विवेचन सारांश
परमात्मा के प्रकाश से अन्तःकरण का शुद्ध होना
गुरुवन्दना एवं दीप प्रज्वलन के साथ ज्ञान से पूर्ण अध्याय के विवेचन का प्रारम्भ हुआ। इस अध्याय में बताया गया है कि कर्मों को करना ही परमात्मा को प्राप्त करना नहीं होता अपितु उनको आचरण में लाना, हमने जो समझा है उसका अनुसरण करना एवं मन, कर्म और वचन में एकरुपता होना ही भगवद् प्राप्ति का मार्ग है। श्रीभगवान ने यह ज्ञान अर्जुन को केवल अर्जुन के लिए ही नहीं दिया अपितु यह ज्ञान उन्होंने पूरी सृष्टि के लिए दिया है। यदि हम गीता जी को समझते और जीवन में उतारते हैं तो हमें किसी प्रकार के कष्ट नहीं आते और हम इस भवसागर को गीता जी के ज्ञान के कारण सरलता से पार कर लेंगे। संशय की स्थिति को मिटाते हुए ज्ञान का प्रकाश प्रवाहित करना और ईश्वर हमारे भीतर है, इस बात को जो जान जाएगा वह कभी भी किसी से द्वेष नहीं रखेगा और उसे परम शान्ति की प्राप्ति होगी। वह अपने कर्मों को ईश्वर को अर्पण करके कर्म बन्धन से मुक्त हो जाएगा और परमात्मा के ज्ञान का प्रकाश उसके जीवन को आभामय बना देगा।
4.32
एवं(म्) बहुविधा यज्ञा, वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्, एवं(ञ्) ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥32॥
इस प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेद की वाणी में विस्तार से कहे गये हैं। उन सब यज्ञों को तू कर्मजन्य जान। इस प्रकार जानकर यज्ञ करनेसे तू (कर्मबन्धन से) मुक्त हो जायगा।
विवेचन- जो भी मैंने किया वह भगवान को अर्पण करना, यज्ञ हो गया। अलग-अलग प्रकार के यज्ञ होते हैं। मैं परमात्मा की प्राप्ति के लिए देवयज्ञ कर रहा हूँ। आहुति देना भी एक यज्ञ है। निःस्वार्थ होकर अपने कर्त्तव्य कर्म करने के पश्चात जो बचता है, वह दान करना एवं उसका फल प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना, जो अपने सारे कर्त्तव्य कर्म को कर अमृत रूपी भोग स्वीकार करता है, वह परमात्मा को प्राप्त होता है। वह परलोक में और इस लोक में भी सुख ही पाता है। वह कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्, ज्ञानयज्ञः(फ्) परन्तप।
सर्वं(ङ्) कर्माखिलं(म्) पार्थ, ज्ञाने परिसमाप्यते॥33॥
हे परन्तप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान-(तत्त्वज्ञान-) में समाप्त हो जाते हैं।
विवेचन- श्रेय का अर्थ है कल्याणकारी, हितकारी। अतः ज्ञानयज्ञ एवं द्रव्ययज्ञ की तुलना की जाए तो अधिक श्रेष्ठ ज्ञानयज्ञ है। ज्ञानयज्ञ में अधिक कल्याण होता है। द्रव्ययज्ञ में आहुति सङ्कल्प एवं फल की प्राप्ति के लिए होती है। जैसे कि पुत्र कामेष्टि यज्ञ, राजसुय यज्ञ, शिक्षा प्राप्ति के लिए यज्ञ, मनोकामना पूर्ति के लिए यज्ञ आदि किए जाते हैं। किन्तु ज्ञानयज्ञ में परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। ज्ञानयज्ञ में सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। यदि ज्ञान प्राप्त करेंगे तो कर्मबन्धन से मुक्त हो जाएँगे और परमात्मा को प्राप्त करेंगे।
तद्विद्धि प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं(ञ्), ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥34॥
उस (तत्त्वज्ञान) को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर) समझ। उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञान का उपदेश देंगे।
विवेचन- ज्ञान को प्राप्त कर लो एवं सम्पूर्ण शरणागत हो जाओ। जब हम दण्डवत् प्रणाम करते हैं, तब हम अपना सब कुछ श्रीभगवान के चरणों में सौंप देते हैं। अपने मन, कर्म, वचन और बुद्धि को श्रीभगवान के चरणों में अर्पण कर दो। प्रथम अध्याय में अर्जुन जब असमञ्जस की स्थिति में थे, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें सुनाते हैं एवं दूसरे अध्याय में पहले डाँटते हैं कि हृदय की दुर्बलता छोड़ो वे उपदेश नहीं देते हैं, बल्कि उन्हें समझाते हैं। लेकिन जब अर्जुन कहते हैं कि मैं आपका शिष्य हूँ और शीश झुकाकर प्रणाम करते हैं तथा कहते हैं कि मुझे बताइए, मैं कुछ नहीं जानता। तब श्रीभगवान अर्जुन को उपदेश देते हैं। अतः निष्कपट होकर प्रश्न पूछना। उनसे पूछना, जिन्होंने स्वयं आत्म अनुभूति कर ली है। स्वामी विवेकानन्द गुरु को ढूँढते रहे। जब उन्होंने ठाकुर रामकृष्ण जी की सम्पूर्ण परीक्षा कर ली, तब उन्होंने उनका शिष्यत्व स्वीकार किया। अतः सिर्फ आँखों से देखना ही ज्ञान नहीं होता। ज्ञानचक्षुओं के द्वारा छुपे हुए तत्त्वों को देखना भी ज्ञान होता है। वायु है, किन्तु उसके अन्दर प्राण वायु ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड आदि हैं। यह तत्त्वज्ञान के द्वारा ही मालूम होते हैं। ऐसे ही पितृत्व, मातृत्व आदि तत्त्व छिपे होते हैं।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहम्, एवं(म्) यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण, द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥35॥
जिस (तत्त्वज्ञान) का अनुभव करने के बाद तू फिर इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगा, और हे अर्जुन ! जिस (तत्त्वज्ञान) से तू सम्पूर्ण प्राणियों को निःशेषभाव से पहले अपने में और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में देखेगा।
विवेचन- जिसको जानकर, समझ कर फिर तुम्हें मोह नहीं होगा, फिर तुम्हें अज्ञान नहीं हो सकता जो भाव तुम्हारे मन में अलग-अलग आए हैं। यहाँ दृष्टि ही अज्ञान कहलाती है। अलग-अलग वस्तुएँ अलग-अलग प्राणी हैं। मनुष्य का यह प्रतीत होना अज्ञान है। इन सब में एक ही परमात्मा को देखना ही ज्ञान है फिर तुम्हें अज्ञान परेशान नहीं करेगा। जिस ज्ञान के द्वारा वस्तु, प्राणी सभी निर्माण हुआ है वह भूत कहलाते हैं। कुछ भी नदी, पर्वत, वृक्ष, प्राणी मनुष्य किसी को भी अलग न रखते हुए पूर्णतः स्वयं देखोगे यह ज्ञान जब प्राप्त हो जाता है तो सभी भूत स्वयं में दिखने लगते हैं। दूसरों को दुःखी देखकर ज्ञानी को अन्तरङ्ग में भी दुःख होता है। उसमें अलग का भाव भी नहीं रहता। सज्जन का हृदय पराए दुःख को देखकर भी दुःखी हो जाता है। ज्ञानी का हृदय दूसरों के दुःख को देखकर पिघल जाता है। वह दूसरों में स्वयं को देखता है। दूसरे का दुःख उसको दूसरे का दुःख लगता ही नहीं है वह उसे अपना ही दुःख लगता है। दूसरे का सुख भी अपना ही सुख लगता है।
सज्जनस्य हृदयं नवनीतं यद्वदन्ति कवयस्तदलीकम्। अन्यदेहविलसत्परितापात् सज्जनो द्रवति नो नवनीतम्॥
सज्जनों का हृदय नवनीत या मक्खन से भी कोमल होता है। दूसरे के दुःख को कोई समझ लेगा, लेकिन दूसरे के सुख को देखकर आनन्द का अनुभव करना, यह उससे भी अधिक कठिन है। कोई हमसे आगे जाने लगता है तो तुम मनुष्य को उसके आगे जाने में भी दुःख होता है। उसको कहते हैं मत्सर या ईर्ष्या। जो सबको अपने जैसा देख रहा हो, उसको यह भाव आएगा ही नहीं। स्वयं में देखोगे और मुझमें देखोगे परमात्मा ही सभी में है, मैं भी इसमें हूँ। ठाकुर रामकृष्ण देव को अन्तिम दिनों में कैंसर हो गया था। लोग उनके लिए मिठाई लेकर आते थे। सब लोग कहते थे कि हमें बहुत दुःख होता है कि आप मिठाई नहीं खा सकते। ठाकुर ने कहा आप लोग खाओ तो भी मुझे आनन्द मिल रहा है। मुझे लग रहा है कि मैं स्वयं खा रहा हूँ।
माता अपने बालक को खिलाती है,
बालक खाता है तो आनन्द मांँ को होता है।
बालक खाता है तो आनन्द मांँ को होता है।
ज्ञानियों के लिए कोई भी बात अलग नहीं होती। सन्त ज्ञानेश्वर जी महाराज कहते हैं कि यह ज्ञान सन्तों को प्राप्त होता है। यह ज्ञान प्राप्त होने के पश्चात उसे दृष्टि कैसी प्राप्त होती है, यह भी श्रीभगवान बता रहे हैं।
अपि चेदसि पापेभ्यः(स्), सर्वेभ्यः(फ्) पापकृत्तमः।
सर्वं(ञ्) ज्ञानप्लवेनैव, वृजिनं(म्) सन्तरिष्यसि॥36॥
यदि तू सब पापियों से भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौका के द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्र से अच्छी तरह तर जायगा।
विवेचन- कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो यह ज्ञान प्राप्त होने से वह सन्त हो जाता है। यह ज्ञान प्राप्त होगा तो पाप का सागर पार कर जाओगे। सन्तों के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करने की बातें श्रीभगवान कर रहे हैं। ज्ञान प्राप्त करना या यज्ञ का आचरण करना।
सारे भूतों में स्थित आत्माओं में, सभी में स्वयं को देखते हैं, उनकी दृष्टि ऐसी हो जाती है। कोई भी वस्तु, व्यक्ति, प्राणी उसके भीतर का आदमी तक उनको दिखाई नहीं देता है उनको आत्म तत्त्व दिखाई देता है। छठे अध्याय में श्रीभगवान कहते हैं जो इस प्रकार मुझे सब में और सभी में मुझे देखता है। उसको मैं अलग नहीं होने देता लेकिन जो अज्ञानी है वह असमञ्जस में है, उसके मन में विश्वास नहीं है, श्रद्धा नहीं है।
भगवद्गीता पर श्रद्धा है किन्तु केवल संशय रखता है उसका भी विनाश हो जाता है। उसे इस लोक में भी सुख नहीं मिलता। वह हमेशा संशय में ही डूबा रहता है परलोक की तो बात ही दूर है वह इस लोक में भी सुखी नहीं रह सकता इसलिए बिना संशय के पूरी श्रद्धा आवश्यक है।
सारे भूतों में स्थित आत्माओं में, सभी में स्वयं को देखते हैं, उनकी दृष्टि ऐसी हो जाती है। कोई भी वस्तु, व्यक्ति, प्राणी उसके भीतर का आदमी तक उनको दिखाई नहीं देता है उनको आत्म तत्त्व दिखाई देता है। छठे अध्याय में श्रीभगवान कहते हैं जो इस प्रकार मुझे सब में और सभी में मुझे देखता है। उसको मैं अलग नहीं होने देता लेकिन जो अज्ञानी है वह असमञ्जस में है, उसके मन में विश्वास नहीं है, श्रद्धा नहीं है।
भगवद्गीता पर श्रद्धा है किन्तु केवल संशय रखता है उसका भी विनाश हो जाता है। उसे इस लोक में भी सुख नहीं मिलता। वह हमेशा संशय में ही डूबा रहता है परलोक की तो बात ही दूर है वह इस लोक में भी सुखी नहीं रह सकता इसलिए बिना संशय के पूरी श्रद्धा आवश्यक है।
यथैधांसि समिद्धोऽग्नि:(र्), भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः(स्) सर्वकर्माणि, भस्मसात्कुरुते तथा॥37॥
हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनों को सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को सर्वथा भस्म कर देती है।
विवेचन- जैसे यज्ञ मे आहुति देते हैं हम जो भी उसमें अर्पण करते हैं वह उसको भस्म कर देता है। जब यह ज्ञान अग्नि प्रज्वलित हो जाती है तो सारे कर्म भस्म हो जाते हैं। ज्ञान प्रकट हो जाने से ज्ञान अग्नि मनुष्य के सभी कर्मों को भस्म कर देती है और वह कर्म बन्धन से मुक्त हो जाता है। यही मोक्ष है।
न हि ज्ञानेन सदृशं(म्), पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं(म्) योगसंसिद्धः(ख्), कालेनात्मनि विन्दति॥38॥
इस मनुष्यलोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आप में पा लेता है।
विवेचन- ज्ञान जैसा पवित्र कुछ भी नहीं। सबसे पवित्र यह ज्ञान आता कहाँ से है? वह ज्ञान हमारे भीतर है। प्रत्येक जीव में यह ज्ञान है। ध्यान हमारे भीतर के ज्ञान, शिक्षा से प्रकट होता है। अन्तःकरण ज्ञान को जागृत करने का माध्यम है। शिक्षा के द्वारा वह स्वयं ही उसको प्राप्त हो जाता है। हमारा अन्तःकरण शुद्ध होता जाता है और अन्दर का ज्ञान स्वयं प्रकट हो जाता है। उसके लिए समय लगता है। अपने अन्दर ही उसको प्राप्त कर कर्मयोग के आचरण से हम प्राप्त कर सकते हैं।
पुराने समय मे लालटेन होती थी। लालटेन के काँच पर काजल जमा हो जाता था तो प्रकाश नहीं आता था। जब हम उसको साफ करते थे तो अच्छा प्रकाश आने लगता था। जब हमारा अन्तःकरण प्रकाश से शुद्ध हो तो वह अपने आप कर्म योग से बाहर आ जाता है। अपने भीतर ही ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान उसी को प्राप्त होगा जिसका अन्तःकरण शुद्ध होगा।
पुराने समय मे लालटेन होती थी। लालटेन के काँच पर काजल जमा हो जाता था तो प्रकाश नहीं आता था। जब हम उसको साफ करते थे तो अच्छा प्रकाश आने लगता था। जब हमारा अन्तःकरण प्रकाश से शुद्ध हो तो वह अपने आप कर्म योग से बाहर आ जाता है। अपने भीतर ही ज्ञान प्राप्त होता है। ज्ञान उसी को प्राप्त होगा जिसका अन्तःकरण शुद्ध होगा।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं(न्), तत्परः(स्) संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं(म्) लब्ध्वा परां(म्) शान्तिम्, अचिरेणाधिगच्छति॥39॥
जो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।
विवेचन- श्रद्धा वाले इस ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए श्रद्धा आवश्यक है। बिना श्रद्धा के विज्ञान भी नहीं सीखा जा सकता। विज्ञान में ज्यामिति में बिन्दु,त्रिकोण आदि सीखना पड़ता है। बिन्दु की व्याख्या की जाती है। बिन्दु वह है जिसकी कोई लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई नहीं होती। हम कहते हैं कि कल्पना करो ऐसी कोई बात हो जिसकी कोई लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई नहीं है तो हम कैसे मानें यदि तुम श्रद्धा नहीं रखोगे तो विज्ञान नहीं सीख पाओगे। परमाणु के बारे में वैज्ञानिकों ने बताया। हम उस पर श्रद्धा रखते हैं तो मानते हैं। बिना श्रद्धा के ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। जो हमें प्राप्त करना है उसको प्राप्त करने के लिए प्रयास ही नहीं करेंगे तो हम कैसे कहेंगे कि अस्तित्व में नहीं है। केवल श्रद्धा है तो ज्ञान प्राप्त हो जाएगा ऐसा नहीं है। यदि उसका अनुसरण नहीं करेंगे तो नहीं सीख पाएँगे। जो बताया है वैसे ही इसका अनुसरण करना, उसका आचरण करना। मैं करके देखूँगा तब मुझे अनुभव होगा। हमें स्वयं पर नियन्त्रण रखना होगा। यदि हमें कोई रोग हो तो जैसा डॉक्टर ने बताया वैसा परहेज करते हैं।
हमारा कर्त्तव्य है, यदि हम उसको आचरण में नहीं लेंगे तो हम नहीं सीख पाएँगे।
हमारा कर्त्तव्य है, यदि हम उसको आचरण में नहीं लेंगे तो हम नहीं सीख पाएँगे।
गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें।
यह त्रिसूत्रीय आचरण करेंगे तभी हम जीवन में ला पाएँगे। पढ़ना मतलब अच्छे से सीखने के लिए हमें अच्छे से पढ़ना पड़ेगा। तब अभ्यास अच्छा होता है जो बताया गया वैसा आचरण करके देखना।
श्रीभगवान आज मैं जो भी कार्य करूँगा, आपके द्वारा दिया गया है यह सोचकर करूँगा और जो भी कार्य करें उसको अर्पण करते जाना ऐसे व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है।
श्रीभगवान आज मैं जो भी कार्य करूँगा, आपके द्वारा दिया गया है यह सोचकर करूँगा और जो भी कार्य करें उसको अर्पण करते जाना ऐसे व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त होता है।
तें हृदयीं प्रतिष्ठे, आणि शांतीचा अंकुर फुटे।
मग विस्तार बहु प्रकटे, आत्मबोधाचा ॥ १९० ॥
मग विस्तार बहु प्रकटे, आत्मबोधाचा ॥ १९० ॥
ज्ञान प्राप्त होने पर सबसे पहले वह शान्ति को अनुभव करता है। वह विचलित नहीं होता। कार्य होने पर भगवान जितना मेरा सामर्थ्य उतना किया, आपका कार्य आपको अर्पण। यदि दिन में भूल गए तो रात को सोते समय उनको अर्पण कर देने के बाद ही हम उनके कार्य के बन्धन से मुक्त होते हैं और तुरन्त ज्ञान उदय होता है। ज्ञान उदय से शान्ति का अङ्कुर आत्मबोध का विस्तार होगा। मेरा पराया यह भाव भी चला जाएगा।
"वसुधेव कुटुम्बकम्"
यह भावना उसके अन्दर प्रबल होगी। जो ज्ञानी हैं, उनके लिए सारी वसुन्धरा एक परिवार जैसी है।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च, संशयात्मा विनश्यति।
नायं(म्) लोकोऽस्ति न परो, न सुखं(म्) संशयात्मनः॥40॥
विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्य का पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्य के लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।
विवेचन- जो अज्ञानी है और उसके अन्दर श्रद्धा भी नहीं है। संशय के कारण उसका विनाश हो जाता है। उसका सारा जीवन अशान्ति से निकलता है। उसे इस लोक और परलोक में भी सुख एवं शान्ति नहीं मिलती।
योगसन्न्यस्तकर्माणं(ञ्), ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं(न्) न कर्माणि, निबध्नन्ति धनञ्जय॥41॥
हे धनञ्जय ! योग (समता) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और ज्ञान के द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयों का नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते।
विवेचन- हे अर्जुन! जिसने अपने सारे कर्मों का, कर्म योग के आचरण के द्वारा त्याग किया है। जो कर्म किए हैं, उनका जो अर्पण करता है ज्ञान के द्वारा उसका सारा संशय एवं अज्ञान नष्ट हो जाता है। ऐसा आत्मज्ञानी जिसने अपने मन, इन्द्रियों पर नियन्त्रण कर लिया है ऐसे व्यक्ति को कर्म बन्धन में नहीं डाल सकते। जब वह कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाएगा तब वह परमात्मा में विलीन हो जाएगा।
तस्मादज्ञानसम्भूतं(म्), हृत्स्थं(ञ्) ज्ञानासिनात्मन:।
छित्त्वैनं(म्) संशयं(म्) योगम्, आतिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥42॥
इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदय में स्थित इस अज्ञान से उत्पन्न अपने संशय का ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग (समता) में स्थित हो जा, (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।
विवेचन- अर्जुन इसलिए अज्ञान के कारण तुम्हारे मन मे जो संशय उत्पन्न हुआ है, उसे समाप्त कर दो। तुम्हारे ह्रदय, तुम्हारे अन्तःकरण में जो संशय बैठें हैं, उन्हें ज्ञान रूपी तलवार से काट डालो और काटकर समत्व की दृष्टि मन में स्थित होकर एवं धर्म की रक्षा के लिए यह कार्य मुझे करना है, यह सोच कर खड़े हो जाओ। तुम एक योद्धा हो, युद्ध करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। तुम युद्ध करो श्रीभगवान अर्जुन को उसका कर्त्तव्य करने के लिए कह रहे हैं। श्रीभगवान कहते हैं कि उठो अपने कर्त्तव्य करने में लग जाओ। मन में आने वाली शङ्काओं को दूर कर दो। यदि यह हमारा कर्त्तव्य है तो हमें करना है उसके लिए खड़े हो जाना चाहिए।
श्रीभगवान दोहरी बातें क्यों कर रहे हैं? एक बार बोलते हैं- उठो कर्म करो! दूसरी बार कहते हैं- सन्तों के पास जाओ उनकी सेवा करो, उनसे ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। ज्ञान से पवित्र कुछ भी नहीं है। यह सब करने के लिए तो छोड़ कर जाना पड़ेगा। एक बार कहते हैं युद्ध करो, एक बार कहते हैं छोड़ कर जाओ। करना क्या चाहिए? अर्जुन श्रीभगवान को समय-समय पर ऐसे प्रश्न पूछते हैं। अतः ज्ञान के बारे में कोई भी उत्तर नहीं रहता।
इस प्रश्न से पाँचवा अध्याय प्रारम्भ होता है जो हम आगे जानने का प्रयास करेंगे। इस अध्याय के विवेचन का फल श्रीभगवान के श्री चरणों में अर्पण करते हए सुन्दर अध्याय का विवेचन समाप्त हआ।
श्रीभगवान दोहरी बातें क्यों कर रहे हैं? एक बार बोलते हैं- उठो कर्म करो! दूसरी बार कहते हैं- सन्तों के पास जाओ उनकी सेवा करो, उनसे ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। ज्ञान से पवित्र कुछ भी नहीं है। यह सब करने के लिए तो छोड़ कर जाना पड़ेगा। एक बार कहते हैं युद्ध करो, एक बार कहते हैं छोड़ कर जाओ। करना क्या चाहिए? अर्जुन श्रीभगवान को समय-समय पर ऐसे प्रश्न पूछते हैं। अतः ज्ञान के बारे में कोई भी उत्तर नहीं रहता।
इस प्रश्न से पाँचवा अध्याय प्रारम्भ होता है जो हम आगे जानने का प्रयास करेंगे। इस अध्याय के विवेचन का फल श्रीभगवान के श्री चरणों में अर्पण करते हए सुन्दर अध्याय का विवेचन समाप्त हआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- पुष्पलता दीदी
प्रश्न- क्या गीता कक्षा के माध्यम से गीता सीखना भी ज्ञानयज्ञ की श्रेणी में आता है?
उत्तर- जी हाँ।
प्रश्नकर्ता- पुष्पलता दीदी
प्रश्न- ज्ञानेश्वरी कहाँ से प्राप्त कर सकते हैं?
उत्तर- ज्ञानेश्वर महाराज ने श्रीमद्भगवद्गीता जी पर मराठी भाषा में टीका लिखा है। इसका हिन्दी अनुवाद आपको गीता प्रेस, गोरखपुर से प्राप्त हो जाएगा।
प्रश्नकर्ता- कल्पना दीदी
प्रश्न- कर्मयोग, निष्काम कर्म और अकर्म क्या तीनों एक ही हैं?
उत्तर- हाँ, लगभग एक ही हैं। तीनों में निष्काम भाव से कर्म किया जाता है और उसे श्रीभगवान को अर्पण कर दिया जाता है।
प्रश्नकर्ता- रामप्रसाद भैया
प्रश्न- हम सात्त्विक भाव से पूजा करते हैं और उसके बाद ही भोजन आदि करते हैं। यह भी यज्ञ है या जो आहुति आदि देकर यज्ञ करते हैं, वह ही आवश्यक है।
उत्तर- कर्मकाण्ड का अपना महत्त्व है। किन्तु अपने सात्त्विक कर्मों को नित्यप्रति श्रीभगवान को अर्पण करते हुए करने से भी यज्ञ हो जाता है।
प्रश्नकर्ता- चरण दास भैया
प्रश्न- ज्ञान और विज्ञान में क्या अन्तर है?
उत्तर- ज्ञान के अलग-अलग स्तर हैं-
1) सामान्य ज्ञान- किसी वस्तु को मात्र देखने से जो ज्ञान प्राप्त होता है वह सामान्य ज्ञान है। जैसे लोहे को देखकर लोहे का ज्ञान लकड़ी को देखकर लकड़ी का ज्ञान हो गया आदि।
2) परमाणु से लेकर इस विश्व के आकार के बराबर की वस्तुओं को जानने का प्रयास करना ही विज्ञान है।
3) ज्ञान अर्थात् आत्मज्ञान। मैं कौन हूँ? इसका उत्तर जानना।
समर्थ रामदास स्वामी जी ने ज्ञान की बहुत सुन्दर व्याख्या करते हुए कहा है कि स्वयं के भीतर स्थित परमात्मा को जानना, यह जानना कि मैं यह शरीर नहीं हूँ। ऐसा जानकर परमात्मा से एकरूप होना ही आध्यात्मिक ज्ञान है।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसन्न्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्याय:।।
इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ज्ञानकर्मसन्यासयोग’ नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ।