विवेचन सारांश
श्रीभगवान् के प्रिय भक्त
आरम्भ में प्रयाग में चल रहे महाकुम्भ पर बच्चों का प्रश्नोत्तर के रूप में ज्ञानवर्धन किया गया।
प्रश्न- प्रयाग में कुछ मुख्य आयोजन चल रहा है। इसका नाम क्या है?
उत्तर- कुम्भ।
प्रश्न- यह क्यों होता है?
उत्तर- श्रीभगवान् के दर्शन और आस्था हेतु यह आयोजन होता है।
प्रश्न- इसके आयोजन के पीछे क्या कथा है?
उत्तर- देवता और दानवों ने समुद्र मन्थन किया था जिसमें से अमृत निकला। दानवों से बचाने के लिए इस अमृत कलश को इन्द्र के पुत्र जयन्त लेकर भागे। इससे अमृत की कुछ बूँदें प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में गिर गईं। तभी से इन चार तीर्थ स्थानों पर कुम्भ मेले का आयोजन होने लगा।
प्रश्न- कुम्भ कितने प्रकार का होता है?
उत्तर-
एक कुम्भ बारह वर्ष में होता है।
और एक कुम्भ एक सौ चवालीस वर्ष में होता है।
इस वर्ष प्रयाग में महाकुम्भ का मेला लगा है। यह एक सौ चवालीस वर्ष के बाद आया है। यह हमारे जीवन का पहला महाकुम्भ है। सभी को इसमें अवश्य जाना चाहिए। अब यह महाकुम्भ अगले एक सौ चवालीस वर्ष के बाद आएगा। उस समय हम नहीं होंगे।
प्रश्न- प्रयाग में कौन- कौन सी नदियों का सङ्गम है?
उत्तर- यहाॅं गङ्गा, यमुना और सरस्वती तीन नदियों का सङ्गम है। इस सङ्गम स्थान को त्रिवेणी भी कहते हैं।
पिछले भाग में श्रीभगवान् ने ज्ञान और विज्ञान के विषय में बताया था। परा और अपरा प्रकृति के विषय में भी बताया। अब आगे के श्लोक में श्रीभगवान् अपने स्वरूप की बात कर रहे हैं।
7.13
त्रिभिर्गुणमयैर्भावै:(र्), एभिः(स्) सर्वमिदं(ञ्) जगत्।
मोहितं(न्) नाभिजानाति, मामेभ्यः(फ्) परमव्ययम्॥13॥
इन तीनों गुणों का अर्थ क्या है?
सात्त्विक का अर्थ है- अच्छे कार्य करना।
राजसिक का अर्थ है- सांसारिक वस्तुओं से मोह और आसक्ति होना।
तामसिक का अर्थ है- बुरे विचारों का मन में आना, आलस्य करना, सोते रहना और खाते रहना।
हमें अपने अन्दर सात्त्विक गुणों का विकास करना है। यदि हम श्रीभगवान् के प्रिय बनना चाहते हैं तो हमें सात्त्विक बनना पड़ेगा।
प्रश्न- और कौन से अध्याय में सात्त्विक गुणों के बारे में बताया गया है?
उत्तर- चौदहवें और सत्रहवें अध्याय में भी सात्त्विक गुणों को विकसित करने के विषय में बताया गया है।
अगले श्लोक में बताया गया है कि जब श्रीभगवान् हमारे चारों ओर हैं, कण- कण में हैं तो हमें दिखाई क्यों नहीं देते।
दैवी ह्येषा गुणमयी, मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते, मायामेतां(न्) तरन्ति ते॥14॥
मम्- अर्थात् मेरी।
दुरत्यया- अर्थात् दुष्कर है।
हम मोह - माया में फँस जाते हैं। मोह- माया क्या है? हमें खेलना है, फोन चलाना है, घूमना है, यह सब मोह - माया है। जब हम इस माया में फँस जाते हैं तब हमें श्रीभगवान् दिखाई नहीं देते। जैसे परीक्षा में पढ़ने के अतिरिक्त हम फोन चलाते हैं तो हम फोन के मोह में बिल्कुल भूल जाते हैं कि हमें पढ़ाई भी करनी थी। फोन चलाने या घूमने में हमें इतना आनन्द आने लगता है कि हम पढ़ाई को भूल जाते हैं। इसी प्रकार संसार के मोह में फँस कर हम श्रीभगवान् को भूल जाते हैं। हमें इस मोह - माया में अत्यधिक बँधना नहीं है। कभी- कभी माँ के बताए कामों को भी हम भूल जाते हैं और कहते हैं मैं यू ट्यूब चला रही थी अथवा फोन चला रही थी। हमें ऐसा नहीं करना है।
जो श्रीभगवान् की शरण में आ जाते हैं वो इस संसार से तर जाते हैं, अर्थात् श्रीभगवान् को प्राप्त कर लेते हैं।
न मां(न्) दुष्कृतिनो मूढाः(फ्), प्रपद्यन्ते नराधमाः।
माययापहृतज्ञाना, आसुरं(म्) भावमाश्रिताः॥15॥
जो लोग माया में पूरी तरह से संलिप्त रहते हैं वे मुझे प्रिय नहीं होते और मुझे प्राप्त भी नहीं होते हैं इसलिए हम जो भी कार्य कर रहे हैं, उसके आनन्द में हम सब कुछ न भूल जाएँ। सभी कार्य समय से पूर्ण हों, इसके लिए अपनी समय सारणी बनाकर उसका पालन करना चाहिए, परन्तु जब श्रीभगवान् की भक्ति करनी हो तो सब कुछ भूलकर ही करनी चाहिए। हमें श्रीभगवान् का प्रिय बनना है। उन्हें अपना सबसे अच्छा मित्र बनाना है। श्रीभगवान् की भक्ति के लिए कोई समय सीमा नहीं है।
सोलहवें अध्याय में बताया गया था, बुरे मनुष्यों में क्या- क्या आसुरी वृत्तियाँ होती हैं-
दम्भो दर्पाभिमानश्च, क्रोधः, पारुष्यमेव च।
अज्ञानमचाभिजातस्य, पार्थ, सम्पदम्, आसुरीम्।।
चतुर्विधा भजन्ते मां(ञ्), जनाः(स्) सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी, ज्ञानी च भरतर्षभ॥16॥
अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी।
अर्थार्थी- अर्थात् सब कुछ पाने की इच्छा से श्रीभगवान् की पूजा करने वाले भक्त। जैसे आप कहो कि भगवान् मुझे इतने नम्बर दिला दो, मैं इतने रुपए का प्रसाद चढ़ाऊँगा। इक्कीस, एक सौ एक, पाँच सौ एक रुपए का प्रसाद चढ़ाऊँगा और नम्बर नहीं आए तो प्रसाद भी नहीं चढ़ाते।
एक आरती भी है-
कष्ट मिटे तन का।
आर्त भक्त- जब हम बहुत दुःखी होते हैं तब श्रीभगवान् को याद करते हैं। जैसे जब द्रोपदी का चीर हरण हुआ तब पहले द्रौपदी ने सभा में सबकी ओर देखा। सबने विवशता से अपने सर झुका लिए। तब द्रोपदी ने श्रीभगवान् को याद किया। श्रीभगवान् दौड़ते हुए आए और द्रोपदी की सहायता की। जब कभी अन्धेरे में हम कहीं जा रहे हों और डर के मारे हम श्रीभगवान् को याद करने लगते हैं। हम भजन करते हुए जाते हैं। यह आर्त्त भक्ति है।
जिज्ञासु भक्त- जिन्हें श्रीभगवान् को जानने की इच्छा होती है। जैसे नचिकेता, उद्धव जी थे। इन्हें श्रीभगवान् के स्वरूप को जानने की इच्छा थी।
ज्ञानी भक्त- जिन्होंने बहुत सारी साधना, पूजा कर ली। जो श्रीभगवान् को जानते हैं। हनुमान जी और शुकदेव जी ऐसे ही ज्ञानी भक्त हैं।
प्रश्न- आप किस प्रकार के भक्त हैं?
उत्तर- हम तीन प्रकार के भक्त हैं। अर्थार्थी भक्त हैं क्योंकि हम श्रीभगवान् से अपने परिवार की प्रसन्नता माँगते हैं। जिज्ञासु भक्त भी हैं क्योंकि श्रीभगवान् को जानने की इच्छा भी है और हम आर्त भक्त भी हैं क्योंकि दुःख होने पर हमें श्रीभगवान् ही याद आते हैं।
तेषां(ञ्) ज्ञानी नित्ययुक्त, एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थम्, अहं (म्) स च मम प्रियः॥17॥
श्रीभगवान् को जानने के लिए हमें बहुत सारी तपस्या और साधना करनी होगी। अभी तो हमने श्रीमद्भगवद्गीता पढ़नी आरम्भ की है। एक साथ हम बहुत कुछ नहीं कर सकते। ऐसा नहीं है कि हम हिमालय पर जाकर तपस्या करनी आरम्भ कर दें। यह आवश्यक नहीं है।
जैसे कि प्रारम्भिक शिक्षा से धीरे-धीरे हम आगे बढ़ते हैं। एक-एक सीढ़ी चढ़ते हुए स्नातक की परीक्षा भी देते हैं। इसी प्रकार श्रीभगवान् को प्राप्त करने के लिए भी हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़ते-बढ़ते किसी जन्म में हम ज्ञानी भक्त बन जायेंगे।
स्वामी रामसुख दास जी ने एक बार अपने प्रवचन में कहा कि एक दिन आप सब को भगवत् प्राप्ति निश्चित है। सभी आश्चर्य चकित थे कि ऐसा कैसे हो सकता है? स्वामी जी ने फिर कहा कि ऐसा होना निश्चित है किन्तु आप जैसे - जैसे अपनी तपस्या करते जाओगे, जैसे - जैसे आपके पुण्य का खाता भर जाएगा तब आपको ईश्वर की प्राप्ति होगी।
जो सारा दिन श्रीभगवान् की भक्ति में लीन हैं उन्हें तो श्रीभगवान् की प्राप्ति होनी ही है। हम कर्मयोगी हैं। सारा दिन पूजा नहीं कर सकते। परन्तु ध्यान करना, श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ना, यह सब कार्य तो कर ही सकते हैं। जब हम बूढ़े हो जाएँगे तो हमारे पास गीता पढ़ने के लिए समय ही समय होगा। जिसकी जितनी शीघ्र साधना पूरी हो जाएगी, उसे श्रीभगवान् मिल जायेंगे। कोई अधिक साधना कर रहा है तो उसे जल्दी श्रीभगवान् मिल जायेंगे। कोई धीरे पाठ कर रहा है तो उसे देर से श्रीभगवान् मिलेंगे।
उदाराः(स्) सर्व एवैते, ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः(स्) स हि युक्तात्मा, मामेवानुत्तमां(ङ्) गतिम्॥18॥
बहूनां(ञ्) जन्मनामन्ते, ज्ञानवान्मां(म्) प्रपद्यते।
वासुदेवः(स्) सर्वमिति, स महात्मा सुदुर्लभः॥19॥
कई लोग श्रीभगवान् के अस्तित्व पर प्रश्न उठाते हैं तो कई लोग परमात्मा की भक्ति में ही लीन रहते हैं।
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः(फ्), प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।
तं(न्) तं(न्) नियममास्थाय, प्रकृत्या नियताः(स्) स्वया॥20॥
मनुष्य जीवन का उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है। श्रीभगवान् की प्राप्ति का अर्थ है सब कार्य करते हुए भी श्रीभगवान् का ध्यान करते रहना। ईयर फोन लगाकर रास्ते में गाने सुनने के स्थान पर भजन सुन सकते हैं। धीरे - धीरे हम श्रीभगवान् के प्रिय बन जायेंगे। हमारी इच्छाएँ हमारा ध्यान मुख्य उद्देश्य से भटका देती हैं, इसलिए श्रीभगवान् का ध्यान करते रहना आवश्यक है।
यो यो यां(म्) यां(न्) तनुं(म्) भक्तः(श्), श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां(म्) श्रद्धां(न्), तामेव विदधाम्यहम्॥21॥
जैसे हमारी साढ़े साती चल रही है तो हम शनि देव की पूजा करते हैं।
यदि हमें धन की आवश्यकता है तो हम लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं।
ऐसे ही हमें जो चाहिए हम उस देवता की पूजा करने लगते हैं। वर्षा चाहिए तो इन्द्र देव की पूजा करने लग जाते हैं। अग्नि नहीं जल रही तो अग्नि देव को याद करने लग जाते हैं।
श्रीभगवान् कह रहे हैं कि "इन देवताओं की पूजा करने से जो श्रद्धा उत्पन्न होती है उसे दृढ़ करने का काम मैं ही करता हूँ।"
स तया श्रद्धया युक्त:(स्), तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः(ख्) कामान्, मयैव विहितान्हि तान्॥22॥
जैसे विद्यालय में प्रवेश विभाग, परीक्षा विभाग, अलग- अलग विभाग होते हैं, परन्तु उन्हें सब कार्य करने की मुख्य शक्ति प्रधानाध्यापक से ही मिलती है। इसी प्रकार जिस भी देवता की पूजा की जाए, उसका फल श्रीभगवान् के द्वारा ही दिया जाता है।
अन्तवत्तु फलं(न्) तेषां(न्), तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति, मद्भक्ता यान्ति मामपि॥23॥
श्रीभगवान् और देवता में अन्तर होता है। श्रीभगवान् का जन्म और मृत्यु नहीं होती है। श्रीभगवान् सदैव थे, हैं और रहेंगे। कुछ नहीं हैं तो भी श्रीभगवान् हैं, सब कुछ है तो भी श्रीभगवान् ही हैं। जैसे मनुष्य योनि है वैसे ही देवता योनि भी है। कोई देवता कम या अधिक शक्तिशाली होता है, यह उसके पुण्य कर्मों पर निर्भर करता है।
जैसे एक जिले में IAS अधिकारी के पास सबसे अधिक शक्तियाँ हैं। उसके नीचे वाले अधिकारियों के पास उससे कम शक्तियाँ है। जिस देवता के पास जितने अधिक पुण्य कर्म फल होते हैं, वह उतना ही शक्तिशाली हो जाता है। जिसके पास सबसे अधिक पुण्य कर्म हैं वह इन्द्र बन जाता है।
अव्यक्तं(म्) व्यक्तिमापन्नं(म्), मन्यन्ते मामबुद्धयः।
परं(म्) भावमजानन्तो, ममाव्ययमनुत्तमम्॥24॥
नाहं(म्) प्रकाशः(स्) सर्वस्य, योगमायासमावृतः।
मूढोऽयं(न्) नाभिजानाति, लोको मामजमव्ययम्॥25॥
वेदाहं(म्) समतीतानि, वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि, मां(न्) तु वेद न कश्चन॥26॥
इच्छाद्वेषसमुत्थेन, द्वन्द्वमोहेन भारत।
सर्वभूतानि सम्मोहं(म्), सर्गे यान्ति परन्तप॥27॥
श्रीभगवान् कहते हैं कि “इच्छा और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द्व और मोह से सभी प्राणी जन्म-मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं।” इसका अर्थ है कि हमारी इच्छाएँ तथा दूसरों से ईर्ष्या में फँस कर हम बार-बार जन्म लेते हैं, बार-बार हमारी मृत्यु होती है और यह जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।
पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम् |
येषां(न्) त्वन्तगतं(म्) पापं(ञ्), जनानां(म्) पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता, भजन्ते मां(न्) दृढव्रताः॥28॥
पुण्यकर्मा का अर्थ है ऐसे मनुष्य, जिन्होंने बहुत सारे पुण्य किए हों। जब हम बहुत सारे पुण्य कर्म करते हैं, श्रीभगवान् की भक्ति कर लेते हैं, पूजा-पाठ कर लेते हैं, बहुत सारा ध्यान कर लेते हैं, श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ लेते हैं, तब हमारे पाप नष्ट होते जाते हैं। ऐसे ही जब हम महाकुम्भ में स्नान करके आएँगे, तब हमारे सारे पाप धुल जाएँगे, अर्थात् नष्ट हो जाएँगे।
श्रीभगवान् कह रहे हैं कि “ऐसे मनुष्य मेरा भजन करते हैं।”
जब हमारे पाप कम हो जाते हैं, तब हमारा मन श्रीभगवान् में लगने लगता है, इसलिए हमें अच्छे-अच्छे काम करते रहना चाहिए और अपने पुण्यों को बढ़ाते रहना चाहिए।
जरामरणमोक्षाय, मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः(ख्) कृत्स्नम्, अध्यात्मं(ङ्) कर्म चाखिलम्॥29॥
वृद्धावस्था में कुछ व्यक्ति ठीक से चल नहीं पाते हैं। यदि हम प्रतिदिन व्यायाम (exercise) करेंगे, योग करेंगे तब हम वृद्धावस्था अर्थात् बुढ़ापे में अच्छी तरह से चल सकते हैं और अच्छे से खेल-कूद भी सकते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम अपना ध्यान कितनी अच्छी तरह रखते हैं। अगर हम अभी अपना ध्यान नहीं रखेंगे तो फिर बुढ़ापे में देखते रहेंगे कि चारों ओर क्या चल रहा है? हमारे घुटनों में दर्द भी हो जाएगा और हम अच्छी तरह से चल नहीं पाएँगे, इसलिए हमें अपने शरीर का ध्यान रखना चाहिए।
साधिभूताधिदैवं(म्) मां(म्), साधियज्ञं(ञ्) च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां(न्), ते विदुर्युक्तचेतसः॥30॥
श्रीभगवान् कहते हैं कि “जो मनुष्य अधिदैव और अधिभूत के साथ मुझे जानते हैं, वे ब्रह्माजी को भी समझते हैं और ब्रह्माण्ड को भी समझते हैं, ऐसे मनुष्य अन्तकाल में मुझे ही प्राप्त हो जाते हैं।”
यदि हमें श्रीभगवान् को प्राप्त करना है तो हमें बहुत सारा ज्ञान बढ़ाना पड़ेगा। इसके लिए हमें श्रीमद्भगवद्गीता पढ़नी चाहिए, ध्यान करना चाहिए, श्रीभगवान् की भक्ति करनी चाहिए। जब हमारा ज्ञान बढ़ता है, तब हम श्रीभगवान् के प्रिय हो जाते हैं और मृत्यु के समय उन्हें ही प्राप्त होते हैं। इसलिए यदि हम चाहते हैं कि हम श्रीभगवान् के प्रिय हो जाएँ, जीवन के हर स्तर पर, चाहे बचपन हो, युवावस्था हो या बुढ़ापा हो, हमें हमेशा श्रीभगवान् का ध्यान करना चाहिए।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां (म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः॥