विवेचन सारांश
धर्मयुद्ध का महाघोष
हम सभी प्रथम अध्याय का विवेचन देख रहे हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता प्रत्यक्ष समराङ्गण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है। प्रथम अध्याय में कहीं भी श्रीभगवानुवाच नहीं आता, अर्थात् श्रीभगवान का उपदेश, द्वितीय अध्याय से प्रारम्भ हुआ है।
प्रश्न हो सकता है, प्रथम अध्याय की आवश्यकता क्या है?
कोई भी बात किस सन्दर्भ और परिस्थिति में कही गई है, किससे कही गई है और जिससे कही गई है उसकी मनःस्थिति कैसी है आदि जानना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सन्दर्भ को जाने बिना समझा नहीं जा सकता। वैसे श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत के सन्दर्भ में पढ़ना चाहिए, यह महाभारत का ही अंश है। प्रथम अध्याय में, उस परिस्थिति और प्रश्नकर्ता अर्जुन की मनःस्थिति का वर्णन विस्तार से किया गया है, अतः इन्हें जानने हेतु प्रथम अध्याय का महत्त्व, अनन्य है। गत शनिवार हमने देखा-
धृतराष्ट्र ने पूछा, कुरुक्षेत्र जो कि धर्मक्षेत्र है, वहाँ उपस्थित मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया, ऐसा कहे जाने पर सञ्जय वहाँ घटित सभी बातें विस्तार से बताना, समालोचन (commentry) आरम्भ कर रहे हैं। सञ्जय ने बताया दोनों सेनाएँ आमने सामने खड़ी हैं, दुर्योधन आचार्य के पास जाकर कहता है, यह है पाण्डवों की सेना, इसकी रचना किसने की है और इसमें कौन कौन मुख्य योद्धा हैं देखिए! उसने आचार्य को योद्धाओं के नाम बताए।
हमारी ओर के योद्धा कौन कौन हैं, यह भी जान लीजिए! ऐसा कहकर सञ्जय ने उन सारे योद्धाओं के नाम भी बताए और यह भी बताया कि इतना ही नहीं बहुत सारे योद्धा मेरे लिए अपने प्राण त्यागने हेतु आए हैं। पितामह भीष्म को अपने पक्ष में झुकाने के लिए दुर्योधन ने कहा-
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।। 1.11
पितामह के मन में पाण्डवों के प्रति प्रेम अधिक है।
1.12
तस्य सञ्जनयन्हर्षं(ङ्), कुरुवृद्धः(फ्) पितामहः।
सिंहनादं(व्ँ) विनद्योच्चैः(श्), शङ्खं(न्) दध्मौ प्रतापवान्॥1.12॥
पितामह भीष्म के लिए एक और विशेषण है प्रतापवान! वे कैसे है? वे महा प्रतापी है। कुरुवृद्ध, महाप्रतापी पितामह भीष्म ने सिंहनाद किया और शङ्ख बजाया।
शङ्ख बजाने का मतलब है, युद्ध अब प्रारम्भ किया जाय।
हमको इस प्रथम अध्याय के माध्यम से उस समय की परिस्थितियों को समझना है, तो कल्पना कीजिएगा, कदाचित उस युद्धभूमि में हम ही खड़े हैं और पितामह भीष्म ने शङ्खनाद किया, अब अवस्था कैसी है? अब तो यह युद्ध टल ही नहीं सकता।
ततः(श्) शङ्खाश्च भेर्यश्च, पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त, स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।1.13।।
युद्ध में बहुत सारे वाद्य होते हैं जिन्हें बजाकर योद्धाओं का उत्साह बढ़ाया जाता है, शक्ति बढ़ाई जाती है, इन्हें रणवाद्य कहा जाता है, रणवाद्य बजाने से योद्धाओं का उत्साह बढ़ता है।
दोनों हाथों से बजाया जाता है।
अनक कमर के पास लटकाकरदो डण्डियों से बजाया जाता है।
गोमुख, बिगुल को कहा जाता है।
हमने गणतन्त्र दिवस पर सैन्य घोष या राष्ट्रीय स्वयंसेवक सङ्घ के पथ सञ्चालन के समय घोष में इन वाद्य यन्त्रों को देखा होगा। पितामह के शङ्खनाद करते ही, ये सभी रणवाद्य हजारों की सङ्ख्या में, एकदम से बजने लगे और अत्यन्त भयङ्कर शब्द गूँजने लगा।
ततः(श्) श्वेतैर्हयैर्युक्ते, महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः(फ्) पाण्डवश्चैव, दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।1.14।।
श्वेत घोड़े से युक्त उस महान रथ में माधव अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डव अर्थात् महाराज पाण्डु के पुत्र अर्जुन बैठे हुए हैं, दोनों ने अपने दिव्य शङ्ख बजाए, दोनों के शङ्ख सामान्य नहीं अपितु दिव्य हैं।
अर्जुन ने भी अपना शङ्ख बजाया है अर्थात् अर्जुन की मनःस्थिति भी ऐसी है कि वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हैं। शङ्ख बजाकर उन्होंने यह घोषित कर दिया है।
श्रीभगवान ने भी शङ्ख बजाया है,युद्ध आरम्भ हो सकता है, यह घोषित किया है।
पाञ्चजन्यं(म्) हृषीकेशो, देवदत्तं(न्) धनञ्जयः।
पौण्ड्रं(न्) दध्मौ महाशङ्खं(म्), भीमकर्मा वृकोदरः।।1.15।।
हृषिकेश अर्थात् हृषिक यानि इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले, इन्द्रियों के स्वामी, इन्द्रियों के ईश, श्रीभगवान ने अपना पाञ्चजन्य नामक दिव्य शङ्ख बजाया।
एक युद्ध में बहुत सारा धन जीतने वाले धनञ्जय अर्थात् अर्जुन ने अपना देवदत्त नामक दिव्य शङ्ख बजाया।
बड़े-बड़े काम करने वाले वृक नामक अग्नि उदर में होने के कारण बहुत सारा भोजन पचाने की क्षमता वाले वृकोदर, भीम ने पौण्ड्र नामक बहुत बड़ा महाशङ्ख बजाया।
परिस्थितियाँ और अर्जुन की मनःस्थिति दोनों हीं उनके युद्ध के लिए पूरी तरह सज्ज होना स्पष्ट करती हैं। उनके साथ ही अन्य लोगों ने भी शङ्ख बजाए, उसका वर्णन सञ्जय आगे करते हैं।
अनन्तविजयं(म्) राजा, कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः(स्) सहदेवश्च, सुघोषमणिपुष्पकौ।।1.16।।
यहाँ दृष्ट्व्य है, यद्यपि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक नहीं हुआ है परन्तु वही राजा बनने के योग्य है, अतः सञ्जय ने निर्भीक होकर धृतराष्ट्र के सामने युधिष्ठिर को राजा कहकर सम्बोधित किया है। वे आजकल के सामान्य पत्रकारों के समान नहीं हैं, जो मात्र राजा को अच्छी लगने वाली बात करें। आज युधिष्ठिर के पास राज्य नहीं है, परन्तु वे राजा हैं, राज्यविहीन राजा।
सुघोष और मणिपुष्पक नामक शङ्ख क्रमशः नकुल और सहदेव ने बजाए।
हम कल्पना कर सकते हैं, इतने सारे शङ्ख बज रहे हैं। अर्जुन, स्वयं श्रीभगवान, सभी पाण्डव और उनके साथ अनेक राजा शङ्ख बजा रहे हैं, कितनी ध्वनि हो रही है!
आगे कुछ मुख्य योद्धाओ के नाम सञ्जय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं, जिन्होंने शङ्ख बजाए और युद्ध के लिए उपस्थित हैं।
काश्यश्च परमेष्वासः(श्), शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।1.17।।
राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न, राजा विराट जिनके राज्य में अज्ञातवास के समय पाण्डवों ने आश्रय लिया था और सात्यकि जो अर्जुन के शिष्य हैं और अपराजित हैं, कभी पराजित नहीं हुए हैं।
सञ्जय बात पूरी करते हुए सञ्जय अगले श्लोक में बताते हैं-
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च, सर्वशः(फ्) पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः(श्), शङ्खान्दध्मुः(फ्) पृथक्पृथक्।।1.18।।
द्रुपद स्वयं,
उनके पुत्र धृष्टद्युम्न और
उनकी पुत्री द्रौपदी के पाँचों पुत्र।
सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं, हे पृथ्वीपते! हे राजन! सभी ने अलग-अलग दिशाओं से अपने स्थान से ही खड़े होकर शङ्ख बजाए हैं। जिससे भयङ्कर नाद (शब्द) उत्पन्न हुआ है।
स घोषो धार्तराष्ट्राणां(म्), हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं(ञ्) चैव, तुमुलो व्यनुनादयन्।।1.19।।
उस भयङ्कर शब्द का परिणाम, सञ्जय निर्भीक होकर धृतराष्ट्र को सत्य बताते हैं। वे कहते हैं आपके पुत्रों के हृदय वीदीर्ण हो गए हैं, वे डर गए हैं। पाण्डव डर गए हैं, ऐसा नहीं कहा, पाण्डवों के हृदय वीदीर्ण नहीं हुए हैं।
जब वह असत्य के साथ होता है। जो सत्य के साथ होता हैं, वह कभी नहीं डरता।
जो असत्य के साथ होता है, वही डरता है, ऐसा ही धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ हुआ।
यह सारा अध्याय उन परिस्थितियों के वर्णन का है, जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता बताई गई हैं, अतः हमें उन परिस्थितयों को अच्छे से समझ लेना है।
अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।1.20।।
यह जानकर अर्जुन ने अपना धनुष उठाया।
हृषीकेशं(न्) तदा वाक्यम्, इदमाह महीपते। अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत।।1.21।।
एक बार धृतराष्ट्र ने पाण्डवों के पास युद्ध रोकने के लिए दूत भेजे थे कि मेरे पुत्र बुद्धिमान नहीं हैं, परन्तु आप तो बुद्धिमान हैं। युद्ध न करें, तब दूत के लौट आने पर धृतराष्ट्र ने पूछा, वहाँ क्या देखा? दूत ने बताया कि अर्जुन के कक्ष में जब वह गया तो देखा कि वहाँ मात्र अर्जुन और श्रीभगवान थे और अर्जुन के पैर श्रीभगवान की गोद में हैं और वे अर्जुन के पैर भी दबा रहे थे। तो अर्जुन यहाँ मित्र भाव से भगवान से कहते हैं।
अभी हम प्रथम अध्याय में ही हैं।
श्रीभगवान भी अर्जुन को अपना मित्र मानते हैं, तो अभी अर्जुन के मन में मित्र भाव ही है।
अर्जुन कहते हैं, मेरे रथ को बीच में ले चलकर स्थापित कीजिए, मैं कुछ देखना चाहता हूॅं।
यावदेतान्निरीक्षेऽहं(य्ँ), योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यम्, अस्मिन्रणसमुद्यमे॥1.22
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं(य्ँ), य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे:(र्), युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1.23॥
किसको देखना चाहते हैं? धृतराष्ट्र के उस दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन को!
राजा को बुद्धिमान होना चाहिए।
अन्यथा महाभारत के समान युद्ध हो जाता है।
यहाँ सब कुछ सञ्जय ही धृतराष्ट्र को बता रहे हैं, अर्जुन ने जो बाते कहीं हैं, उन्हें भी वो उद्धृत कर बता रहे हैं।
सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो, गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये, स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।1.24।।
इस प्रकार हृषिकेश से गुडाकेश अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दिया।
गुडाकेश अर्जुन के इस तरह से कहने पर हृषिकेश, जितेन्द्रिय भगवान श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य स्थापित कर दिया।
हमें तो भगवद्गीता का सार रूप ज्ञान समझने का प्रयास करना चाहिए। अर्जुन की मनःस्थिति समझकर चिन्तन करना चाहिए क्योंकि हम भी अर्जुन की श्रेणी में ही आते हैं।
and myself never
अर्थस्य पुरुषो दास: