विवेचन सारांश
ईश्वर सर्वत्र व्याप्त हैं
सुमधुर प्रार्थना, दीप प्रज्वलन, हनुमान चालीसा पाठ तथा गुरु-वन्दना के साथ आज के सत्र का आरम्भ हुआ।
श्रीभगवान की अतिशय मङ्गलमय कृपा से हमारा ऐसा सद्भाग्य जागृत हुआ कि हम अपने जीवन को सार्थक करने के लिए, सुफल करने के लिए, इस जीवन का सच्चा उद्देश्य प्राप्त करने के लिए तथा इस जीवन को पूर्ण लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के चिन्तन-मनन, पठन-पाठन, उसके उच्चारण को सीखने, उसके अर्थ को जानने, उसके सूत्रों को समझने तथा जीवन में अपनाने में प्रवृत्त हो गए।
पता नहीं कोई पूर्वजन्म के सुकृत हैं या फिर किसी जन्म में किसी सन्त महापुरुष की कृपादृष्टि हम पर हो गई, उस कारण हमारा ऐसा भाग्योदय हो गया जो हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के पठन-पाठन में लग गए। हम सबको यह परम विश्वास होना चाहिए कि हमने गीताजी को नहीं चुना है, बल्कि हम गीताजी को पढ़ने के लिए चुने गए हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता जी जैसा परम कल्याणकारी, सुगम व सहज उपलब्ध दूसरा कोई ग्रन्थ मानवजाति के लिए नहीं है इसलिए हम लोगों को जितनी अधिक तत्परता से हो सके, उतनी अधिक तत्परता से श्रीमद्भगवद्गीता के अध्य्यन में लग जाना चाहिए।
आज हम नौवें अध्याय का चिन्तन देख रहे हैं। यह अत्यन्त गूढ़ अध्याय है। पिछले सत्र में हमने देखा था कि यह कितना उलझाने वाला है?
श्रीभगवान कहते हैं कि “सभी प्राणियों की उत्पत्ति का कारण मैं हूँ लेकिन न वे मुझ में हैं, न मैं उनमें हूँ।”
हमें इस अध्याय में इस प्रकार की बहुत सारी उलझने-उलझाने वाली बातें देखने को मिलती हैं। वास्तव में शास्त्रों में वे बातें उलझने-उलझाने वाली नहीं होतीं, लेकिन हमारी बुद्धि उतनी खुली नहीं है, उतनी परिष्कृत नहीं है, जो इतनी गहरी बातों को आसानी से समझ जाए।
इस अध्याय का नाम राजविद्याराजगुह्ययोग है, अर्थात् जो सभी विद्यााओं में, समस्त ज्ञान में सबसे ऊँचा है। नौवें श्लोक में श्रीभगवान कहते हैं, “अर्जुन! तुम तो कर्म करते हो लेकिन सारे कर्म मेरी शक्ति से होते हैं, मैं कुछ नहीं करता।”
दसवें श्लोक में श्रीभगवान स्वयं को और प्रतिष्ठित करके कहते हैं-
9.10
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः(स्), सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय, जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि “अर्जुन! मेरी अध्यक्षता में यह समस्त प्रकृति चर और अचर, सारे जगत को रचती है। इस हेतु से ही यह संसार चक्र घूमता है। मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ, यह समस्त कार्य प्रकृति मेरे नियन्त्रण में, मेरी अध्यक्षता में, मेरी शक्ति से करती है।
मान लीजिये आपको रिलायन्स जिओ का सिम लेना हो तो लेने के लिए आपको अम्बानी जी के पास नहीं जाना पड़ता। यह आपको अपने निकटतम स्टोर से एक साधारण कार्मिक से मिल जाता है तथा आपके मोबाइल में कनेक्शन आरम्भ हो जाता है।
आप कहते हैं कि अम्बानी जी की सेवा प्राप्त कर रहे हैं। वह सिम अम्बानी जी ने विक्रय नहीं किया है किन्तु अम्बानी जी की शक्ति से, अम्बानी जी द्वारा उनके स्टोर में नियुक्त एक कार्मिक द्वारा विक्रय किया गया है। वे रिलायन्स के प्रमुख हैं। अम्बानी जी को तो फिर भी कर्म बाँधेंगे क्योंकि इसमें उनकी आसक्ति है।
दिन के अन्त में, माह के अन्त में तथा तिमाही के अन्त में उनके पास बिक्री के आँकड़े भेजे जाते हैं। उन पर इनका प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार वे उस कर्म से बँध गये।
श्रीभगवान कहते हैं कि “मैं तो उदासीन के सदृश सारे काम करता हूँ।
यह सारी प्रकृति मेरे अधिकार से सारा कर्म करती है, किन्तु ये कर्म मुझे नहीं बाँधते। इससे मेरा कोई राग-द्वेष, कर्मफल की वासना, कोई फलेच्छा या कोई आसक्ति नहीं जुड़ी है।"
अवजानन्ति मां(म्) मूढा, मानुषीं(न्) तनुमाश्रितम्।
परं(म्) भावमजानन्तो, मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि “ऐसा होने पर भी मेरे परम भाव को न जानने वाले मूढ़ व्यक्ति, मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ सम्पूर्ण भूतों के महान ईश्वर रूप को तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी योगमाया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुये मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मान लेते हैं"।
अभी हमने रिलायन्स जिओ के मालिक अम्बानी जी का उदाहरण देखा। एक सत्य यह भी है कि किसी दिन श्री मुकेश अम्बानी जी के मन में आए कि मैं आज जाकर अपने एक स्टोर में बैठ कर वहाँ की गतिविधियाँ देखूँ। सामान्यतः उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं हैं किन्तु यदि वे चाहें तो ऐसा कर सकते हैं।
ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं। वे परम शक्ति हैं। उनसे कोई स्थान या एक छोटा सा अणु का कण भी रिक्त नहीं हो सकता। उस कण-कण में व्याप्त परमात्मा को साधारणतः किसी शरीर को धारण करके मनुष्यों के मध्य घूमने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु उस सर्वशक्तिमान के अन्दर इतनी शक्ति है कि अपने भक्तों की इच्छा पूरी करने के लिए वह परमात्मा एक शरीर में अवतार लेकर आ जाएँ।
'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्' ।
भक्तों का कल्याण करने के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए, धर्म की स्थापना के लिए समय-समय पर वह परमात्मा धरती पर अवतरित होते हैं। कभी वामन के रूप में, कभी वाराह के रूप में, कभी राम के रूप में, कभी कृष्ण के रूप में, कभी बुद्ध के रूप में परमात्मा अवतरित हुये हैं।
श्रीभगवान कहते हैं कि “लेकिन मेरे परमभाव को न जानने वाले अर्थात् जो मेरी शक्तियों से परिचित नहीं हैं, वे मूढ़ हैं"।
एक उदाहरण से हम इसे समझते हैं। विज्ञान में कोयले का मूल तत्त्व कार्बन है तथा हीरे का मूल तत्त्व भी कार्बन ही है। हीरे को तो बहुत मूल्यवान मानकर आभूषणों के रूप में पहना जाता है तथा कोयले को भट्टी में जला दिया जाता है। तत्त्वतः दोनों कार्बन ही हैं। सामान्य व्यक्ति के लिए कोयला भट्टी में जला देने की वस्तु है और हीरा गले में पहनने की वस्तु है, लेकिन एक वैज्ञानिक के लिए वे दोनों कार्बन हैं। उसे ज्ञात है कि जो आज कोयला दिखता है, वह करोड़ों वर्षों में वापस हीरा बन जायेगा और जो आज हीरा दिखता है, वह करोड़ों वर्षों पूर्व कोयला रहा होगा।
यह परमतत्त्व से जानने की बात है।
यहाँ श्रीभगवान ने मूढ़ शब्द का प्रयोग किया है जिसका अर्थ है कि कोई व्यक्ति अगर किसी बात को समझने की योग्यता न रखे तो वह उस विषय का मूढ़ होता है।
वाणिज्य के छात्र को विज्ञान नहीं समझ में आएगा तो वह उस विषय में मूढ़ है। विज्ञान के छात्र को वाणिज्य नहीं समझ आयेगा तो वह उस विषय का मूढ़ है। उस मूढ़ता में ही अनेक व्यक्ति उस परमतत्त्व ईश्वर को सामान्य मनुष्य मान लेते हैं और साधारण मनुष्य को ईश्वर मान लेते हैं। यह मूढ़ता है।
प्राचीन काल में नारदजी को भी भ्रम हुआ, ब्रह्माजी को भी भ्रम हुआ, गरुड़ जी को भी भ्रम हुआ था कि क्या वास्तव में परमात्मा धरती पर आए हैं?
भागवत् जी में एक कथा आती है कि कृष्णावतार के समय समस्त ऋषि-मुनि तथा देवता नित्य श्रीभगवान के दर्शन करने गोकुल आते थे। श्रीभगवान ने माया का थोड़ा सा प्रभाव ब्रह्माजी की ओर कर दिया। जैसे ही ब्रह्माजी की बुद्धि पर माया पहुँची, मूढ़ता आयी, ब्रह्माजी के मन में विचार आया कि क्या वास्तव में अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के स्वामी एक साधारण से ग्वाले के रूप में गोकुल में ग्वाल-बालों के साथ गैया चराते हैं? गोपियों के साथ लीला करते हैं?
एक दिन जब श्रीभगवान गोपों के साथ गैया चराने के लिए वन में गये थे, ब्रह्माजी ने परीक्षा लेने के लिए सारे गोपों और गौवंश के झुण्ड को लुप्त करके एक गुफा में ले जाकर सुला दिया। वे ब्रह्मलोक गये और वापस आये, तब तक पृथ्वी पर छः माह हो गये। ब्रह्माजी चिन्तित हो गये। वहाँ जाकर देखा कि सारे गोप वहाँ श्रीकृष्ण के साथ घूम रहे हैं। वे सोचने लगे कि श्रीकृष्ण को कैसे पता चला कि मैंने इन्हें किस गुफा में सुलाया था? वे तत्काल उस गुफा में पहुँचे तो देखा कि वे सब वैसे ही सो रहे हैं। तब ब्रह्माजी को बुद्धि आयी कि “अरे! मैं उस परम शक्तिमान परमात्मा की परीक्षा लेने जा रहा था जिनकी शक्ति से मैं ब्रह्माण्ड का निर्माण करता हूँ। मैं उनकी शक्ति को नापने चला था।”
हमें कभी यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि हमें कभी मूढ़ता नहीं हो सकती इसलिए नित्य सत्सङ्ग करना आवश्यक है।
मोघाशा मोघकर्माणो, मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं(ञ्) चैव, प्रकृतिं(म्) मोहिनीं(म्) श्रिताः।।9.12।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि “अर्जुन! वे व्यर्थ आशा वाले, व्यर्थ कर्मों वाले, व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन ही राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रवृत्ति को धारण करते हैं। जीवन में जब अज्ञानता की मूढ़ता बढ़ती है, तब उससे जो मोह उत्पन्न होता है, उसके परिणाम बड़े भयङ्कर होते हैं। आसुरी प्रवृत्ति के आश्रित होने के कारण मनुष्य भोगों के आश्रय में चले जाते हैं। व्यर्थ की आशाओं में प्रवृत्ति हो जाती है। जैसे “बस यह हो जाए तो मैं कितना सुखी हो जाऊँगा",
बाल्यकाल में हम माता से कहते थे कि “बस मम्मी! आखरी बार कह रहा हूँ, मुझे यह दिला दीजिये, फिर मैं कुछ नहीं माँगूँगा।"
फिर जैसे ही हमारी वह माँग पूरी होती थी, हम दूसरी वस्तु के लिए हठ करने लगते थे।
एक आशा पूरी हो जाती है तो वह अगली आशा को जन्म देती है। आशा पूरी न हुई तो निराशा को जन्म देती है।
जीवन में किसी का अनुभव ऐसा नहीं है कि आशा की पूर्णता पर सन्तोष आ गया हो। जिसकी कईं आशाएँ लगातार पूरी हो जाती हैं, वह स्वयं को सिद्ध मानने लगता है।
हमारे सारे दु:खों का कारण आशाएँ होती हैं। आशाएँ जीवन को बहुत नीचे ले जाती हैं।
जितना जीवन में ज्ञान होगा और ज्ञान का प्रादुर्भाव होगा, उससे बुद्धि का विवेक जागृत होगा। उतना ही व्यक्ति इन आशाओं से दूर होता जायेगा और आशाओं की तीव्रता कम होती जाएगी। जितनी मोघाशा होगी, उतना-उतना उन भोगों की प्राप्ति में दिन-रात गलत कर्मों में लगे रहेंगे। ऐसे व्यक्ति का ज्ञान भी व्यर्थ वाला होता है। उसने जो कुछ पढ़ा है, सुना है, उसका उपयोग वह अपनी आशाओं को पूरा करने के लिए लगाना चाहता है।
रामायण में अरण्यकाण्ड में एक प्रसङ्ग आता है- उसमें एक चौपाई है, जिसके विषय में यदि आपको ज्ञात नहीं है कि वह किसने बोली है तो आपको लगेगा कि वह या तो वशिष्ठ ऋषि ने बोली होगी या वाल्मीकि ऋषि ने या फिर श्रीराम ने बोली होगी।
वास्तव में यह चौपाई शूर्पनखा ने बोली है। शूर्पनखा अपने समय की अत्यन्त सुन्दर स्त्री थी। जब लक्ष्मणजी ने उसके नाक-कान काट दिये तो पहले तो उसने खर-दूषण को मरवाया, उसके दस हज़ार राक्षसों को मरवाया, फिर वह रावण के पास आयी।
रावण उस समय अपने महल में मदिरापान कर रहा था और नृत्य देख रहा था। शूर्पनखा ने बड़े क्रोध से रावण की ओर देखा और कहा-
करसि पान सोवसि दिनु राती।
सुधि नहिं तव सिर पर आराती॥
वह कहती है कि तू दिन भर मदिरा पीता है, दिन भर पड़ा रहता है, तुझे सूचना भी है कि शत्रु तेरे सिर पर खड़ा है?
राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा।
हरिहि समर्पे बिनु सतकर्मा॥
अरे! नीति के बिना राज्य और धर्म के बिना धन प्राप्त करने से, ईश्वर को समर्पित किए बिना उत्तम कर्म करने से और विवेक बिना विद्या उत्पन्न करने के परिणामस्वरूप केवल श्रम लगता है, कुछ मिलता नहीं ।
बिद्या बिनु बिबेक उपजाएँ।
श्रम फल पढ़ें किएँ अरु पाएँ॥
संग तें जती कुमंत्र ते राजा।
मान ते ग्यान पान तें लाजा॥
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी।
नासहिं बेगि नीति अस सुनी॥
विषयों के सङ्ग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, मदिरापान से लज्जा, नम्रता के बिना प्रीति और अहङ्कार से गुणवान शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, ऐसी नीति मैंने सुनी है ।
रिपु रुज पावक पाप प्रभु
अहि गनिअ न छोट करि।
हे रावण! शत्रु को, रोग को, पाप को, स्वामी को और सर्प को छोटा नहीं समझना चाहिए।
'अस कहि बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन'
जब शूर्पनखा ने विलाप किया तब रावण ने पूछा कि क्या हुआ? तब उसने पूरी बात बताई।
वह वास्तव में व्यर्थ के व्यक्ति को व्यर्थ का ज्ञान दे रही है अर्थात् मोघज्ञान। उसका उद्देश्य केवल यह है कि रावण जाकर उसका बदला ले।
विचेतसः का अर्थ है जिसका चित्त विक्षिप्त हो गया है, चित्त पर अन्धकार आ गया है।
एक मध्यमवर्गीय पति-पत्नी थे। पत्नी बहुत आशावादी थी। जहाँ जाती, दूसरे का सामान देखती तो सोचती कि मुझे भी यह चाहिए। एक बार वह हठ करने लगी कि मुझे तो डिनरसेट लाना है। पति ने बहुत समझाया पर वह नहीं मानी। अन्ततः पति ने उसे डिनरसेट दिलवा दिया। घर आकर पुनः उस डिनरसेट के रङ्ग को लेकर झगड़ा हुआ तो पति ने क्रोध में आकर प्लेट फेंक दी। फिर उसे बहुत पश्चात्ताप हुआ। इसे विचेतसः कहते हैं।
जब चित्त पर अन्धकार आता है तो मनुष्य को अच्छा-बुरा कुछ समझ नहीं आता है।
भस्मासुर बहुत तेजस्वी राक्षस था। उसने दस हज़ार वर्ष की तपस्या की। इन्द्र, वरुण आदि अनेक देवता आकार पूछते कि तुझे क्या चाहिए? वह कहता कि मुझे शिवजी से मिलना है। अन्त में ब्रह्माजी आये और वे भी निराश होकर वापस चले गये। उसने इतनी घोर तपस्या की, कि अन्ततः शिवजी को प्रकट होना पड़ा।
शिवजी ने प्रकट होकर पूछा, “बोलो, तुम्हें क्या चाहिये?” उसने कहा कि “मुझे आपके समान शक्तिशाली बनना है।” शिवजी ने कहा कि “तुम साधारण मनुष्य हो, तुम मेरे समान शक्तिशाली कैसे बन सकते हो?” वह बोला, “इसलिए आपसे मिलना था।” शिवजी ने कहा कि “तुम कोई हथियार माँग लो।” उसने कहा कि “नहीं! मुझे वरदान दीजिये कि मैं जिसके सिर पर हाथ रखूँ, वह भस्म हो जाये"।
शिवजी ने उसे यह वरदान दे दिया। भस्मासुर मोघाशा के अधीन तपस्या कर रहा था कि मैं अमर हो जाऊँगा। उसे लगा कि दस हज़ार वर्षों की तपस्या के उपरान्त शिवजी प्रकट हुये हैं। अब इनके वरदान की जाँच कैसे करूँ? उसने अपने आस-पास देखा। वहाँ कोई नहीं था। उसने सोचा कि मैं शिवजी के सिर पर ही हाथ रख देता हूँ। यदि यह वरदान सत्य हुआ तो शिवजी भस्म हो जाएँगे और फिर मैं ही शिव हो जाऊँगा।
शिवजी तो अन्तर्यामी थे। उन्हें जैसे ही उसकी इच्छा का भान हुआ, वे भागने लगे। भस्मासुर उनके पीछे भागने लगा। शिवजी क्षीरसागर में विष्णुजी के पास पहुँचे। शिवजी ने उन्हें पूरी बात बतायी तो विष्णुजी ने अपनी माया से भस्मासुर के मार्ग के मध्य में एक सुन्दर नगर की रचना कर दी। भस्मासुर उस नगर की चकाचौंध देखकर रुका। उसने नगर में प्रवेश किया तो देखा कि विष्णुजी मोहिनी अवतार में प्रकट होकर वहाँ नृत्य कर रहे हैं। उसने इससे पूर्व इतनी सुन्दर स्त्री और इतना सुन्दर नृत्य नहीं देखा था। वह मोहित होकर उस स्त्री की ओर देखने लगा।
मोहिनी ने नृत्य करते-करते उसकी ओर मोहिनी दृष्टि डाली तो वह और अधिक मोहित हो गया। मोहिनी ने उसे नृत्य करने के लिए बुलाया तो उसने कहा," मैं एक योद्धा हूँ, मैं नृत्य नहीं जानता"। मोहिनी ने कहा कि “अरे! मैं अपने लिए पति की खोज में थी और तुम्हें देखकर लगा कि मेरी खोज पूर्ण हो गयी, किन्तु मेरी एक ही सङ्कल्पना थी कि मैं उसी व्यक्ति का पति के रूप में वरण करूँगी, जिसे सुन्दर नृत्य करना आता हो।” भस्मासुर ने मोहवश कहा कि यदि तुम मुझे नृत्य सिखा दोगी तो मैं सीख लूँगा। मोहिनी ने उसे नृत्य सिखाना आरम्भ किया और विभिन्न मुद्राएँ बनाते हुये अन्ततः अपना एक हाथ अपने सिर पर रखा। उसे देख कर भस्मासुर ने जैसे ही अपने सिर पर हाथ रखा, वह वहीं भस्म हो गया।
इस प्रकार ये आशाएँ मनुष्य को भस्म कर देती हैं। हम भी किसी छोटी सी बात के लिए अपना बहुत कुछ दाँव पर लगा देते हैं और बाद में महसूस होता है कि हमने बहुत बड़ी भूल की।
महात्मानस्तु मां(म्) पार्थ, दैवीं(म्) प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो, ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि हे कुन्ती पुत्र! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझे सब भूतों का सनातन कारण, नाशरहित अक्षर स्वरूप जानकर अनन्य मन से मेरा भजन करते हैं।
जो दैवीय प्रकृति के आश्रित हैं, जो गीता पढ़ते हैं, सत्सङ्ग करते हैं, विवेचन सुनते हैं, भजन और जप करते हैं, ऐसे व्यक्ति मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि कारण व अविनाशी समझकर अनन्य भाव से मेरा भजन करते हैं।
सततं(ङ्) कीर्तयन्तो मां(य्ँ), यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां(म्) भक्त्या, नित्ययुक्ता उपासते॥9.14॥
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि “हे अर्जुन! ये दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरन्तर मेरे नाम और गुणों का सङ्कीर्तन करते हैं। मेरी प्राप्ति का प्रयत्न करते हुए तथा मुझे बारम्बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में रत होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं। मेरे नाम-गुण का चिन्तन, उसका गायन करते हैं।”
कीर्तन की महिमा अपरम्पार है। कीर्तन से श्रीभगवान अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। कीर्तन श्रीभगवान की प्रकट भक्ति है, इसलिए वृन्दावन में हर स्थान पर “राधे-राधे" और “गोविन्द-गोविन्द" का कीर्तन ही गूँजता है।
कलियुग केवल नाम आधारा
कलियुग में केवल नामजप और कीर्तन ही ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल उपाय है।
एक बहुत सुन्दर भजन है-
कोई बात नहीं कि मैं संसार का सबसे बड़ा पापी हूँ। यह भी तो सत्य बात है कि संसार के सबसे बड़े पापियों का उद्धार करने वाले आप हैं। यदि आप मेरा उद्धार नहीं कर सकते तो आप क्यों करुणानयन कहलाते हैं?
आपके भक्तों ने ही तो आपका नाम पतित-पावन रखा है। यहाँ मुझे सब कहते हैं कि मैं किसी के काम का नहीं हूँ। एक बार आप मुझे अपना कह देंगे तो फिर मैं सबके काम का हो जाऊँगा। आपने अजामिल, गज, गणिका आदि अनेकों का उद्धार किया है, फिर मैं तो छोटा सा पापी हूँ।
जब आर्तभाव से श्रीभगवान से प्रार्थना की जाती है तो वे प्रसन्न होकर हमारे सब पापों को हर लेते हैं। हमारी बुद्धि को शुद्ध कर देते हैं और हमें अपनी भक्ति प्रदान करते हैं।
श्रीभगवान कहते हैं कि ऐसे दृढ़व्रता व्यक्ति दैवीय हो जाते हैं।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये, यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन, बहुधा विश्वतोमुखम्।।9.15।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि हे अर्जुन! दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म की ज्ञान-यज्ञ द्वारा अभिन्न भाव से उपासना करते हैं। कुछ दूसरे मनुष्य अनेक प्रकार से स्थित मुझ विराट-स्वरूप परमेश्वर की पृथक-पृथक भाव से उपासना करते हैं।
श्रीभगवान ने चौदहवाँ श्लोक भक्तिमार्ग के लिए बोला है और दूसरा श्लोक ज्ञानयोग वाला बोला है।
'एकोSहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति'
जिनके मन में एकात्मता है। जो मुझे और जीव को पृथक नहीं मानते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता की यह विशेषता है कि संसार में किसी भी अन्य ग्रन्थ में यह भाव मिलना कठिन है। भारतीय संस्कृति के वाङ्गमय ग्रन्थों में भी केवल उन्हीं देवी-देवताओं की उपासना की बात है।
श्रीमद्भगवद्गीता एकमात्र ऐसा ग्रन्थ है जहाँ श्रीभगवान चौथे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में कहते हैं-
'ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्'।
मेरी उपासना जिस भी नाम से और जिस भी रूप से करना चाहते हो अथवा बिना नामरूप के भी करना चाहते हो, मैं उसी रूप में तुम्हें मिल जाता हूँ।
विभिन्न मनुष्य करोड़ों मार्गों से मेरी उपासना करते हैं तथा सभी मार्गों से मैं ही उनको प्राप्त होता हूँ।
यह बात ऐसे समझी जा सकती है- हम सबको भूख लगती है। भूख सबको एक जैसी ही लगती है। भूख लगने पर जो भोजन खाया जाता है, उससे तृप्ति भी एक जैसी ही होती है, लेकिन भूख लगने पर किसको क्या और कितना खाने पर तृप्ति मिलेगी? यह मात्रा हर व्यक्ति के लिए अलग होती है। कोई एक रोटी में तृप्त हो जाता है और किसी को बारह रोटी भी कम पड़ती हैं। कोई पूरे दिन में एक बार ही भोजन करता है और किसी को दस बार खाये बिना चैन नहीं आता। किसी को मीठा बहुत प्रिय होता है तो किसी को नमकीन अधिक प्रिय होता है।
इसका तात्पर्य यह है कि सबकी भूख एक जैसी है, तृप्ति भी एक जैसी है किन्तु सबको तृप्ति प्रदान करने वाले पदार्थ अलग-अलग हैं। इसी प्रकार सबकी साधना भी एक जैसी है, साधना से मिलने वाला परिणाम भी एक जैसा है, परन्तु साधना के मार्ग और उसकी प्रवृत्ति सबकी पृथक-पृथक है।
श्रीभगवान की पूजा और उसके फल एक ही हैं, लेकिन कोई कीर्तन करता है तो कोई जप करता है, कोई गीता पाठ करता है तो कोई कहता है कि मैं तो सबकी सेवा करूँगा। कोई ध्यान का मार्ग चुनता है।
एक स्थान पर बहुत सारे जीव थे। उनको हाथी का स्पर्श हुआ। जिस जीव को हाथी के पैर का स्पर्श हुआ, उसे हाथी का पैर ही हाथी लगा। जिसने हाथी के पेट को स्पर्श किया, उसे हाथी का पेट ही हाथी लगा। जो हाथी की सूण्ड के पास था, उसे हाथी की सूण्ड ही हाथी लगी और जो हाथी के मस्तक पर जाकर बैठ गया, उसने मस्तक को हाथी मान लिया। वास्तव में वे सब एक ही हाथी को देख रहे थे किन्तु आपस में झगड़ा कर रहे थे और अपने-अपने अनुभव से हाथी का आकार बता रहे थे। देखने की दृष्टि सीमित होने के कारण वे एक ही हाथी का दर्शन पृथक-पृथक रूप में कर रहे थे।
इसी प्रकार परमात्मा भी विराट हैं। हम उन परमात्मा को पूरे रूप में देख या जान सकेंगे, इसकी सम्भावना नहीं है। हम उनके एक भाव को समझते हैं और उसको ही परमात्मा समझ लेते हैं।
आगे श्रीभगवान कर्मयोग की बात करने वाले हैं।
अहं(ङ्) क्रतुरहं(य्ँ) यज्ञः(स्), स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम्, अहमग्निरहं(म्) हुतम्॥9.16॥
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं, हे अर्जुन! क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। श्रीभगवान अलग ही स्वभाव में कुछ कहना चाहते हैं। सबसे पहले हमें इन शब्दों का अर्थ जानना पड़ेगा कि क्रतु क्या होता है और हवन क्या होता है?
वैदिक रीति से जो अग्निहोत्र किया जाता है, उसे क्रतु कहते हैं। स्मार्त रूप से जो किया जाता है उसे यज्ञ कहते हैं।
पितरों को अर्पण किया जाने वाला जो अन्न होता है, उसे स्वधा कहते हैं।
यज्ञ में आहुति के रूप में जो तेल, जौ, छुहारा, जड़ी-बूटी आदि डाली जाती हैं, उन्हें औषधि कहते हैं।
हुतम्, यज्ञ रूप की क्रिया है।
श्रीभगवान कहते हैं कि “यज्ञ में जो घी डालते हैं वह भी मैं हूँ। उसमें प्रज्वलित होने वाली अग्नि भी मैं हूँ। पूर्ण हवन रूप जो क्रिया है, वह भी मैं हूँ।”
श्रीभगवान यहाँ कर्मकाण्ड रूप में आ गए हैं। चौदहवें श्लोक में वे भक्ति मार्ग में थे, पन्द्रहवें श्लोक में वे कर्मयोग में थे और अब सोलहवें श्लोक में वे कर्मकाण्ड में आ गए। श्रीभगवान कहते हैं “सद्स्थानों में मैं ही हूँ। कभी ऐसा नहीं मानना चाहिये कि कर्मकाण्डी को श्रीभगवान नहीं मिलेंगे, ज्ञानमार्गी को श्रीभगवान नहीं मिलेंगे या फिर भक्तिमार्गी को श्रीभगवान नहीं मिलेंगे।
दूसरों को सम्भवतः ऐसे लगेगा, लेकिन मैं सभी मार्गों पर मिलता हूँ।”
पिताहमस्य जगतो, माता धाता पितामहः।
वेद्यं(म्) पवित्रमोङ्कार, ऋक्साम यजुरेव च।।9.17।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं, “हे अर्जुन! मैं ही इस इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात् धारण करने वाला, कर्मों के फल को देने वाला, माता-पिता-पितामह सब मैं ही हूँ।” यहाँ कुछ भ्रम होना सम्भव हो सकता है। माता-पिता तो ठीक है, पर श्रीभगवान ने पितामह क्यों कहा? इस विषय में कोई अनुमान लगा सकता है?
श्रीभगवान दादा जी कैसे बन गए? सन्त कहते हैं, हमें उत्पन्न करने वाले तो ब्रह्मा जी हैं, तो ब्रह्मा जी पिता हो गए। अब ब्रह्मा जी को कौन उत्पन्न करता है? वे हैं नारायण! तो अब यहाँ ज्ञात होता है कि पिता के पिता अर्थात् दादा जी और वे हैं नारायण।
इस तरह से वे एक सम्बन्ध से पिता हैं, दूसरे सम्बन्ध से पितामह।
श्रीभगवान कहते हैं कि “जानने योग्य पवित्र ॐकार, ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद भी मैं ही हूँ।”
श्रीमद्भग्वद्गीता में श्रीभगवान ने अथर्ववेद की उपेक्षा की है। वास्तव में वेद चार नही हैं, वेद एक ही है।
यहाँ कोई भी सामान्य व्यक्ति यही कहेगा कि हमें तो पढ़ाया गया है कि वेद चार हैं। वह गलत नहीं बताया गया है पर मूल रूप से वेद एक ही है।
इनमें नियत अक्षरों वाली जो ऋचाएँ या मन्त्र हैं, उन्हें ऋग्वेद कहा गया। वहाँ आठ-आठ, बारह-बारह या तेरह-तेरह मात्राओं के चरण होते हैं। आठ-आठ मात्राओं के चरणों को अनुष्टुप छन्द कहा गया। इस तरह जहाँ नियत मात्राओं के छन्द हैं, उन्हें ऋग्वेद कहा गया।
जो गाई जा सकती हैं, जो छन्दबद्ध हैं, उन्हें सामवेद कहा गया।
जो ऋचाएँ अनियत अक्षरों वाली होती हैं, कोई आठ अक्षरों वाली, कोई ग्यारह अक्षरों वाली तो कोई अट्ठारह अक्षरों वाले चरण भी हैं, इनको यजुर्वेद कहा गया।
जहाँ लौकिक विद्याएँ हैं, जैसे भवन कैसे बनाया जाता है? रथ कैसे बनाया जाता है? अस्त्र-शस्त्र कैसे बनाए जाते हैं? भोजन कैसे बनाया जाता है? आदि, ये सभी चौंसठ कलाएँ सिखाने वाली जो ऋचाएँ हैं, उन्हें अथर्ववेद कहा गया।
श्रीभगवान ने श्रीमद्भग्वद्गीता में लौकिक विद्याओं की उपेक्षा कर दी क्योंकि उनकी यहाँ कोई आवश्यकता नहीं है। श्रीभगवान यहाँ कुछ उच्च स्तर की बात करना चाहते हैं।
गतिर्भर्ता प्रभुः(स्) साक्षी, निवासः(श्) शरणं(म्) सुहृत्।
प्रभवः(फ्) प्रलयः(स्) स्थानं(न्), निधानं(म्) बीजमव्ययम्।।9.18।।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं, ”हे अर्जुन! प्राप्त होने योग्य परमधाम, भरण-पोषण करने वाला सबका स्वामी, शुभाशुभ देखने वाला, हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति, प्रलय का हेतु, सबकी स्थिति का आधार-निधान, अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ, लेकिन मैं कुछ भी करता नहीं हूँ।”
हम कहते हैं, “हे भगवान! तुमने मेरे साथ यह क्या किया?” तब श्रीभगवान कहते हैं, “मैंने कुछ नहीं किया। तुम शुभ कर रहे हो, तुम अशुभ कर रहे हो, मैं केवल देख रहा हूँ, मैं उसमें लिप्त नहीं हूँ। मैं सबका कल्याण कर रहा हूँ, परन्तु बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए। सबकी उत्पत्ति, प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार-निधान एवं अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ।”
तपाम्यहमहं(व्ँ) वर्षं(न्), निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं(ञ्) चैव मृत्युश्च, सदसच्चाहमर्जुन॥9.19॥
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, मैं ही जल को ग्रहण करता हूँ और मैं ही वर्षा रूप से जल बरसा देता हूँ।
मैं ही अमृत हूँ, मैं ही मृत्यु हूँ, मैं ही सत्य और असत्य भी हूँ। श्रीभगवान कह रहे हैं, “मेरे सिवाय कुछ भी नहीं है।”
इसके उपरान्त हरिनाम सङ्कीर्तन के साथ आज के सत्र का समापन हुआ तथा प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् |
हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् ||
प्रश्नोत्तर
प्रश्नकर्ता- कुसुम दीदी
श्रीभगवान ने गीता जी में उसकी उपेक्षा कर दी है और उसकी बात अपने श्लोक में नहीं कही है। बाकी तीन वेदों में उपासना, आध्यात्म और कर्मकाण्ड के विषय में बताया गया है।
श्रीभगवान ने बार-बार यही कहा है कि तुम मेरे ही अंश हो। पन्द्रहवें अध्याय में भी श्रीभगवान ने कहा है।
कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू॥
मुझे इस दोहे का अर्थ विस्तार से समझाइए? यहाँ पर ब्राह्मणों का वध करने की बात क्यों कही गई है?
यहाँ श्रीभगवान ने कहा है कि कोई सबसे बड़ा पापी हो, वह भी अगर यह व्रत ले ले कि अब मैं पाप नहीं करूँगा और वह श्रीभगवान की भक्ति में लग जाए तो वह साधु माना जाएगा।
महाभारत के शान्ति पर्व में सिर्फ महाराज युधिष्ठिर और भीष्म पितामह का संवाद है। महाराज युधिष्ठिर ने धर्म सम्बन्धी प्रश्न किए हैं और महाराज भीष्म ने उनके उत्तर दिए हैं। महाराज युधिष्ठिर को जो धर्म का ज्ञान है और धर्म के प्रति जो सूक्ष्म दृष्टि है वह अन्य पाण्डवों में नहीं है इसी कारण महाराज युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग की प्राप्ति हुई।