विवेचन सारांश
धर्मयुद्ध का महाघोष

ID: 5726
हिन्दी
शनिवार, 19 अक्टूबर 2024
अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
2/4 (श्लोक 12-24)
विवेचक: गीता विशारद श्री श्रीनिवास जी वर्णेकर


भगवान श्रीकृष्ण की प्रार्थना, दीप प्रज्वलन, देव वन्दना एवम् श्री गुरु चरण कमलों की वन्दना के पश्चात् प्रथम अध्याय के मध्यांश (द्वितीय भाग) के विवेचन सत्र का शुभारम्भ हुआ।

हम सभी प्रथम अध्याय का विवेचन देख रहे हैं। जैसा कि हम सभी जानते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता प्रत्यक्ष समराङ्गण में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है। प्रथम अध्याय में कहीं भी श्रीभगवानुवाच नहीं आता, अर्थात् श्रीभगवान का उपदेश, द्वितीय अध्याय से प्रारम्भ हुआ है।

प्रश्न हो सकता है, प्रथम अध्याय की आवश्यकता क्या है? 

कोई भी बात किस सन्दर्भ और परिस्थिति में कही गई है, किससे कही गई है और जिससे कही गई है उसकी मनःस्थिति कैसी है आदि जानना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सन्दर्भ को जाने बिना समझा नहीं जा सकता। वैसे श्रीमद्भगवद्गीता, महाभारत के सन्दर्भ में पढ़ना चाहिए, यह महाभारत का ही अंश है। प्रथम अध्याय में, उस परिस्थिति और प्रश्नकर्ता अर्जुन की मनःस्थिति का वर्णन विस्तार से किया गया है, अतः इन्हें जानने हेतु प्रथम अध्याय का महत्त्व, अनन्य है। गत शनिवार हमने देखा- 

धृतराष्ट्र स्वयं देख नहीं सकते, उन्हें बताने के लिए सञ्जय की नियुक्ति हुई है। सञ्जय अपने दिव्य चक्षुओं द्वारा युद्ध क्षेत्र में घटित सभी घटनाएँ धृतराष्ट्र को बता रहे हैं। 

धृतराष्ट्र ने पूछा, कुरुक्षेत्र जो कि धर्मक्षेत्र है, वहाँ उपस्थित मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया, ऐसा कहे जाने पर सञ्जय वहाँ घटित सभी बातें विस्तार से बताना, समालोचन‌ (commentry) आरम्भ कर रहे हैं। सञ्जय ने बताया दोनों सेनाएँ आमने सामने खड़ी हैं, दुर्योधन आचार्य के पास जाकर कहता है, यह है पाण्डवों की सेना, इसकी रचना किसने की है और इसमें कौन कौन मुख्य योद्धा हैं देखिए! उसने आचार्य को योद्धाओं के नाम बताए। 

 हमारी ओर के योद्धा कौन कौन हैं, यह भी जान लीजिए! ऐसा कहकर सञ्जय ने उन सारे योद्धाओं के नाम भी बताए और यह भी बताया कि इतना ही नहीं बहुत सारे योद्धा मेरे लिए अपने प्राण त्यागने हेतु आए हैं। पितामह भीष्म को अपने पक्ष में झुकाने के लिए दुर्योधन ने कहा- 


अयनेषु सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः

भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि।। 1.11


दुर्योधन ने  अपनी सेना से कहा- पितामह भीष्म की हमें रक्षा करनी है, वे हम सबमें प्रमुख हैं, हमारी सेना के प्रमुख हैं।

दुर्योधन को शङ्का तो है ही कि
पितामह के मन में पाण्डवों के प्रति प्रेम अधिक है।

उसे ऐसा लगता है और यह बात थोड़ी सही भी है, पाण्डवों के प्रति उनके मन में प्रेम तो है ही, पितामह अपनी प्रतिज्ञा नहीं तोड़ सकते, मात्र इस कारण कौरवों के साथ खड़े हो गए हैं। अतः दुर्योधन उन्हें अपने पक्ष में झुकाना चाहता है इसलिए उसने कहा पितामह भीष्म की हम सभी को रक्षा करनी है। तब क्या हुआ, आगे देखेंगे।

1.12

तस्य सञ्जनयन्हर्षं(ङ्), कुरुवृद्धः(फ्) पितामहः।
सिंहनादं(व्ँ) विनद्योच्चैः(श्), शङ्खं(न्) दध्मौ प्रतापवान्॥1.12॥

उस (दुर्योधन) के (हृदय में) हर्ष उत्पन्न करते हुए कौरवों में वृद्ध प्रभावशाली पितामह भीष्म ने सिंह के समान गरज कर जोर से शंख बजाया।

विवेचन-  कुरुवृद्ध- कुरूवंश के सबसे वृद्ध  पितामह भीष्म ने दुर्योधन का हर्ष बढ़ाने के लिए सिंहनाद किया, बड़ी गर्जना की। कोई भी युद्ध जब प्रारम्भ होता है तो जोर- जोर से गर्जना की जाती है, धावा बोला जाता है। जोर- जोर से गर्जना करने से  सेना का उत्साह बढ़ता है। भीष्म पितामह ने ही, उच्च स्वर से गर्जना कर अपना शङ्ख‌ भी बजाया।

पितामह भीष्म के लिए एक और विशेषण है प्रतापवान!  वे कैसे है? वे महा प्रतापी है। कुरुवृद्ध, महाप्रतापी पितामह भीष्म ने सिंहनाद किया और शङ्ख बजाया।

शङ्ख बजाने का मतलब है, युद्ध अब प्रारम्भ किया जाय।

हमको इस प्रथम अध्याय के माध्यम से उस समय की परिस्थितियों को समझना है, तो कल्पना कीजिएगा, कदाचित उस युद्धभूमि में हम ही खड़े हैं और पितामह भीष्म ने शङ्खनाद किया, अब अवस्था कैसी है? अब तो यह युद्ध टल ही नहीं सकता।

 शङ्खनाद करने के पश्चात क्या हुआ?

1.13

ततः(श्) शङ्खाश्च भेर्यश्च, पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त, स शब्दस्तुमुलोऽभवत्।।1.13।।

उसके बाद शंख और भेरी (नगाड़े) तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे बाजे एक साथ ही बज उठे। (उनका) वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ।

विवेचन- पितामह के शङ्खनाद करने के पश्चात् बहुत सारे शङ्ख बजने लगे। सारे योद्धाओं ने अपने शङ्ख बजाए, भेरियाँ अर्थात् नगाड़े बजने लगे।

युद्ध में बहुत सारे वाद्य होते हैं जिन्हें बजाकर योद्धाओं का उत्साह बढ़ाया जाता है, शक्ति बढ़ाई जाती है, इन्हें रणवाद्य कहा जाता है, रणवाद्य बजाने से योद्धाओं का उत्साह बढ़ता है।

पणव, अनक और गोमुख ये सभी भी रणवाद्य हैं।

पणव बहुत बड़ा सा ढोल होता है जिसे सीने पर लटकाकर
दोनों हाथों से बजाया जाता है।


अनक कमर के पास लटकाकरदो डण्डियों से बजाया जाता है।

गोमुख, बिगुल को कहा जाता है।

हमने गणतन्त्र दिवस पर सैन्य घोष या राष्ट्रीय स्वयंसेवक सङ्घ के पथ सञ्चालन के समय घोष में इन वाद्य यन्त्रों को देखा होगा। पितामह के शङ्खनाद करते ही, ये सभी रणवाद्य हजारों की सङ्ख्या में, एकदम से बजने लगे और अत्यन्त भयङ्कर‌ शब्द गूँजने लगा।

इसके साथ ही, श्रीमद्भगवद्गीता के सबसे महत्वपूर्ण दो नायकों का आगमन हो रहा है।

1.14

ततः(श्) श्वेतैर्हयैर्युक्ते, महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः(फ्) पाण्डवश्चैव, दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।1.14।।

इसके पश्चात् सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।

विवेचन- सञ्जय बताते हैं कि अर्जुन का रथ सामान्य नहीं है। उसमें श्वेत घोड़े लगे हुए हैं। रथ के ऊपर ध्वज में श्री हनुमान जी विराजमान हैं।

श्वेत घोड़े से युक्त उस महान रथ में माधव अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डव अर्थात् महाराज पाण्डु के पुत्र अर्जुन बैठे हुए हैं,  दोनों ने अपने  दिव्य शङ्ख बजाए, दोनों के शङ्ख सामान्य नहीं अपितु दिव्य हैं।

अर्जुन ने भी अपना शङ्ख बजाया है अर्थात् अर्जुन की मनःस्थिति भी ऐसी है कि वे युद्ध के लिए सन्नद्ध हैं। शङ्ख बजाकर उन्होंने यह घोषित कर दिया है।

श्रीभगवान ने भी शङ्ख बजाया है,युद्ध आरम्भ हो सकता है, यह  घोषित किया है। 

1.15

पाञ्चजन्यं(म्) हृषीकेशो, देवदत्तं(न्) धनञ्जयः।
पौण्ड्रं(न्) दध्मौ महाशङ्खं(म्), भीमकर्मा वृकोदरः।।1.15।।

अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक (तथा) धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक (शंख बजाया और) भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

विवेचन-  सञ्जय धृतराष्ट को शङ्खों के नाम भी बताते हैं- 

हृषिकेश अर्थात् हृषिक यानि इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाले, इन्द्रियों के स्वामी, इन्द्रियों के ईश, श्रीभगवान ने अपना पाञ्चजन्य नामक दिव्य शङ्ख बजाया।

एक युद्ध में बहुत सारा धन जीतने वाले धनञ्जय अर्थात् अर्जुन ने अपना देवदत्त नामक दिव्य शङ्ख बजाया।

बड़े-बड़े काम करने वाले वृक नामक अग्नि उदर में होने के कारण बहुत सारा भोजन पचाने की क्षमता वाले वृकोदर, भीम ने पौण्ड्र नामक बहुत बड़ा महाशङ्ख बजाया।

परिस्थितियाँ और अर्जुन की मनःस्थिति दोनों हीं उनके युद्ध के लिए पूरी तरह सज्ज होना स्पष्ट करती हैं। उनके साथ ही अन्य लोगों ने भी शङ्ख बजाए, उसका वर्णन सञ्जय आगे करते हैं।

1.16

अनन्तविजयं(म्) राजा, कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः(स्) सहदेवश्च, सुघोषमणिपुष्पकौ।।1.16।।

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक (शंख बजाया तथा) नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।

विवेचन-  कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नाम का शङ्ख बजाया।

यहाँ दृष्ट्व्य है, यद्यपि युधिष्ठिर का राज्याभिषेक नहीं हुआ है परन्तु वही राजा बनने के योग्य है, अतः सञ्जय ने निर्भीक होकर धृतराष्ट्र के सामने युधिष्ठिर को राजा कहकर सम्बोधित किया है। वे आजकल के सामान्य पत्रकारों के समान नहीं हैं, जो मात्र राजा को अच्छी लगने वाली बात करें। आज युधिष्ठिर के पास राज्य नहीं है, परन्तु वे राजा हैं, राज्यविहीन राजा।

जैसे वर्तमान में तिब्बत के प्रमुख दलाई लामा के हाथ में राष्ट्र नहीं है परन्तु वे तिब्बत के प्रमुख तो हैं, वैसे ही युधिष्ठिर भी राजा हैं।

सुघोष और मणिपुष्पक नामक शङ्ख क्रमशः नकुल और सहदेव ने बजाए।

हम कल्पना कर सकते हैं, इतने सारे शङ्ख बज रहे हैं। अर्जुन, स्वयं श्रीभगवान, सभी पाण्डव और उनके साथ अनेक राजा शङ्ख बजा रहे हैं, कितनी ध्वनि हो रही है!

आगे कुछ मुख्य योद्धाओ के नाम सञ्जय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं, जिन्होंने शङ्ख बजाए और युद्ध के लिए उपस्थित हैं।

1.17

काश्यश्च परमेष्वासः(श्), शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।1.17।।

हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि,

विवेचन- श्रेष्ठ धनुष धारण करने वाले काशिराज, उनका धनुष सामान्य नहीं है, श्रेष्ठ है।

शिखण्डी पूर्वजन्म की अम्बा हैं!

पितामह भीष्म को अच्छे से पता है कि शिखण्डी (अम्बा) अपने तप और प्रतिशोध की अग्नि के साथ पितामह भीष्म से प्रतिशोध हेतु उपस्थित हैं। वे सामान्य योद्धा नहीं हैं, वे महारथी हैं।

राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न, राजा विराट जिनके राज्य में अज्ञातवास के समय पाण्डवों ने आश्रय लिया था और सात्यकि जो अर्जुन के शिष्य हैं और अपराजित हैं, कभी पराजित नहीं हुए हैं।
सञ्जय बात पूरी करते हुए सञ्जय अगले श्लोक में बताते हैं-

1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च, सर्वशः(फ्) पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः(श्), शङ्खान्दध्मुः(फ्) पृथक्पृथक्।।1.18।।

राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु (इन सभी ने) सब ओर से अलग-अलग (अपने - अपने) शंख बजाये।

विवेचन- राजा द्रुपद‌ जो द्रौपदी और युद्ध के लिए स्वयं भी उपस्थित धृष्टद्युम्न के पिता हैं, वे भी उपस्थित है, द्रौपदेय अर्थात्  द्रौपदी के पुत्र,  द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी युद्ध के लिए उपस्थित हैं।

राजा द्रुपद की तीन पीढ़ियाँ उपस्थित हैं-
 
द्रुपद स्वयं,
उनके पुत्र धृष्टद्युम्न और
उनकी पुत्री द्रौपदी के पाँचों पुत्र।

सौभद्र- सुभद्रा के पुत्र, महाबाहु अर्थात् महा बलशाली अभिमन्यु भी उपस्थित हैं।

सञ्जय धृतराष्ट्र से कहते हैं, हे पृथ्वीपते! हे राजन! सभी ने अलग-अलग दिशाओं से अपने स्थान से ही खड़े होकर शङ्ख बजाए हैं। जिससे भयङ्कर नाद (शब्द) उत्पन्न हुआ है।

 इस शब्द का परिणाम क्या हुआ? सञ्जय धृतराष्ट्र को आगे बताते हैं।

1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां(म्), हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं(ञ्) चैव, तुमुलो व्यनुनादयन्।।1.19।।

और (पाण्डव-सेना के शंखों के) उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों अर्थात् आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर दिये।

विवेचन-  वह घोष, सारे रणवाद्यों का शब्द अत्यन्त भयङ्कर है और नभ अर्थात् आकाश और पृथ्वी उस शब्द से भर गए हैं। उस भयानक शब्द से आपके पुत्रों के हृदय डर से भर गए हैं।

उस भयङ्कर शब्द का परिणाम, सञ्जय निर्भीक होकर धृतराष्ट्र को सत्य बताते हैं। वे कहते हैं आपके पुत्रों के हृदय वीदीर्ण हो गए हैं, वे डर गए हैं। पाण्डव डर गए हैं, ऐसा नहीं कहा, पाण्डवों के हृदय वीदीर्ण नहीं हुए हैं।

मानव डरता कब है?
जब वह असत्य के साथ होता है। जो सत्य के साथ होता हैं, वह कभी नहीं डरता।

जो असत्य के साथ होता है, वही डरता है, ऐसा ही धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ हुआ।

यह सारा अध्याय उन परिस्थितियों के वर्णन का है, जिनमें श्रीमद्भगवद्गीता बताई गई हैं, अतः हमें उन परिस्थितयों को अच्छे से समझ लेना है।

1.20

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।1.20।।

हे राजन् इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने शास्त्र चलाने कि तैयारी के समय धनुष उठाकर मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र सम्बन्धियों को देखकर

विवेचन- इस प्रकार शस्त्र चलाने को तत्पर, व्यवस्थित खड़े धार्तराष्ट्रों  (धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव) को कपिध्वज अर्थात् जिनके रथ पर लगे ध्वज में श्री हनुमान जी विराजमान हैं, अर्जुन ने देखा।

धार्तराष्ट्र
यह सीधे नाम न लेकर, व्यक्ति की विशेषता से उसे बताने की विधि है।

अब तो युद्ध टल नहीं सकता!
यह जानकर अर्जुन ने अपना धनुष उठाया।

1.21

हृषीकेशं(न्) तदा वाक्यम्, इदमाह महीपते। अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत।।1.21।।

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को (आप तब तक) खड़ा कीजिये, जब तक मैं (युद्धक्षेत्र में) खड़े हुए इन युद्ध की इच्छा वालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।

विवेचन- सञ्जय कहते हैं- हे महिपते (महाराज)! अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा- हे हृषिकेश!

यहॉं हम अर्जुन की मनःस्थिति देखें। अर्जुन ने शङ्ख बजाकर और धनुष हाथ में उठाकर कहा- हे हृषिकेश!

सेनयोरुभयोर्मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत।।

आप दोनों सेनाओं के बीच में मेरे रथ को ले चलिए। अर्जुन एक श्रेष्ठ योद्धा हैं। वे पीछे से वार करना नहीं चाहते, अतः श्रीभगवान से कहते हैं- हे अच्युत!  मेरे रथ को बीच में ले जाकर स्थापित कीजिए।

अर्जुन ऐसा क्यों चाहते हैं?

यहाँ अर्जुन रथ में पीछे बैठे हैं और श्रीभगवान रथ को चला रहे हैं। घोड़ों की लगाम श्रीभगवान के हाथ में है। यहाँ अर्जुन की भाषा आज्ञा के समान है, मानो श्रीभगवान को आदेश दे रहे हैं।

श्रीभगवान और अर्जुन अत्यन्त निकट मित्र हैं, दोनों का सम्बन्ध समझना अति महत्वपूर्ण है। दोनों ममेरे- फुफेरे भाई हैं और दोनों का मित्र जैसा व्यवहार है।

एक बार धृतराष्ट्र ने पाण्डवों के पास युद्ध रोकने के लिए दूत भेजे थे कि मेरे पुत्र बुद्धिमान नहीं हैं, परन्तु आप तो बुद्धिमान हैं। युद्ध न करें, तब दूत के लौट आने पर धृतराष्ट्र ने पूछा, वहाँ क्या देखा? दूत ने बताया कि अर्जुन के कक्ष में जब वह गया तो देखा कि वहाँ मात्र अर्जुन और श्रीभगवान थे और अर्जुन के पैर श्रीभगवान की गोद में हैं और वे अर्जुन के पैर भी दबा रहे थे। तो अर्जुन यहाँ मित्र भाव से भगवान से कहते हैं।

अभी अर्जुन और श्रीभगवान का गुरु शिष्य का सम्बन्ध स्थापित नहीं हुआ है।
अभी हम प्रथम अध्याय में ही हैं।

श्रीभगवान भी अर्जुन को अपना मित्र मानते हैं, तो अभी अर्जुन के मन में मित्र भाव ही है।
अर्जुन कहते हैं, मेरे रथ को बीच में ले चलकर स्थापित कीजिए, मैं कुछ देखना चाहता हूॅं।

क्या देखना चाहते हैं, अर्जुन?

1.22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं(य्ँ), योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यम्, अस्मिन्रणसमुद्यमे॥1.22

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं- इस रथ को आप वहाँ ले जाकर तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं देखता हूँ कि यहाँ युद्ध की इच्छावाले और युद्ध की कामना लेकर कौन-कौन आकर अवस्थित हुए हैं और इस युद्ध में किन- किन के साथ युद्ध करना मेरे योग्य है।

अर्जुन एक श्रेष्ठ योद्धा हैं, वे सबके साथ युद्ध नहीं कर सकते। किसी साधारण योद्धा से वे युद्ध नहीं कर सकते।

1.23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं(य्ँ), य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे:(र्), युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1.23॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए (इन सबको) मैं देख लूँ।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं, युद्ध की इच्छा रखने वाले इन योद्धाओं को मैं देखता हूॅं।
यहाँ अर्जुन की भाषा देखनी चाहिये।
किसको देखना चाहते हैं? धृतराष्ट्र के उस दुर्बुद्धि पुत्र दुर्योधन को!

यह महाभारत युद्ध नहीं होता! यदि दुर्योधन पाण्डवों को उनका राज्य लौटा देता।

पाण्डवों ने क्या माँगा था?
पूरा राज्य पाण्डवों का है। उनका सम्पूर्ण राज्य पर अधिकार है, परन्तु उन्होंने मात्र आधा राज्य माँगा था। वह भी न मानने पर पाँच पाण्डवों के लिए मात्र पाँच गाँव माँगे और कहा कि हम चले जाएँगे, युद्ध नहीं करेंगे। परन्तु दुर्बुद्धि दुर्योधन ने कहा-

पाँच गाँव तो दूर, मैं सुई के अग्रभाग के बराबर भी भूमि नहीं दूँगा। जिसकी भूमि है ही नहीं, वह मना कर रहा है, उसने भूमि हड़प ली।

महाभारत में सारा वर्णन है, पाण्डवों ने बहुत प्रयास किए। स्वयं श्रीभगवान भी युद्ध रोकने हेतु गए। यह सारा युद्ध दुर्बुद्धि दुर्योधन और धृतराष्ट्र, इन्हीं दोनों पिता पुत्रों के कारण हुआ है।

दुर्योधन जैसा  दुर्बुद्धि वहाँ नहीं होता, और धृतराष्ट्र जैसा अन्धा वहाँ नहीं होता तो युद्ध नहीं होता।

राजा को बुद्धिमान होना चाहिए।
अन्यथा महाभारत के समान युद्ध हो जाता है।

अर्जुन कहते हैं, उस दुर्बुद्धि दुर्योधन का प्रिय चाहने वाले, यहाँ कौन-कौन खड़े हैं? मैं उन्हें देखना चाहता हूँ,  इन्हें मैं देख लूँगा।

यहाँ सब कुछ सञ्जय ही धृतराष्ट्र को बता रहे हैं, अर्जुन ने जो बाते कहीं हैं, उन्हें भी वो उद्धृत कर बता रहे हैं।

आगे सञ्जय बताते हैं-

1.24

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो, गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये, स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।1.24।।

संजय बोले - हे भरतवंशी राजन्! निद्रा विजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य भाग में उत्तम रथ को खड़ा करके इस तरह कहा-

विवेचन- सञ्जय धृतराष्ट्र को बताते हैं-
इस प्रकार हृषिकेश से गुडाकेश अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दिया।

गुडाकेश-
गुडाकेश अर्थात् निद्रा का स्वामी, जिसने निद्रा को अपने वश में कर लिया हो। अर्जुन निद्रा के वश में नहीं, अपितु अपनी इच्छा से सोएं और जागें, ऐसे हैं। अतः निद्रा को जीत लेने से वे गुडाकेश कहलाए।


हृषिकेश-
इन्द्रियों को जीतने वाला, जिसकी इन्द्रियाँ उसके वश में हों। वह स्वयं इन्द्रियों के नियन्त्रण में न हो! अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी श्रीभगवान। छठे अध्याय आत्मसंयमयोग में स्वयं पर कैसे नियन्त्रण करें? यह श्रीभगवान द्वारा बताया गया है। अपनी इन्द्रियों पर और मन को नियन्त्रित करने के उपाय बताए गये हैं।

गुडाकेश अर्जुन के इस तरह से कहने पर हृषिकेश, जितेन्द्रिय भगवान श्रीकृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य स्थापित कर दिया। 

अर्जुन युद्ध के लिए सज्ज हैं, शङ्खनाद कर चुके हैं।

अब वहाँ पर अर्जुन ने क्या देखा और उनकी मनःस्थिति में क्या परिवर्तन हुआ, यह हम अगले सत्र में देखेंगे।

प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता– श्री मलय भैया 
प्रश्न– श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय के नाम में योग शब्द आता है जिसका अर्थ है भगवान से जुड़ना। पहला अध्याय अर्जुनविषादयोग है, जो अर्जुन की मनःस्थिति का वर्णन है, तो यहाँ भी योग शब्द क्यों प्रयुक्त किया गया है?
उत्तर– विषाद अर्थात् आत्यन्तिक दुःख, युद्ध भूमि में स्वजनों को देखकर अर्जुन अत्यन्त व्यथित हो जाते हैं और युद्ध नहीं करना चाहते। उन्हें इसी मनःस्थिति से निकालकर अपने कर्त्तव्य के प्रति जागरूक करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता का उपदेश दिया।

दुःखी अर्जुन श्रीकृष्ण की शरण में आए और श्रीभगवान के प्रति पूर्ण समर्पण भाव से उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। 

शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपद्ये।।2.07।।

यह आर्तभक्ति कहलाती है। योग का अर्थ है जीवात्मा का परमात्मा से एकाकार होना।

यहाँ अर्जुन का दुःख उन्हें परमात्मा से जोड़ता है इसलिए योग शब्द प्रयुक्त किया गया है।

प्रश्नकर्ता– श्री टेक पपनेजा भैया 
प्रश्न– हमारे धार्मिक ग्रन्थों में स्वर्ग, पाताल, गौलोक ऐसे चौदह लोक बताए गए हैं। क्या ये पृथ्वी, चन्द्र या अन्य ग्रहों के समान ही होते हैं?
उत्तर– ऐसा ही कहा जाता है, परन्तु किसी ने उन्हें नहीं देखा है। वैसे देखा जाए तो पृथ्वी पर ही स्वर्ग और नरक या पाताल लोक का अनुभव होता है। हम जो सुख भोगते हैं वह स्वर्ग और यातनाओं को नरक कह सकते हैं।

पाताल लोक भूमि के नीचे माना जाता है। लेकिन मनुष्य भूमि की तह तक जाने में असमर्थ है। खदानें खोदकर हमें सोना, लोहा और अन्य कई तत्त्व मिलते हैं परन्तु खदान भी पृथ्वी की अन्दरूनी तह (core) तक नहीं पहुॅंच सकतीं। आकाश में क्या है हमें नहीं पता। 

विज्ञान इतनी प्रगति कर रहा है परन्तु वह भी इन रहस्यों को नहीं बता सकता।

हमारे ज्ञानी पूर्वजों ने खगोलयन्त्र (telescope) की खोज से पहले सौर मण्डल, ग्रह और नक्षत्रों के बारे में जो जानकारी दी थी वह आज हमारे खगोलशास्त्रियों ने सत्य प्रमाणित किया है।

हमें तो भगवद्गीता का सार रूप ज्ञान समझने का प्रयास करना चाहिए। अर्जुन की मनःस्थिति समझकर चिन्तन करना चाहिए क्योंकि हम भी अर्जुन की श्रेणी में ही आते हैं।


प्रश्नकर्ता— श्रीमती सुमन रस्तोगी दीदी 
प्रश्न– नवजात शिशु निरीह और निर्दोष होते हैं, परन्तु जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, स्वार्थी और कमजोर होने लगते हैं। यदि भगवान सभी में हैं तो मन कमजोर क्यों पड़ता है?
उत्तर– भगवान सभी में हैं फिर भी सङ्कट क्यों आते हैं? इस प्रश्न का उत्तर महाभारत में ही मिल जाता है।

गुरु द्रोणाचार्य जी ने कौरवों और पाण्डवों को एक ही समान शिक्षा दी थी, परन्तु अर्जुन, अर्जुन बने और दुर्योधन, दुर्योधन। दुर्योधन की प्रवृत्ति दुष्ट थी। इसका कारण है मन की कमजोरी, जो दुर्योधन स्वयं अपने लिए मानता है- 

जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:, जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्ति:।
तेनापि तत्त्वेन हृदिस्थितेन, तथा नियुक्तोसि तथा करोमि।।

दुर्योधन धर्म और अधर्म जानते थे, परन्तु धर्म उनकी प्रवृत्ति में नहीं थी और अधर्म वे छोड़ नहीं सकते थे। उन्होंने वही किया जो उनके हृदय ने कहा। स्वार्थ प्रेरित इच्छाएं मनुष्य को बहकाकर गलत मार्ग पर ले जाती हैं। इसलिए श्रीभगवान ने छठवें अध्याय में कहा है कि 

उद्धरेदात्मनात्मानं, नात्मानमवसादयेत।। 6•05।।

दूसरे क्या करते हैं? यह हमारे नियन्त्रण में नहीं है, परन्तु हमारा व्यवहार हमारे नियन्त्रण में अवश्य होता है। इसलिए हमें वही करना चाहिए जिससे हमारा उद्धार हो और श्रीभगवान की ओर हमारा मार्ग प्रशस्त हो। हमारा मन वायु की तरह चञ्चल है, उसे वश में करना कठिन है। अर्जुन कहते हैं- 

चञ्चलं हि मन: कृष्ण, प्रमाणित बलवद्दृढं।
            तस्याहं निग्रहं मन्ये, वायोरिव सुदुष्करम्।। 6•34।।

श्रीकृष्ण कहते हैं कि हम त्रिगुणात्मिका प्रकृति के वश में कार्य करते हैं। हमारे मन में रजोगुण प्रधान होता है, जिससे हमारी कामनाएँ बढ़ती हैं, और उनके पूर्ण न होने पर क्रोध आता है और हम गलत मार्ग पर चलने लगते हैं।

काम एष क्रोध एष, रजोगुण समुद्भव:।।3•37।।

प्रश्नकर्ता— श्रीमती सुमन रस्तोगी दीदी
प्रश्न– भीष्म पितामह ने कौरवों की दुष्टता जानते हुए भी उनका साथ क्यों दिया?
उत्तर– अपनी प्रतिज्ञा के कारण भीष्म पितामह ने कौरवों का साथ दिया। उन्होंने हस्तिनापुर की रक्षा करने की शपथ ली थी, जिसके कारण दुर्योधन के गलत होते हुए भी उसका साथ दिया, यही उनकी गलती थी।
प्रतिज्ञा करनी चाहिए लेकिन कैसी प्रतिज्ञा हो यह हमें भगवान श्रीकृष्ण से सीखना चाहिए। उन्होंने भी महाभारत के युद्ध में शस्त्र नहीं उठाने की शपथ ली थी, परन्तु आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने शस्त्र उठा लिए। राष्ट्रहित के लिए व्यक्तिगत प्रतिज्ञा को महत्त्व नहीं दिया जाता। गुरु श्री गोविन्ददेव गिरिजी की बात हमेशा याद रखना चाहिए-

My Nation is first,
my mission is next
and myself never 

भीष्म पितामह ने अपने हठ को प्रमुखता दी। उसी प्रकार गुरु द्रोणाचार्य भी स्वामिभक्ति के लिए कौरवों के साथ थे। वे कौरवों की नौकरी करते थे, उन्होंने कहा- 

अर्थस्य पुरुषो दास:

आज भी हम समाज में देखते हैं कि मजबूरी में कभी-कभी गलत का साथ देना पड़ता है।

प्रश्नकर्ता– श्री एन• वी• भट्ट भैया 
प्रश्न– आज हम देख रहे हैं कि संसार में हिन्दुओं की सङ्ख्या कम होती जा रही है और हिन्दुत्व का विनाश हो रहा है। श्रीभगवान ने भगवद्गीता में कहा है सम्भवामि युगे युगे, इन परिस्थितियों में श्रीभगवान कब अवतार लेकर हमारी रक्षा करेंगे?
उत्तर – पूरी गीता जी पढ़कर ही हम समझ सकते हैं कि श्रीभगवान कहाँ रहते हैं?

ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठंति
                 भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।18•61।।

भगवान तो हमारे हृदय में ही वास करते हैं, हम उन्हें नहीं देख पाते। सम्भवामि युगे युगे इसका अर्थ हम नहीं समझ रहे हैं और श्रीभगवान के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। हम समझते हैं कि भगवान आएँगे और हमारी रक्षा करेंगे, हमें कोई प्रयास नहीं करना है। मराठी में एक कहावत है- 

असेल माझां हरि, तरह देईल खाटल्या वरी।।

हम सो रहे हैं। आलसी लोगों को भगवान कुछ नहीं देते। जागृत होकर भगवान के काम में लगेंगे तो वे अवश्य प्रकट होंगे। कलियुग में श्रीभगवान असङ्ख्य रूप में आते हैं।

सङ्घे शक्ति: कलियुगे।

 कलियुग में जब सज्जन सङ्गठित होंगे, तब श्रीभगवान स्वयं प्रकट होंगे।
गीता परिवार धर्म का प्रचार और प्रसार कर रहा है, लाखों सेवी इस कार्य में जुटे हैं। यह ईश्वरीय कार्य है तो  यह एक तरह से ईश्वर का प्रकट रूप ही है।

समाज में जितने भी अच्छे कार्य हो रहे हैं वे ईश्वरीय कार्य हैं इसलिए हमें उनसे जुड़ने का प्रयास करना चाहिए।