||
जो किसी को भी उद्विग्न न करने वाला, सत्य और प्रिय तथा हितकारक भाषण है (वह) तथा स्वाध्याय और अभ्यास (नाम जप आदि) भी - यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
विवेचन- किसी का अनुद्वेग नहीं करना यानी उदास या दुःखी नहीं करना। कुछ भी बोलें सत्य बोलें, किन्तु रुचिकर नहीं होगा तो अनुद्वेग पैदा हो जाएगा।
कड़े शब्दों का प्रयोग सुनने वाले के लिए कष्टदायी होता है।
इसे एक कहानी द्वारा समझ सकते हैं-
एक राजा ने ज्योतिषियों को बुला कर अपनी आयु पूछी। एक ज्योतिषी ने बताया कि महाराज आपकी आयु इतनी लम्बी है कि आपके परिवार, स्वजन आपके सामने ही मर जाएँगे। राजा को क्रोध आ गया, उसने उस ज्योतिषी को कारागार में डाल दिया।
उसी ज्योतिषी का भाई था, वह चतुर था, उसने राजा की जन्मपत्री देखी और बोला, आपकी दीर्घायु है। बहुत वर्षों तक राज्य का सुख भोग करेंगे।
दोनों ने ही सत्य कहा, किन्तु बोलने के तरीक़े से एक से राजा नाराज़ हो गया, तो एक से प्रसन्न।
माता- पिता से कुछ भी बोल रहे हों तो सम्मान के साथ बोलना चाहिए।
किसी मित्र या सम्बन्धी के कपड़े बुरे लगे तो सीधे सीधे मुँह पर ही बोल देना उचित नहीं है। मैं तो मन का साफ़ हूँ, मुझे बनावटी बात करनी नहीं आती, जो भी बोलना हैं, मुँह पर ही बोलता हूँ। ये प्रियम् वद नहीं हुआ। वाणी का भी तप होता है। सभी तपों का अनुसरण करना चाहिए।
स्वाध्याय-
पढ़ाई। श्रीमद्भगवद्गीता का वाचन भी स्वाध्याय है। श्रीभगवान का नाम जप करना चाहिए। ये सब वाणी सम्बन्धी तप कहलाते हैं।
सत्यं वद प्रियम् वद
कड़े शब्दों का प्रयोग सुनने वाले के लिए कष्टदायी होता है।
इसे एक कहानी द्वारा समझ सकते हैं-
एक राजा ने ज्योतिषियों को बुला कर अपनी आयु पूछी। एक ज्योतिषी ने बताया कि महाराज आपकी आयु इतनी लम्बी है कि आपके परिवार, स्वजन आपके सामने ही मर जाएँगे। राजा को क्रोध आ गया, उसने उस ज्योतिषी को कारागार में डाल दिया।
उसी ज्योतिषी का भाई था, वह चतुर था, उसने राजा की जन्मपत्री देखी और बोला, आपकी दीर्घायु है। बहुत वर्षों तक राज्य का सुख भोग करेंगे।
दोनों ने ही सत्य कहा, किन्तु बोलने के तरीक़े से एक से राजा नाराज़ हो गया, तो एक से प्रसन्न।
माता- पिता से कुछ भी बोल रहे हों तो सम्मान के साथ बोलना चाहिए।
किसी मित्र या सम्बन्धी के कपड़े बुरे लगे तो सीधे सीधे मुँह पर ही बोल देना उचित नहीं है। मैं तो मन का साफ़ हूँ, मुझे बनावटी बात करनी नहीं आती, जो भी बोलना हैं, मुँह पर ही बोलता हूँ। ये प्रियम् वद नहीं हुआ। वाणी का भी तप होता है। सभी तपों का अनुसरण करना चाहिए।
स्वाध्याय-
पढ़ाई। श्रीमद्भगवद्गीता का वाचन भी स्वाध्याय है। श्रीभगवान का नाम जप करना चाहिए। ये सब वाणी सम्बन्धी तप कहलाते हैं।
मनः(फ्) प्रसादः(स्) सौम्यत्वं(म्), मौनमात्मविनिग्रहः|
भावसंशुद्धिरित्येतत्, तपो मानसमुच्यते||17.16||
मन की प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मन का निग्रह (और) भावों की भली भाँति शुद्धि - इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
विवेचन- मानसिक तप के लक्षण क्या हैं?
मन से किसी के लिए भी बुरा सोचते हैं तो मानसिक तप में आ जाता है। अच्छा सोचना मानसिक तप है। मानसिक तप में मन भीतर और बाहर से प्रसन्न रहता है। अन्दर से प्रसन्न रहता है, तो चेहरा भी खिला हुआ होता है। प्रसन्न रहने पर माता-पिता और मित्र पूछते हैं कि क्या बात है, इतने खुश कैसे लग रहे हो?
चेहरे पर सौम्यता होनी चाहिए।
मौन रहना मानसिक तप है। कुछ समय शान्ति से बैठ कर श्रीभगवान का चिन्तन करना चाहिए। मौन में बैठ कर यदि खेल का चिन्तन कर रहे हैं, तो मौन नहीं हुआ।
एकादशी के व्रत वाले दिन मौन रहने से वाणी का तप बढ़ता है।
आत्मनिग्रह-
अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना चाहिए। जिस समय जो काम कर रहे हैं उसे पूरी तरह ध्यान देकर करना चाहिए। जब पढ़ना है तब पढ़ें। जब भोजन करें या कुछ खायें तो वही करें।
कक्षा में बैठे हैं, शिक्षिका पढ़ा रही हैं, मन कहीं और विचरण करेगा तो कक्षा में कुछ भी समझ नहीं आएगा।
विचार भी शुद्ध होने चाहिए। कोई भी झूठ या चोरी करने के लिए नहीं कहता। हम जैसा चिन्तन करेंगे, वैसे ही बन जाएँगे। वैसी ही क्रियाएँ होगीं।
मन की प्रसन्नता, क्रियाओं, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुद्ध विचार, ये मानसिक तप हैं। इनको हम मानेंगे तो श्रीभगवान के प्रिय हो जाएँगे।
मन से किसी के लिए भी बुरा सोचते हैं तो मानसिक तप में आ जाता है। अच्छा सोचना मानसिक तप है। मानसिक तप में मन भीतर और बाहर से प्रसन्न रहता है। अन्दर से प्रसन्न रहता है, तो चेहरा भी खिला हुआ होता है। प्रसन्न रहने पर माता-पिता और मित्र पूछते हैं कि क्या बात है, इतने खुश कैसे लग रहे हो?
चेहरे पर सौम्यता होनी चाहिए।
मौन रहना मानसिक तप है। कुछ समय शान्ति से बैठ कर श्रीभगवान का चिन्तन करना चाहिए। मौन में बैठ कर यदि खेल का चिन्तन कर रहे हैं, तो मौन नहीं हुआ।
एकादशी के व्रत वाले दिन मौन रहने से वाणी का तप बढ़ता है।
आत्मनिग्रह-
अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना चाहिए। जिस समय जो काम कर रहे हैं उसे पूरी तरह ध्यान देकर करना चाहिए। जब पढ़ना है तब पढ़ें। जब भोजन करें या कुछ खायें तो वही करें।
कक्षा में बैठे हैं, शिक्षिका पढ़ा रही हैं, मन कहीं और विचरण करेगा तो कक्षा में कुछ भी समझ नहीं आएगा।
विचार भी शुद्ध होने चाहिए। कोई भी झूठ या चोरी करने के लिए नहीं कहता। हम जैसा चिन्तन करेंगे, वैसे ही बन जाएँगे। वैसी ही क्रियाएँ होगीं।
मन की प्रसन्नता, क्रियाओं, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुद्ध विचार, ये मानसिक तप हैं। इनको हम मानेंगे तो श्रीभगवान के प्रिय हो जाएँगे।
श्रद्धया परया तप्तं(न्), तपस्तत्त्रिविधं(न्) नरैः|
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः(स्), सात्त्विकं(म्) परिचक्षते||17.17||
परम श्रद्धा से युक्त फलेच्छा रहित मनुष्यों के द्वारा (जो) तीन प्रकार (शरीर, वाणी और मन) - का तप किया जाता है, उसको सात्त्विक कहते हैं।
विवेचन- इस श्लोक में सात्त्विक तप के लक्षण बताये गए हैं।
अब श्रीभगवान बताते हैं कि सात्त्विक तप क्या है?
इच्छारहित जो भी कार्य करते हैं वह सात्त्विक तप कहलाता है। फल की इच्छा नहीं हैं। जो भी कार्य कर रहे हैं उसे सेवा समझ कर करें, श्रीभगवान का कार्य श्रीभगवान के लिए कर रहे हैं यह सोच कर करें, तो यह सात्त्विक तप कहलाएगा।
आगे राजसी तप के बारे में बतायेंगे।
अब श्रीभगवान बताते हैं कि सात्त्विक तप क्या है?
इच्छारहित जो भी कार्य करते हैं वह सात्त्विक तप कहलाता है। फल की इच्छा नहीं हैं। जो भी कार्य कर रहे हैं उसे सेवा समझ कर करें, श्रीभगवान का कार्य श्रीभगवान के लिए कर रहे हैं यह सोच कर करें, तो यह सात्त्विक तप कहलाएगा।
आगे राजसी तप के बारे में बतायेंगे।
सत्कारमानपूजार्थं(न्), तपो दम्भेन चैव यत्|
क्रियते तदिह प्रोक्तं(म्), राजसं(ञ्) चलमध्रुवम्||17.18||
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये तथा दिखाने के भाव से किया जाता है, वह इस लोक में अनिश्चित (और) नाशवान फल देने वाला (तप) राजस कहा गया है।
विवेचन- जो तप स्वयं की प्रशंसा, पूजा, सत्कार के लिए करते हैं, वह राजसी तप होता है।
जैसे हमें अपने माता-पिता, गुरुजनों को प्रणाम करना चाहिए। यदि कोई अतिथि आ जाए तो उसको देख कर हम माता-पिता को प्रणाम करें तो यह राजसी तप कहलाएगा क्योंकि हम चाहते हैं कि अतिथि हमारी प्रशंसा करें।
दिखावे के लिए किया जाने वाला कोई भी कार्य राजसी तप कहलाता है।
यदि हम चाहते हैं कि कोई ये समझे कि हम अच्छे बच्चें हैं, इसलिए हम अच्छा व्यवहार करेंगे, तो यह राजसी तप हो गया।
राजसी तप में स्वयं की इच्छा और फल की इच्छा प्रमुख होती है।
आगे तामसी तप के बारे में बतायेंगे।
जैसे हमें अपने माता-पिता, गुरुजनों को प्रणाम करना चाहिए। यदि कोई अतिथि आ जाए तो उसको देख कर हम माता-पिता को प्रणाम करें तो यह राजसी तप कहलाएगा क्योंकि हम चाहते हैं कि अतिथि हमारी प्रशंसा करें।
दिखावे के लिए किया जाने वाला कोई भी कार्य राजसी तप कहलाता है।
यदि हम चाहते हैं कि कोई ये समझे कि हम अच्छे बच्चें हैं, इसलिए हम अच्छा व्यवहार करेंगे, तो यह राजसी तप हो गया।
राजसी तप में स्वयं की इच्छा और फल की इच्छा प्रमुख होती है।
आगे तामसी तप के बारे में बतायेंगे।
मूढग्राहेणात्मनो यत्, पीडया क्रियते तपः|
परस्योत्सादनार्थं(म्) वा, तत्तामसमुदाहृतम्||17.19||
जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से अपने को पीड़ा देकर अथवा दूसरों को कष्ट देने के लिये किया जाता है, वह (तप) तामस कहा गया है।
विवेचन- तामसी तप- हठपूर्वक किया हुआ कार्य, जो दूसरों को कष्ट पहुँचाता है, तामसी तप कहा जाता है।
जैसे पूजा के पण्डाल सजते हैं, उसमे पूजा, मन्त्रोच्चारण न हो कर ज़ोर-ज़ोर से चलचित्रों के गीत बजें और नृत्य हों तो यह सब तामसी तप हुआ।
शास्त्रोक्त विधि से पूजा न करते हुए हमारे मन के अनुसार की जाए तो वह तामसिक तप कहलाता है।
श्रीभगवान की पूजा मन्त्रोचारण से, शास्त्रों के विधि विधान से होती है तो सात्त्विक तप में आती है।
अगले श्लोक में श्रीभगवान सात्त्विक, राजसी, तामसी दान के लक्षण बताते हैं।
जैसे पूजा के पण्डाल सजते हैं, उसमे पूजा, मन्त्रोच्चारण न हो कर ज़ोर-ज़ोर से चलचित्रों के गीत बजें और नृत्य हों तो यह सब तामसी तप हुआ।
शास्त्रोक्त विधि से पूजा न करते हुए हमारे मन के अनुसार की जाए तो वह तामसिक तप कहलाता है।
श्रीभगवान की पूजा मन्त्रोचारण से, शास्त्रों के विधि विधान से होती है तो सात्त्विक तप में आती है।
अगले श्लोक में श्रीभगवान सात्त्विक, राजसी, तामसी दान के लक्षण बताते हैं।
दातव्यमिति यद्दानं(न्), दीयतेऽनुपकारिणे|
देशे काले च पात्रे च, तद्दानं(म्) सात्त्विकं(म्) स्मृतम्||17.20||
दान देना कर्तव्य है - ऐसे भाव से जो दान देश, काल और पात्र के प्राप्त होने पर अनुपकारी को अर्थात् निष्काम भाव से दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।
विवेचन- सात्त्विक दान कौन सा है? यह बताते हुए श्रीभगवान कहते हैं कि जो दान कर्त्तव्य समझ कर किया जाता है, किसी पर दया समझ कर नहीं, वह दान सात्त्विक होगा। श्रीभगवान की पूजा कर, उनको याद करके, शुद्ध भाव से दिये जाने वाले दान से किसी का कल्याण होगा तो वह सात्त्विक दान होगा।
दान देश, काल, पात्र के अनुरूप हो, जहाँ जिस वस्तु का अभाव हो, वहाँ वह दी जाय तो सात्त्विक दान हुआ।
यदि किसी व्यक्ति के पास भोजन है और हम उसे भोजन ही दे दें तो वह दान सात्त्विक नहीं हो सकता।
देश, काल, पात्र का अर्थ जिस व्यक्ति को अभाव है उसी को भोजन, वस्त्र, दवा देना चाहिए। जिसके पास है, उसी को देने का अर्थ व्यर्थ में दिया गया दान है। जो सम्पन्न हो वह दान का पात्र नहीं है।
भूखे, बीमार, अनाथ को बिना स्वयं के लिए फल की इच्छा के किया दिया गया दान, सात्त्विक दान होगा।
दान देश, काल, पात्र के अनुरूप हो, जहाँ जिस वस्तु का अभाव हो, वहाँ वह दी जाय तो सात्त्विक दान हुआ।
यदि किसी व्यक्ति के पास भोजन है और हम उसे भोजन ही दे दें तो वह दान सात्त्विक नहीं हो सकता।
देश, काल, पात्र का अर्थ जिस व्यक्ति को अभाव है उसी को भोजन, वस्त्र, दवा देना चाहिए। जिसके पास है, उसी को देने का अर्थ व्यर्थ में दिया गया दान है। जो सम्पन्न हो वह दान का पात्र नहीं है।
भूखे, बीमार, अनाथ को बिना स्वयं के लिए फल की इच्छा के किया दिया गया दान, सात्त्विक दान होगा।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं(म्), फलमुद्दिश्य वा पुनः|
दीयते च परिक्लिष्टं(न्), तद्दानं(म्) राजसं(म्) स्मृतम्||17.21||
किन्तु जो (दान) क्लेशपूर्वक और प्रत्युपकार के लिये अथवा फल-प्राप्ति का उद्देश्य बनाकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।
विवेचन- राजसी दान सात्त्विक दान जैसा ही होता है।
भीतर से फल की इच्छा होती है, मुझे स्वर्ग मिल जाये, मेरा समाज में नाम हो जाये, आदर मिले, लोग प्रशंसा करें, इस भाव या इच्छा से दिया हुआ दान राजसी दान है।
फल की इच्छा रखते हुए जो दान किया जाता है, राजसी दान कहलाता है।
भीतर से फल की इच्छा होती है, मुझे स्वर्ग मिल जाये, मेरा समाज में नाम हो जाये, आदर मिले, लोग प्रशंसा करें, इस भाव या इच्छा से दिया हुआ दान राजसी दान है।
फल की इच्छा रखते हुए जो दान किया जाता है, राजसी दान कहलाता है।
अदेशकाले यद्दानम्, अपात्रेभ्यश्च दीयते|
असत्कृतमवज्ञातं(न्), तत्तामसमुदाहृतम्||17.22||
जो दान बिना सत्कार के तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और काल में कुपात्र को दिया जाता है, वह (दान) तामस कहा गया है।
विवेचन- जिसके पास खाना भोजन सब कुछ है, यानी जिसको आवश्यकता नहीं है, उसको दिया हुआ दान तामसी है।
बच्चों के साथ, बच्चों के लिए सत्र होने के कारण बच्चों की बातें भी हैं। ये सत्र को रुचिकर भी बनाता है। जैसे डॉक्टर ने अनिरुद्ध को कहा, चॉकलेट नहीं खाना, तुम्हारे दाँत में कीड़े हैं, फिर भी उसको चॉकलेट या मिठाई देते हैं, तो यह तामसी दान हुआ।
कक्षा में एक बच्चा पुस्तक माँगता है, गृहकार्य जानना चाहता है, हम उसे पुस्तक देते हुए, या गृहकार्य बताते हुए नखरे दिखाएँ, या उसकी बात सुने ही नहीं, यदि पुस्तक दें या गृहकार्य बतायें भी तो मुँह बना कर या उस पर कृपा करने के भाव से, तो वह तामसी दान कहलाएगा।
गीता जी का अध्ययन करने वाले बच्चें अच्छे होते हैं, वे ऐसा ग़लत कार्य नहीं करते हैं। गीता पढ़ने से धीरे धीरे सीख जाएँगे।
बच्चों का ध्यान बनाए रखने के लिए पुनः उनसे प्रश्न पूछे गए -
प्रश्न- कौन-कौन सात्त्विक दान करते हैं।
उत्तर- कुछ तामसी, कुछ राजसी, कुछ सात्त्विक दान करते हैं। अधिकतर लोग सात्त्विक दान ही करते हैं। जिन्होंने तामसी कहा है, वो साधुवाद के पात्र हैं, इन्होंने सरलता से, सच सच बता दिया है।
आगे के श्लोक में श्रीभगवान अपने नाम बतायेंगे।
सभी का कोई न कोई नाम होता है। जैसे- श्रीराम, राणा, गार्गी आदि। हम सबको नाम से पुकारते हैं। नाम नहीं हो तो किसी को भी बुलाने में कठिनाई होती है। क्या लाल कपड़े पहना हुआ बच्चा कहकर बुलाया जाएगा? फिर अगर दूसरे किसी बच्चे ने भी लाल कपड़े पहन रखे हैं, तो कैसे पुकारा जाएगा?
सबके नाम होते हैं, वैसे ही श्रीभगवान भी कह रहे हैं, उनके नाम हैं, “ओम्, तत्, सत्”।
पूजा करते हुए, शास्त्र पढ़ते हुए, मङ्गल कार्य में श्रीभगवान का नाम लेते हैं। इन तीनों नामों को देखतें हैं।
बच्चों के साथ, बच्चों के लिए सत्र होने के कारण बच्चों की बातें भी हैं। ये सत्र को रुचिकर भी बनाता है। जैसे डॉक्टर ने अनिरुद्ध को कहा, चॉकलेट नहीं खाना, तुम्हारे दाँत में कीड़े हैं, फिर भी उसको चॉकलेट या मिठाई देते हैं, तो यह तामसी दान हुआ।
कक्षा में एक बच्चा पुस्तक माँगता है, गृहकार्य जानना चाहता है, हम उसे पुस्तक देते हुए, या गृहकार्य बताते हुए नखरे दिखाएँ, या उसकी बात सुने ही नहीं, यदि पुस्तक दें या गृहकार्य बतायें भी तो मुँह बना कर या उस पर कृपा करने के भाव से, तो वह तामसी दान कहलाएगा।
गीता जी का अध्ययन करने वाले बच्चें अच्छे होते हैं, वे ऐसा ग़लत कार्य नहीं करते हैं। गीता पढ़ने से धीरे धीरे सीख जाएँगे।
बच्चों का ध्यान बनाए रखने के लिए पुनः उनसे प्रश्न पूछे गए -
प्रश्न- कौन-कौन सात्त्विक दान करते हैं।
उत्तर- कुछ तामसी, कुछ राजसी, कुछ सात्त्विक दान करते हैं। अधिकतर लोग सात्त्विक दान ही करते हैं। जिन्होंने तामसी कहा है, वो साधुवाद के पात्र हैं, इन्होंने सरलता से, सच सच बता दिया है।
आगे के श्लोक में श्रीभगवान अपने नाम बतायेंगे।
सभी का कोई न कोई नाम होता है। जैसे- श्रीराम, राणा, गार्गी आदि। हम सबको नाम से पुकारते हैं। नाम नहीं हो तो किसी को भी बुलाने में कठिनाई होती है। क्या लाल कपड़े पहना हुआ बच्चा कहकर बुलाया जाएगा? फिर अगर दूसरे किसी बच्चे ने भी लाल कपड़े पहन रखे हैं, तो कैसे पुकारा जाएगा?
सबके नाम होते हैं, वैसे ही श्रीभगवान भी कह रहे हैं, उनके नाम हैं, “ओम्, तत्, सत्”।
पूजा करते हुए, शास्त्र पढ़ते हुए, मङ्गल कार्य में श्रीभगवान का नाम लेते हैं। इन तीनों नामों को देखतें हैं।
ॐ तत्सदिति निर्देशो, ब्रह्मणस्त्रिविधः(स्) स्मृतः|
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च, यज्ञाश्च विहिताः(फ्) पुरा||17.23||
ऊँ, तत् और सत् - इन तीन प्रकार के नामों से (जिस) परमात्मा का निर्देश (संकेत) किया गया है, उसी परमात्मा से सृष्टि के आदि में वेदों तथा ब्राह्मणों और यज्ञों की रचना हुई है।
विवेचन- श्रीभगवान को दर्शाने के लिए, ॐ, तत् , सत् नाम बतलाए गये हैं। श्रीभगवान का पूजा में आह्वान करने के लिए ये तीन नाम लिए जाते हैं।
ब्राह्मण मन्त्र उच्चारण के समय भी ॐ का उच्चारण करते हैं। शास्त्रों के पाठ में भी ॐ तत् सत् बोल कर भगवान को बुलाया जाता है।
गीताजी में भी अध्याय के अन्त में पुष्पिका भी ॐ तत्सदिति, श्रीमद्भगवद्गीता से ही प्रारम्भ होती है।
आगे तीनों नामों की महत्ता जानेंगे।
ब्राह्मण मन्त्र उच्चारण के समय भी ॐ का उच्चारण करते हैं। शास्त्रों के पाठ में भी ॐ तत् सत् बोल कर भगवान को बुलाया जाता है।
गीताजी में भी अध्याय के अन्त में पुष्पिका भी ॐ तत्सदिति, श्रीमद्भगवद्गीता से ही प्रारम्भ होती है।
आगे तीनों नामों की महत्ता जानेंगे।
तस्मादोमित्युदाहृत्य, यज्ञदानतपः(ख्) क्रियाः|
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः(स्), सततं(म्) ब्रह्मवादिनाम्||17.24||
इसलिये वैदिक सिद्धान्तों को मानने वाले पुरुषों की शास्त्रविधि से नियत यज्ञ, दान और तप रूप क्रियाएँ सदा 'ॐ’ इस परमात्मा के नाम का उच्चारण करके (ही) आरम्भ होती हैं।
विवेचन- श्रेष्ठ पुरुष, योगीजन श्रीभगवान की प्राप्ति के लिए शास्त्रानुरूप यज्ञ, तप, दान आदि क्रियाएँ करते हैं। इनका आरम्भ ॐ के उच्चारण से ही होता है।
भगवद्गीता में भी अध्याय का आरम्भ ॐ श्री परमात्मने नमः से होता है। शुभ कार्य, मङ्गल कार्य या किसी भी कार्यक्रम का आरम्भ भी ॐ से ही होता है।
विष्णुसहस्र नामावली, ॐ विष्णवे नमः से शुरू होती है। शुभ कार्य और कर्म ॐ नाम से ही शुरू होते हैं।
अगला नाम है तत्। तत् नाम में क्या-क्या है? यह आगे बतलायेंगे।
भगवद्गीता में भी अध्याय का आरम्भ ॐ श्री परमात्मने नमः से होता है। शुभ कार्य, मङ्गल कार्य या किसी भी कार्यक्रम का आरम्भ भी ॐ से ही होता है।
विष्णुसहस्र नामावली, ॐ विष्णवे नमः से शुरू होती है। शुभ कार्य और कर्म ॐ नाम से ही शुरू होते हैं।
अगला नाम है तत्। तत् नाम में क्या-क्या है? यह आगे बतलायेंगे।
तदित्यनभिसन्धाय, फलं(म्) यज्ञतपः(ख्) क्रियाः|
दानक्रियाश्च विविधाः(ख्), क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभि:||17.25||
तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा के लिये ही सब कुछ है - ऐसा मान कर मुक्ति चाहने वाले मनुष्यों द्वारा फल की इच्छा से रहित होकर अनेक प्रकार की यज्ञ और तप रूप क्रियाएँ तथा दान रूप क्रियाएँ की जाती हैं।
विवेचन- सब कुछ परमात्मा का ही है ऐसे भाव से, फल की इच्छा के बिना मनुष्य जो यज्ञ, तप, दान कल्याण की दृष्टि से करते हैं, उसमें तत् का प्रयोग करते हैं।
सद्भावे साधुभावे च, सदित्येतत्प्रयुज्यते|
प्रशस्ते कर्मणि तथा, सच्छब्दः(फ्) पार्थ युज्यते||17.26||
हे पार्थ ! सत्- ऐसा यह परमात्मा का नाम सत्ता मात्र में और श्रेष्ठ भाव में प्रयोग किया जाता है तथा प्रशंसनीय कर्म के साथ 'सत्' शब्द जोड़ा जाता है।
विवेचन- परमात्मा का यह नाम सत्य का भाव दर्शाता है। सत् शब्द का अर्थ है- अच्छा, उच्च स्तर, श्रेष्ठता आदि।
सादा जीवन, उच्च विचार
सत् शब्द का प्रयोग सत्य भाव, श्रेष्ठ भाव में श्रीभगवान के लिए किया जाता है। किसी भी अच्छे कार्य को दर्शाने हेतु सत् का प्रयोग किया जाता है।
जैसे- सत्सङ्ग, सत् विचार, सत्कार्य आदि।
सादा जीवन, उच्च विचार
सत् शब्द का प्रयोग सत्य भाव, श्रेष्ठ भाव में श्रीभगवान के लिए किया जाता है। किसी भी अच्छे कार्य को दर्शाने हेतु सत् का प्रयोग किया जाता है।
जैसे- सत्सङ्ग, सत् विचार, सत्कार्य आदि।
यज्ञे तपसि दाने च, स्थितिः(स्) सदिति चोच्यते|
कर्म चैव तदर्थीयं(म्), सदित्येवाभिधीयते||17.27||
यज्ञ तथा तप और दान रूप क्रिया में (जो) स्थिति (निष्ठा) है, (वह) भी 'सत्' - ऐसे कही जाती है और उस परमात्मा के निमित्त किया जाने वाला कर्म भी 'सत्' - ऐसा ही कहा जाता है।
विवेचन- जो यज्ञ, तप, दान करते हैं, वो सत् ही कहलायेंगे। सत् का अर्थ है अच्छा। यदि हम बुरा करते हैं तो वह असत्य हो जाता है।
जो हमेशा से है वही सत् है, सनातन है। यज्ञ, तप अनादिकाल से चले आ रहें हैं, अचानक नहीं आए हैं।
परमात्मा के लिए की जाने वाली ये सारी क्रियाएँ सनातन हैं।
जो हमेशा से है वही सत् है, सनातन है। यज्ञ, तप अनादिकाल से चले आ रहें हैं, अचानक नहीं आए हैं।
परमात्मा के लिए की जाने वाली ये सारी क्रियाएँ सनातन हैं।
अश्रद्धया हुतं(न्) दत्तं(न्), तपस्तप्तं(ङ्) कृतं(ञ्) च यत्|
असदित्युच्यते पार्थ, न च तत्प्रेत्य नो इह||17.28||
हे पार्थ ! अश्रद्धा से किया हुआ हवन, दिया हुआ दान (और) तपा हुआ तप तथा (और भी) जो कुछ किया जाय, (वह सब) 'असत्' - ऐसा कहा जाता है। उसका (फल) न तो यहाँ होता है और न मरने के बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता।
विवेचन- यह बहुत महत्वपूर्ण श्लोक है। श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं, हे अर्जुन! श्रद्धारहित जो यज्ञ, तप, दान किया जाता है, वह असत् कहलाता है।
सन्देह रहित और विश्वास अर्थात् पूर्ण श्रद्धा से किया हुआ यज्ञ, दान और तप सत् है।
माँ के कहने पर पूजा, दान करते हैं, परन्तु श्रद्धा नहीं है, तो लाभ तो मिलेगा परन्तु पूर्ण श्रद्धा होने से पूर्ण लाभ मिलेगा। श्रद्धा रहित दान, तप से न तो इस लोक में लाभ मिलता है, न परलोक में ही। श्रद्धा बहुत महत्त्वपूर्ण है।
तिलक लगाते हैं तो यह श्रद्धा होनी चाहिए कि आज्ञा चक्र स्थिर होगा, बुद्धि का विकास होगा। माता- पिता को प्रणाम करने से अच्छे विचार आयेंगे। श्रद्धा अत्यन्त आवश्यक है। जो भी हम करेंगे उसे पूरी श्रद्धा के साथ करेंगे तभी हमारा कल्याण होगा।
प्रश्न- श्रद्धा कितने तरह की होती है।
उत्तर- सबने अलग अलग उत्तर दिये हैं। किसी ने तीन, चार, पाँच, बतायी हैं।
अधिकतर बच्चों ने तीन कहा है। सात्त्विक, राजसी, तामसी।
अध्याय का नाम भी है श्रद्धात्रयविभाग योग। तीन प्रकार की श्रद्धा के बारे में बताया गया है, इसीलिए इस अध्याय का नाम भी श्रद्धात्रयविभाग योग है। जीवन में जैसा बनना चाहते हैं, वैसी श्रद्धा का विकास अपने में करना होगा।
हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए सत्र का समापन हुआ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता –चार्मी दीदी
।।कृष्णार्पणमस्तु।।
सन्देह रहित और विश्वास अर्थात् पूर्ण श्रद्धा से किया हुआ यज्ञ, दान और तप सत् है।
माँ के कहने पर पूजा, दान करते हैं, परन्तु श्रद्धा नहीं है, तो लाभ तो मिलेगा परन्तु पूर्ण श्रद्धा होने से पूर्ण लाभ मिलेगा। श्रद्धा रहित दान, तप से न तो इस लोक में लाभ मिलता है, न परलोक में ही। श्रद्धा बहुत महत्त्वपूर्ण है।
तिलक लगाते हैं तो यह श्रद्धा होनी चाहिए कि आज्ञा चक्र स्थिर होगा, बुद्धि का विकास होगा। माता- पिता को प्रणाम करने से अच्छे विचार आयेंगे। श्रद्धा अत्यन्त आवश्यक है। जो भी हम करेंगे उसे पूरी श्रद्धा के साथ करेंगे तभी हमारा कल्याण होगा।
प्रश्न- श्रद्धा कितने तरह की होती है।
उत्तर- सबने अलग अलग उत्तर दिये हैं। किसी ने तीन, चार, पाँच, बतायी हैं।
अधिकतर बच्चों ने तीन कहा है। सात्त्विक, राजसी, तामसी।
अध्याय का नाम भी है श्रद्धात्रयविभाग योग। तीन प्रकार की श्रद्धा के बारे में बताया गया है, इसीलिए इस अध्याय का नाम भी श्रद्धात्रयविभाग योग है। जीवन में जैसा बनना चाहते हैं, वैसी श्रद्धा का विकास अपने में करना होगा।
हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए सत्र का समापन हुआ।
प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता –चार्मी दीदी
प्रश्न – श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीमद्भागवत में क्या अन्तर है?
उत्तर - श्रीमद्भगवद्गीता कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ वार्तालाप है। युद्ध भूमि में शत्रु सेना में अपने परिजनों को देखकर अर्जुन हताश होकर युद्ध नहीं करना चाहते थे इसलिए श्रीकृष्ण ने कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के माध्यम से उन्हें अपना कर्त्तव्य कर्म करने को प्रेरित किया।
श्रीमद्भागवत एक महापुराण है जिसमें श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन है। इसमें श्रीकृष्ण के जन्म से लेकर ब्रज में ग्वालबालों और गोपियों के साथ बिताए गए बचपन और पाण्डवों के मित्र बनकर, युद्ध में उनके साथ रहकर उनका मार्गदर्शन करने तक सभी घटनाएँ बताईं गईं हैं। महाभारत इसी ग्रन्थ का भाग है।
प्रश्नकर्ता – स्पृहा थोरात दीदी
प्रश्न -- भगवद्गीता क्यों लिखी गई है?
उत्तर -- युद्ध भूमि में शत्रु सेना में अपने परिजनों को देखकर अर्जुन हताश होकर युद्ध नहीं करना चाहते थे, इसलिए श्रीकृष्ण ने कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के माध्यम से उन्हें अपने कर्त्तव्य कर्म करने के लिए प्रेरित किया।
अर्जुन हमारे ही प्रतिनिधि हैं, उनके माध्यम से श्रीकृष्ण ने हमारा ज्ञान बढ़ाने और आने वाली पीढ़ी के लाभ के लिए भगवद्गीता कही।
युद्ध क्षेत्र में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ वार्तालाप ही भगवद्गीता है। वह मूलतः संस्कृत भाषा में है जो उस समय सामान्य बोलचाल की भाषा थी। महर्षि वेदव्यास जी ने इसे लिखा ताकि यह ज्ञान हम सब तक पहुँच सके।
प्रश्नकर्ता – आद्या यादव दीदी
प्रश्न -- श्रीकृष्ण जी का रङ्ग क्या है? उन्हें चित्रों में और पर्दे पर नीला क्यों दिखाया जाता है?
उत्तर -- श्रीकृष्ण हल्के साँवले रङ्ग के या श्यामवर्ण थे। यदि उन्हें काले रङ्ग में दिखाया जाता है तो वे पर्दे पर दिखेंगे ही नहीं इसलिए उनका रङ्ग नीला दिखाया जाता है।
प्रश्नकर्ता – राघवप्रसाद हेगड़े भैया
प्रश्न – राजसिक भक्ति क्या होती है?
उत्तर – जब किसी इच्छापूर्ति के भाव से कोई पूजा की जाती है तो वह राजसिक भक्ति कहलाती है। प्रायः हम कुछ पाने के लिए ही पूजा करते हैं, जैसे कोई मन्नत माँगते हैं कि यदि हमारा यह कार्य सफल हुआ तो हम पूजा करवाएँगे या इतने रुपयों का भोग चढाएँगे आदि।
प्रश्नकर्ता – वन्दन पटेल भैया
प्रश्न –भाव भक्ति और कृति भक्ति में क्या अन्तर है?
उत्तर –ये दोनों पारिभाषिक शब्द हैं जो विभिन्न संस्थाओं द्वारा अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होते हैं।
निष्काम भक्ति को भाव भक्ति कह सकते हैं। फल की आकाङ्क्षा न रखकर जो भक्ति की जाती है वह भाव भक्ति है।
राजसिक भक्ति को कृति भक्ति कहा जा सकता है, पूजा करने पर बदले में कामना पूर्ति की चाह रखना।
।।कृष्णार्पणमस्तु।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय:।।
इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘श्रद्धात्रयविभागयोग’ नामक सत्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।