विवेचन सारांश
प्रयाणकाल में ब्रह्म प्राप्ति के मार्ग
श्रीभगवान् की अतिशय मङ्गलमयी कृपा से हम सब लोगों का ऐसा भाग्य जाग्रत हुआ है कि हम लोग अपने इस जीवन में और इस जीवन के बाद भी विजय प्राप्त करने के लिए और मानव जीवन को सफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए, इसको पूर्णार्थ करने के लिए, इस मानव जीवन के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भगवद्गीता के अध्ययन के लिए चुने गये हैं। पता नहीं हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य कर्म हैं, हमारे पूर्वजों के सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी सन्त पुरुष की कृपादृष्टि हम पर पड़ गई जिसके कारण हम भगवद्गीताजी में लग गये हैं।
आठवाँ अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है। यह एक क्लिष्ट अध्याय है, भ्रमित करने वाला है, बिना गुरु के इसे जानना सम्भव नहीं है। इस अध्याय का चिन्तन थोड़ा कठिन है पर इसके गूढ़ अर्थों को भली- भाँति समझ लेने के बाद और भी अधिक आनन्द आने लगता है।
इस अध्याय का आरम्भ अर्जुन के सात प्रश्नों से होता है। सातवें अध्याय के अन्त में श्रीभगवान् ने अर्जुन को तीसवें श्लोक में कुछ शब्दावली बताईं किन्तु उन्हें विस्तार से नहीं बताया -
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः।।
7.30
श्रीभगवान् कहते हैं कि जो पुरुष अधिभूत तथा अधिदैव के सहित और अधियज्ञ के सहित मुझे जानते हैं, वे मुझ में लगे हुए चित्त वाले मनुष्य अन्तकाल में भी मुझे ही जानते हैं अर्थात् मुझे ही प्राप्त होते हैं।
जब श्रीभगवान् ने अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ इत्यादि शब्दों का प्रयोग किया, तो इनके समाधान के लिए अर्जुन का मन दुविधाग्रस्त हो गया। इनके समाधान के लिए अर्जुन ने श्रीभगवान् से कुछ प्रश्न किए।
8.1
अर्जुन उवाच
किं(न्) तद्ब्रह्म किमध्यात्मं(ङ्), किं(ङ्) कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं(ञ्) च किं(म्) प्रोक्तम्, अधिदैवं(ङ्) किमुच्यते ॥8.1॥
सातवें अध्याय में श्रीभगवान् ने अर्जुन को कठिन-कठिन नाम बताए। अर्जुन भ्रमित होकर श्रीभगवान् से कहते हैं कि हे पुरुषोत्तम! मुझे समझ में नहीं आया कि आपने क्या बताया? कृपा करके मुझे बताएँ कि -
1. किं तद्ब्रह्म? - ब्रह्म क्या है, यह कैसा होता है?
2. किमध्यात्मं? - अध्यात्म क्या है?
3. किं कर्म? - कर्म किसे कहा गया है?
4. किं अधिभूतं? - अधिभूत क्या है?
5. किं अधिदैवं? - अधिदैव कौन है?
6. किं अधियज्ञ:? - अधियज्ञ किसे कहते हैं?
7.प्रयाणकाले च कथं (ञ्)? - अन्तकाल में आप को कैसे जानें?
इस प्रकार अर्जुन ने प्रथम श्लोक मे छ: प्रश्न किये और अन्तिम सातवाँ प्रश्न दूसरे श्लोक में किया।
श्रीभगवान् उत्तम, परिपूर्ण वक्ता हैं। किस विषय का विस्तार करना है और किस विषय को संक्षेप में बताना है वे भली-भाँति जानते हैं। पहले छह प्रश्नों का उत्तर उन्होंने दो श्लोकों में बताया और सातवें प्रश्न के उत्तर को आठवें अध्याय में विस्तार से बताया कि अन्त काल में मृत्यु शैया पर श्रीभगवान् को कैसे जाने?
सातवें प्रश्न का उत्तर श्रीभगवान् ने अर्जुन को निमित्त बनाकर पूरी मानव जाति को बताया कि अन्त काल में
- सगुण साकार रूप मानने वालों को ईश्वर की प्राप्ति कैसी होगी?
- निर्गुण निराकार रूप में ब्रह्म को मानने वालों को भगवद् प्राप्ति कैसी होगी और
- अन्य मत वालों को भगवद् प्राप्ति किस रूप में होगी?
अर्थात् अन्तिम समय में उनकी क्या धारणा होनी चाहिए।
अधियज्ञ:(ख्) कथं (ङ्) कोऽत्र, देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं (ञ्), ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥ 8.2॥
विवेचन -अर्जुन ने पूछा कि यह अधियज्ञ क्या हैं? वह इस शरीर में कैसे हैं और युक्तचित्त वाले पुरुष द्वारा अन्त समय में आपको किस प्रकार से जाना जाता है?
श्रीभगवानुवाच
अक्षरं(म्) ब्रह्म परमं(म्), स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो, विसर्गः(ख्) कर्मसञ्ज्ञितः ॥ 8.3॥
उदाहरण से समझते हैं -
कभी कागज बना था। जब बन रहा था तब वह किसी अन्य रूप में था। जो हमें आज कागज के रूप में दिखता है, यह कागज भी कभी नष्ट हो जाएगा। इसकी उत्पत्ति हुई, स्थिति है और इसका विलय हो जाएगा।
अर्थात् इसका कभी व्यय नहीं होता।
जो क्षर पदार्थ हैं उनका मूल भी अक्षर है।
काग़ज के अक्षर रूप का विचार करने के लिए हम इस उदाहरण को समझते हैं। यदि हम यह बोलें कि इस कागज को नष्ट करने पर दस लाख रुपया मिलेगा। कोई भी बोलेगा कि यह तो बड़ा ही सरल काम है कागज को फाड़ देते हैं, यह नष्ट हो जाएगा। लेकिन कागज को फाड़ देने पर, वह कतरन में बदल जाएगा, उसका स्वरूप बदल जाएगा। कोई बोलेगा कि कागज को पानी में गला देते हैे। पानी में गलने से वह लुगदी बन जाएगा, उसका स्वरूप बदल जाएगा पर नष्ट नहीं होगा। कोई कह सकता है कि कागज को जला देते हैं। जलाने से वह कार्बन में परिवर्तित हो जाएगा और तब भी नष्ट नहीं होगा।
संसार में कुछ भी नष्ट नहीं होता केवल रूप परिवर्तन होता है। श्रीभगवान् अक्षर हैं, श्रीभगवान् का रूप परिवर्तन नहीं होता। संसार की अपरा प्रकृति में रूप परिवर्तन का विधान है। कुछ भी नष्ट नहीं होता, एक रूप दूसरे रूप में बदल जाता है।
इस पृथ्वी का वज़न ना तो एक ग्राम बढ़ता है और ना ही एक ग्राम कम होता है। कोरोना आया बहुत सारे लोग मारे गए तो क्या धरती हल्की हो गई? आबादी बढ़ जाने पर क्या पृथ्वी का भार बढ़ जाएगा? ऐसा कुछ भी नहीं है बस एक रूप दूसरे रूप में परिवर्तित हो जाता है। मूल में ब्रह्म के सिवा कुछ भी नहीं है।
उपनिषदों में इसके कुछ उदाहरण देखते हैं-
जल में लहरें हैं क्या? तालाब के रुके हुए पानी में लहरें नज़र नहीं आती या एक गिलास पानी में भी लहरें नजर नहीं आती हैं, लेकिन जल के कारण लहरें उत्पन्न होती हैं।
लहरों में जल नहीं है,
ऐसी ही स्थिति ब्रह्म की है।
स्वर्ण के बने सुन्दर आभूषणों से यदि स्वर्ण को निकाल दिया जाएगा तो कुछ भी बचेगा क्या?
इसी प्रकार हम हैं। ब्रह्म के बिना हमारा कोई अस्तित्त्व नहीं है। हम अपने "I" (ego अर्थात् अहम्) को बहुत सम्भाल कर रखते हैं। देह की बड़ी रक्षा करते हैं, सेवा करते हैं, सम्भाल कर रखते हैं। अच्छे-अच्छे वस्त्र, आभूषण पहनते हैं, सुन्दर दिखने के लिए भी हम कितना व्यय करते हैं। बीमार होने पर अच्छे से अच्छा इलाज कराते हैं और कुछ भी करके देह को बचाने में लगे रहते हैं। जब तक चिकित्सक नहीं कहता लाखों रुपए खर्च कर देते हैं। पर जिस क्षण शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है तब शरीर तो वैसा ही रहता है, पर इसमें से चेतना का प्रयाण हो जाता है, तो वह मृत शरीर कहलाता है। देह से ब्रह्म को निकाल देने पर कुछ नहीं बचेगा। देह वैसे की वैसे रहती है। नाक, कान, आँख, बाल वैसे ही रहते है, आकार वही रहता है। लेकिन जब इस "I" से ब्रह्म निकल गया, अहङ्कार निकल गया तो यह "I" शून्य हो जाता है। शाम होने से पहले परिजन अन्तिम संस्कार कर देते हैं। जब तक देह में ब्रह्म का वास है हम शरीर की रक्षा करते हैं और ब्रह्म के निकल जाने पर शरीर शून्य हो जाता है इसे कहते हैं कि शरीर मिट्टी हो गया।
प्रयाण करता है तब शरीर शून्य हो जाता है।
उसी प्रकार इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड से
ब्रह्म को निकाल दें तो शून्य बचता है।
बालकाण्ड में चौपाई के माध्यम से तुलसीदास जी ने ब्रह्म का सुन्दर वर्णन किया है-
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना।।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।
तनु बिनु परस नयन बिनु देखा।
ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।।
असि सब भाँति अलौकिक करनी।
महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।
ब्रह्म का वर्णन करते हुए गोसाई तुलसीदास जी कहते हैं कि उसकी बिना पैरों के गति है। वह बिना पैरों के चल सकता है। बिना कानों के सुनता है, बिना हाथों के सब काम कर सकता है, बिना मुख से सभी रसों का आनन्द ले सकता है, बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है और बिना शरीर, त्वचा के सबका स्पर्श कर सकता है। बिना आँख के देख सकता है, बिना नाक के सब सुगन्ध ग्रहण कर सकता है। उस ब्रह्म की गति सब प्रकार से अलौकिक है। उसकी महिमा का वर्णन नहीं किया जा सकता। बिना किसी कारण के ही समस्त कार्य हो रहे हैं।
जहाँ पर बिना किसी कारण के ही कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं।
इसी प्रकार ब्रह्म चेतन के रूप में ही ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल का कारण हैं। चेतन तत्त्व को तीनों लोकों में कोई मिलकर भी सिद्ध नहीं कर सकता। इसके बारे में जितना भी विचार करने पर यह वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं होता। जो भी कुछ हम विचार करेंगे वह सोचने की क्षमता जड़ बुद्धि के पास ही है। बुद्धि जड़ है। इस जड़- बुद्धि से उसको समझना असम्भव है।
जैसे हम सब ने एक शब्द सुना है अनन्त (Infinite) इन्फिनिटी इसे हम सब सुन रहे हैं, जान रहे हैं। वैज्ञानिक भी प्रयोग करते हैं कि सारा ब्रह्माण्ड अनन्त है, ऐसा विज्ञान भी मानता है। हम अनन्त को परिभाषित नहीं कर सकते यह हमारी बुद्धि की क्षमता के बाहर है। हम अनन्त को जानते हैं, पर परिभाषित नहीं कर सकते। हमारी सीमित बुद्धि जानती है कि वह कहीं से आरम्भ हो रहा है कहीं पर समाप्त होगा लेकिन हम इसे परिभाषित नहीं कर सकते। एक आकाश-गङ्गा है, दूसरी होगी, हजारवीं भी होगी, एक लाख भी होगी, दस खरब भी होगी उसके बाद क्या है? हमें पता नहीं है। अनन्त को समझने की क्षमता हमारे पास नहीं है।
हम सनातन शब्द का प्रयोग करते हैं। वह परमात्मा है, हमारा धर्म सनातन है। सनातन अर्थात् जो पहले कभी हुआ ही नहीं।
जो पहले कभी नहीं हुआ ऐसा कैसे हो सकता है।
पहली बार कभी तो कुछ हुआ होगा
There is no first, it is since always.
दही की उत्पत्ति दूध से होती है। दही बनने के बाद पुनः दूध की प्राप्ति नहीं हो सकती। जिसको इस बात का ज्ञान नहीं है। वह कभी नहीं मानेगा कि दही दूध से ही बना है क्योंकि वह इन्हें अलग़-अलग़ मानेगा कि एक ठोस है और दूसरा तरल है।
अध्यात्म क्या है - श्रीभगवान् ने अपने स्वरूप को, जीवात्मा को अध्यात्म नाम से कहा है।
स्वभाव का अर्थ है - स्व = मैं, स्व का भाव, स्वभाव
अंग्रेजी में Who am I की खोज करना है।
और ब्रह्म का व्यष्टि भाव जीव है।
स्वयं को जानने की यात्रा Who am I को जानना ही अध्यात्म है। आत्मा से आच्छादित ज्ञान ही अध्यात्म है।
जब अर्जुन ने पूछा कि कर्म क्या है तो श्रीभगवान् ने कहा -
एक उदाहरण से समझते हैं-
पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। मोदी जी को भाव आया कि पाकिस्तान को इसका दण्ड मिलना चाहिए। मोदी जी ने कैबिनेट की बैठक बुलाई। निर्णय हुआ हम इसका जवाब देंगे। मोदी जी राष्ट्रपति जी के पास गए। राष्ट्रपति जी ने तीनों सेनाध्यक्षों को बुलाया और निर्णय हुआ कि भारत पाकिस्तान पर हमला करेगा। अभी तक भाव का त्याग नहीं हुआ, इसलिये कोई काम नहीं हुआ। प्रधानमन्त्री जी ने भाव का त्याग राष्ट्रपति को किया और राष्ट्रपति ने भाव का त्याग सेनाध्यक्षों को किया। अभी तक भाव आया है काम नहीं हुआ है। सेनाध्यक्षों ने अपने सेनानायकों के साथ बैठक करके योजना बनाई और निर्णय हुआ कि रात्रि बारह बजे आक्रमण करेंगे। सेना की अमुक टुक्ड़ी इस ओर से आक्रमण करेगी। रात के बारह बजे सैनिक मिलकर आक्रमण करते हैं। अगले दिन समाचार पत्र में खबर छपती है कि भारत ने पाकिस्तान पर हमला किया। कर्म करने के अन्तिम व्यक्ति उत्तरदायी को कोई नहीं पूछता, उसे कर्म का अधिकारी नहीं माना जाता। कर्म करने के भाव का पहला त्याग जिसने किया उसका कर्म माना जाता है।
बाजार में जा रहे थे। जलेबी बनती दिखी। गरम जलेबी देखकर मन में भाव आया कि अच्छी जलेबी हैं इनको खाया जाए। अभी भाव है काम नहीं। फिर भाव आया कि अभी परसों तो खाई थी, शुगर अधिक, है वजन भी बढ़ रहा है। यह भाव टल गया तो टल गया कर्म नहीं हुआ, क्योंकि भाव का त्याग नहीं हुआ। मन की तृष्णा प्रभावित हुई परसों तो खाई थी पर इतनी अच्छी नहीं थी। गाड़ी मोड़ कर दुकान पर पहुँचकर जलेबी खाली। यहाँ भाव का त्याग होने पर कर्म हो गया।
भाव का त्याग होने पर कर्म की उत्पत्ति होती है।
अधिभूतं(ङ्) क्षरो भावः(फ्), पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र, देहे देहभृतां(म्) वर ॥ 8.4॥
अधिभूत - गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई॥
परा का अनुभव नहीं किया जा सकता।
जिसका अनुभव आप कर सकते हैं वह मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार है। जिसको आप नहीं देख सकते हैं वह आत्मा है।
हम कह सकते हैं कि मेरी बुद्धि काम कर रही है, मेरा मन नहीं कर रहा किन्तु ऐसा नहीं कह सकते कि मेरी आत्मा यह काम कर रही है या वह यह कह रही है। हम आत्मा का अनुभव नहीं कर सकते। यह परा प्रकृति है।
आँख का देवता - सूर्य
नाक की देवी - पृथ्वी
हाथ के देवता - इन्द्र
पैरों के देवता - विष्णु
पैरों में विष्णु भगवान का निवास है इसलिए बड़ों को जब प्रणाम करते हैं तो पैरों को स्पर्श करते हैं।
उत्तरकाण्ड में तुलसीदास जी कहते हैं -
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना।
तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।।
आवत देखहिं बिषय बयारी।
ते हठि देही कपाट उघारी।।
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई।
तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।।
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा।
बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।।
इन्द्रियों के द्वार, हृदय रूपी घर के अनेक झरोखे हैं। वहाँ-वहाँ देवता अपना-अपना थाना (अड्डा) जमाकर बैठे हैं। जैसे ही विषय रूपी हवा को आते देखते हैं वैसे ही रस को प्राप्त करने के लिए हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं। हम सोचते हैं कि हम रसों का आनन्द ले रहे हैं लेकिन रस का आनन्द तो उन इन्द्रियों के देवताओं को मिलता है। ये जो भी इंन्द्रियों के द्वार पर बैठे हुए देवता हैं, उन पर उनके देवता का अधिकार है। ये इन्द्रियाँ भोग उन देवता की शक्ति से ही करती है। ब्रह्माजी उन सारे देवताओं को नियुक्त करते हैं। उनके अधिपति ब्रह्माजी हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि इनका स्वामी मैं हूँ।
हिरण्यगर्भ क्या है? वह अधिदेव क्या है? -
इन सभी इन्द्रियों के देवताओं के स्वामी ब्रह्माजी हैं अर्थात ब्रह्मा जी जिन्होंने सृष्टि को बनाया है और उन देवताओं को भी बनाया है। वे प्रधानाध्यापक हैं, वे हिरण्यमय पुरुष ही हिरण्यगर्भ हैं, वे ही अधिदैव हैं।
अधियज्ञ क्या है? -
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं अर्थात् परमात्मा ही अधियज्ञ हूँ। सारे देवता और उनके स्वामी ब्रह्माजी आदि यज्ञ के अलग-अलग स्वरूप है। यज्ञ करते समय हम जिनका आवाहन करते हैं - वह विष्णु हों, लक्ष्मी हों, शिवजी हों, कृष्ण हों, गणेशजी होंं, नवग्रह हों, अथवा कोई भी इष्टदेव हों, वे सभी अधियज्ञ (यज्ञ का स्वामी) हैं पर मूल रूप से अधियज्ञ मैं ही हूँ।
अन्तकाले च मामेव, स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः(फ्) प्रयाति स मद्भावं(म्), याति नास्त्यत्र संशयः॥ 8.5॥
अन्तकाल में जो मुझे याद करते हुए शरीर छोड़ता है वह मुझे प्राप्त करता है उसी को मोक्ष कहा गया है, उसी को निर्वाण कहा गया है, उसको कैवल्य कहा गया है।
यं(म्) यं(म्) वापि स्मरन्भावं(न्), त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं(न्) तमेवैति कौन्तेय, सदा तद्भावभावितः ॥ 8.6॥
8.5
पूरा जीवन मस्त मौज करो अन्त काल में राम-राम करेंगे तो मुक्त हो जाएँगे। श्रीभगवान कहते हैं कि यदि तुम सोच ऐसा रहे हो तो तुम भूल कर रहे हो, क्योंकि ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता। जिसका जैसा भाव रहता है, अन्त काल में वैसे ही मुक्ति मिलती है। चाहे वह निर्गुण रूप का हो, या सगुण रूप का भाव हो। जिस भी रूप का चिन्तन करता हुआ प्राणी जाता है, वह मुझे ही प्राप्त होता है इसमें कोई शङ्का नहीं है।
हम कितना भी चाहे कि अन्त में हमारे भाव सद्भाव में बदल जाएँ पर यह सम्भव नहीं होता है, क्योंकि जीवन भर हम जिस भाव को प्राप्त होते हैं, उसी पर अन्तिम समय में हमारा भाव आसक्त हो जाता है।
उपनिषदों में सिद्धान्त दिया है कि मनुष्य जीवन भर जिस भाव में रहता है वह अन्त काल तक उसी भाव में रहता है।
जैसे यदि कोई दीवार यदि पश्चिम दिशा में झुक गई है तो कालान्तर में वह दीवार जब भी गिरेगी पश्चिम दिशा में ही गिरेगी, क्योंकि वह पश्चिम दिशा में झुकी है।
इसी प्रकार हम जिस भी भाव में रहेंगे अन्त काल में उसी भाव को प्राप्त करेंगे। नानक जी के शिष्य त्रिलोकचन्द जी का सुन्दर भजन है -
अन्तकाल में लछमी सिमरै सरप जोनि में उतरै।
लक्ष्मी का स्मरण करते हैं तो सर्प योनि को प्राप्त होते हैं।
स्त्री का स्मरण करते हैं तो मनुष्य योनि को प्राप्त होते हैं।
पुत्र- पुत्री का स्मरण करते हैं तो शूकर योनि को प्राप्त होते हैं।
घर का स्मरण करते हैं तो छिपकली की योनि को प्राप्त होते हैं।
सम्पत्ति का स्मरण करते हैं तो प्रेत की योनि को प्राप्त होते हैं।
नारायण का स्मरण करते हैं तो नारायण स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
इस विषय पर एक प्रसङ्ग इस प्रकार है-
एक बार एक स्त्री अपनी अन्तिम साँसे ले रही थी। वह रो भी रही थी। पति बोले कोई अन्तिम इच्छा हो तो बताओ। स्त्री रोते-रोते बोली कि मेरे पास मेरी अलमारी में दस हजार साड़ियाँ हैं। मेरी मृत्यु के पश्चात् अब ये सभी साड़ियां देवरानी की हो जाएँगी। इनको बचाने का बहुत उपाय सोच रही हूँ। मैं इसलिये दुःखी हूँ। अन्तकाल में भी परमात्मा को छोड़कर भौतिक वस्तुओं से मोह छूटा नहीं था।
इस विषय पर एक अन्य प्रसङ्ग इस प्रकार है-
एक बार एक वृद्ध व्यापारी मरणासन्न था। उसके चारों पुत्र उसके पास थे। अन्त समय में कुछ बोलना चाह रहा था, पर बोल नहीं पा रहा था। उन पुत्रों ने सोचा कि पिताजी ने कुछ बता नहीं पा रहे। हो सकता कि जो धन इकट्ठा कर रखा है, कोई प्रॉपर्टी हो, कोई खजाना दबा रखा हो, कोई फिक्स्ड डिपॉज़िट करवा रखा हो, उसके बारे में बताना चाहते हों। वह बोलने में असमर्थ हो रहे थे। बड़ा लड़का भाग कर डॉक्टर के पास गया। पिता जी अन्त समय में कुछ बोलना चाह रहे हैं, पर बोल नहीं पा रहे हैं। डॉक्टर साहब कुछ करो। आप जो बोलोगे वो मैं करुँगा। डॉक्टर ने कहा कि पाँच हजार का महँगा इञ्जेक्शन लगाना पड़ेगा। सोच लो इञ्जेक्शन के बाद वह एक ही बार कुछ बोलने में सक्षम होंगे। भाईयों ने विचार कर डॉक्टर की सलाह पर उस इञ्जेक्शन का उपयोग करने का निश्चय किया। जब वृद्ध थोड़ा बोलने में समर्थ हुए तो उन्होंने कहा कि यहाँ क्यों खड़े हो? जाकर देखो बाहर गाय झाड़ू खा रही है और उसके बाद उनका शरीर शान्त हो गया।
जन्म जन्म मुनि जतनु कराहीं।
अंत राम कहि आवत नाहीं।।
किष्किन्धा काण्ड में सुन्दर प्रसङ्ग है -
भगवान् श्रीराम ने बालि का वध कर दिया। वध करने के बाद बाद बालि के सिर को गोदी में रखकर बैठ गए तब बालि ने कहा, भगवान आपने यह सही नहीं किया।
मैं बैरी सुग्रीव पिआरा।
अवगुन कवन नाथ मोहि मारा।।
भगवान् श्रीराम से बालि ने कहा कि यह आपने ठीक नहीं किया सुग्रीव को आपने मित्र बनाया किन्तु मुझे मार दिया। आपने यह अन्याय किया है। भगवान् श्रीराम ने उत्तर दिया कि मैं यूँ ही किसी को नहीं मारता।
अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।।
इन्हहि कुदृष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।।
छोटे भाई की पत्नी, पुत्रवधु, भगिनी तथा अपनी कन्या ये चारों समान हैं। इन पर जो कुदृष्टि डालता है, वह अत्याचारी है और उसका वध करना चाहिए। तूने सुग्रीव की पत्नी का अपहरण करके उसे अपनी पत्नी बनाकर रखा है। बालि ने मुस्कुरा कर कहा कि प्रभु आपके समक्ष मेरी चातुरी तो नहीं चलेगी।
सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि।
प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि॥
मैं तर्कहीन हूँ पर मैंने भी शास्त्रों का अध्ययन किया है, तो मैंने गुरु से सुना है कि यदि अन्तकाल में भगवान् के दर्शन हो जाए तो सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। अभी मैं आपकी गोद में लेटा हूँ, मेरी मृत्यु का कारण भी आप ही हैं, आप मेरे सामने हैं, मैं आपका स्मरण कर रहा हूँ और मैं आपसे बात कर रहा हूँ। यदि मेरे पाप अब भी नष्ट न हुए तो आप भगवान् नहीं हैं और यदि आप भगवान् हैं तो मैं पापी नहीं रहा। भगवान् ने कहा कि तुम्हारी बात सही है। अब तो तुम पापी नहीं रहे और तुम्हें मेरे शाश्वत धाम की प्राप्ति होगी।
सुनत राम अति कोमल बानी। बालि सीस परसेउ निज पानी।।
अचल करौं तनु राखहु प्राना। बालि कहा सुनु कृपानिधाना।।
बालि की अत्यन्त कोमल वाणी सुनकर श्रीरामजी ने उसके सिर को अपने हाथ से स्पर्श किया और कहा- मैं तुम्हारे शरीर को अचल कर दूँ, तुम प्राणों को रखो। मैं तुम्हें प्राणदान देता हूँ। बालि ने कहा हे कृपानिधान! सुनिये।
जासु नाम बल संकर कासी।
देत सबहि सम गति अबिनासी।।
मम लोचन गोचर सोइ आवा।
बहुरि कि प्रभु अस बनिहि बनावा।।
श्रीभगवान् ने अपने हाथों से बालि के सिर को स्पर्श किया और कहा कि मैं तुम्हारी बात मानता हूँ, तुम्हें प्राण दान देता हूँ। तब बालि ने कहा- रूकिए अब मुझे प्राण दान नहीं चाहिए। जन्मों-जन्मों की साधना के बाद भी मुनियों को भी अन्तकाल में राम नाम मुख में नहीं आता है। जिस राम नाम को काशी में बैठकर शिवजी ध्यान करते हैं, जिनके नाम मात्र से जीव का कल्याण होता है, ऐसे प्रभु राम मेरे सामने खड़े हैं। ऐसा अद्भुत संयोग किसे मिलता है। आपको देखते हुए, सुनते हुए, आपकी गोद में मेरे प्राण निकल जाएँ। अब मुझे जीवन का कोई मोह नहीं और यह कहकर बालि ने शरीर त्याग दिया। भगवान् श्रीराम ने भी बालि को महामोक्ष प्रदान किया।
अन्तकाल में जो भी श्रीभगवान का स्मरण करता है वे उसे मोक्ष प्रदान कर देते हैं।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु, मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धि:(र्), मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥ 8.7॥
इस सन्दर्भ में एक सुन्दर कथा है -
एक बार शिवजी और पार्वती जी कुम्भ का मेला ऊपर से देख रहे थे। पार्वती जी ने कहा कि भगवन् आपकी कितनी अद्भुत व्यवस्था है। कुम्भ जल में स्नान करने से समस्त पाप धुल जाते हैं। यहाँ तो लाखों लोग स्नान कर रहे हैं तो सभी के पाप नष्ट हो जाएँगे। क्या ये सभी पाप मुक्त हो जाएँगे? शिवजी ने कहा कि ऐसा नहीं होता हैं। पार्वती जी ने कहा कि एक ओर तो कहते हैं कि सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर कहते हैं, ऐसा नहीं होता है। सत्य क्या है? शिवजी ने कहा कि बात तो सच है, लेकिन कोई विश्वास नहीं करता। पार्वती जी ने कहा कि विश्वास के कारण ही ये सभी यहाँ आ रहें हैं। शिवजी ने कहा कि तुम मेरी बात मानती नहीं हो तो चलो स्वयं देखो हम परीक्षा लेते हैं। पार्वती जी से कहा कि मैं कोढ़ी बनता हूँ तुम मेरी सुन्दर पत्नी बन जाना। मैं गड्ढे में गिर जाऊँगा। तुम कहना जिसने पाप नहीं किया वह ही इन्हें निकालेगा।
शिवजी ने अपनी माया से एक गहरा गड्ढा खोदा और तु्रन्त कोढ़ी के रूप में परिवर्तित होकर गड्ढे में गिर गए। पार्वती जी सुन्दर स्त्री के रूप में परिवर्तित हो गईं। शिवजी ने कहा कि यहाँ से जो भी गुज़रता है, उसे मदद के लिए पुकार कर कहना है कि मेरे पति को इस गड्ढे से निकाल दो। साथ ही ध्यान रहे! यह अवश्य बताना कि जिसमें तनिक भी पाप शेष है, अगर वह हाथ लगाएगा तो उसे भी कोढ़ हो जायेगा।
लोग देख कर चले जाते, कोई भी मदद के तैयार नहीं हुआ। शाम हो गई। अचानक एक युवा बालक दौड़ते हुए आया और कुम्भ स्नान करने के पश्चात् झट से गड्ढे में कूद पड़ा। पार्वती जी बोली कि रुको! सुनो बालक तुम्हे डर नहीं लगता। वह बालक बोला कि मैं सुबह से आपकी बात सुन रहा हूँ। मैं तो कुम्भ स्नान करके आया हूँ। मुझमें कोई पाप शेष नहीं है और मैं भाग कर इसलिये आया ताकि दूसरा पाप न हो जाये।
शिवजी तुरन्त प्रकट हो गए और
उन्होंने कहा कि देखा पार्वती
जानते तो सभी हैं पर
विश्वास किसी विरले में ही होता है।
हम विवेचन तो सुन रहे हैं लेकिन मन किसी दूसरी जगह आसक्त है। ऐसा होने से भी हमारे विश्वास में कमी रह जाती है। शास्त्रों की सारी बातें सत्य होती हैं। हमारा विश्वास ही प्रबल नहीं होता जब तक श्रद्धा रूपी विश्वास प्रबल नहीं होगा तब तक संशय बना रहता है। भगवान् पर विश्वास के साथ मन को लगायें।
अभ्यासयोगयुक्तेन, चेतसा नान्यगामिना ।
परमं (म्) पुरुषं (न्) दिव्यं (म्), याति पार्थानुचिन्तयन् ॥ 8.8॥
एक व्यक्ति तत्त्वज्ञानी गुरु जी के पास जाकर बोला कि मैं दीक्षा के लिए आया हूँ। आप मुझे गुरु मन्त्र दीजिए। गुरुजी ने एक साधारण सा लगने वाला मन्त्र उसे दे दिया। व्यक्ति ने बोला इस साधारण मन्त्र से मेरा क्या होगा? उन्होंने कहा यह साधारण मन्त्र नहीं, गुरुमन्त्र है। तब व्यक्ति ने कहा यह मन्त्र श्री राम जय राम, जय-जय राम है, यह क्या गुरु मन्त्र हुआ? यह तो मैं पहले से ही जानता हूँ। इसमें ऐसा क्या विशेष है? गुरुजी ने कहा कि तुम इसकी महिमा को नहीं जानते। गुरु जी के पास एक पीपल का बीज पड़ा था। उन्होंने उस बीज को उठाकर व्यक्ति को दे दिया और कहा कि बरसात का मौसम है इसे बो देना। वह व्यक्ति किसान का बेटा था, उसने कहा कि सम्भवतः इस बीज से पीपल का पौधा उग भी सकता है और नहीं भी उग सकता।
श्रीभगवान् कहते हैं कि परमेश्वर के ध्यान का अभ्यास रूपी योग से युक्त निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त हो जाता है।
श्रीभगवान् कहते हैं नान्यगामिना - मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाना।
जिस प्रकार घोड़े की आँख के पास पर्दे लगा दिए जाते हैं क्योंकि घोड़े की इधर-उधर देखने की आदत होती है। पर्दे लगने के बाद उसे इधर-उधर दिखाई नहीं देता। वह केवल सामने की ओर देखता है। उसे मात्र मार्ग दिखाई देता है।
श्रीभगवान् कहते हैं कि अपने ऊपर सब नियमों के पर्दे लगा दो ताकि चित्त को एकाग्र कर सकें।
कबीरा मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव।
भावै गुरु की भक्ति करूं, भावै विषय कमाव।।
ये पर्दे मनुष्य को अपने जीवन में सत्सङ्ग के, भक्ति के, ज्ञान वैराग्य के, गुरु प्रदत्त मन्त्र अभ्यास आदि के लगाने पड़ते हैं।
कविं(म्) पुराणमनुशासितारम्,
अणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम्,
आदित्यवर्णं (न्) तमसः (फ्) परस्तात्॥ 8.9॥
विवेचन- श्रीभगवान् ने इस श्लोक के माध्यम से अपने गुण बतलाये हैं, स्वयं को किसी भी नाम से सम्बोधित नहीं किया। श्रीभगवान् ने कहा कि बताता हूँ कि मैं कौन हूँ और परमात्मा के लक्षण बताए हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियन्ता, सूक्ष्म से अत्यन्त सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करने वाला, अचिन्त्य रूप, अज्ञान से अत्यन्त परे, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश स्वरूप, ज्ञान स्वरूप, शुद्ध श्रद्धावान स्वरूप का चिन्तन करता है।
कविं - कवि का संस्कृत में मूल अर्थ है सर्वज्ञ, जो सब कुछ जानता है जो त्रिकालज्ञ है। ऐसा तो ईश्वर ही हो सकता है या फिर दैत्यगुरु शुक्राचार्य। गीताजी के दसवें अध्याय में श्रीभगवान् कहते हैं -
कवीनामुशना कविः।।10.37।।
श्रीभगवान् कहते हैं जो अनादि है, सदैव सबको अनुशासन में रखने वाला, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है।
अष्ट सिद्धियाँ हैं - अणिमा, गरिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्त्व और वशित्त्व यह सारी सिद्धियाँ जिसमें हों,
परमात्मा के किसी भी रूप का चिन्तन परमात्मा के किसी भी स्वरूप में करें।
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन,
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्,
स तं(म्) परं(म्) पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ 8.10॥
कौन से योग का अभ्यास किया
किन्तु गुरु भक्ति के प्रताप से
अन्तकाल में यौगिक सिद्धि से देहत्याग किया।
यदक्षरं(म्) वेदविदो वदन्ति,
विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं(ञ्) चरन्ति,
तत्ते पदं(म्) सङ्ग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥ 8.11॥
विवेचन- श्रीभगवान् निर्गुण की महिमा गाते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! वेद को जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्द परम पद को अविनाशी कहते हैं, आसक्ति रहित शीर्ष संन्यासी महात्मा जिसमें प्रवेश करते हैं! जिस परम पद को पाने की इच्छा से ब्रह्मचारी लोग जिस ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह मैं तुझे संक्षेप में कहता हूँ। श्रीभगवान् अन्तकाल में योग धारणा विधि से निर्गुण ब्रह्म के ध्यान के प्रकार और उसके फल का वर्णन यहाँ पर करते हैं।
सर्वद्वाराणि संयम्य, मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः(फ्) प्राणम्, आस्थितो योगधारणाम् ॥ 8.12॥
ओमित्येकाक्षरं(म्) ब्रह्म, व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
य:(फ्) प्रयाति त्यजन्देहं(म्), स याति परमां (ङ्) गतिम् ॥ 8.13॥
श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! सभी इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थित करके, फिर जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक पर स्थापित करके, परमात्मा सम्बन्धी योगधारा में स्थित होकर, जो पुरुष ॐ, इस एक अक्षर स्वरूप ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ, उसके अर्थ स्वरूप ब्रह्म का चिन्तन करता हुआ, शरीर को त्यागता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है। भगवान ने पहले साकार का वर्णन किया है और फिर निराकार का वर्णन किया है। जो अन्त समय में मेरा चिन्तन करते हुए सिर्फ ॐ कार का उच्चारण करते हुए जाता है, वह योगी भी मुझको प्राप्त होता है।
इसका वर्णन करते हुए गीता प्रेस के संस्थापक आदरणीय श्रीजयदयाल गोयन्दका जी कहते हैं कि जब किसी का अन्त समय हो तो उसकी परम सेवा करो, गङ्गा जी के तट पर ले जाओ, गङ्गाजी की रेती बिछाऔ और यदि गङ्गा जी ले जाना सम्भव न हो तो घर में ही गङ्गा जी की रेती बिछाकर लिटा दो। रेती पर राम नाम लिखो, तुलसी का गमला रखो, तुलसी-दल और गङ्गा-जल मुख में डालो, गीताजी को वक्ष पर रखो, चतुर्भुज रूप भगवान् विष्णु का चित्र या इष्टदेव का चित्र सामने रखो और सब लोग मिलकर कीर्तन करो, उसे गीता सुनाएं।
कर्णेन्द्रिय सबसे शक्तिशाली हैं। इन्द्रियों में कर्णेन्द्रिय सबसे अन्त में जाती है।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः।।
8.6
जिस भाव से कलेवर का अन्त किया उसी भाव को प्राप्त होंगे। सारे जीवन भर इस बात की चिन्ता करना कि मेरे सारे कर्म ऐसे हो कि मैं अन्त समय में श्रीभगवान् को ही याद करूँ।
अनन्यचेताः(स्) सततं(म्), यो मां(म्) स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं(म्) सुलभः(फ्) पार्थ, नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥ 8.14॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! जो पुरुष मुझमें अनन्य चित्त होकर, निरन्तर मुझ पुरुषोत्तम का स्मरण करता है, उस निरन्तर मुझमें युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ। अर्थात् मैं उसको सहज ही प्राप्त होता हूँ। जिसको अन्य कुछ नहीं चाहिए जो अनन्य चित्त होकर भगवान में लग जाता है। श्रीभगवान् ने कहा कि सारी बातें हो जाती हैं पर देव-भक्ति अनन्य नहीं होती।
अनन्य का अर्थ समझते हैं -
मैं तो श्रीकृष्ण की उपासना करता हूँ, मुझे किसी और की उपासना नहीं करनी। मैं तो श्रीराम की उपासना करता हूँ, मैं दूसरे की उपासना क्यों करूँ? मैं तो शिवजी की उपासना करता हूँ, किसी अन्य के उपासना नहीं करता। यह अनन्य भक्ति नहीं है।
सभी देवताओं की उपासना करके अपने इष्ट की उपासना में प्रगाढ़ता का भाव रखना मूल बात है।
अनन्यता का अर्थ है
संसार में मेरा मन न जाए, भगवान में जाए।
तुलसीदास जी कहते हैं-
कर से कर्म करो विधि नाना।
मन राखो जहाँ कृपा निधाना।।
अपना मन कृपानिधान में लगाएँ और जो कर्म करने हैं अपने हाथों से उसे करते रहें। सभी को जाना है, कोई रुकेगा नहीं।
एक बार एक वृक्ष के पत्ते ने पेड़ से पूछा कि कल तो इस शाखा पर ग्यारह पत्ते थे, आज नौ क्यों दिख रहे हैं? तो पेड़ ने उत्तर दिया-
तरुवर बोला पात से, सुनो पात मेरी बात।
या घर की इक रीत है, इक आवत है एक जात।।
अर्थात् कोई भी सदैव रहने वाला नहीं है। कोई आएगा कोई जाएगा। यह धरा की रीत है। इसलिए इस बात का शोक मत कर। जाने की तैयारी अच्छे से करो कि कल जाना पड़े तो चिन्ता की कोई बात नहीं।
श्रीभगवान् को समर्पित करने के भाव से हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ विवेचन सत्र की समाप्ति हुई और प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
विचार - मन्थन(प्रश्नोत्तर)-
प्रश्नकर्ता - गोपाल प्रसाद भैया
प्रश्न - क्या हर अध्याय का अलग़-अलग़ विवेचन मिल सकता है?
उत्तर - हर अध्याय का अलग़-अलग़ विवेचन-
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प्रश्नकर्ता -जया दीदी
प्रश्न - जैसे दूध का दही बन गया तो दूध तो उसमें से नहीं निकाल सकते हैं। वैसे ही जब आत्मा शरीर में आ गई तो शरीर जीव बन गया उसमें से आत्मा कैसे निकल सकती है ?
उत्तर - आत्मा अप्रमेय है। जैसे वायु गन्ध को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर छोड़ देती है। उसमें लिप्त नहीं होती। जैसे जल में नीला रङ्ग मिला देने से वो उसमें स्थायी रूप से रहता है, परन्तु यदि हवा में गुलाल उड़ायी जाये तो वो गुलाल से लिप्त नहीं होती। उसी प्रकार से आत्मा देह छोड़ देती है, उससे लिप्त नहीं होती।
प्रश्नकर्ता - सुवर्णा दीदी
प्रश्न - कविं का अर्थ समझ में नहीं आया, समझा दीजिए।
उत्तर - कविं का अर्थ है त्रिकालदर्शी - तीनों काल का ज्ञाता।
।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।