विवेचन सारांश
आसुरी गुण सम्पदा के लक्षण

ID: 6158
Hindi - हिन्दी
रविवार, 05 जनवरी 2025
अध्याय 16: दैवासुरसंपद्विभागयोग
2/2 (श्लोक 6-24)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


प्रार्थना, प्रकाश स्वरूप दीप प्रज्वलन व गुरु वन्दना के साथ आज का विवेचन सत्र प्रारम्भ हुआ।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को इस अध्याय में दैवीय गुण सम्पदा के छब्बीस गुणों के बारे में बताते हैं जबकि इन सभी गुणों का वर्णन तेरहवें अध्याय में किया गया है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को विस्तार से आसुरी गुणों के बारे में भी बताते हैं। यह सारे आसुरी गुण दैवीय गुण के साथ प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर होते हैं।

इन छः प्रकार के आसुरी गुणों के बारे में, भगवान अर्जुन से इसलिए कहते है क्योंकि अर्जुन गाण्डीव नीचे रख कर मन में नकारात्मकता से भर गया है। वह युद्ध नहीं करना चाहता और उसके मन में कई तरह के ऐसे विचार उत्पन्न हो रहे हैं जो कि दैवीय गुण वाले व्यक्ति में नहीं होने चाहिए। दैवीय गुण सम्पदा से आसुरी सम्पदा जब बढ़ जाती है तो दैवीय गुण से युक्त व्यक्ति भी नकारात्मक विचारों से घिर जाता है। प्रकृति में तीन ही गुण है सत्त्व गुण, रजोगुण, तमोगुण यह तीनों ही गुण प्रत्येक व्यक्ति में जन्म से ही आते हैं जैसे कम्प्यूटर में इसका इन-बिल्ट सॉफ्टवेयर होता है उसी प्रकार से हर मनुष्य में तीनों गुणों का समावेश होता है।

परन्तु तीनों गुणों में व्यक्ति जब सन्तुलन नहीं कर पाता तो उसमें दैवीय और आसुरी शक्तियाँ क्रमश: सकारात्मक एवं नकारात्मक भाव पैदा करती हैं। जैसे हम सब लोग जिनमें गीता सीखने की इच्छा शक्ति पैदा हुई हम सभी में दैवीय गुण या सकारात्मकता अधिक है। यह नहीं होता कि किसी में आसुरी गुण सम्पदा हो ही न, क्योंकि यही वह सम्पदा है जिसके कारण हमें नींद आती है। निद्रा आसुरी प्रवृत्ति के गुण के कारण आती है। योगी और सिद्ध व्यक्ति अपनी निद्रा पर काबू करके अपने अन्दर से तमोगुण को कम कर देते हैं और सत्त्व गुण बढ़ा लेते है।

रजोगुण से युक्त लोग भी अपनी निद्रा पर काबू पाकर कार्यरत रहते हैं और केवल तीन-चार घण्टे की नींद लेते हैं। निद्रा आसुरी गुण सम्पदा का एक भाग है और प्रत्येक मनुष्य न तो देव है और न ही असुर है इसलिए उसमें इन तीनों गुणों का मिश्रण रहता है।

16.6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्, दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः(फ्) प्रोक्त , आसुरं(म्) पार्थ मे शृणु।।16.6।।

इस लोक में दो तरह के ही प्राणियों की सृष्टि है -- दैवी और आसुरी। दैवी को तो (मैंने) विस्तार से कह दिया, (अब) हे पार्थ! (तुम) मुझसे आसुरी को (विस्तार) से सुनो।

विवेचन- श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि लोक में हमेशा ही दोनों प्रकार के मनुष्य रहेंगे जहाँ राम होंगे वहाँ आसुरी शक्तियों से युक्त रावण भी होंगे। जहाँ श्री कृष्ण होंगे वहाँ कंस भी रहेंगें। सदियों से ऐसे ही होता रहा है और आगे भी सदियों तक ऐसे ही होता रहेगा। दैवीय गुण में छब्बीस प्रकार के गुण बताते हुए भगवान अर्जुन को आसुरी गुणों से भी सचेत करते हैं क्योंकि जहाँ पर वाद्य यन्त्र होगा वहाँ आवाज आएगी, जहाँ गुड़ की मिठास होगी वहाँ चींटी भी आएगी। जहाँ फूल खिलते हैं, वहाँ मकरन्द भी पहुँच ही जाएगा। जहाँ घर्षण होगा वहाँ अग्नि भी अवश्य प्रज्वलित होगी। मानव जीवन में भी ऐसा ही है। जहाँ दैवीय गुण सम्पदा होगी वहाँ आसुरी गुण सम्पदाएँ भी होंगी। इस मानव जन्म को प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है इसीलिए इसको जीने के लिए आसुरी गुण सम्पदा पर विशेष नियन्त्रण रखना आवश्यक है। यह मनुष्य पर आश्रित है कि वह अपने जीवन को दैवीय गुण सम्पदा से या आसुरी गुण सम्पदा से प्रवृत करता है।

16.7

प्रवृत्तिं(ञ्) च निवृत्तिं(ञ्) च, जना न विदुरासुराः।
न शौचं(न्) नापि चाचारो, न सत्यं(न्) तेषु विद्यते।।16.7।।

आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य किस में प्रवृत होना चाहिये और किससे निवृत्त होना चाहिये (इसको) नहीं जानते और उनमें न तो बाह्य शुद्धि, न श्रेष्ठ आचरण तथा न सत्य-पालन ही होता है।

विवेचन- दैवीय एवम् आसुरी गुण हमारे पूर्व जन्मों से अर्जित होते हैं और कुछ हमें हमारे पूर्वजों से प्राप्त होते हैं। कुछ दैवीय गुण सम्पदा हमें हमारे पूर्वजों के कारण प्राप्त होती है। जैसे परिवार में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक कुछ अच्छी बातें चलती हैं। भोजन करने से पहले हाथ धोना, स्वच्छ रहना, सत्य बोलना दैवीय गुण हैं। लेकिन आसुरी गुण वाले व्यक्ति स्वच्छता का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखते। भोजन बिना हाथ धोऐ खा लेते हैं। किसी भी समय पर खा लेते हैं कितना भी भोजन खा लेते हैं। असत्य बोल देते हैं और असत्य बोलकर भी हमें असत्य बोलना नहीं आता ऐसा कहते हैं। वह आन्तरिक और बाहरी रूप से अस्वच्छ ही रहते हैं।

16.8

असत्यमप्रतिष्ठं(न्) ते, जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं(ङ्), किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।

वे कहा करते हैं कि संसार असत्य, बिना मर्यादा के (और) बिना ईश्वर के अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से पैदा हुआ है। (इसलिये) काम ही इसका कारण है, इसके सिवाय और क्या कारण है? (और कोई कारण हो ही नहीं सकता।)

विवेचन- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आसुरी गुण सम्पदा के व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए ही सोचते हैं। भगवान में किसी भी तरह का विश्वास नहीं रखते। केवल अपने सुख के लिए धन अर्जित करते हैं। आनन्द एवम् सुख में अन्तर होता है, सुख के पीछे दौड़ने वाले अन्त में दु:ख पाते है। सुख भी नश्वर है। दु:ख भी नश्वर है। सुख, दु:ख की ओर ले जाता है और दु:ख, सुख की ओर ले जाता है परन्तु आनन्द, परमानन्द की ओर ले जाता है। जो आनन्द की प्राप्ति के लिए कार्यरत रहते हैं वह वर्षों तक उस आनन्द को प्राप्त करते हैं। गीता जी का पाठ करने वाले सभी व्यक्ति परम आनन्द की प्राप्ति करते हैं और यह आनन्द की अनुभूति कोई एक पल या एक वर्ष के लिए नहीं होती। पाँच हजार वर्षों तक भी यह आनन्द समाप्त नहीं हुआ। आनन्द का कोई परम छोर नहीं होता। आसुरी गुण सम्पदा के लोग "मेरी मर्जी" वाले तत्त्व ज्ञान से चलते हैं। विषय भोगों को भोगने वाले तर्क देते हैं कई प्रकार से सनातन नियमों का पालन नहीं करते और उस पर व्यङ्ग्य कसते हैं उनका अपना ही तर्क रहता है "क्या जानवरों के विवाह नहीं होते? क्या वह मुहूर्त निकलवा कर विवाह करते हैं? क्या बुरे काम करने से कीड़े मकोड़े की जिंदगी मिलती है? अगर जीवन ऐसा मिलता भी है तो वह भी तो मस्त रहते हैं। पाप और पुण्य कौन मापता है? कोई भगवान नहीं होता। जो माँस मदिरा नहीं खाते ऐसे योग करने वाले व्यक्ति भी तो कई बार दुनिया से चले जाते हैं और कई बार मदिरा पीने वाला व्यक्ति मौज करता हुआ अस्सी साल तक जिन्दा रहता है" ऐसे तर्क देकर वह भगवान के अस्तित्व पर भी प्रश्न उठाते हैं।

16.9

एतां(न्) दृष्टिमवष्टभ्य, नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः, क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।

इस (पूर्वोक्त) (नास्तिक) दृष्टि का आश्रय लेने वाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूप को नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्र कर्म करने वाले (और) संसार के शत्रु हैं, उन मनुष्यों की सामर्थ्य का उपयोग जगत का नाश करने के लिये ही होता है।

विवेचन-भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसी अल्प बुद्धि के लोग अपने साथियों का भी नाश करते हैं। मनुष्य को दूसरे के आनन्द में आनन्द प्राप्त करना चाहिए और दूसरे के दु:ख में दु:ख का अनुभव करना चाहिए। आसुरी प्रवृत्ति के मनुष्य दूसरों का भला देख कर दु:खी होते हैं और दु:ख को देखकर प्रसन्न होते हैं। दूसरों के आनन्द में उनको अच्छा नहीं लगता। ऐसे आसुरी गुण सम्पदा के लोग नकारात्मक बुद्धि वाले होते हैं।

16.10

काममाश्रित्य दुष्पूरं(न्), दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्, प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।

कभी पूरी न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मद में चूर रहने वाले (तथा) अपवित्र व्रत धारण करने वाले मनुष्य मोह के कारण दुराग्रहों को धारण करके (संसार में) विचरते रहते हैं।

विवेचन- आसुरी सम्पदा के लोग बड़े ही दम्भ से भरे हुए होते हैं। इनमें से कुछ तपस्वी भी हुए हैं जैसे रावण, हिरण्यकश्यप आदि।

रावण ने बहुत भक्ति की थी और इसी तरह से अमर होने के लिए हिरण्यकश्यप ने भी बहुत भक्ति की थी और उसने ब्रह्मा से माँग लिया था कि उसका वध न कोई नर, न ही देव और न ही दानव कर सके। न कोई दिन में उसे मार सके न रात में, न घर के अन्दर और न घर के बाहर कोई उसे मार सके परन्तु प्रह्लाद ने जब यह कहा कि स्तम्भ में भी परमात्मा है तो हिरण्यकश्यप ने स्तम्भ पर जोर से पैर मारा तो प्रभु को साक्षात दर्शन देने पड़े। नरसिंह के रूप में प्रभु ने अपने जङ्घा पर रखकर घर की दहलीज में, न घर के अन्दर और न घर के बाहर, सन्ध्या काल में जब न रात थी, न दिन था अपने नाखूनों से हिरण्यकश्यप को मारा।

16.11

चिन्तामपरिमेयां(ञ्) च, प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा, एतावदिति निश्चिताः।।16.11।।

(वे) मृत्यु पर्यन्त रहने वाली अपार चिन्ताओं का आश्रय लेने वाले, पदार्थों का संग्रह और उनका भोग करने में ही लगे रहने वाले और 'जो कुछ है, वह इतना ही है' - ऐसा निश्चय करने वाले होते हैं।

विवेचन- आसुरी प्रवृत्ति के मनुष्य किसी भी तरह का खाना खाकर उसको प्रतिकार क्षमता बढ़ाने वाला  होने का तर्क दे देंगे। धन कमाने और लाभ कमा कर सञ्चित किए धन को विषयों पर व्यय करना ही उनका काम है। "खाओ पियो और मस्त रहो" यही उनके जीवन का उद्देश्य रहता है। जो वे कहते हैं वही सत्य है, ऐसा उनका मानना होता है। आसुरी प्रवृत्ति के मनुष्य जीवन को केवल सुख भोगने के लिए ही जीने का अर्थ समझते है।

16.12

आशापाशशतैर्बद्धाः(ख्), कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थम्, अन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।

(वे) आशा की सैकड़ों फाँसियों से बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर पदार्थों का भोग करने के लिये अन्याय पूर्वक धन-संचय करने की चेष्टा करते रहते हैं।

विवेचन- आसुरी प्रवृत्ति के लोग अपनी आशाओं और कामनाओं को पूर्ण करने के लिए हमेशा कार्यरत रहते हैं और जब उनकी कामनाएँ पूर्ण न हो तो वह क्रोध से भर जाते हैं कामनाओं को पूर्ण करना ही उनके जीवन का उद्देश्य रहता है। जिसके लिए वह धन अर्जित करते हैं। लक्ष्मीजी की उपासना तो करते हैं पर नारायण जी के साथ लक्ष्मीजी की पूजा नहीं करते। अगर लक्ष्मी जी अकेले आती हैं तो वह उल्लू पर सवार होती है और ऐसा धन हमेशा विनाश का कारण बनता है। अगर नारायण जी के साथ उपासना की जाए तो वह गरुड़ पर (जो कि नारायण जी की सवारी है) आती है। ऐसा धन दुर्व्यवहार और व्यसन लेकर नहीं आता। इसलिए लक्ष्मी जी का पूजन हमेशा नारायण जी के साथ ही करना चाहिए।

16.13

इदमद्य मया लब्धम्, इमं(म्) प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे, भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।

वे इस प्रकार के मनोरथ किया करते हैं कि - इतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं (और अब) इस मनोरथ को प्राप्त (पूरा) कर लेंगे। इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना (धन) फिर भी हो जायगा।

विवेचन- प्रकृति से ही आसुरी गुण सम्पदा के मनुष्य लोभ से भरे होते हैं। आज छोटी गाड़ी है तो कल बड़ी गाड़ी लेने की इच्छा पैदा होती है और अगर बड़ी गाड़ी है तो उससे भी बड़ी गाड़ी लेने की कामना रहती है। ऐसे लोग प्रतिदिन नए-नए भोग विलास में डूबे रहते हैं और विषयों की प्राप्ति के लिए धन अर्जित करने में जुटे रहते हैं। उनके जीवन में वह दिया नहीं दिया जिससे कि उनके जीवन में प्रकाश हो। वह अहङ्कार से उन्मत्त रहते हैं।

16.14

असौ मया हतः(श्) शत्रु:(र्), हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं(म्) भोगी, सिद्धोऽहं(म्) बलवान्सुखी।।16.14।।

वह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और (उन) दूसरे शत्रुओं को भी (हम) मार डालेंगे। हम ईश्वर (सर्व समर्थ) हैं। हम भोग भोगने वाले हैं।हम सिद्ध हैं, (हम) बड़े बलवान (और) सुखी हैं।

विवेचन- भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति दम्भ से भरे हुए स्वयं को ही ईश्वर कहते हैं। "मेरे पास धन है" जिससे मैं हर सुख सुविधा खरीद सकता हूँ।" ऐसी अभिलाषा पैदा हो जाती जिससे वह स्वयं को सर्वोपरि समझने लगते हैं। उन्हें ऐसा जान पड़ता है कि धन से वह अपने लिए प्रत्येक सांसारिक भोग विलास की वस्तु ले सकते हैं जो उन्हें सुख देगी।

16.15

आढ्योऽभिजनवानस्मि, कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य, इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।

हम धनवान हैं, बहुत से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान दूसरा कौन है? (हम) खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे (और) मौज करेंगे - इस तरह (वे) अज्ञान से मोहित रहते हैं।

विवेचन- ऐसे आसुरी गुण सम्पदा के व्यक्ति अपने मद में इतने चूर हो जाते हैं कि वह अपने ही गृहस्थ जीवन को नरक बना लेते हैं।

घरों में ही बार खोलकर बच्चों के साथ बैठकर पीने वाले लोग अपने बच्चों का भविष्य भी खराब कर देते हैं। आजकल शहरों में बच्चों की वाटर बोतल में शराब लेकर आने के समाचार हैं। बच्चे वही सीख रहे हैं जो बच्चे देख रहे हैं। उनका अर्जित किया हुआ धन ही उनके विनाश का कारण बन जाता है जमीन पर चलने की बजाय वह हवा में उड़ते रहते है। आसुरी प्रवृत्ति उन्हें दम्भ से भर देती है। मेरे नाम से यज्ञ कराया गया ऐसे द्रव्य यज्ञ करने में बहुत अहङ्कार महसूस करते हैं उन्हें ऐसा जान पड़ता है कि भोग विलास में लगे रहकर कैसा भी पाप करने से कुछ नहीं होता यज्ञ कर देने से सब सही हो जाता है। नवें अध्याय के श्लोक को पढ़कर दूसरों को सुनाते हैं-

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं, क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति।
एव त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना, गतागतं कामकामा लभन्ते।।9.21।।
 

जिसका वह अर्थ यह समझ लेते हैं कि एक यज्ञ करने से भी स्वर्ग प्राप्त हो जाता है चाहे कितना भी सोमरस का सेवन कर लो लेकिन वे उससे आगे श्लोक के भाव तक नहीं पढ़ते और न ही समझते है कि जैसे ही तुमने उस यज्ञ के बदले में स्वर्ग की यात्रा की, वैसे ही उसके फल की समाप्ति पर वहाँ से निकाल भी दिए जाओगे।

16.16

अनेकचित्तविभ्रान्ता, मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः(ख्) कामभोगेषु, पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।

(कामनाओं के कारण) तरह-तरह से भ्रमित चित्त वाले, मोह-जाल में अच्छी तरह से फँसे हुए (तथा) पदार्थों और भोगों में अत्यन्त आसक्त रहने वाले मनुष्य भयंकर नरकों में गिरते हैं।

विवेचन- श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आसुरी गुण सम्पदा के लोग अपना गुणगान करने में व्यस्त रहते हैं। उनके पास थोड़ी देर के लिए बैठो तो वह मद से भरे हुए अपना ही व्याख्यान प्रारम्भ कर देते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे उनके पास बहुत पैसा है तो कोई भी व्यक्ति उनके बारे में सुनना चाहता है। एक बार एक धनी व्यक्ति ने एक महाराज को बुलाया और भागवत कथा के दौरान खाने का प्रबन्ध करने के लिए उसको नियुक्त किया। भागवत कथा के दौरान मुख्य यजमान ऐसी भूमिका में दम्भ पूर्ण श्रेय लेता हुआ इधर-उधर घूमने लगा। आसुरी गुण सम्पदा के लोगों में इस तरह के लक्षण रहते हैं।

16.17

आत्मसम्भाविताः(स्) स्तब्धा, धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते, दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।

अपने को सबसे अधिक पूज्य मानने वाले, अकड़ रखने वाले (तथा) धन और मान के मद में चूर रहने वाले वे मनुष्य दम्भ से अविधिपूर्वक नाममात्र के यज्ञों से यजन करते हैं।

विवेचन- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति के मनुष्य आत्मा की शुद्धि और भगवान को प्रसन्न करने के लिए यज्ञ करते हैं लेकिन अशुद्ध भावना के साथ और अनुचित प्रयोजनों के लिए करते हैं। ऐसे आसुरी आचरण वाले व्यक्ति समाज की दृष्टि में स्वयं को पवित्र दिखाने के लिए भव्य धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते हैं। वे शास्त्रों की आज्ञाओं का भी पालन नहीं करते बल्कि इसके स्थान पर वे स्वयं की ख्याति के लिए और प्रदर्शन करने के प्रयोजन से धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

16.18

अहङ्कारं(म्) बलं(न्) दर्पं(ङ्), कामं(ङ्) क्रोधं(ञ्) च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु, प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।

(वे) अहंकार, हठ, घमण्ड, कामना और क्रोध का आश्रय लेने वाले मनुष्य अपने और दूसरों के शरीर में (रहने वाले) मुझ अन्तर्यामी के साथ द्वेष करते हैं (तथा) (मेरे और दूसरों के गुणों में) दोष दृष्टि रखते हैं।

विवेचन- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि आसुरी गुण सम्पदा के मनुष्य अहङ्कार, कामना व क्रोध में लिप्त होकर दूसरों की निन्दा करने में आनन्द की अनुभूति लेने लगते हैं। वह दूसरों की निन्दा करते समय उस व्यक्ति में भी परमपिता परमात्मा का अंश है ऐसा सोचे बिना परमात्मा के उस रूप की भी निन्दा कर जाते हैं। जिसकी वह बिल्कुल परवाह नहीं करते। ऐसे व्यक्ति अच्छे या बुरे किसी भी व्यक्ति की निन्दा करने में लज्जित नहीं होते। अच्छे व्यक्तियों की भी निन्दा करते हैं और बुरे व्यक्ति की भी। अगर किसी व्यक्ति में कोई बुराई है तो उस बुराई का व्याख्यान करने की बजाय मौन भी रह सकते हैं परन्तु उन्हें निन्दा करने में प्रसन्नता का अनुभव होता है। परिणामस्वरूप वे परमात्मा के अंश की उपेक्षा और अपमान करते हैं, जो उनके अपने और अन्य लोगों के हृदयों में स्थित हैं।

16.19

तानहं(न्) द्विषतः(ख्) क्रूरान् , संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभान्, आसुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।

उन द्वेष करने वाले, क्रूर स्वभाव वाले (और) संसार में महानीच, अपवित्र मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता ही रहता हूँ।

विवेचन- किसी भी आत्मा को जब शरीर से जाना होता है तो वह दूसरे शरीर को प्राप्ति करती है। योगी आत्माएँ सकारात्मक उदर में एवम् आसुरी गुण सम्पदा के मनुष्य अगले जीवन में समान उदर वाले परिवारों में जन्म लेते हैं। सकारात्मक आत्मा सभी मनुष्य की शुभचिन्तक रहती हैं। उसी प्रकार से आसुरी प्रवृत्ति के मनुष्य बुरी मानसिकता के पात्र हैं और जब तक उन्हें सकारात्मक उदर प्रदान नहीं होता तब तक वह दूसरों के लिए दु:ख का कारण ही बनते हैं।

16.20

आसुरीं(य्ँ) योनिमापन्ना, मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय, ततो यान्त्यधमां(ङ्) गतिम्।।16.20।।

हे कुन्तीनन्दन ! (वे) मूढ मनुष्य मुझे प्राप्त न करके ही जन्म-जन्मान्तर में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, (फिर) उससे भी अधिक अधम गति में अर्थात् भयंकर नरकों में चले जाते हैं।

विवेचन- श्रीकृष्ण भगवान अर्जुन से कहते हैं कि यह आसुरी आत्माएँ हमेशा आसुरी राह पर ही लेकर जाती है। इस सम्बन्ध में भगवान मनुष्य के कर्मों की प्रकृति के अनुसार निर्णय करते हैं। इस प्रकार से आसुरी लोग निम्न कोटि को ही प्राप्त होते हैं।

16.21

त्रिविधं(न्) नरकस्येदं(न्), द्वारं(न्) नाशनमात्मनः।
कामः(ख्) क्रोधस्तथा लोभ:(स्), तस्मादेतत्त्रयं(न्) त्यजेत्।।16.21।।

काम, क्रोध और लोभ - ये तीन प्रकार के नरक के दरवाजे जीवात्मा का पतन करने वाले हैं, इसलिये इन तीनों का त्याग कर देना चाहिये।

विवेचन- भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं की नरक के तीन द्वार हैं काम, क्रोध और लोभ। यह आध्यात्मिक दोष हैं। जैसे मार्केटिंग का काम करते वक्त प्रायः लोगों को क्रोध आता है। एक बार विवेचक अपने मित्र के पिता के देहान्त पर पहुँचे। वहाँ गरुड़ पुराण का पाठ सुनते समय विवेचक को ऐसा महसूस हुआ कि क्रोध करना बहुत ही गलत है क्योंकि क्रोध करने से हमारे शरीर के अन्दर रक्त उबलता है। बिल्कुल वैसे ही जैसे नरक में कोई उबलते तेल में डाल रहा हो। चेहरा भी वैसा ही लाल हो जाता है तो क्रोध के कारण नरक तो यहीं इसी धरती पर है। इससे तो बेहतर है कि क्रोध जैसे आसुरी व नकारात्मक विचारों पर नियन्त्रण किया जाए।

16.22

एतैर्विमुक्तः(ख्) कौन्तेय, तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः(श्) श्रेयस् , ततो याति परां(ङ्) गतिम्।।16.22।।

हे कुन्तीनन्दन ! इन नरक के तीनों दरवाजों से रहित हुआ (जो) मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है, (वह) उससे परम गति को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन- भगवान श्रीकृष्ण आसुरी प्रवृत्ति के मूल कारण व नरक के तीन द्वार काम, क्रोध और लोभ को बताते हैं। वे काम, क्रोध और लोभ का परित्याग करने के सकारात्मक परिणाम का वर्णन करते हैं। जब तक ये विद्यमान रहते हैं तब तक मनुष्य प्रेय या सुखों के प्रति आकर्षित होते हैं। जब भौतिक लालसाएँ क्षींण होती हैं तब बुद्धि मोह के प्राकृतिक गुण से मुक्त हो जाती है। इसलिए ऐसी प्रवृत्तियों का त्याग करना चाहिए।

16.23

यः(श्) शास्त्रविधिमुत्सृज्य, वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति , न सुखं(न्) न परां(ङ्) गतिम् ।।16.23।।

जो मनुष्य शास्त्रविधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि (अन्तःकरण की शुद्धि) को, न सुख (शान्ति) को (और) न परमगति को (ही) प्राप्त होता है।

विवेचन- दैवीय और आसुरी प्रवृत्ति के बीच के अन्तर की तुलना करते हुए भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि आसुरी प्रवृत्ति किस प्रकार से नारकीय जीवन की ओर ले जाती है। इस प्रकार से वे सिद्ध करते हैं कि शास्त्रों के विधि निषेधों को ठुकराने से कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।

आसुरी प्रकृति के मनुष्यों का मार्ग शास्त्रों के उपदेशों के विपरीत होता है। वे निषिद्ध कर्मों में लीन रहते हैं और अच्छे कर्मों से दूर रहते हैं। ऐसे लोग जो शास्त्रों द्वारा दिखाए मार्ग का त्याग करते हैं और अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करते हैं। वे अपनी इच्छाओं के आवेग से प्रेरित होते हैं। वे न तो सच्चा ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं और न ही पूर्ण आनन्द।

16.24

तस्माच्छास्त्रं(म्) प्रमाणं(न्) ते, कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं(ङ्), कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।

अतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र (ही) प्रमाण है - (ऐसा) जानकर (तू) इस लोक में शास्त्रविधि से नियत कर्तव्य-कर्म करने योग्य है अर्थात् तुझे शास्त्रविधि के अनुसार कर्तव्य-कर्म करने चाहिये।

विवेचन-भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य को शास्त्रों में बताए गई राह पर ही चलना रहना चाहिए जिससे उसमें सतोगुण, रजोगुण व तमोगुण का सही समावेश बना रहता है। शास्त्रों में बताई गई विधियो के अनुसार जीवन सतोगुण प्रवृत्तियों से भरपूर हो जाता है। 

इसके साथ ही यह ज्ञानमय सत्र पूर्ण हुआ तत्पश्चात प्रश्नोत्तर हुए। 

प्रश्नोत्तर सत्र-

प्रश्नकर्ता- जिज्ञासा दीदी
प्रश्न- जब आध्यात्म में मन लगाती हूँ तो आध्यात्म में मन नहीं लगता और जब पढ़ाई में मन लगाती हूँ तब पढ़ाई में मन नहीं लगता है। कुछ याद नहीं होता। यह क्यों हो रहा है?
उत्तर- इसका एकमात्र कारण यह कि आप प्राणायाम नहीं कर रहे हो। आपका स्वयं पर नियन्त्रण नहीं है। प्राणायाम में यम और नियम दोनों होते हैं। यम का अर्थ होता है नियन्त्रण जैसे समय पर जागना, समय पर सोना, समय पर खाना, समय पर पढ़ना आदि और कुछ काम नियम से करने होते हैं। उसके बाद आप कुछ आसान कर लो, आसन में भी सबसे सरल मात्र इतना ही कर लीजिए कि जितने समय में आपकी श्वास अन्दर जा रही है उतने ही समय में आप श्वास बाहर छोड़िए। इतना करने पर ही आपको अन्तर दिखाई देने लगेगा।

प्रश्नकर्ता- आर्या दीदी
प्रश्न- क्या गङ्गा में नहाने से सभी पाप दूर हो जाते हैं?
उत्तर- जब आप गङ्गा में स्नान कर रहे होते हैं तब आप पाप मुक्त होते हैं किन्तु जब आप उससे बाहर निकलते हैं तो पाप पुनः आपसे चिपक जाते हैं। कुम्भ मेले में यह कुछ अधिक समय के लिए होता है। यदि आप गङ्गा में से बाहर निकलते हैं और निकलने के साथ ही अच्छे कर्म करना प्रारम्भ कर देते हैं तो पाप कर्म आप पर नहीं चिपकते हैं। गङ्गा स्नान के बाद आपको अपना बाद का जीवन पाप मुक्त जीना चाहिए तभी आप पाप मुक्त बने रहेंगे।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘देवासुरसम्पदविभाग योग’ नामक सोलहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।