विवेचन सारांश
कर्म योग की श्रेष्ठता
ईश्वर की असीम अनुकम्पा एवम् गुरुदेव के आशीर्वाद से आज के विवेचन सत्र (बालकों-बालिकाओं हेतु) का शुभारम्भ सड्कीर्तन, भगवान श्रीकृष्ण की प्रार्थना एवम् दीपप्रज्वलन से हुआ।।तत्पश्चात् श्रीमद्भगवद्गीता जी के पञ्चम अध्याय (कर्मयोग) का विवेचन चिन्तन प्रारम्भ हुआ। इस विवेचन सत्र में श्लोक क्रमाङ्क एक से विवेचन प्रारम्भ होता है।
सम्वादात्मक सत्र होने के नाते गीता जिज्ञासु बालक-बालिकाओं से समय-समय पर प्रश्न भी पूछे गए।
अर्जुन पहले अध्याय में विषाद में हैं, घबराएँ हुए भी हैं। भीष्म, द्रोणाचार्य जैसे महारथी, उनके बड़े तथा आदरणीय हैं, जिनके प्रति अर्जुन के मन में सम्मान का भाव है, उनसे वो कैसे युद्ध कर सकते हैं?बालकों की उपस्थिति में बालकों के लिए विशेष होने के कारण, बीच-बीच में उनको संबोधित भी किया है, बच्चों को समझाने के लिए उनके स्वभाव और क्रिया को उदाहरण रूप में प्रस्तुत भी किया है।
जैसे हम सभी अपने से बड़ो से कैसे युद्ध करे, ये बोलते भी हैं। श्रीअर्जुन जब युद्ध नहीं करूँगा, बोलते हैं, तो श्रीभगवान उपदेश देने लगते हैं, क्या सही है, क्या ग़लत है, क्या करने से पाप नहीं लगेगा?
तीसरे अध्याय में कर्मयोग की व्याख्या करते हुए कहते हैः कि कैसे कर्म करना है, कैसे कर्म नहीं करना है।
उसके और ऊपर के स्तर की बात चौथे अध्याय में करते हैं। अर्जुन विषाद से ग्रसित है, भ्रमित भी हैं। इसी कारण पाँचवें अध्याय का उदय होता है। तीसरे अध्याय में श्रीभगवान एक बात कहते हैं, चौथे अध्याय में अलग बात कहते हैं, इससे अर्जुन और भ्रमित हो जाते हैं। श्रीभगवान क्या कह रहें, वे समझ नहीं पाते। अर्जुन के बार-बार भ्रमित होने से ही पाँचवें अध्याय का उदय हुआ है। अर्जुन पूछते हैं, सही क्या है?
सत्र को रुचिकर बनाने के लिए बच्चों से पूछे गए कुछ प्रश्न-
प्रश्न- पहले अध्याय का क्या नाम है?
उत्तर- साध्वी ने सही उत्तर दिया, अर्जुनविषादयोग।
प्रश्न- तीसरे अध्याय का क्या नाम है?
उत्तर- नित्या ने सही उत्तर दिया, कर्मयोग।
प्रश्न- चौथे अध्याय का क्या नाम है?
उत्तर- सम्बित ने बताया, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग। बिल्कुल सही बताया।
अर्जुन भ्रमित हो जाते हैं, कि कर्मयोग या कर्मसंन्यास में से कौन सा श्रेष्ठ है।
कर्मयोग, कर्मसंन्यास की परिभाषा आसान शब्दों में ये है, ये श्रीभगवान पहले श्लोक में बताते हैं।
5.1
अर्जुन उवाच सन्न्यासं(ङ्) कर्मणां(ङ्) कृष्ण, पुनर्योगं(ञ्) च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं(न्), तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥5.1॥
हम सभी को, श्रीभगवान को जो कर्म पसन्द हैं, वही करने चाहिए। हम जानते हुए भी कि जो बोल रहे हैं, वो सही नहीं है, फिर भी झूठ बोल देते हैं। झूठ बोलना श्रीभगवान को पसन्द नहीं आता है। श्रीभगवान ने ये जीवन दिया है, तो अच्छे-अच्छे कर्म करें, और वापस श्रीभगवान के पास ही चले जाएँ। सन्त महात्मा श्रीभगवान के पसन्द के सत् कर्म ही करते हैं। उनके पास कुछ होता भी नहीं है, और कुछ पाने की आकाङ्क्षा भी नहीं होती है। हमें तो एक वीडियो गेम की इच्छा भी हो जाती है, और नहीं मिलने पर क्रोध से भर जाते हैं। गीताजी पढ़ने वाले बच्चों में ये दुर्गुण नहीं होता है।
कर्मसंन्यासयोग का मतलब होता है, कर्म करके फल की इच्छा नहीं करना।
कर्म तो सभी को करने ही होते हैं। तुरन्त ही संन्यासी बन जाय, कोई इच्छा नहीं रखें, ये इतना आसान भी नहीं है।
उदाहरण- जैसे एक बच्चा पढ़ना शुरू करता है, तो प्रारम्भ में ही ऊँची कक्षाओं में प्रवेश नहीं पा जाता। उसे सर्वप्रथम छठीं में जाने के लिए उसके नीचे को कक्षाओं में अध्ययन करके उत्तीर्ण होना होगा तभी, छठीं कक्षा में प्रवेश पा सकेगा। हम सब साधारण मनुष्य है। कर्म योगी पहले बनेगें। श्रीभगवान की पसन्द के कार्य करेगें तो धीरे-धीरे, संतों की भावना भी आने लगेगी। कर्मयोग और कर्मसंन्यासयोग में कौन सा श्रेष्ठ है, ये अगले श्लोक में श्रीभगवान बताते हैं।
श्रीभगवानुवाच सन्न्यासः(ख्) कर्मयोगश्च, निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्, कर्मयोगो विशिष्यते॥5.2॥
ज्ञेयः(स्) स नित्यसन्न्यासी, यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो, सुखं(म्) बन्धात्प्रमुच्यते॥5.3॥
यो न हृष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी, भक्तिमान्यः(स्) स मे प्रियः॥१२.१७॥
जो द्वेष नहीं करता, आकांक्षा नहीं करता, दूसरे के लिए बुरा भी नहीं सोचता, उसको संन्यासी कह सकते हैं।यहाँ कह रहे हैं, द्वेष नहीं करने वाला, आकाङ्क्षा नहीं रखने वाला कर्म योगी, साड्•ख्य योगी के समान ही होता है। द्वन्द्वों से मुक्त, लाभ हानि से परे, सुख-दुःख में समभाव वालों का भगवान से सम्बन्ध जुड़ जाता है।
बारहवें अध्याय के सोलहवें, सत्रहवें श्लोक में ये ही बात दोहरायी गयी है।
अनपेक्षः(श्) शुचिर्दक्ष, उदासीनो गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी, यो मद्भक्तः(स्) स मे प्रियः॥१२.१६॥
कहानी- एक बाबा भारती थे। उनके पास एक घोड़ा, अत्यन्त सुन्दर, अच्छे क़द काठी का सफ़ेद चमकदार था। उसका नाम था सुल्तान। बाबा भारती उस घोड़े से बहुत प्यार करते थे। संन्यासी होते हुए भी, उस घोड़े से बाबा भारती को बहुत लगाव था। सब कुछ त्याग दिया, पर घोड़े को नहीं छोड़ पाये। उसके लिए एक अस्तबल भी रहने को बना दिया। उस घोड़े की प्रशंसा उस क्षेत्र में चारों ओर होती थी। उसी गाँव में खड़गसिंह नाम का डाकू भी रहता था। एक किवदन्ती भी है।खिड़कियों के खड़कने से खड़कता है खड़क सिंह।
जो भी चीज या वस्तु खड़गसिंह को पसन्द आती थी, वो ले लेता था। बाबा भारती का घोड़ा विशेष है, ये बात उसे पता चली। वो बाबा भारती के पास आता है, बाबा भारती उस घोड़े की बहुत प्रसंशा करते हैं। खड़गसिंह सैर करना चाहता है। सैर करने के पश्चात खड़गसिंह घोड़े पर मोहित हो जाता है। वो बाबा भारती से वो घोड़ा माँगता है, पर बाबा भारती देने से मना कर देते हैं। इस पर खङ्गसिंह बोल कर जाता है कि वो घोड़ा, उनसे ले लेगा। बाबा भारती ये सुन कर चिन्तित हो जाते हैं। रात रात को उस घोड़े को सम्भालते रहते। कुछ महीने बीत गये, कुछ भी नहीं हुआ तो बाबा भारती की चिन्ता कम हो गयी।
बाबा भारती एक दिन घोड़े पर घूमने निकले, रास्ते में एक अत्यन्त निर्धन अस्वस्थ व्यक्ति दर्द से कराहता हुआ मिला। उस व्यक्ति ने बाबा भारती से सहायता के लिए कहा कि आगे के गाँव तक उसे घोड़े पर चढ़ा कर पहुँचा दे। बाबा भारती ने एक बार न भी कह दिया। दयनीय व्यक्ति के पीड़ा से दूसरी बार कहने पर उन्होंने उसे घोड़े पर बैठा लिया। छद्म वेष में वो अस्वस्थ, निर्बल व्यक्ति डाकू खड़गसिंह ही था, बाबा को घोड़े पर नहीं बैठने देकर वो घोड़ा लेकर आगे चला गया। बाबा ने पीछे से आवाज़ देकर, उसको रुकने के लिए कहा। खड़गसिंह रुक गया। बाबा भारती उसको बोलते हैं, एक बात मानोगे। डाकू बोलता है, घोड़ा वापस देने की बात को छोड़ कर कोई भी बात मानूँगा। बाबा बोलते हैं, आज जो हुआ, वो किसी को भी नहीं बताना। कारण कि भविष्य में कोई भी किसी निर्धन की मदद नहीं करेगा। लोक कल्याण की बात, बाबा विचार करके बोल रहें हैं। खङ्गसिंह सोचता है, बाबा उसके प्रति द्वेष का भाव नहीं रख रहे हैं। वो चिन्ता कर रहे हैं कि लोग एक दूसरे की मदद नहीं करेगें। खङ्गसिंह का हृदय प्रवर्तित हो जाता है। रात को खङ्गसिंह घोड़ा वापस लाकर अस्तबल में बाँध देता है।
रात को घोड़े की हिनहिनाहट का स्वर सुनकर बाबा भारती अस्तबल में जाकर देखते हैं, तो घोड़े को वहाँ पाकर, बहुत रोते हैं।
इस कहानी से शिक्षा मिलती है कि बाबा को घोड़े से बहुत प्रेम होने के बाद भी घोड़े के चले जाने पर भी द्वेष नहीं करते हुए, समाज के बारे में ही सोचते हैं, क्योंकि वे संन्यासी हैं, राग-द्वेष से ऊपर उठे हुए हैं।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः(फ्), प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः(स्) सम्यग्, उभयोर्विन्दते फलम्॥5.4॥
साङ्ख्ययोग को अलग-अलग मानते है। दोनों से ही भगवान की प्राप्ति होती है। दोनों योगों से एक परिणाम मिलने वाला है।
उदाहरण- नदी के किनारे खड़े हैं। उस पार जाना हैं तथा पार जाने हेतु दो भिन्न-भिन्न मार्ग हैं। नाव से जा सकते हैं या तैर कर। उसी तरह श्रीभगवान की प्राप्ति के भी यह दो साधन है, कर्म योग और साङ्ख्य योग, चूँकि दोनों ही भगवद् प्राप्ति के मार्ग हैं अत: दोनों ही मार्ग समस्त जीवों, जो भगवद् प्राप्ति मार्ग की ओर प्रशस्त हैं, हेतु महत्वपूर्ण हैं, श्रेष्ठ हैं।
यत्साङ्ख्यैः(फ्) प्राप्यते स्थानं(न्), तद्योगैरपि गम्यते।
एकं(म्) साङ्ख्यं(ञ्) च योगं(ञ्) च, यः(फ्) पश्यति स पश्यति॥5.5॥
सन्न्यासस्तु महाबाहो, दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म, नचिरेणाधिगच्छति॥5.6॥
कर्मयोग में मनुष्य अपने समस्त कर्मों को श्रीभगवान को अर्पित कर देता है, इस प्रकार वह स्वयं के समस्त कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है। न ही जीव में स्वयं द्वारा किए गए कर्मों हेतु कर्ता का अभिमान ही निहित होता है, न ही किसी कर्म फल की इच्छा। अत: ऐसा पूर्णतः मुक्त जीव स्वतः ही भगवद् भक्ति द्वारा श्रीभगवान को प्राप्त कर लेता है।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा, विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा, कुर्वन्नपि न लिप्यते॥5.7॥
नैव किञ्चित्करोमीति, युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्, नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥5.8॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्, नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु, वर्तन्त इति धारयन्॥5.9॥
यह तन किसी का है दिया ।
जो भी अपने पास है,
वह धन किसी का है दिया
किसी का अर्थात् भगवान का दिया हुआ है अर्थात् मेरे समीप जो भी कुछ है, उस परमपिता परमेश्वर का ही दिया हुआ है। अत: ऐसे विचार करते हुए जो भी कुछ हमारे साथ है उसका जीव को लेशमात्र भी अभिमान नहीं करना चाहिए।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि, सङ्गं(न्) त्यक्त्वा करोति यः꠰
लिप्यते न स पापेन, पद्मपत्रमिवाम्भसा॥5.10꠱
जैसे जल में कमल का फूल रहे,
मेरे सब गुण दोष समर्पित हों,
करतार तुम्हारे हाथों में ॥
प्रश्नकर्ता- संवेद भैया
प्रश्न- ज्ञान एवम् कर्म योग में क्या अन्तर है?
- कर्मयोग- इस योग के माध्यम से जीव अपने कर्म एवम् उसके कर्मफलों का त्याग कर अर्थात् उन्हें श्रीभगवान को अर्पित कर देते हैं। वे श्रीभगवान के सगुण रूप की उपासना करते हैं। वे श्रीराम एवम् श्रीकृष्ण के मूर्ति रूप पर, उनके उपासक अपने समस्त कर्मों को अर्पित कर देते हैं।
इस प्रकार ज्ञान योगी वेदों के अध्ययन व श्रीभगवान की आराधना करते हुए, श्रीभगवान को प्राप्त करते हैं।
तथा कर्मयोगी अपने कर्मों के श्रीभगवान को अर्पण कर श्रीभगवान को प्राप्त करते हैं
प्रश्नकर्ता- प्रथम भैया
प्रश्न- भोजन से पूर्व कौन सा श्लोक उच्चारित किया जाना चाहिए?
उत्तर- यदि हम श्रीमद्भगवद्गीता जी के श्लोकों के सन्दर्भ बात करें तब अध्याय चतुर्थ के चौबीसवें श्लोक का उच्चारण भोजन पूर्व किया जाना महत्वपूर्ण माना जाता है-
ब्रह्मार्पणं(म्) ब्रह्म हविः(र्), ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं(म्), ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
अर्थ- जो मनुष्य पूर्णतया भगवद् भक्ति में तल्लीन रहते हैं उनका हवन ब्रह्म है, हवन सामग्री ब्रह्म है और करछुल जिससे आहुति डाली जाती है वह ब्रह्म है, अर्पण कार्य ब्रह्म है और यज्ञ की अग्नि भी ब्रह्म है। ऐसे मनुष्य जो प्रत्येक वस्तु को भगवान के रूप में देखते हैं वे सहजता से उसे पा लेते हैं।
इसके अतिरिक्त यदि आपके निकट पर्याप्त समय है तब आप श्रीमद्भगवद्गीता जी के सम्पूर्ण पन्द्रहवें अध्याय का भी पठन कर सकते हैं।
प्रश्नकर्ता- सानवी दीदी
प्रश्न- ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु का क्या अर्थ है?
उत्तर- जिस प्रकार हम कोई कार्ड अर्थात् जन्मदिन की शुभकामनाओं वाले पत्र बना अपने माता-पिता, अपने दादी-दादा को देते हैं। तब हमारे द्वारा किया गया कार्य अर्थात् बनाया गया कार्ड उन्हें अर्पित कर दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार जब हम अपने द्वारा किए गए समस्त कार्यों को श्रीभगवान के चरणों में अर्पित कर देते हैं तथापि हम उन समस्त कर्म बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं साथ ही कर्ता के अभिमान सहित जीव कर्मफल की इच्छा से भी विरक्त हो जाते हैं।