विवेचन सारांश
दैवी गुण सम्पदा
हम अपने इस मानव जीवन को सफल करने के लिए, सार्थक करने के लिए, इसके परमोच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भगवद्गीता में प्रवृत्त हो गए हैं। पता नहीं हमारे कोई इस जन्म के पुण्य हैं, हमारे पूर्व जन्मों के पुण्य उदय हो गए हैं, हमारे पूर्वजों के कोई सुकृत हैं या किसी जन्म में किसी सन्त महापुरुष की कृपा दृष्टि हम पर पड़ गई जिस कारण हमारा ऐसा भाग्य उदय हो गया कि हम गीता पढ़ने के लिए चुन लिए गए हैं। गत तिरेपन सौ वर्षों में कितने ही महापुरुषों ने, आचार्यों ने बारम्बार कहा है कि भगवद्गीता के समान मानव के लिए कल्याणकारी ग्रन्थ कोई नहीं है। गीता प्रेस के संस्थापक परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन जयदयाल गोयन्दका जी ने गीताजी की प्रस्तावना में लिखा है कि समस्त शास्त्रों का अध्ययन करने के पश्चात् मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि गीता के समान मनुष्य के कल्याण के लिए दूसरा कोई ग्रन्थ नहीं है। यह ग्रन्थ छोटा है किन्तु बहुत अधिक शक्तिशाली है। तिरेपन सौ वर्षों में भारत में कोई ऐसा सम्प्रदाय नहीं हुआ जिसने भगवद्गीता का अध्ययन नहीं किया हो। यह एक विशिष्ट बात है। यह एकमात्र ग्रन्थ है जिसका सभी सम्प्रदाय आदर करते हैं। अलग-अलग मान्यताओं को मानने वाले पन्थ जो अन्य ग्रन्थों में आस्था रखते हैं, वे भी भगवद्गीता में आस्था रखते हैं। ऐसा कोई भी सम्प्रदाय नहीं है जो भगवद्गीता में आस्था नहीं रखता। इसका विशेष कारण है कि भगवद्गीता कोई साम्प्रदायिक बात नहीं करती। जो लोग भगवद्गीता को केवल हिन्दू धर्म का ग्रन्थ मानते हैं वे भगवद्गीता को नहीं जानते। भगवद्गीता किसी सम्प्रदाय विशेष की बात नहीं करती, वह नहीं सिखाती कि पूजा-पद्धति किस प्रकार की हो क्योंकि भगवद्गीता के प्रणेता भगवान श्रीकृष्ण को इस बात से कोई प्रयोजन नहीं है।
बारहवें अध्याय में श्रीभगवान ने भक्तों के उनचालीस लक्षण बताएँ हैं। उन्होंने नहीं बताया कि श्रीभगवान के भक्त को किस प्रकार का तिलक लगाना है, यज्ञोपवीत पहनना है, शिखा धारण करनी है, ताली बजाकर कीर्तन करना है, आरती करना है या श्रीभगवान की पूजा करना है। वे कहते हैं -
जो अद्वेष्ट है, सभी भूत-प्राणियों में करुणा का भाव रखता है, वह भक्त है। जिसके जीवन में उनचालीस प्रकार के सद्गुण हैं, वह मेरा भक्त है। श्रीभगवान कहते हैं कि तुम पूजा किस प्रकार से करते हो? कितना समय करते हो? मुझे उससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता। उसके बाद तुम्हारे जीवन में क्या बदला? तुम कहाँ पहुँचे हो? मुझे इस बात का प्रयोजन है। भगवद्गीता के प्रथम प्रणेता भगवान श्रीकृष्ण केवल और केवल लक्षणों की चर्चा करते हैं। वे मार्ग की चर्चा नहीं करते, गन्तव्य की चर्चा करते हैं।
उदाहरणार्थ -
किसी को मुम्बई से दिल्ली पहुँचना है तो वह बस से, कार से, वायुयान से, रेलगाड़ी से, पैदल या किसी से सहायता माँग कर वहाँ पहुँच सकता है। विभिन्न प्रकार के साधनों से दिल्ली पहुँचने पर भी हर व्यक्ति के लिए दिल्ली एक समान ही होगी, अलग-अलग नहीं होगी। श्रीभगवान कहते हैं इसी प्रकार मुझे अन्तर नहीं पड़ता। मार्ग अलग-अलग होने पर भी मेरा गन्तव्य सभी के लिए समान होता है।
अलग-अलग अध्यायों में श्रीभगवान ने इसको सूचीबद्ध किया है-
यदि कोई स्वयं को स्थितप्रज्ञ मानता है तो श्रीभगवान ने दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताए हैं।
यदि स्वयं को भक्त मानता है तो श्रीभगवान ने बारहवें अध्याय में भक्त के लक्षण बताए हैं।
यदि स्वयं को ज्ञानी मानता है तो श्रीभगवान ने तेरहवें अध्याय में ज्ञानी के लक्षण बताए हैं।
यदि स्वयं को गुणातीत समझता है तो श्रीभगवान ने चौदहवें अध्याय में गुणातीत के लक्षण बताए हैं।
इसी प्रकार श्रीभगवान ने सोलहवें अध्याय में दैवीय और आसुरी गुणों के लक्षण बताए हैं।
यदि आप अपने को अच्छा व्यक्ति मानते हैं, धार्मिक मानते हैं या दैवीय गुणों से सम्पन्न मानते हैं तो जाँच सूची से स्वयं को जाँच लें।
सच्चा हिन्दू कौन होगा?
इन मानकों के कारण श्रीभगवान ने मार्गों की उपेक्षा करके गन्तव्य को प्रधानता दी है। इसी कारण गीताजी सर्वमान्य हैं।
आदि शङ्कराचार्य भगवान ने भी भगवद्गीता की महिमा गाई है। भजगोविन्दम् स्तोत्र में आदि शङ्कराचार्य भगवान कहते हैं-
भगवद्गीता किञ्चिदधीता; गङ्गाजल लव कणिका पीता।
सकृदपि येन मुरारि समर्चा; क्रियते तस्य यमेन न चर्चा।।20।।
जिसने जीवन में थोड़ा सा भी श्रीमद्भगवद्गीता को धारण कर लिया, गङ्गाजल की एक बूँद का भी पान कर लिया और श्रीभगवान के नाम की जो चर्चा करता है, कीर्तन करता है, यमराज उसके नाम की चर्चा करने से भी घबराता है। जिसने जीवन में ये तीन बातें कर लीं, उसके जीवन का कल्याण निश्चित है।
हमारे शास्त्रों में पाँच 'ग' का वर्णन किया गया है जो भवतारक माने जाते हैं-
1) गौ माता
2) गङ्गा माता
3) गायत्री माता
4) गीता माता
5) और स्वयं भगवान गोविन्द।
भगवद्गीता में ये पाँचों मिल जाते हैं।
पार्थो: वत्स सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥
अर्थात् सभी उपनिषदों को गाय बनाकर उनको दुहकर गोपालनन्दन श्रीकृष्ण ने अमृत रूपी गीता के दूध को वत्स अर्थात् अर्जुन को पान करने के लिए दिया है। भगवद्गीता के दसवें अध्याय में श्रीभगवान कहते हैं-
अर्थात् दूध देने वाली गायों में, मैं कामधेनु हूँ।
'स्रोतसामस्मि जाह्नवी'।।10.21।।
अर्थात् नदियों में, मैं गङ्गा हूँ तथा
'गायत्री छंदसामहम्'।।10.35।।
अर्थात् छन्दों में, मैं गायत्री छन्द हूँ।
यह कहने वाले स्वयं श्रीभगवान गोविन्द हैं।
इस प्रकार उपरोक्त पाँचों 'ग' हमें श्रीमद्भगवद्गीता में मिल जाते हैं।
अट्ठारहवें अध्याय के अड़सठवें और उनहत्तरवें श्लोक में श्रीभगवान ने स्पष्ट रूप से गीता जी की महिमा कही है। श्रीभगवान कहते हैं कि जो इस भगवद्गीता को पढ़ता है, धारण करता है वह मुझे ही प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय:।।18.68।।
जो इस भगवद्गीता का प्रचार-प्रसार करता है, लोगों को इससे जोड़ता है, इसकी सेवा में लग जाता है, श्रीभगवान उसके लिए कहते हैं-
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ 18.69॥
हमें इसका प्रचार-प्रसार करना है, इसे हमें जीवन में लाना है। परम पूज्य स्वामी जी ने भी हमें सूत्र दिया है-
विवेचन सुनते समय सब कुछ काम का होगा ऐसा नहीं हो सकता, लेकिन इसमें कुछ न कुछ काम का अवश्य मिलेगा। विवेचन से मैं कुछ ऐसा चुन लूँ जिससे जीवन बदल जाए। गीताजी को जीवन में धारण करने के लिए एक सूत्र पकड़कर उस पर चलना शुरू करें तो जीवन सफल हो जाएगा।
हमने बहुत सारी श्रेणियाँ देखी हैं। लोगों को बाँटना हो तो श्वेत-श्याम (गोरा-काला), धनी-निर्धन (अमीर-गरीब), जातियों, सम्प्रदायों आदि में बाँट सकते हैं। श्रीभगवान ने सारे मनुष्यों को दो श्रेणियौं में विभाजित किया है-
1. आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य
2. दैवीय प्रवृत्ति वाले मनुष्य
आसुरी प्रवृत्ति- वे मनुष्य जो रजोगुण और तमोगुण में लगे हैं, निन्दा करते हैं, स्वार्थी हैं, दूसरों की हानि करके अपना लाभ कैसे हो? इसमें जीवन व्यतीत कर देते हैं। अविचारी हैं, जीवन में भोग ही देखते हैं। जीवन में धन की प्राप्ति हो जाए, गाड़ी मिल जाए, बड़ी गाड़ी मिल जाए, भोग की, यश की प्राप्ति हो जाए।
दैवीय प्रवृत्ति- वे मनुष्य जिनका रजोगुण और तमोगुण, सतोगुण की ओर प्रवृत्त हो गया है। जो अपने जीवन में कुछ अर्थ ढूँढते हैं। धन प्राप्त करना, सन्तान उत्पत्ति उचित है। जीवन यापन कोई भी कर लेता है, पशु भी कर लेते हैं। मनुष्य जीवन का कुछ बड़ा लक्ष्य है। संसार की चौरासी लाख योनियों में मनुष्य योनि सर्वश्रेष्ठ है। मात्र खाने-पीने, सन्तान उत्पत्ति में इसे लगा दें तो यह न्याय सङ्गत नहीं। इसका कुछ और उपयोग होना चाहिए। इस प्रकार का विचार करके जब मनुष्य जिज्ञासु प्रवृत्ति से आगे बढ़ता है तब उसका जीवन सतोगुण से प्रभावित होता है। उसका जीवन चरित्रवान होता है, शीलवान होता है, संस्कारी होता है। उसकी वृत्ति होती है-
ईश्वर ने मुझे इस योग्य बनाया कि मैं किसी के काम आया।
रजोगुणी सोचता है कि सब मेरा उपयोग करते हैं। मैंने अमुक के लिए अमुक काम किया, उसने बदले में मेरे लिए क्या किया?
सतोगुणी व्यक्ति कहता है कि मैंने उसका काम किया क्योंकि मैं कर सकता था। मैं किसी का काम कर सकता था, क्योंकि ईश्वर ने मुझे सामर्थ्यवान बनाया था। सतोगुणी की वृत्ति हो जाती है कि मैं जीवन में हर क्षण किसी के काम आ सकूँ। उसे प्रतिफल नहीं चाहिए। मैं किसी के लिए काम करूँ और किसी को पता भी न चले। वह मनुष्यों के ही नहीं, पशु-पक्षियों के साथ-साथ प्रकृति के कल्याण का भी भाव रखता है।
संसार में अच्छाई अधिक है किन्तु हम बुराई देखते हैं, बातें बुराई की करते हैं। कहा गया है -
16.1
श्रीभगवानुवाच
अभयं(म्) सत्त्वसंशुद्धिः(र्), ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं(न्) दमश्च यज्ञश्च, स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।।
1. अभय-
श्रीभगवान ने पहला गुण बताया- अभय।
अभय का अर्थ है - अ + भय।
भय का न होना
दो प्रकार की बातें होती है-
विधेयात्मक और
निषेधात्मक
यहाँ श्रीभगवान ने निषेधात्मक बातें कही हैं। हितोपदेश नामक नीति ग्रन्थ में एक श्लोक आता है-
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥
कोई भी बात सम्पूर्ण रूप से विकार नहीं होती। उस विकार का एक आवश्यक भाग होता है। जब आवश्यक भाव को जीवन में रखते हैं तो वह आभूषण का काम करता है। एक भय आवश्यक है। भय की दो प्रवृत्तियाँ होती हैं-
i) निर्भयता
ii) निरङ्कुशता
निर्भयता- यह सुन्दर बात है। अपने से बड़ों का भय, गुरु का भय। यह हमें अनुचित मार्ग पर चलने से रोकती है, सात्त्विक है।
निरङ्कुशता- यह बुरी बात है। मैं चाहे यह करूँ, मैं चाहे वह करूँ, मेरी मर्जी। मैं किसी से नहीं डरता। यह विचारहीन और दिशाहीन है। तामसिक है। दो शब्द आए हैं-
i) लापरवाही
ii) बेपरवाही
लापरवाही- यह नकारात्मक है। जहाँ पर किसी बात की चिन्ता तो करनी थी किन्तु नहीं की।
बेपरवाही- यह सकारात्मक है। जैसा अपेक्षित था वैसा नहीं हुआ। कोई बात नहीं, कोई चिन्ता नहीं। किसी अनहोनी का भय नहीं होता।
कुछ लोग कहते हैं कि हमें समाज की, परिवार की परवाह नहीं है, शास्त्र का, पाप-पुण्य का भय नहीं है। ऐसे लोग अपने जीवन का नाश करते हैं।
सन्त कबीरदास जी से किसी ने पूछा कि महाराज आपको कभी भय नहीं लगता है? कबीर जी ने कहा-
काल पकड़ चेला किया भय के कतरे कान।
समरथ गुरु सर पे खड़े का को करे सलाम।
मैं समर्थ योग्य गुरु का चेला हूँ। मुझे किसी का भी भय नहीं होता।
रामचरितमानस में राम-सीता स्वयंवर के समय धनुष भङ्ग का सुन्दर प्रसङ्ग आया है। शिव धनुष भङ्ग हुआ जानकर परशुराम जी क्रोध में भरकर जनक सभा में आए। उन्हें देखकर सब लोग भयभीत हो गए किन्तु रामजी और लक्ष्मणजी को जरा भी भय नहीं था। परशुरामजी पूछते हैं कि तुम्हें मुझसे डर नहीं लगा? मैंने इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार किया है। भगवान राम हाथ जोड़कर कहते हैं -
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।।
आप कैसी बातें कर रहे हैं? हम आपको अभय इसलिए नहीं दिख रहे हैं क्योंकि हम आपसे नहीं डरते हैं, अपितु हम तो गुरुजनों से डरते हैं इसलिए हम किसी से नहीं डरते।
जो जीवन में अपने गुरु का, माता-पिता का, बड़ों का अनुशासन रखता है उसको सर्वदा अभय होने का वरदान मिल जाता है। कुछ लोगों को जीवन में सदा भय बना रहता है। सब कुछ अच्छा है, धन-धान्य है, घर है, यश है, सब है। उनके चेहरे पर सदा घबराहट रहती है। पूछने पर कहते हैं कि पता नहीं घबराहट रहती है। कुछ अनहोनी न हो जाए (Fear of unknown and Fear of uncertainty) जीवन में अभय आएगा कैसे?
जीवन में भय दो कारणों से होगा -
i) जो जितने पाप करेगा उसके जीवन में उतना ही भय होगा। रावण कितना अधिक शक्तिशाली था। फिर भी सीता जी का अपहरण करते समय वह कुत्ते की तरह छिप कर आया, डरते-डरते आया कि कोई मुझे देख न ले।
ii) जिसके जीवन में संसार का आश्रय अधिक होगा और श्रीभगवान का आश्रय कम होगा उसे भी सदैव भय का भाव बना रहेगा। श्रीभगवान का आश्रय होगा तो कभी भी भय का भाव नहीं होगा।
हमारे साथ श्री रघुनाथ तो किस बात की चिन्ता।
शरण में रख दिया है जब माथ तो किस बात की चिन्ता।
एक बार सती भगवान रामजी की परीक्षा लेने गई तो शिवजी को चिन्ता हुई। उन्होंने सती को समझाया पर वे नहीं मानी तो शिवजी बोले-
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।
ये जीवन के सूत्र हैं। इन्हें ग्रहण करके जीवन में धारण करना चाहिए। यक्ष प्रश्न में यक्ष ने पूछा-
किमाश्चर्यम्? संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर जी ने उत्तर दिया, यह जानने के बाद भी कि सभी को इस संसार से जाना है फिर भी किसी की मृत्यु पर लोग विलाप करते हैं। जब सभी जाने वाले हैं तो क्यों रोना? कोई पहले जाएगा कोई बाद में जाएगा लेकिन हम सभी लोग जाने वाले हैं। जीवन में जब इस प्रकार की धारणा दृढ़ हो जाएगी तो किसी को किसी बात का भय नहीं रहेगा। श्रीभगवान जो भी करते हैं, मेरे मङ्गल के लिए करते हैं।
जब तक अभय का भाव नहीं आएगा जीवन में सात्त्विक गुण नहीं टिकेगा। किसी न किसी भय के कारण हम अपने सात्त्विक भाव छोड़ देते हैं। भय के कारण हमारे सारे सात्त्विक गुण क्षीण होते जाते हैं, इसलिए श्रीभगवान ने अभय को सभी सात्त्विक गुणों का इञ्जन बताया है।
2. सत्व संशुद्धि-
सत्त्व संशुद्धि का अर्थ है अन्तःकरण की निर्मलता। अन्तःकरण की पवित्रता श्रीभगवान को पाने के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
कुछ लोग ध्यान करते हैं, पूजा करते हैं, पैसा हड़पना हो तो झूठ भी बोलते हैं। गलत बात करने में कोई विचार नहीं करते, झगड़ा भी कर लेते हैं और अन्तःकरण की शुचिता का ध्यान नहीं करते। श्रीभगवान कहते हैं, मैं ऐसे लोगों को प्राप्त नहीं होता। यदि मिल भी जाता हूँ तो अपने मैले अन्तःकरण से वे मुझे देख नही पाते। जिनका अन्तःकरण मैला है, मन में कामना है, वासना है, विकार है, असत्य बोलते हैं, बुराई करते हैं, द्वेष करते हैं, किसी के लिए भी षड्यन्त्र करते हैं, झूठ-कपट को अपनी चतुराई मानते हैं। श्रीभगवान कहते हैं, मैं तब तक प्राप्त नहीं होता जब तक अन्तःकरण में मलिनता है। विभीषण को भगवान ने कहा-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
चालाकी (Manipulation) को लोग चतुराई (Smartness) मानते हैं लेकिन जितनी अधिक चालाकी करोगे श्रीभगवान भी उतने ही चतुर (smart) हैं। श्रीभगवान मलिन अन्तःकरण वालों को नहीं मिलते लेकिन सरल व्यक्ति को अवश्य मिलते हैं।
दूध लेते समय भगौना साफ होने पर भी माताएँ कपड़े से पौंछकर दूध लेती हैं क्योंकि वे जानती है कि उसमें जरा भी कोई कण पड़ा रह गया तो दूध फट सकता है। परमात्मा तो दूध से भी स्वच्छ हैं। छिपाव-दुराव से छिप जाते हैं। परमात्मा को मन में पाना है तो संशुद्धि का आश्रय लेना पड़ेगा। परमात्मा को पाना है तो हृदय को साफ रखो। झूठ, द्वेष, असत्य को निकाल दो।
3. ज्ञानयोगव्यवस्थिति-
श्मशान वैराग्य का उदाहरण- श्मशान में विदा करते समय लोग तरह-तरह के ज्ञान की बातें करते हैं। वैराग्य की बातें करते हैं। मृतक व्यक्ति के लिए बात करते हैं। सब संसार में रह गया क्या रखा है इस संसार में? सब कुछ यहीं रह जाता है। इतनी बड़ी गाड़ी थी पर आना तो चार कन्धों पर ही पड़ा या बस में आना पड़ा। सारा जीवन भागता रहा, जीवन यूँ ही निकल गया, क्या मिला?
मैं तो अब गीता जी पढ़ूँगा, अच्छी-अच्छी पुस्तक पढ़ूँगा, भजन करूँगा। वैराग्य की बातें करते हैं लेकिन घर पहुँच कर वैराग्य की बातें हवा में ही रह जाती हैं। घर आकर कहते है पहले स्नान कर लूँ फिर चाय पीता हूँ। फिर से मोह-माया में फँस जाते हैं।
श्मशान में वैराग्य आता तो है पर टिकता नहीं।
कभी-कभी गीता जी में बहुत मन लगता है, विवेचन में बहुत मन लगता है, कीर्तन कथा में बहुत मन लगता है, माला, पूजा में मन लगता है, कथा बहुत अच्छी लगती है, कभी मन बिल्कुल नहीं लगता। श्रीभगवान कहते हैं कि दैवीय लक्षण तभी होंगे जब ज्ञान टिकने लगेगा। जब निरन्तरता आ जाएगी तब ज्ञानयोग व्यवस्थित हो जाएगा।
4. दान-
दान का अर्थ है देना और हर समय देने के लिए तत्पर रहना।
देवत्य इति देवताः– जिसको देना आ गया वह देवता हो गया।
केवल धन का दान ही दान नहीं होता। समय का और ज्ञान का दान भी दान होता है। जो सेवा करते हैं वह भी एक प्रकार का दान ही है। गीता कक्षा में बैठे हुए, आप सबको शिक्षा देते हुए सभी गीता सेवी कार्यरत हैं, यह भी दान है, वे अपने समय का कर रहे हैं।
निष्काम भाव से कार्यरत हुए ये सब गीता सेवी भी दान करने में लगे हैं। आप जिन गीता कक्षाओं में सीख रहे हैं वहाँ अनेक विभाग हैं। हर कोई बिना किसी अपेक्षा के अपना कार्य कर रहा है। जिस कक्षा में आप हैं वहाँ ट्रेनर सिखा रहे हैं, टेक हैं जो स्लाइड्स लगा रहे हैं, जीसी हैं, बीसी हैं, सब निःस्वार्थ भाव से अपना कार्य कर रहे हैं। कोई इस समय विवेचन लिख रहा है तो कोई अनुवाद कर रहा है, कोई सम्पादन करेगा।
हमारे माननीय प्रधानमन्त्री जी श्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वच्छता अभियान चलाया। स्वच्छता का दान भी दान ही है। जिसका दायित्व हमारा नहीं है, उस कचरे को साफ करना।
कुछ लोग प्रसन्नता का दान देते हैं। किसी से भी, सुबह-शाम जब भी आप मिलें तो प्रसन्न भाव से मिलें तो उसको भी सारा दिन आपका मुस्कुराना याद रहता है। इस प्रकार जीवन में प्रसन्नता का भाव बाँटने से भी दान का पुण्य मिलता है।
सभी ने एलोपैथी, होम्योपैथी सुनी है। एक और पैथी है – (Sympathy) सहानुभूति। कोई दु:खी हो तो उसे उपदेश मत दो, सहानुभूति का दान दो।
शास्त्र कहते हैं कि अपनी शुद्ध आय का दस प्रतिशत संस्थाओं को, दरिद्र को, वञ्चित वर्ग को दान करना चाहिए। साथ ही दस प्रतिशत अपने अक्षम रिश्तेदारों, कुटुम्ब के लोगों की सहायता में लगाना चाहिए। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो बृहस्पति नीति के अनुसार पाप लगता है।
एक सुन्दर गीत है-
देश हमें देता है सब कुछ, कुछ हम भी तो देना सीखें।
सूरज हमें रौशनी देता, हवा नया जीवन देती है।
भूख मिटने को हम सबकी, धरती पर होती खेती है।
औरों का भी हित हो जिसमें, हम ऐसा कुछ करना सीखें ॥1॥
गरमी की तपती दुपहर में, पेड़ सदा देते हैं छाया।
सुमन सुगंध सदा देते हैं, हम सबको फूलों की माला।
त्यागी तरुओं के जीवन से, हम परहित कुछ करना सीखें ॥2॥
जो अनपढ़ हैं उन्हें पढ़ाएँ, जो चुप हैं उनको वाणी दें।
पिछड़ गए जो उन्हें बढ़ाएँ, समरसता का भाव जगा दें।
हम मेहनत के दीप जलाकर, नया उजाला करना सीखें ॥3॥
दोनों हाथों की दो स्थितियाँ होती हैं – एक दाता की और दूसरी याचक की। श्रीभगवान ने देने वालों की पङ्क्ति में आपको खड़ा किया है तो देने का अभिमान भी नहीं होना चाहिये। किसी ने कुछ दिया तो आभार मानो और किसी ने कुछ ले लिया तो उससे कुछ अपेक्षा मत रखो।
5. दम -
दम का अर्थ है इन्द्रियों का संयम। हमारा कर्त्तव्य है कि हम इन्द्रियों को संयम में रखें।
मैं आँखों से क्या देखूँ, नासिका से कौन सी गन्ध लूँ, मुख से क्या खाऊँ, कानों से क्या सुनूँ, किसका स्पर्श करूँ या न करूँ यह पता होना चाहिए। कुछ लोग अनावश्यक निरर्थक क्रियाएँ करते रहते हैं ऐसा नहीं होना चाहिए।
इन्द्रियों पर हमारा संयम होना चाहिए।
जीवन में स्थिरता होनी चाहिए।
कुछ लोग किसी के घर जाते हैं तो उनकी आँखें स्कैनर की तरह काम करती रहती हैं और वे घर के हर कोने की का निरीक्षण करके जाँच लेते हैं कि वहाँ पर क्या-क्या रखा है? किसी विवाह में जाते हैं या उत्सव में जाते हैं तो वहाँ किसने क्या पहना है? क्या खाया है? क्या आभूषण धारण किया है? सब जान लेते हैं। आँखों में इस प्रकार की चञ्चलता नहीं होनी चाहिए। कुछ लोग होते हैं जो जरा सी आहट पर बाहर आ जाते हैं और यह जानने का प्रयास करते हैं कि क्या हुआ? कुछ लोग निरर्थक की पैर हिलाते रहते हैं। हमें अपनी इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिए और जो आवश्यक नहीं है उनका त्याग कर देना चाहिए।
6. यज्ञ -
साधारणतः यज्ञ का अर्थ हम समझते हैं- हवन, अग्निहोत्र। यह भी एक प्रकार का यज्ञ है।
गीता जी के चौथे अध्याय में बारह प्रकार के यज्ञ बताए गए हैं। दसवें अध्याय में नाम जाप को यज्ञ कहा गया है-
जो कर्म समष्टि के कल्याण के लिए, बिना किसी अपेक्षा के साथ कर्त्तव्य भाव से किया जाता है वह यज्ञ कहलाता है। गीता ज्ञानयज्ञ और श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ- यहाँ हवन नहीं हो रहा किन्तु समष्टि के कल्याण के लिए ज्ञान का प्रसार-प्रचार हो रहा है।
7. स्वाध्याय-
स्वाध्याय का साधारण अर्थ है पढ़ना। शास्त्रीय दृष्टि से पढ़ना स्वाध्याय का एक भाग है।
स्व का अर्थ है- मैं (स्वयं)
अध्ययन का अर्थ है- जानना
स्वयं को जानना
स्वयं को जानने की खोज के लिए जो पढ़ता है, देखता है, सुनता है, सन्तों का सङ्ग करता है, चिन्तन करता है - वह स्वाध्याय है। स्वाध्याय का अर्थ है आध्यात्मिक चिन्तन- मैं कौन हूँ?
8. तप-
तप के लिए हमारे मन में आता है कि योगी हिमालय में जाकर एक पैर पर खड़े होकर तपस्या करते है या गङ्गाजल में रहकर तपस्या करते हैं या पद्मासन लगाकर तपस्या करते हैं। यह तप का एक प्रकार है।
धर्म पालन के लिए कर्त्तव्य करना और जो भी कष्ट आए उसे सहना और प्रसन्नतापूर्वक सहना तप है। मैंने एक छोटा सा नियम लिया और उसकी पूर्ति के लिए जो भी कष्ट आएगा वह में प्रसन्नतापूर्वक सहूँगा, यह तप है।
माता ने करवा चौथ का व्रत रखा है और बच्चों को भेजती है कि जाकर चाँद देख आओ। पूरे दिन भर तो निराहार रहकर उपवास किया, कष्ट सहा लेकिन रात को संयम नहीं हो पा रहा। यह अधूरा तप है। इससे तप टूट जाता है।
एकादशी का व्रत वैष्णव के लिए अनिवार्य है। पूरे दिन निराहार रहकर या कम खाकर, फल खाकर रह जाऊँ। मैं व्रत में पूजा नियम से करूँगा, बिना पूजा किए चाय नहीं लूँगा और यदि देरी हो गई तो चाय नहीं पिऊँगा। बिना गीता पाठ के जल नहीं लूँगा।
मुझे बोलना नहीं चाहिए और मैं नहीं बोलूँगा। मुझे किसी को बुरे लगने वाली बात नहीं बोलनी है। यह वाणी का तप है।
सत्रहवें अध्याय में तीन प्रकार के तप बताए गए हैं -
i) शारीरिक
ii) मानसिक
iii) वाचिक
मानसिक तप - विपरीत परिस्थितियों में प्रसन्न रहना, कभी उदास नहीं होता।
वाचिक तप- वाणी से किसी को दुख नहीं देता।
9. आर्जवम्-
आर्जवम् का अर्थ है - सरलता
मैं जैसा हूँ वैसा ही दिखूँ। आर्जवम् का विपरीत अर्थ है दम्भ। हम कुछ और दिखने का प्रयास करते हैं। आर्जवम् को शबरी माता की बचपन की कथा से समझने का प्रयास करते हैं-
शबरी का मूल नाम है श्रमणा। वे भील समाज की थीं इसलिए भीलनी कहलाई। शबर जाति की थी इसलिए शबरी कहलाई। रायपुर मध्य प्रदेश से छत्तीस किलोमीटर दूर खरौंद गाँव में शबरी माता का मन्दिर है।
वह शबर कबीले के सरदार की बेटी थी। जब शबरी दस-बारह वर्ष की थी उनके पास एक मेमना था। दोनों दिन-भर साथ ही खेलते, खाते, सोते, साथ-साथ रहते। दोनों में लगाव हो गया। दोनों एक क्षण के लिए भी एक दूसरे से अलग नहीं होते थे। वैसे तो शबरी भील जाति की थी लेकिन पूर्वजन्म की योगिनी थी। बचपन से ही सात्त्विक प्रवृत्ति की थी। किसी को भी कष्ट उन्हें सुहाता नहीं था।
तेरह-चौदह वर्ष की आयु में उनका विवाह तय हो गया। विवाह से तीन दिन पूर्व जब वे सोकर उठी तो उन्हें अपना मेमना नहीं दिखाई दिया। सबसे पूछा पर किसी ने उन्हें मेमने के बारे में नहीं बताया। वे रोने लगी। व्याकुल होकर सायंकाल तक घूमती रही। तब उनकी एक सहेली ने बताया कि अब वह मेमना तुम्हें कभी नहीं मिलेगा। साथ ही उसने यह भी बताया कि तुम्हारा मेमना ही नहीं, गाँव के सभी घरों से एक-एक मेमना लिया गया है। तुम्हारे विवाह में बाराती आएँगे। इन सभी मेमनों को पकाकर उन बारातियों को खिलाया जाएगा। यह जानकर वे सिहर गईं, रोने लगी कि मेरे विवाह के कारण इतने सारे पशुओं की जान चली जाएगी। उनके मन में दृढ़ भावना थी कि मैं जब यहाँ नहीं रहूँगी तो मेरा विवाह भी नहीं होगा और भोज भी नहीं बनेगा। इस कारण कोई भी पशु नहीं मरेगा। यह विचार कर अँधेरा होने पर वे कबीला छोड़कर भाग गईं। तीन दिन तक लगातार चलती रहीं, रुकी नहीं। बिना खाए-पिए गाँव, जङ्गल, पहाड़, नदी पार करके वे एक घनघोर जङ्गल में व्याकुल होकर गिर गईं। घनघोर जङ्गल में वे जहाँ गिरी वहाँ मतङ्ग ऋषि का आश्रम था जहाँ वे अपने कुछ शिष्यों के साथ रहते थे।
जब वे स्नान को निकले तो उन्होंने शबरी को भूमि पर पड़े देखा। जल छिड़क कर प्रेम से सिर पर हाथ रखकर पूछा कि कहाँ से आई हो? शबरी ने उन्हें अपनी आपबीती बताई। मतङ्ग ऋषि की आँखों में आँसू आ गए। मतङ्ग ऋषि ने शबरी से कहा कि तुम अपना पता बताओ ताकि मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आता हूँ। श्रमणा ने कहा कि मुझे नहीं पता मेरा घर कहाँ है? मैं भील जाति की हूँ, शबर जाति की हूँ। शबरी की भाषा से मतङ्ग ऋषि को समझ नहीं आया कि वह किस क्षेत्र से आई थी। उन्होंने उस बालिका से जो बात की उससे शबरी के मन में श्रेष्ठ भक्ति जाग्रत हो गई। अब श्रमणा आश्रम में ही रहने लगी। आश्रम की सफाई करती, काम करती। कुछ दिनों बाद आश्रम में किसी ने बोला कि ब्रह्मचारियों के आश्रम में कन्या का क्या काम? श्रमणा ने यह सुन लिया, उसने विचार किया कि यहाँ भी मेरे कारण गुरु जी को कोई अप्रिय न बोले। यह विचार करके वे आश्रम से निकल गईं। जब वे दिखाई नहीं दीं तो गुरु जी ने पूछा कि श्रमणा कहाँ गई?
श्रमणा ने प्रवचन सुनकर ग्रहण कर लिया था कि उन्हें गुरु जी की सेवा करनी है। वे भील जाति की थीं इसलिए पेड़ों पर चढ़कर रहने लगी। रोज रात को वे गुरुजी के नदी जाने का मार्ग साफ करने लगीं। एक दिन मतङ्ग ऋषि ने शिष्यों से पूछा कि मार्ग कुछ अधिक स्वच्छ है, कङ्कड़-पत्थर दिखाई नहीं दे रहे। शिष्यों ने कहा कि यह हम नहीं करते। कुछ समय बाद श्रमणा ने विचार किया कि ऋषिकुमारों और शिष्यों को दूर से लकड़ियाँ लानी पड़ती है। उन्होंने लकड़ियों को तोड़कर आश्रम के पास ही रखना आरम्भ कर दिया ताकि शिष्यों को कष्ट न हो। सेवा भाव से एक वर्ष तक वे गुरु सेवा करती रहीं और किसी को पता नहीं चला कि आश्रम की सफाई कौन करता है और आश्रम के समीप लकड़ियाँ कौन रखता है?
एक बार अर्धरात्रि के समय आश्रम के समीप मतङ्ग ऋषि को एक आकृति दिखाई दी। ऋषि उसके पास आ गए। मतङ्ग ऋषि को देखकर श्रमणा स्तब्ध हो गई। श्रमणा ने उनको झुक कर प्रणाम किया। ऋषि ने शबरी से पूछा कि तुम कहाँ चली गई थीं? शबरी ने कुछ नहीं बताया तो शिष्यों ने कहा कि हमने कुछ कहा था, शायद इसने वह सुन लिया होगा। इस घटना के बाद शबरी की गुरुभक्ति और प्रगाढ़ हो गई।
धीरे-धीरे समय बीतता गया और शिष्यों की पढ़ाई पूर्ण हो गई। एक दिन मतङ्ग ऋषि ने शबरी से कहा कि अब मेरा हिमालय जाने का समय आ गया है। यह सुनकर शबरी रोने लगी। उसे रोता देख ऋषि ने कहा कि मुझे जाना होगा लेकिन भगवान राम तुझे साक्षात दर्शन देंगे। यह कहकर मतङ्ग ऋषि वहाँ से चले गए।
शबरी रोने लगी। उसे लगा मैंने तो पूछा ही नहीं कि भगवान राम कब आएँगे, किधर से आएँगे? वे चारों तरफ के मार्ग साफ करतीं, आसन लगातीं, फल सजातीं। सरलता के भाव से भरी शबरी के मन में कभी नहीं आया कि गुरु जी ने पता नहीं उसका मन रखने के लिए ऐसे ही कह दिया? पन्द्रह वर्ष की शबरी अस्सी वर्ष की हो गई थी। आर्जव् भाव से भरी शबरी नित्य राम जी आएँगे की आस लेकर आँखों में चमक लिए प्रभु राम की राह निहारती। एक दिन भगवान रामजी सीता की खोज में मार्ग बदलकर मतङ्ग ऋषि के आश्रम में आ पहुँचे।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।।
राम जी के दर्शन पाकर उसके मन में भाव आया कि मेरे गुरु जी के वचन सिद्ध हो गए हैं।
जटा मुकुट सिर उर बनमाला।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई।
सबरी परी चरन लपटाई।।
शबरी भगवान राम के चरणों से लिपट गई।
पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।।
सादर जल लै चरन पखारे।
पुनि सुन्दर आसन बैठारे।।
वे रोती जाती हैं, चरण पखारती जाती हैं।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारम्बार बखानि।।
वर्णन आता है कि शबरी चखकर भगवान राम को बेर देती है ताकि कोई खट्टा बेर न दे दे। भगवान श्रीराम शबरी से बेर लेकर प्रेमवश खा रहे हैं और उनकी प्रशंसा कर रहे हैं। लक्ष्मण जी को हैरानी है कि चौदह वर्षों तक मैंने सर्वोत्तम फल भगवान राम को दिए परन्तु उन्होंने मेरी कभी प्रशंसा नहीं की। शबरी लक्ष्मण जी को भी बेर देती हैं लेकिन वे नहीं खाते और उन्हें फेंक देते हैं। तब भगवान श्रीराम कहते हैं कभी यही फल तेरी प्राण रक्षा करेंगे।
प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।।
शबरी कातर भाव से भगवान राम से कहती है -
अधम जाति मैं जड़मति भारी।।
अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।।
भगवान राम शबरी के हाथ पकड़ कर बोले-
मानउँ एक भगति कर नाता।।
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुन चतुराई।।
मैं तो केवल एक ही नाता मानता हूँ।
बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
श्रीभगवान कहते हैं कि उपदेश तब ही दिया जाना चाहिए जब प्रश्न किया जाता है। शबरी ने श्रीभगवान से कुछ नहीं कहा तो श्रीभगवान ने बिना माँगे ही शबरी से कहा कि मैं तुम्हें नवधा भक्ति बताता हूँ।
सावधान सुनु धरु मन माहीं।।
भगवान राम ने कहा तुम सावधान होकर सुनो -
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा।
दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।।
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।।
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।।
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।।
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।।
नवधा भक्ति -
i) सन्तों का सङ्ग - तीर्थ में जाकर सन्तों का सङ्ग करो।
ii) कथा में मन लगाना
iii) गुरु चरणों की सेवा
iv) कपट छोड़कर श्रीभगवान का गुणगान करना
v) मेरे मन्त्र का जाप और
vi) इन्द्रिय शील और
vii) सब में श्रीभगवान को देखना -सियाराम मय सब जग जानी
viii) जैसा है, वैसे ही में प्रसन्न हूँ, सन्तुष्ट हूँ
ix) षड्यन्त्र नहीं करना
नारी, पुरुष, चराचर या पशु कोई भी इनमें से एक प्रकार की भक्ति करता है तो मैं उससे प्रसन्न हो जाता हूँ, किन्तु शबरी तुममें तो सारी की सारी भक्ति हैं।
भगवान राम ने पम्पा सरोवर को प्रस्थान किया। भगवान राम की कृपा से योग अग्नि से स्वयं के शरीर को भस्म कर स्वयं की चेतना को शबरी ने श्रीभगवान में विलीन कर लिया। सरलता के बल पर शबरी ने उस गति को प्राप्त किया जो संसार में योगियों को भी दुर्लभ है।
हरि शरणम् सङ्कीर्तन के साथ विवेचन सत्र समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र-
प्रश्नकर्ता- मीना दीदी
प्रश्न- ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी' इस चौपाई का क्या अर्थ है?
उत्तर- किसी ग्रन्थ का वह सन्देश मान्य होता है जो कि उसके रचयिता ने अथवा उसके नायक ने कहा हो। किसी खलनायक की बात को उसका सन्देश नहीं माना जाता है। यह चौपाई न ही भगवान राम ने कही है और न ही तुलसीदास जी ने कही है। यह चौपाई समुद्र द्वारा कही गई है। जब समुद्र तीन दिन तक अनुनय करने पर भी भगवान राम को मार्ग नहीं देता है तो भगवान राम अपना धनुष बाण चलाने को तैयार हो जाते हैं और कहते हैं-
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति।।
भयभीत होकर समुद्र यह चौपाई कहता है-
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी'
और क्षमा याचना करता है कि वह स्वयं एक जड़-बुद्धि है और वह इस कारण से की गई भूल की क्षमा माँग रहा है।
प्रश्नकर्ता- राजकुमारी दीदी
प्रश्न- शबरी की कथा सुन कर रोना क्यों आ जाता है?
उत्तर- इस प्रकार की कथाओं से प्रेमा भक्ति जाग्रत हो जाती है इस कारण से रोना आ जाता है।
प्रश्नकर्ता- गजानन भैया
प्रश्न- सुपात्र को ही दान देना चाहिए। हमें कैसे पता चलेगा कि कौन सुपात्र है?
उत्तर- इसके लिए श्रीभगवान ने सत्रहवें अध्याय में सूत्र दिया है-
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।
देश और काल के अनुसार जो पात्र हो उसे दान देना चाहिए। वही सुपात्र होता है। अन्न के लिए कोई कुपात्र नहीं होता है। अन्नदान को महादान कहा गया है।अन्न और औषधि किसी को भी दी जा सकती है।
प्रश्नकर्ता- आकाङ्क्षा दीदी
प्रश्न- सही समय पर सही निर्णय लेने का सामर्थ्य कैसे विकसित किया जा सकता है?
उत्तर- आपने गीता कक्षा में प्रवेश लिया है। आप छ: महीने में अपने भीतर बदलाव अवश्य अनुभव करेंगी। गीता जी आपके संशयों को दूर कर आप में सही निर्णय लेने की क्षमता जाग्रत कर देती हैं। इसके लिए आप निम्नानुसार ये तीन उपाय भी कर सकती हैं-
1) वृद्धों की सेवा
2) ज्ञानार्जन
3) भक्ति
प्रश्नकर्ता- सरोज भैया
प्रश्न- वेदवित् किसे कहते हैं?
उत्तर- वेद का अर्थ ज्ञान, वित् का अर्थ जिसने ज्ञान को जाना और समझा हो। जो ज्ञान को जानता और समझता है उसे वेदवित् कहते हैं।
एक बार की बात है, बहुत वर्ष पूर्व स्वामी जी एक यजमान के यहाँ कथा करने गए। वहाँ उन्होंने पाँच वर्ष के बालक को अङ्ग्रेजी का समाचार पत्र पढ़ते देखा। स्वामी जी को बहुत आश्चर्य हुआ कि पाँच वर्ष का बालक अङ्ग्रेजी का समाचार पत्र पढ़ लेता है। जब स्वामी जी ने बालक से पूछा कि क्या तुम अङ्ग्रेजी का समाचार पत्र पढ़ लेते हो तो उसने उत्तर दिया, हाँ। स्वामी जी ने बालक को पढ़कर सुनाने को कहा तो बालक ने पढ़ना आरम्भ किया-
"टी एच ई टी आई एम ई एस ओ एफ आई एन डी आई ए"
उस बालक को मात्र अक्षर ज्ञान था अर्थ पूछने पर उसे इसका अर्थ नहीं आता था। वेदवित् भी ज्ञान के विभिन्न स्तरों को बताते हैं।