विवेचन सारांश
सर्वव्यापी है ईश्वर
रामनवमी के पावन पर्व पर सुन्दर भजन, सुमधुर प्रार्थना दीप प्रज्वलन, एवम् गुरु वन्दना के साथ सत्र का आरम्भ हुआ। इस अध्याय के आरम्भ में ही श्रीभगवान् ने यह स्पष्ट कर दिया था कि इस अध्याय को ध्यान से सुनोगे तो ज्ञान को समझ पाओगे और विज्ञान अर्थात् उस ज्ञान का अनुभव भी कर सकोगे।
9.7
सर्वभूतानि कौन्तेय, प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥9.7॥
हे कुन्तीनन्दन ! कल्पों का क्षय होने पर (महाप्रलय के समय) सम्पूर्ण प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं (और) कल्पों के आदि में (महासर्ग के समय) मैं फिर उनकी रचना करता हूँ।
विवेचन- इस सृष्टि का, प्रकृति का विलय कैसे होता है यह बात श्रीभगवान् इस श्लोक में समझा रहे हैं। इस सृष्टि की रचना और इसका प्रलय इन सब के बारे में जानना क्यों आवश्यक है?
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
जिससे हम यह समझ सके कि हम इतनी बड़ी सृष्टि का एक अंश मात्र है। छोटी-छोटी बात का हमें अहङ्कार हो जाता है। यहाँ आने-जाने का चक्र निरन्तर चलता रहता है। हमें इस संसार में कैसे रहना है अर्जुन के माध्यम से श्रीभगवान् यह हमें समझा रहे हैं। आज रामजन्म उत्सव के उपलक्ष्य में हम श्रीराम से प्रार्थना करेंगे कि उनके जैसे कुछ गुण हममें भी आ जाए।
सोलहवें अध्याय में हमने दैवीय गुणों के बारे में पढ़ा था।
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्।।16.1।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।16.2।।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।16.3।।
अर्जुन को यह रहस्यमय बात बताने का कारण ही यह है कि अर्जुन में यह (उपरोक्त) सभी गुण विद्यमान थे। ऐसे ही सद्गुण हमारे भीतर लाने या बढ़ाने से हमारा जीवन भी निर्मल हो जाएगा।
श्रीराम जी का जीवन मंगलमय था।
श्रीराम जी का जीवन मंगलमय था।
“मंगल भवन अमंगल हारी।”
प्रकृति में जो सारे भूत मात्र हैं, प्राणी हैं, जीव जन्तु हैं। इनका निर्माण श्रीभगवान् प्रकृति के माध्यम से ही करते हैं।
प्रकृति अर्थात् पञ्च/पाँच महाभूत पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश। इन पाँच महाभूतों से प्रकृति बनी है परमात्मा निर्देश करते हैं, उनके अनुसार प्रकृति कार्य करती है। इस तरह सृष्टि का सृजन कल्प के आदि में होता है। कल्प के अन्त में इसका विलय भी हो जाता है।
GOD means G for generator
O for operator and
D for destroyer
ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना करते हैं। विष्णु जी पालन करते हैं और शिव जी संहार करते हैं।
प्रकृतिं(म्) स्वामवष्टभ्य, विसृजामि पुनः(फ्) पुनः।
भूतग्राममिमं(ङ्) कृत्स्नम्, अवशं(म्) प्रकृतेर्वशात्।।9.8।।
प्रकृति के वश में होने से परतन्त्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणी समुदाय की (कल्पों के आदि में) मैं अपनी प्रकृति को वश में करके बार-बार रचना करता हूँ।
विवेचन- सात्त्विक, राजसिक और तामसिक गुणों के आधार से पूरी सृष्टि का निर्माण हुआ है।
सात्त्विक अर्थात् अच्छे गुण, अच्छे कार्य में मन लगता है। श्रीभगवान् की भक्ति, भजन में मन लगता है। पढ़ाई में मन लगता है।
राजसिक प्रतिस्पर्धा करना या बहुत अधिक कार्य करने वाला गुण और तामसिक आलस्य निद्रा कुछ न करने वाला गुण।
प्रकृति इन तीनों गुणों के अधीन होती है। जैसे हमें कोई भी कार्य करना होता है तो हमें हमारे बड़ों से अनुमति लेनी होती है उसी प्रकार सात्त्विक गुण की अनुमति के बिना रजोगुण और तमोगुण कार्य नहीं कर सकते। इसलिए सात्त्विक गुण बहुत महत्वपूर्ण होता है। हम जो भी कार्य करते हैं इन तीनों गुणों के अधीन होकर ही करते हैं। हम साधारण लोग इन तीनों गुणों में बॅंधे होते हैं अर्थात् अधीन होते हैं, लेकिन जो महापुरुष होते हैं शिवाजी महाराज, लोकमान्य तिलक जैसे महात्मा, जिन्होंने अच्छे कार्य किए हैं, वे प्रसिद्ध हैं, वे इन गुणों के बन्धनों के अधीन नहीं हैं। हमें इन तीनों गुणों से ऊपर उठना है।
सात्त्विक अर्थात् अच्छे गुण, अच्छे कार्य में मन लगता है। श्रीभगवान् की भक्ति, भजन में मन लगता है। पढ़ाई में मन लगता है।
राजसिक प्रतिस्पर्धा करना या बहुत अधिक कार्य करने वाला गुण और तामसिक आलस्य निद्रा कुछ न करने वाला गुण।
प्रकृति इन तीनों गुणों के अधीन होती है। जैसे हमें कोई भी कार्य करना होता है तो हमें हमारे बड़ों से अनुमति लेनी होती है उसी प्रकार सात्त्विक गुण की अनुमति के बिना रजोगुण और तमोगुण कार्य नहीं कर सकते। इसलिए सात्त्विक गुण बहुत महत्वपूर्ण होता है। हम जो भी कार्य करते हैं इन तीनों गुणों के अधीन होकर ही करते हैं। हम साधारण लोग इन तीनों गुणों में बॅंधे होते हैं अर्थात् अधीन होते हैं, लेकिन जो महापुरुष होते हैं शिवाजी महाराज, लोकमान्य तिलक जैसे महात्मा, जिन्होंने अच्छे कार्य किए हैं, वे प्रसिद्ध हैं, वे इन गुणों के बन्धनों के अधीन नहीं हैं। हमें इन तीनों गुणों से ऊपर उठना है।
एक प्रसङ्ग आता है राज्य अभिषेक होने के पहले जब श्रीराम को यह सूचना देने, उनके गुरु गए कि कल उनका राज्याभिषेक होने वाला है। उनके मुख पर प्रसन्नता थी। उसके तुरन्त बाद ही माता कैकई का प्रसङ्ग आता है कि भरत का राज अभिषेक किया जाना चाहिए और श्रीराम को वनवास की आज्ञा दी जाए। श्रीराम को यह समाचार मिला कि राज्याभिषेक नहीं होगा और उन्हें वन में जाना होगा। राजकुमार को वनवासी की तरह रहना होगा बिना सुख सुविधाओं के। इस बात को सुनने के बाद भी श्रीराम के मुख पर वही भाव थे जो राज्य अभिषेक की बात सुनने पर थे। श्रीराम दोनों ही परिस्थितियों में सम थे क्योंकि वे गुणो के अधीन नहीं थे। गुण उनके अधीन थे।
उनके स्थान पर यदि हम होते तो हम तो विचलित ही हो जाते। क्रोधित हो जाते, गुस्से से आग बबूला हो जाते। इन गुणों के बन्धनों से यदि हमें बाहर निकलना है तो हमें यह समझना आवश्यक है कि सृष्टि की रचना कैसे होती है? इसका विलय कैसे होता है?
न च मां(न्) तानि कर्माणि, निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनम्, असक्तं(न्) तेषु कर्मसु।।9.9।।
हे धनञ्जय ! उन (सृष्टि-रचना आदि) कर्मों में अनासक्त और उदासीन की तरह रहते हुए मुझे वे कर्म नहीं बाँधते।
विवेचन- श्रीभगवान् इतनी सुन्दर सृष्टि की रचना प्रकृति की सहायता से करते हैं। न केवल सृष्टि अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना परमात्मा ने की है। फिर भी उन्हें नाम मात्र का भी अहङ्कार नहीं है।
और हम एक चित्र (painting) भी बना लेते हैं तो दस लोगों को बताते हैं यह मैंने बनाया, यह मैंने बनाया।
उदासीनवदासीनम् अर्थात् जिसका श्रेय नहीं लेते, परमात्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है लेकिन उसमें वे कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं।
केवल सृष्टि किस प्रकार चल रही है? उसका निरीक्षण करते हैं।
इस बात को हम एक उदाहरण से समझते हैं जैसे जब कक्षा में शिक्षक नहीं होते हैं तो बच्चे बातें करते हैं, मस्ती करते हैं और जैसे ही शिक्षक आ जाते हैं बच्चे अपने स्थान पर बैठकर अपना-अपना कार्य करने लगते हैं।
जैसे शिक्षक कक्षा का निरीक्षण करते हैं, उसी प्रकार परमात्मा सृष्टि का निरीक्षण करते हैं। किसी भी कार्य में, कर्म में परमात्मा की आसक्ति नहीं होती है।
मैं अर्थात् परमात्मा कोई भी कर्म इस कारण नहीं करते कि मुझे ( परमात्मा) इसका श्रेय मिले या मेरी ( परमात्मा ) प्रशंसा हो या मेरी (परमात्मा) भक्ति की जाए।
हम श्रीभगवान् की अर्चना, पूजा, वन्दना भक्ति हमारे लिए, हमारी उन्नति के लिए करते हैं, न कि भगवान के लिए, श्रीभगवान् अपने कर्तव्य, कर्म बिना आसक्ति के करते हैं।
और हम एक चित्र (painting) भी बना लेते हैं तो दस लोगों को बताते हैं यह मैंने बनाया, यह मैंने बनाया।
उदासीनवदासीनम् अर्थात् जिसका श्रेय नहीं लेते, परमात्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है लेकिन उसमें वे कोई हस्तक्षेप नहीं करते हैं।
केवल सृष्टि किस प्रकार चल रही है? उसका निरीक्षण करते हैं।
इस बात को हम एक उदाहरण से समझते हैं जैसे जब कक्षा में शिक्षक नहीं होते हैं तो बच्चे बातें करते हैं, मस्ती करते हैं और जैसे ही शिक्षक आ जाते हैं बच्चे अपने स्थान पर बैठकर अपना-अपना कार्य करने लगते हैं।
जैसे शिक्षक कक्षा का निरीक्षण करते हैं, उसी प्रकार परमात्मा सृष्टि का निरीक्षण करते हैं। किसी भी कार्य में, कर्म में परमात्मा की आसक्ति नहीं होती है।
मैं अर्थात् परमात्मा कोई भी कर्म इस कारण नहीं करते कि मुझे ( परमात्मा) इसका श्रेय मिले या मेरी ( परमात्मा ) प्रशंसा हो या मेरी (परमात्मा) भक्ति की जाए।
हम श्रीभगवान् की अर्चना, पूजा, वन्दना भक्ति हमारे लिए, हमारी उन्नति के लिए करते हैं, न कि भगवान के लिए, श्रीभगवान् अपने कर्तव्य, कर्म बिना आसक्ति के करते हैं।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः(स्), सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय, जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।
प्रकृति मेरी अध्यक्षता में सम्पूर्ण चराचर जगत को रचती है। हे कुन्तीनन्दन ! इसी हेतु से जगत का (विविध प्रकार से) परिवर्तन होता है।
विवेचन:- श्रीभगवान् कहते हैं इस प्रकार मेरी अध्यक्षता में पूरी प्रकृति कार्य करती है।
प्रकृति में जो भी वस्तुऍं हैं, वे सब कुछ परिवर्तनशील है।
इस बात को हम हमारे जीवन के उदाहरण से ही समझ लेते हैं जब हमारा जन्म हुआ था हम कितने छोटे से थे। धीरे-धीरे बड़े हुए, बोलना सीखा, चलना सीखा, वयस्क हुए और प्रौढ़ भी हो जाऍंगे।
सम्पूर्ण प्रकृति निरन्तर बदलती रहती है। केवल परमात्मा ही है जो कभी नहीं बदलते।
वे सृजन के पहले भी थे और प्रलय के बाद भी थे/रहेंगे। वे सनातन है। वहीं अनन्त, अनादि है।
प्रकृति में जो भी वस्तुऍं हैं, वे सब कुछ परिवर्तनशील है।
इस बात को हम हमारे जीवन के उदाहरण से ही समझ लेते हैं जब हमारा जन्म हुआ था हम कितने छोटे से थे। धीरे-धीरे बड़े हुए, बोलना सीखा, चलना सीखा, वयस्क हुए और प्रौढ़ भी हो जाऍंगे।
सम्पूर्ण प्रकृति निरन्तर बदलती रहती है। केवल परमात्मा ही है जो कभी नहीं बदलते।
वे सृजन के पहले भी थे और प्रलय के बाद भी थे/रहेंगे। वे सनातन है। वहीं अनन्त, अनादि है।
अवजानन्ति मां(म्) मूढा, मानुषीं(न्) तनुमाश्रितम्।
परं(म्) भावमजानन्तो, मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।
मूर्ख लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान् ईश्वररूप श्रेष्ठ भाव को न जानते हुए मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर (मेरी) अवज्ञा करते हैं।
विवेचन:- श्रीभगवान् कहते हैं कि यह प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है। श्रीभगवान्
मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं, तो क्या वे मनुष्य की तरह ही हो गए? साधारण मनुष्य श्रीभगवान् को नहीं पहचान पाए वह उन्हें साधारण मानव ही समझते हैं।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर नमक समाज सुधारक थे। विचारक एवं प्रसिद्ध लेखक थे।
मनुष्य रूप में अवतार लेते हैं, तो क्या वे मनुष्य की तरह ही हो गए? साधारण मनुष्य श्रीभगवान् को नहीं पहचान पाए वह उन्हें साधारण मानव ही समझते हैं।
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर नमक समाज सुधारक थे। विचारक एवं प्रसिद्ध लेखक थे।
एक बार ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी नाटक देखने गए। उस नाटक में एक व्यक्ति, अंग्रेज व्यक्ति का अभिनय कर रहे थे। इतना अच्छा अभिनय कर रहे थे कि वे अंग्रेज हैं या कलाकार यह अन्तर करना कठिन था। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी उस अभिनय में इतने मग्न हो गए थे कि वे यह भूल गए कि वह नाटक है। उन्हें लगा जो व्यक्ति अभिनय कर रहा है, वह सही में अंग्रेज अधिकारी है, जो भारतीयों पर अत्याचार कर रहा है। उन्होंने क्रोधित होकर पैर का जूता गुस्से में उस कलाकार के ऊपर फेंक दिया। उस कलाकार ने जूता स्वीकार करते हुए कहा आज तक मेरी भूमिका की सभी ने प्रशंसा की, पर ऐसी प्रशंसा आज तक नहीं मिली।बताने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा जब अवतार लेते हैं श्रीराम, श्रीकृष्ण के रूप में तो वह भी एक प्रकार से अभिनय ही करते हैं। श्रीराम ने सीता जी के विरह में, जो लीला की, विलाप किया, उन्हें खोजते रहे क्योंकि वे उस समय मनुष्य की भूमिका निभा रहे थे।
आपने दूरदर्शन पर रामायण सीरियल आता था, उसके बारे में सुना होगा। उस सीरियल में जो कलाकार राम, लक्ष्मण, सीता जी की भूमिका निभाते थे। उन्होंने अपने अनुभव साझा किया तो बताया कि जब वे किसी स्थान पर जाते थे तो लोग उन्हें उतना ही आदर सम्मान या पूजा करते थे, जितनी वे श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी की पूजा अर्चना करते हैं क्योंकि वे उन्हें वही मानते थे।
श्रीराम ने अपने जीवन काल में माता-पिता का त्याग अयोध्या का त्याग, सीता जी का त्याग, एक समय ऐसा आया जब लक्ष्मण जी का भी त्याग किया पर अपने कर्तव्य का त्याग कभी नहीं किया।
श्रीभगवान् अपरिवर्तनशील है जो इस बात को नहीं जानते श्रीभगवान् कहते हैं, मेरी लीलाओं को मनुष्य अगर नहीं समझ पाता। वे मेरे परम भाव को नहीं जानते ऐसे लोग अज्ञानी है, मूढ़ हैं।
मोघाशा मोघकर्माणो, मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं(ञ्) चैव, प्रकृतिं(म्) मोहिनीं(म्) श्रिताः।।9.12।।
(जो) आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का ही आश्रय लेते हैं, ऐसे अविवेकी मनुष्यों की सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ-कर्म व्यर्थ होते हैं (और) सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात् जिनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान (समझ) सत्-फल देने वाले नहीं होते।
विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् आसुरी, राक्षसी मोहिनी प्रवृत्ति के लोगों के बारे में बता रहे हैं।
उदाहरण- माँ ने चॉकलेट के डब्बे में से एक चॉकलेट लेने को कहा और मैंने देखा माँ मुझे देख नहीं रही है तो मैंने उसमें से दो चॉकलेट ले ली पर उस समय भी मैं स्वयं अपने आप को तो देख रहा होता हूँ न।
श्रीभगवान् तो हमारे हृदय में रहते हैं, उन्होंने तो हमें देखा न और हम समझते हैं हमें किसी ने नहीं देखा तो हम आसुरी, राक्षसी, मोहिनी प्रवृत्ति के हो जाते हैं। हमें यह समझना चाहिए, यह जानना चाहिए कि श्रीभगवान् हमारे सबसे समीप हैं, सबसे निकट हैं। श्रीभगवान् हमारे वस्त्र, हमारी त्वचा, हमारे अंग इन सब से भी अधिक हमारे निकट है।
जो सतत दैवीय गुणों के आश्रित रहते हैं, उनकी स्मरण शक्ति, उनका तेज अधिक होता है। श्रीभगवान् कहते हैं जो निरन्तर सतत मेरे गुणों का अनुसरण करता है। वे दिव्य स्वरूप ही बन जाते है, ऐसे लोगों पर परमात्मा का आशीर्वाद सदैव बना रहता है।
हमारे गीता परिवार में भी आशू भैया, संजय भैया तथा स्वयं हमारे पूज्य स्वामी जी पर परमात्मा का आशीर्वाद सदा बना रहता है। हमारे प्रश्नों के उत्तर हमें उनसे बिना पूछे ही मिल जाते हैं। जो परमात्मा के दिव्य रूप को समझ जाते है। वे स्वत: ही आसुरी गुणों से दूर हो जाते है। दैवीय गुणों की आराधना करते-करते देवता स्वरूप ही बन जाते हैं और जो मनुष्य आसुरी, राक्षसी मोहिनी,प्रवृत्ति में पड़ जाते हैं। ऐसे लोगों की क्षमता धीरे-धीरे क्षय या समाप्त होने लगती है। ऐसे लोगों की यही धारणा होती है कि भगवान् नहीं होते हैं।
To eat drink and be merry.
To eat drink and be merry.
ऐसे लोगों का जीवन आनन्दमय नहीं हो सकता। वे कभी प्रसन्न नहीं रह सकते।
महात्मानस्तु मां(म्) पार्थ, दैवीं(म्) प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो, ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।
परन्तु हे पृथानन्दन ! दैवी प्रकृति के आश्रित अनन्य मन वाले महात्मा लोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि (और) अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं।
विवेचन- दैवी प्रकृति के लोग महात्मा होते हैं। हमारे अन्दर जब दैवी गुणों का विस्तार होता है तो हमारा जीवन उज्जवल हो जाता है, चमकने लगता है।
बच्चों का ध्यान आकर्षित करने के लिए उनसे प्रश्न पूछा गया -
इस अध्याय का नाम क्या है?
बच्चों का ध्यान आकर्षित करने के लिए उनसे प्रश्न पूछा गया -
इस अध्याय का नाम क्या है?
बच्चों ने उत्साह पूर्वक उत्तर दिया “राजविद्याराजगुह्ययोग”। अर्थात् विधाओं का राजा।
The most secret knowledge. एक और अर्थ होता है, चमकना।
The most secret knowledge. एक और अर्थ होता है, चमकना।
ऐसी विद्या जो हमारे जीवन को चमका देगी। हम जब ऐसी विद्या का पठन-पाठन करेंगे तो हमारा जीवन भी चमक जाएगा। शिवाजी महाराज, श्रीराम, श्रीकृष्ण का जीवन तेजस्वी था। वैसा ही हमारा जीवन भी तेजस्वी हो जाएगा। जो व्यक्ति दैवी गुणों का आश्रय लेकर जीवन यापन करते हैं। जो व्यक्ति यह मानकर सभी की सेवा करते हैं कि सभी के हृदय में परमात्मा का वास है।
हमारे गीता परिवार के लोगो (Logo) में भी लिखा है “तस्मात् योगी भवार्जुन”। ऐसे लोग सभी की सेवा करते हैं।
सततं(ङ्) कीर्तयन्तो मां(य्ँ), यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां(म्) भक्त्या, नित्ययुक्ता उपासते॥9.14॥
नित्य- निरन्तर (मुझ में) लगे हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगन पूर्वक साधन में लगे हुए और प्रेम पूर्वक कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुये निरन्तर मेरी उपासना करते हैं।
विवेचन- जो व्यक्ति परमात्मा के कीर्तन में दृढ़ निश्चय से निरन्तर लगे रहते हैं।
नित्युक्ता, अर्थात् जो भी कार्य करें वह इस भाव से करें कि मैं परमात्मा के लिए, ईश्वर के लिए यह कार्य कर रहा हूँ।
यदि पढ़ाई भी करें तो सम्पूर्ण एकाग्रता से ध्यान से करें।
भोजन भी करें तो इस भाव से करें कि भगवान् को प्रसाद अर्पण करके भोजन कर रही हूँ/ कर रहा हूँ।
ज्ञानेश्वर महाराज भी कहते हैं कि हर कर्म को भगवान् का भजन मान कर करें।
नित्युक्ता, अर्थात् जो भी कार्य करें वह इस भाव से करें कि मैं परमात्मा के लिए, ईश्वर के लिए यह कार्य कर रहा हूँ।
यदि पढ़ाई भी करें तो सम्पूर्ण एकाग्रता से ध्यान से करें।
भोजन भी करें तो इस भाव से करें कि भगवान् को प्रसाद अर्पण करके भोजन कर रही हूँ/ कर रहा हूँ।
ज्ञानेश्वर महाराज भी कहते हैं कि हर कर्म को भगवान् का भजन मान कर करें।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये, यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन, बहुधा विश्वतोमुखम्।।9.15।।
दूसरे साधक ज्ञान यज्ञ के द्वारा एकीभाव से (अभेद-भाव से) मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और दूसरे भी कई साधक (अपने को) पृथक् मानकर चारों तरफ मुखवाले मेरे विराट रुप की अर्थात् संसार को मेरा विराट रुप मानकर सेव्य-सेवक भाव से (मेरी) अनेक प्रकार से (उपासना करते हैं)।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कुछ भक्त भक्ति के मार्ग के द्वारा मेरी पूजा करते हैं। सारे कार्य भक्ति भाव से करेंगे। कुछ भक्त इस भावना से करते हैं कि सारे विश्व में परमात्मा का ही वास है।
भगवान् एक ही हैं और हर एक प्राणी में है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो श्रीभगवान् को नहीं मानते पर हर प्राणी की सेवा करते हैं। वे भी एक तरह से श्रीभगवान् की भक्ति ही करते हैं उन्हें ज्ञानमार्गी कहते हैं। ऐसे व्यक्ति आसुरी प्रवृत्ति से दूर होते हैं और दैवी प्रवृत्ति की ओर अग्रसर होते हैं।
हम किसी सन्त महात्माओं को विशेष रूप से प्रणाम करते हैं। हम यह मानते हैं कि सब में श्रीभगवान् है लेकिन गुरु को हम प्रणाम करते हैं तो हम यह मानते हैं कि उनमें विशेष रूप से हैं।
यह बातें थोड़ी कठिन प्रतीत हो सकती है किन्तु बार-बार चिन्तन, मनन करने से समझ में आने लगती है। रामनवमी के उपलक्ष्य में भजन के माध्यम से श्रीरामजी से पावन भिक्षा माँगेंगे। इसी तरह गीता जी के पथ पर चलते रहे।
प्रश्नकर्ता- आरोही दीदी
प्रश्न- जिस चेयर में मैं बैठी हूँ या जिस टेबल का मैं उपयोग करती हूँ, क्या उनमें भी पञ्च तत्त्व उपस्थित हैं?
उत्तर- हाँ, उनमें भी पञ्च तत्त्व उपस्थित हैं। टेबल पर धूल, मिट्टी होती है एवं कोई भी कठोर वस्तु, पृथ्वी तत्त्व का द्योतक है। रस युक्त पदार्थों में मुख्यतः जल तत्त्व की प्रधानता होती है। जब किसी पात्र में जल भरा जाता है तब उस जल में कुछ मात्र में वायु तत्त्व उपस्थित होता है। इस तथ्य को हम जलाशयों में उपस्थित जलीय जीवन से उचित प्रकार से समझ सकते हैं। जहाँ अनेक जीव स्वयं को जीवित रखने हेतु जल में उपस्थित प्राणवायु को ग्रहण करते हैं।
हम सभी रसायन शास्त्र की प्रयोगशाला में अनेक प्रयोग करते हैं तथा पाते हैं कि किन्हीं दो पदार्थों की भिन्न-भिन्न मात्रा के संयोग से कोई अन्य ही पदार्थ निर्मित होता है।
जैसे ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन के संयोग से जल निर्मित होता है। जबकि ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन वायु तत्त्व हैं तथा जल, जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अत: हम कह सकते हैं कि कोई पदार्थ किसी भी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता हो परन्तु उसमें अन्य तत्त्व सूक्ष्म रूप में निश्चित ही विद्यमान रहते हैं।
जिस प्रकार हमारी पृथ्वी का बाह्य आवरण शीतल है परन्तु उसके कोर में लावा उपस्थित है जो अत्यधिक गर्म है अत: वह अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है।
जिस प्रकार कभी-कभी हमारे माता-पिता से हमारे गुण नहीं मिलते परन्तु दादी-दादा या नानी-नाना से मिलते हैं तब ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि हमारे माता-पिता में वे गुण उपस्थित न हों। उनमें वे गुण कहीं न कहीं सुषुप्तावस्था में विद्यमान होते हैं परन्तु वे गुण उनमें प्रतिलक्षित न हो कर उनकी अगली पीढ़ी में स्पष्ट दिखाई देते हैं। यह रसायन विज्ञान सदृश्य है।
प्रश्नकर्ता- प्रणिका दीदी
प्रश्न- कॉटन, जिससे निर्मित वस्त्र ग्रीष्म ऋतु में पहने जाते हैं तथा यह शरीर को शीतलता प्रदान करते हैं, में पञ्च तत्त्व कैसे उपस्थित हो सकते हैं?
उत्तर- कॉटन किससे निर्मित होता है?, कॉटन प्लाण्ट से। पौधे से निकलने वाली कपास से धागे निर्मित होते हैं। तत्पश्चात् उनसे वस्त्र निर्मित होते हैं। कपास के पौधे को उत्पन्न करने हेतु हम मिट्टी में बीज बोते हैं। पृथ्वी से खनिज तत्व ग्रहण करते हुए, बारिश के माध्यम से जल ले, बीज से एक नन्हा पौधा निकलता है। जो सूर्य की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के माध्यम से अपना भोजन निर्मित करता है। इस प्रक्रिया में पौधा वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करता है तथा भोजन निर्माण की प्रक्रिया के पश्चात ऑक्सीजन वातावरण में त्याग देता है। इस प्रकार पञ्च तत्त्वों की सहायता से वह कपास का पौधा वृद्धि को प्राप्त होता है तथा हम उससे उत्पन्न हुए कपास से निर्मित वस्त्र धारण करते हैं।
समस्त जीवों को जीवित रहने हेतु भोजन की आवश्यकता होती है। मानव प्रायः अपना भोजन पका कर ग्रहण करता है। अत: भोजन को पकाने हेतु अग्नि की आवश्यकता होती है तथा उस पके हुए भोजन को ग्रहण करने के पश्चात उसके पाचन हेतु भी हमारे शरीर में अग्नि विद्यमान होती है।
प्रकृति में उपस्थित इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सृष्टि द्वारा निर्मित प्रत्येक चर-अचर वस्तु में पञ्च महाभूत निश्चित ही विद्यमान हैं परन्तु उनकी उपस्थिति किसी पदार्थ में सूक्ष्म, किसी में अधिक होती है।
भगवान् एक ही हैं और हर एक प्राणी में है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो श्रीभगवान् को नहीं मानते पर हर प्राणी की सेवा करते हैं। वे भी एक तरह से श्रीभगवान् की भक्ति ही करते हैं उन्हें ज्ञानमार्गी कहते हैं। ऐसे व्यक्ति आसुरी प्रवृत्ति से दूर होते हैं और दैवी प्रवृत्ति की ओर अग्रसर होते हैं।
हम किसी सन्त महात्माओं को विशेष रूप से प्रणाम करते हैं। हम यह मानते हैं कि सब में श्रीभगवान् है लेकिन गुरु को हम प्रणाम करते हैं तो हम यह मानते हैं कि उनमें विशेष रूप से हैं।
यह बातें थोड़ी कठिन प्रतीत हो सकती है किन्तु बार-बार चिन्तन, मनन करने से समझ में आने लगती है। रामनवमी के उपलक्ष्य में भजन के माध्यम से श्रीरामजी से पावन भिक्षा माँगेंगे। इसी तरह गीता जी के पथ पर चलते रहे।
“राम राम जय राजा राम पावन भिक्षा दे दो राम
निर्मल करणी दे दो राम, कोमल वाणी दे दो राम,
राम राम जय राजा राम पावन भिक्षा दे दो राम
हित कारक जो दे दो राम जन सुख कारक दे दो राम
इंगीतज्ञता दे दो राम बहुजन मैत्री दे दो राम
राम राम जय राजा राम पावन भिक्षा दे दो राम
प्यार तुम्हारा दे दो राम दास कहे मोहे दे दो श्री राम
राम राम जय राजा राम पवन भिक्षा दे दो राम
संगीत गायन दे दो राम तान मधुरता दे दो राम
राम राम जय राजा राम पावन भिक्षा देदो राम”
“जय जय सियाराम”, “रामचन्द्र महाराज की जय”
सुमधुर भजन के साथ सत्र का समापन हुआ।
विचार मंथन
प्रश्न- जिस चेयर में मैं बैठी हूँ या जिस टेबल का मैं उपयोग करती हूँ, क्या उनमें भी पञ्च तत्त्व उपस्थित हैं?
उत्तर- हाँ, उनमें भी पञ्च तत्त्व उपस्थित हैं। टेबल पर धूल, मिट्टी होती है एवं कोई भी कठोर वस्तु, पृथ्वी तत्त्व का द्योतक है। रस युक्त पदार्थों में मुख्यतः जल तत्त्व की प्रधानता होती है। जब किसी पात्र में जल भरा जाता है तब उस जल में कुछ मात्र में वायु तत्त्व उपस्थित होता है। इस तथ्य को हम जलाशयों में उपस्थित जलीय जीवन से उचित प्रकार से समझ सकते हैं। जहाँ अनेक जीव स्वयं को जीवित रखने हेतु जल में उपस्थित प्राणवायु को ग्रहण करते हैं।
हम सभी रसायन शास्त्र की प्रयोगशाला में अनेक प्रयोग करते हैं तथा पाते हैं कि किन्हीं दो पदार्थों की भिन्न-भिन्न मात्रा के संयोग से कोई अन्य ही पदार्थ निर्मित होता है।
जैसे ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन के संयोग से जल निर्मित होता है। जबकि ऑक्सीजन एवं हाइड्रोजन वायु तत्त्व हैं तथा जल, जल तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है। अत: हम कह सकते हैं कि कोई पदार्थ किसी भी तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता हो परन्तु उसमें अन्य तत्त्व सूक्ष्म रूप में निश्चित ही विद्यमान रहते हैं।
जिस प्रकार हमारी पृथ्वी का बाह्य आवरण शीतल है परन्तु उसके कोर में लावा उपस्थित है जो अत्यधिक गर्म है अत: वह अग्नि तत्त्व का प्रतिनिधित्व करता है।
जिस प्रकार कभी-कभी हमारे माता-पिता से हमारे गुण नहीं मिलते परन्तु दादी-दादा या नानी-नाना से मिलते हैं तब ऐसा तो सम्भव ही नहीं है कि हमारे माता-पिता में वे गुण उपस्थित न हों। उनमें वे गुण कहीं न कहीं सुषुप्तावस्था में विद्यमान होते हैं परन्तु वे गुण उनमें प्रतिलक्षित न हो कर उनकी अगली पीढ़ी में स्पष्ट दिखाई देते हैं। यह रसायन विज्ञान सदृश्य है।
प्रश्नकर्ता- प्रणिका दीदी
प्रश्न- कॉटन, जिससे निर्मित वस्त्र ग्रीष्म ऋतु में पहने जाते हैं तथा यह शरीर को शीतलता प्रदान करते हैं, में पञ्च तत्त्व कैसे उपस्थित हो सकते हैं?
उत्तर- कॉटन किससे निर्मित होता है?, कॉटन प्लाण्ट से। पौधे से निकलने वाली कपास से धागे निर्मित होते हैं। तत्पश्चात् उनसे वस्त्र निर्मित होते हैं। कपास के पौधे को उत्पन्न करने हेतु हम मिट्टी में बीज बोते हैं। पृथ्वी से खनिज तत्व ग्रहण करते हुए, बारिश के माध्यम से जल ले, बीज से एक नन्हा पौधा निकलता है। जो सूर्य की उपस्थिति में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के माध्यम से अपना भोजन निर्मित करता है। इस प्रक्रिया में पौधा वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करता है तथा भोजन निर्माण की प्रक्रिया के पश्चात ऑक्सीजन वातावरण में त्याग देता है। इस प्रकार पञ्च तत्त्वों की सहायता से वह कपास का पौधा वृद्धि को प्राप्त होता है तथा हम उससे उत्पन्न हुए कपास से निर्मित वस्त्र धारण करते हैं।
समस्त जीवों को जीवित रहने हेतु भोजन की आवश्यकता होती है। मानव प्रायः अपना भोजन पका कर ग्रहण करता है। अत: भोजन को पकाने हेतु अग्नि की आवश्यकता होती है तथा उस पके हुए भोजन को ग्रहण करने के पश्चात उसके पाचन हेतु भी हमारे शरीर में अग्नि विद्यमान होती है।
प्रकृति में उपस्थित इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सृष्टि द्वारा निर्मित प्रत्येक चर-अचर वस्तु में पञ्च महाभूत निश्चित ही विद्यमान हैं परन्तु उनकी उपस्थिति किसी पदार्थ में सूक्ष्म, किसी में अधिक होती है।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।