विवेचन सारांश
कर्मों द्वारा फलप्राप्ति

ID: 6983
हिन्दी
रविवार, 11 मई 2025
अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग
2/2 (श्लोक 6-20)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


आज के सत्र अर्थात् पन्द्रहवें अध्याय के उत्तरार्ध का शुभारम्भ ईश-वन्दना, राष्ट्र-वन्दना, श्रीहनुमान चालीसा, गुरुचरण वन्दन के साथ ही दीप प्रज्ज्वलन करते हुये हुआ।

सर्वप्रथम सभी बच्चों की कुशलक्षेम पूछी गयी। श्रीमद्भगवगीता जी के प्रभाव से सभी बच्चे प्रसन्न, सन्तुष्ट और समाधानी भाव में हैं। हमें प्रसन्न ही रहना चाहिए क्योंकि जब हम स्वयं प्रसन्न रहेंगे तभी दूसरों के मध्य भी प्रसन्नता का प्रसार कर सकेंगे। 

पिछले सप्ताह हमने पन्द्रहवें अध्याय के श्लोकों का अर्थ विवेचन आरम्भ किया। हमने देखा था कि ईश्वर ने कैसे व किस प्रकार से योनियों का विभाजन जीव के कर्मानुसार किया है। देव योनि, मनुष्य योनि, तिर्यक योनि इन सभी का वर्गीकरण एक काल्पनिक व विपरीत खड़े वृक्ष द्वारा किस प्रकार चित्रित किया जाता है तथा किस प्रकार के कर्मों के कारण कैसा जन्म और योनि प्राप्त होती है - यह भी समझा। साथ ही उस वृक्ष के असङ्ख्य पत्ते जो वेद स्वरूप माने जाते हैं।

जिस प्रकार ज्ञान असीमित और अगणित होता है ठीक इसी प्रकार इस वृक्ष में पत्ते होते हैं। इस वृक्ष के मूल में स्वयं परमात्मा तथा इसके तने में श्रीब्रह्माजी हैं। यह सम्पूर्ण संसार तीन गुणों से चलता है- सत्त्व, रज व तम

यदि इनमें से कोई एक गुण भी अनुपस्थित हो तो हम दुविधा में पड़ जायेंगे। तीनों गुणों की समान रूप से आवश्यकता है।

उदाहरणार्थ - नींद तामसिक गुण का प्रतीक है किन्तु यह आवश्यक भी है। यदि हम सोयेंगे नहीं तो हमारी थकान नहीं मिटेगी तथा हम पुनः ऊर्जावान नहीं हो सकेंगे। यदि हम में तामसिक गुण नहीं होंगे तो हमारी नींदु में बाधा आयेगी अतः तीनों गुण सम्पूर्ण सृष्टि के चर-अचर पदार्थों में उपस्थित हैं परन्तु उनकी मात्रा का अनुपात समस्त पदार्थों में भिन्न-भिन्न है।

सत्त्व गुण अच्छाई का प्रतीक है।

रजो गुण सक्रियता का प्रतीक है तथा यह परिणामदायक गुण है।

तामसिक गुण अर्थात् आलस्य युक्त हो जाना।

ये तीनों गुण पुनः पुनः हमारी चर्चा में आयेंगे।

चौदहवें अध्याय में भी हम इन गुणों के बारे में पढ़ेंगे।

इन तीनों गुणों का सन्तुलन हमारे भीतर होना आवश्यक है। किसी भी एक प्रकार के गुण के बढ़ने से हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता है। तथापि हमें यह प्रयास करते रहना है कि हमारे भीतर सात्विक गुण ही अधिक हों।

आज के भाग में हम कर्मों का प्रभाव देखेंगे। हमें अच्छे कर्म करने व बुरे कर्म न करने के लिये कहा जाता है। अच्छे कार्यों का प्रभाव सकारात्मक तथा बुरे कार्यों का प्रभाव नकारात्मक होता है।                  

 श्रीमद्भगवतगीता जी के साथ जीवात्मा की अनन्त यात्रा 

हमारे विचार तक अच्छे व सकारात्म‌क होने चाहिये। अपने इस जीवन के बाद आगे के जन्मों में हम अपने कर्मों के प्रभाव को साथ लेकर जाते हैं। हम जो कुछ भी सोचते हैं, करते हैं जैसे हम सब श्रीमद्भगवतगीता जी पढ़ते हैं - यह सब कार्य हमारे साथ आने वाले हैं, यदि हम अभी श्रीमद्भगवतगीता जी को पढ़ेंगे, समझेंगे तथा कण्ठस्थ करेंगे तो यह हमारे अगले जन्म में भी हमारे साथ जायेगा तथा अगले जन्म में यह हमें और जल्दी कण्ठस्थ हो जायेगी।
       
अच्छे कर्म करेंगे तो हमें पुनः मनुष्य योनि प्राप्त होगी तथा यदि बहुत अच्छे कर्म करेंगे तो हमें देव योनि भी प्राप्त हो सकती है। इसके विपरीत यदि हम बुरे कर्म करते हैं तो हम कीट अथवा् तिर्यक योनि प्राप्त करेंगे।

प्रश्न - कोई निकृष्ट योनि में जाना चाहता है क्या?
उत्तर -  नहीं।
विशेष बिन्दु 

इसलिये अच्छे कर्म करो। देवता बनने के लिए बहुत अच्छे तथा मनुष्य बनने के लिये अच्छे कर्म करो। बहुत ध्यान एवम् साधना करनी पड़ेगी।

इसके विपरीत तिर्यक योनि प्राप्त करना अत्यन्त सरल है। सभी प्रकार के बुरे कर्मों को करने से तिर्यक योनि सहजता से प्राप्त हो जाती है, परन्तु हमें यह नहीं करना है। हमें अच्छा बच्चा बनना है।

15.6

न तद्भासयते सूर्यो, न शशाङ्को न पावकः।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं(म्) मम।।6।।

उस (परमपद) को न सूर्य, न चन्द्र (और) न अग्नि ही प्रकाशित कर सकती है (और) (जिसको) प्राप्त होकर जीव लौट कर (संसार में) नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।

विवेचन - अभी तक के श्लोकों में हमने संसार की रचना व स्वरूप देखा था। साथ ही हमने परमात्मा के विषय में भी जाना था। अब इस श्लोक में श्रीभगवान् बताते हैं कि वह परमात्मा अर्थात् परम सत्ता क्या है व कौन है ?

प्रश्न- विज्ञान के अनुसार, प्रकाश का मुख्य स्त्रोत क्या है?
तारे / सूर्य / अग्नि 
(According to science what is the main source of light) - Star/ Sun/ Fire 
उत्तर- सभी को उत्तर ज्ञात हैं। (84%) चौरासी प्रतिशत बच्चों ने उत्तर दिया - सूर्य
किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता जी में श्रीभगवान् बताते हैं कि सूर्य प्रकाश का मुख्य स्त्रोत नहीं है।
प्रकाश हेतु हम कई वस्तुऍं प्रयोग में लाते हैं जैसे टाॅर्च, मोमबत्ती इत्यादि।
किन्तु यहाॅं श्रीभगवान् बताते हैं कि सूर्य, चन्द्रमा व अग्नि सभी को मेरे द्वारा प्रकाश प्राप्त होता है। वे मुझे प्रकाशित नहीं कर सकते क्योंकि मैं तो पहले से ही प्रकाशमान तथा तेजवान हूॅं।

तेजोमयी परमात्मा

हमसे ऐसी क्या त्रुटियाँ (Mistakes) हो जाती हैं जिनके कारण हम इच्छा रखते हुये भी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। यह हम अगले श्लोक में देखेंगे।

15.7

ममैवांशो जीवलोके, जीवभूतः(स्) सनातनः।
मनः(ष्) षष्ठानीन्द्रियाणि, प्रकृतिस्थानि कर्षति।।7।।

इस संसार में जीव बना हुआ आत्मा (स्वयं) मेरा ही सनातन अंश है; (परन्तु वह) प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

विवेचन- श्रीभगवान् यहाँ बताते हैं कि हमारी आत्मा हमारी इन्द्रियों नेत्र (eyes), कान (ears), नाक(Nose), जिह्वा (tongue) तथा त्वचा (skin) तथा मन को आकर्षित करती है।

ऊर्जामयी आत्मा - परमात्मा का अंश

 यदि आत्मा हमारे शरीर से बाहर निकल जाये तो शरीर कुछ भी नहीं कर सकेगा। आत्मा ही ऊर्जा का स्त्रोत है अतः आत्मा के आकर्षण से ही हमारा, मन तथा हमारी इन्द्रियाँ अपना कार्य करती है।  

श्रीभगवान् कहते हैं कि सभी जीव मेरा ही अंश है "ममैवांशो जीवलोके"

हम एक दूसरे की चुगलियाॅं करते हैं, आपस में झगड़ते हैं। एक-दूसरे की बुराई करते हैं जबकि हम सभी परमात्मा का ही अंश हैं तथा उनसे विलग नहीं है। जब ऐसा है कि हम सभी एक ही स्रोत से आये हैं तो हमें आपस में द्वेष व ईर्ष्या नहीं रखनी चाहिये।
मुख्य बिन्दु 
हमें यह समझना चाहिये कि ईश्वर ने हमें स्वयं का ही अंश या भाग समझकर संसार में कुछ समय बिताने के लिये भेजा है तथा वे हमसे जो कार्य करवाना चाहते हैं, हम अपना सम्पूर्ण ध्यान केन्द्रित करके वही कार्य पूर्ण करने में लग जायें।

"जीवभूत: सनातन:" अर्थात् आत्मा सनातन है।
आत्मा का चिरस्थायी अस्तित्व 
दो शब्द हैं -
पुरातन तथा सनातन

पुरातन का अर्थ है अति प्राचीन

सनातन का अर्थ है जिसका न कोई आदि हो न अन्त हो। (neither starting & nor ending)

जिसका न जन्म हुआ और न ही जिसका अन्त होता है।

प्रश्न- आप अपना जन्मदिवस अपने शरीर का मनाते हैं या आत्मा का ?

उत्तर- अधिकतर बच्चों ने उत्तर दिया - शरीर का।
सभी की प्रशंसा की गयी।

आत्मा का कोई जन्म नहीं होता है और न यह कभी मरती है अर्थात मृत्यु भी नहीं होती। 

शरीर जन्म लेता है और उसी की मृत्यु होती है इसीलिये आत्मा सनातन है।

इसलिये हमारी आत्मा हमारे मन तथा इन्द्रियों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

15.8

शरीरं(य्ँ) यदवाप्नोति, यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति, वायुर्गन्धानिवाशयात्॥15.8॥

जैसे वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को (ग्रहण करके ले जाती है), ऐसे ही शरीरादि का स्वामी बना हुआ जीवात्मा भी जिस शरीर को छोड़ता है, (वहाँ से) इन (मन सहित इन्द्रियों) को ग्रहण करके फिर जिस (शरीर) को प्राप्त होता है, (उसमें) चला जाता है।

विवेचन- हम सभी को यात्रा (travelling) करना बहुत अच्छा लगता है।

प्रश्न
- हम सब कैसे-कैसे यात्रा करते हैं?

उत्तर- हम सब रेलगाड़ी, वायुयान, रिक्शा अथवा पैदल भी यात्रा करते हैं।

हमारी आत्मा भी यात्रा करती है।

मान लीजिये आप किसी उपवन (Garden) में जाते हैं, जहाॅं बहुत सारे गुलाब के पौधे लगे हुये हैं। अन्य फूलों के पौधे भी हैं। सभी फूलों की सुगन्ध उस स्थान को सुगन्धित करती रहती है। वह स्थान तो सुगन्धित होता ही है साथ ही थोड़ी दूर आगे तक भी उस सुगन्ध से वातावरण परिपूर्ण रहता है।

यह वायु की उपस्थिति (Presence of Air) के कारण होता है। इसी प्रकार से हमारी आत्मा जब एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है तब वह हमारे अच्छे विचार, अच्छे कर्म सब कुछ नये शरीर में लेकर चली जाती है।

यदि हम बुरे तथा अनुचित कर्म करेंगे तो नये शरीर में भी वे कर्म स्थानान्तरित (transfer) हो जायेंगे। इस प्रकार हमारे पाप बढ़ते जायेंगे। पाप बढ़ने से हम तिर्यक (कीट आदि) योनि में चले जायेंगे

मान लीजिये कोई कीड़े-मकोड़े बन गया तो कोई एक बार झाड़ू लगायेगा और कीड़ा उसी से साफ हो गया। उसका जीवन समाप्त हो गया।

मनुष्य एवं देव योनियों का महत्व 

छोटे जीवों को अपने जीवन के लिये बहुत सङ्घर्ष करना पड़ता है। उनका जीवन अत्यन्त सहजता से समाप्त किया जा सकता है। इसके विपरीत देव अथवा मनुष्य योनि में कम से कम हम अपनी इच्छानुसार जीवनयापन कर सकते हैं।

मनुष्य योनि एकमात्र योनि है जिसमें हम अपनी इच्छानुसार रह सकते हैं, खा सकते हैं और मनचाहे कार्य कर सकते हैं। यदि हम अच्छे कार्य करेंगे तो हमारे पुण्यों का भाग या अंश बढ़़ जायेगा तथा अगले जन्म में भी हमें अच्छा जीवन मिलेगा।

यदि पाप का अंश अधिक हुआ तो अगले जन्म में तिर्यक योनि प्राप्त होगी।

हमारी आत्मा साथ में क्या लेकर जाती है?  हमारे कर्म तथा हमारे विचार
इसीलिये लोग आध्यात्मिक बनना चाहते हैं।

15.9

श्रोत्रं(ञ्) चक्षुः(स्) स्पर्शनं(ञ्) च, रसनं(ङ्) घ्राणमेव च।
अधिष्ठाय मनश्चायं(व्ँ), विषयानुपसेवते॥15.9॥

यह (जीवात्मा) मन का आश्रय लेकर ही श्रोत्र और नेत्र तथा त्वचा, रसना और घ्राण –(इन पाँचों इन्द्रियों के द्वारा) विषयों का सेवन करता है।

विवेचन - इस श्लोक में श्रीभगवान् बताते हैं कि आत्मा बाह्य जगत से हमारी इन्द्रियों द्वारा जो कुछ भी प्राप्त कर रही है वह मन की सहायता से ही प्राप्त कर पाती है।
मान लीजिये कभी हमसे पूछा गया कि अभी-अभी काले रङ्ग की पोशाक में एक बालक गया, आपने उसे देखा क्या? तो आप कहते हैं, नहीं। यद्यपि आपने उसे देखा होता है फिर भी हमारा मन, उस बालक की ओर न होने से हमारा ध्यान उसकी ओर आकर्षित नहीं हुआ।
मन की एकाग्रता-- ध्यान 

कई बार ऐसा होता है कि हमने किसी ओर देखा, कुछ सुना किन्तु हमारा मन उस वस्तु या व्यक्ति की ओर आकर्षित न होने के कारण या हमारी इन्द्रियों का आकर्षण उसकी ओर न होने के कारण हम वहाँ ध्यान नहीं दे पाते हैं। ऐसा करने के लिये हमारी इन्द्रियों को हमारे मन के आधार (Support) की आवश्यकता होती है।

इसी कारण आपसे मन लगाकर पढ़ाई करने के लिये कहा जाता है क्योंकि यदि आपका मन पढ़ाई में नहीं होगा तथा आप मात्र नेत्रों से पुस्तक की ओर देखते रहेंगे तो पढ़ाई आपको समझ में नहीं आयेगी।

सभी बातों ग्रहण करने  के लिये मन का आधार आवश्यक है तथा इसके लिये हमारी सारी ज्ञानेन्द्रियाँ हमारे मन से जुड़ी हुई होनी चाहिये ।

इन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा ही हम विषयों का सेवन करते हैं।
ज्ञानेन्द्रियाँ तथा उनके विषय 

विषयों का अर्थ है जैसे नेत्रों के द्वारा हम देखते हैं। हम अपने नेत्रों का उपयोग क्या देखने के लिये करते है? यह हम पर निर्भर करता है। हम टीवी देखते हैं, यू ट्यूब देखते हैं, हम उपवन (Garden) देखते हैं या ईश्वर की छवि को देखते हैं।
कान का विषय है सुनना। कानों के द्वारा सुनना हमें अच्छा लगता है।

हमारे कानों का कार्य है सुनना, नेत्रों का कार्य है देखना, इसी प्रकार हमारी जिह्वा का कार्य है स्वाद चखना तथा त्वचा का कार्य है स्पर्श करना।
ये सारे कार्य मन के आधार से इन्द्रियों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं।

विशेष बिन्दु 
कई बार कक्षा में हमारी शिक्षिका जी पढ़ाने के बाद हमसे पूछती हैं कि उन्होंने क्या पढ़ाया?
यदि हम बैठे वहीं थे किन्तु हमारा मन कहीं और चला गया था तो शिक्षिका जी ने क्या पढ़ाया, यह हम नहीं बता सकेंगे। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारा सम्पूर्ण शरीर वहाँ होने पर भी यदि हमारा मन कुछ और सोच रहा था तो हमारे वहाँ होने न होने का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

हमारे गुरु यह बात अच्छी तरह से समझते हैं इसीलिये वे उसी व्यक्ति से पूछते हैं जिसके लिये उन्हें लगता है कि वह वहाॅं मन से उपस्थित नहीं था।

ऐसा बहुधा सभी के साथ होता है। जो बच्चे पढ़ाया हुआ, पाठ एक बार में समझ रहे हैं, उसका अर्थ है कि वे मन तथा शरीर दोनों से कक्षा में उपस्थित थे। वे कुछ और नहीं सोच रहे थे। इसीलिये जो भी कार्य करें वह मन लगाकर करें। जब हम मन लगाकर कार्य करेंगे तो उसके परिणाम भी उतने ही अच्छे आयेंगे।

15.10

उत्क्रामन्तं(म्) स्थितं(व्ँ) वापि, भुञ्जानं(व्ँ) वा गुणान्वितम्।
विमूढा नानुपश्यन्ति, पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥15.10॥

शरीर को छोड़कर जाते हुए या दूसरे शरीर में स्थित हुए अथवा विषयों को भोगते हुए भी गुणों से युक्त (जीवात्मा के स्वरूप) को मूढ़ मनुष्य नहीं जानते, ज्ञानरूपी नेत्रोंवाले (ज्ञानी मनुष्य ही) जानते हैं

विवेचन- इस श्लोक में यह बताया जा रहा है कि आत्मा क्या होती है? यह बात या यह विषय, अज्ञानी या मूढ़ व्यक्ति नहीं समझ पाते हैं। यह समझने के लिए हमारे पास आध्यात्मिक शक्ति (divine power) होनी चाहिए परन्तु वह कैसे प्राप्त होगी?
आध्यात्मिक शक्ति - आत्मा को जानने का साधन 

आध्यात्मिक शक्ति, ऊर्जा या ज्ञान हमें अच्छे कर्म करने से प्राप्त होते हैं जिससे कि हमें दिव्य-चक्षु प्राप्त हों। विज्ञान तो सभी पढ़ते हैं पर क्या सभी लोग आविष्कार कर पाते हैं? बल्ब तो एक ही व्यक्ति बना सका क्योंकि उनके ज्ञान-चक्षु खुल गए थे।
अर्जुन - दैवीय प्रवृत्ति 
 जब हम सात्त्विक कर्म करेंगे तो हमारी दैवीय शक्ति जागृत हो जाएगी। अर्जुन जैसा बनने के लिए हमें थोड़ा प्रयास तो करना ही पड़ेगा।

यह कहानी तो आप सभी ने सुनी होगी कि जब द्रोणाचार्य जी ने अपने शिष्यों- कौरवों और पाण्डवों से पूछा कि “तुम्हें पेड़ पर क्या दिख रहा है?” किसी ने उत्तर दिया कि पेड़ दिख रहे हैं, किसी ने कहा कि पहाड़ दिख रहे हैं, किसी ने कहा वृक्ष की शाखाएँ दिख रही हैं, किसी ने कहा कि पत्तियाँ दिख रही हैं लेकिन जब अर्जुन की बारी आती है और उनसे पूछा जाता है कि “तुम्हें पेड़ पर क्या दिखाई दे रहा है?” तो अर्जुन उत्तर देते हैं, “मुझे तो केवल चिड़िया की आँख ही दिखाई दे रही है।” वहीं पर तो निशाना साधना था क्योंकि अर्जुन की एकाग्र क्षमता और दैवीय शक्ति (Concentration and divine power) बहुत अधिक है।

अज्ञानी मनुष्य या मूढ़ मनुष्यों को उनका लक्ष्य पता नहीं होता, इसलिए वे भटकते रहते हैं। जब हम प्रतिदिन श्रीमद्भगवतगीता जी का अध्ययन करेंगे तो हमारे ज्ञान-चक्षु खुल सकते हैं। जो बातें श्रीमद्भगवतगीता जी में बताई गई हैं, उन्हें थोड़ा-थोड़ा जीवन में लाने का प्रयास करेंगे तो फिर

हम अपने लक्ष्य से नहीं भटकेंगे।

15.11

यतन्तो योगिनश्चैनं(म्), पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो,नैनं(म्) पश्यन्त्यचेतसः।।11।।

यत्न करने वाले योगी लोग अपने आप में स्थित इस परमात्म तत्त्व का अनुभव करते हैं। परन्तु जिन्होंने अपना अन्तःकरण शुद्ध नहीं किया है, (ऐसे) अविवेकी मनुष्य यत्न करने पर भी इस तत्त्व का अनुभव नहीं करते।

विवेचन- इस श्लोक में यह बताया जा रहा है कि बहुत से मनुष्य प्रयास करते हैं कि वह भी अर्जुन जैसे बन जाएँ। सभी अर्जुन जैसे नहीं बन पाते। योगी बन जाएँ, एकाग्रचित हो जाएँ, अच्छे कार्य करें। एक व्यक्ति अर्जुन जैसा बन पाता है, दूसरा व्यक्ति अर्जुन जैसा नहीं बन पाता, यह अन्तर क्यों होता है?

हमें दूसरों की सफलता (success) या उन्नति (progress) से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। हमें आगे बढ़ना है तो हमें स्वयं के प्रयास से आगे बढ़ना या उन्नति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।

अर्जुन जैसा बनने के लक्षण 

हमें किसी से भी अपनी तुलना नहीं करनी चाहिए। जो व्यक्ति अर्जुन जैसे बन पाते हैं, वह इसलिए कि उनका मन पवित्र, शुद्ध है, वे किसी की आलोचना नहीं करते, वे किसी से ईर्ष्या नहीं करते, किसी के प्रति बुरा व्यवहार या भाव नहीं रखते। मन को साफ, शुद्ध, पवित्र करने के लिए अच्छे-अच्छे कार्य करने पड़ते हैं, ध्यान करना पड़ता है, स्वाध्याय करना पड़ता है।

15.12

यदादित्यगतं(न्) तेजो, जगद्भासयतेऽखिलम्।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ,तत्तेजो विद्धि मामकम्।।12।।

सूर्य को प्राप्त हुआ जो तेज सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है (और) जो तेज चन्द्रमा में है तथा जो तेज अग्नि में है, उस तेज को मेरा ही जान।

विवेचन -     
परमात्मा की शक्तियाँ 

इस श्लोक में हम श्रीभगवान् की शक्तियों के बारे में जानेंगे। यहाँ पर श्रीभगवान् बता रहे हैं कि सूर्य के पास जो तेज है, चन्द्रमा के पास जो शीतलता है, अग्नि के पास जो तेज है, दाहकता है, ऊर्जा, शक्ति आदि है, वह सब परमात्मा के द्वारा ही प्रदत्त है।

15.13

गामाविश्य च भूतानि, धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः(स्) सर्वाः(स्), सोमो भूत्वा रसात्मकः।।13।।

मैं ही पृथ्वी में प्रविष्ट होकर अपनी शक्ति से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ और (मैं ही) रस स्वरूप चन्द्रमा होकर समस्त ओषधियों (वनस्पतियों) को पुष्ट करता हूँ।

विवेचन- हम जानते हैं कि यह पृथ्वी अपनी धुरी पर परिक्रमा करती है (Earth rotates on its own orbit.) यह कैसे सम्भव होता है? पृथ्वी कभी गिरती नहीं है, वह सन्तुलित (balanced) रहती है। वनस्पति तथा औषधि आदि भी सब उस परमपिता परमात्मा की शक्ति से ही निर्मित होते हैं।

15.14

अहं(व्ँ) वैश्वानरो भूत्वा, प्राणिनां(न्) देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः(फ्), पचाम्यन्नं(ञ्) चतुर्विधम्॥15.14॥

प्राणियों के शरीर में रहने वाला मैं प्राण-अपान से युक्त वैश्वानर (जठराग्नि) होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।

विवेचन- बच्चों से प्रश्न पूछा गया -
प्रश्न- कितने प्रकार की अग्नि होती है?
विकल्प दिए गए - दो, तीन, चार पाँच।
उत्तर- प्रमुख अग्नि तीन प्रकार की होती है-

  • वैश्वानर अग्नि,
  • वड़वानल अग्नि,
  • दावानल अग्नि,

वड़वानल- जो समुद्र में अग्नि होती है उसे वड़वानल अग्नि कहते हैं।
दावानल- जो अग्नि जङ्गल में लगती है उसे दावानल कहते हैं।
वैश्वानर- जो अग्नि उदर (stomach) में होती है, भोजन पचाने के काम आती है, उसे वैश्वानर कहते हैं। जब हमें भूख लगती है तो हम कहते हैं न कि पेट में आग लग रही है, वह इसी कारण से कहते हैं।

यहाँ श्रीभगवान् बता रहे हैं कि “जो पेट में वैश्वनर अग्नि है, वह मैं ही हूँ।”

चार प्रकार के भोजन होते हैं- चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले। उन्हें पचाने के लिए वैश्वानर अग्नि का प्रयोग होता है।

15.15

सर्वस्य चाहं(म्) हृदि सन्निविष्टो, मत्तः(स्) स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं(ञ्) च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो, वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15।।

मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ तथा मुझसे (ही) स्मृति, ज्ञान और अपोहन (संशय आदि दोषों का नाश) होता है। सम्पूर्ण वेदों के द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ। वेदों के तत्त्व का निर्णय करने वाला और वेदों को जानने वाला भी मैं (ही हूँ)।

विवेचन-
कण-कण में ईश्वर 
श्रीभगवान् कहते हैं कि “मैं सभी प्राणियों के ह्रदय या दिल में निवास करता हूँ।”

श्रीभगवान् कह रहे हैं कि “जो तुम्हारी स्मरणशक्ति है, जो तुम्हारी भूलने की क्षमता है, वह भी मेरे कारण ही है।”

अपोहन का अर्थ है अर्थात् भूलने की क्षमता

अगर यह क्षमता नहीं होती तो बड़ी कठिनाई हो जाती। फिर हम कोई भी ऐसी घटना या बात, जो हमें बुरी लगी, भूल नहीं पाते। हम परेशान होते रहते। यह अपोहन शक्ति ही हमें भूलने में मदद करती है। इसी कारण हमें, हमारे पूर्वजन्म की कोई भी बातें याद नहीं रहतीं। सोचिए कि यदि यह अपोहन की शक्ति न होती, हमें सब कुछ याद होता और इस जन्म में हमें याद आता कि हम पूर्वजन्म में तो सामने वाले घर में रहते थे, तो सब कुछ उलट-पुलट (mismanage) हो जाता। कुछ भी व्यवस्थित नहीं रहता। हम पूर्वजन्म के मित्रों, रिश्तेदारों की ओर जाते क्योंकि उनके साथ हमारा ज्यादा समय व्यतीत हुआ था। इसलिए भूलने की शक्ति बहुत आवश्यक है।

वेद-पुराण उपनिषदों में जो भी कहा गया है, वह सब परमपिता परमात्मा के विषय में ही कहा गया है। उन सभी में यही बात बताई गई है कि भगवद् तत्त्व क्या है? उन्हें कैसे प्राप्त किया जा सकता है? उन्हें कैसे जाना जा सकता है? उपरोक्त सभी ग्रन्थों में श्रीभगवान् के विषय में ही बताया गया है।

15.16

द्वाविमौ पुरुषौ लोके, क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः(स्) सर्वाणि भूतानि, कूटस्थोऽक्षर उच्यते।।16।।

इस संसार में क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) – ये दो प्रकार के ही पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर क्षर और जीवात्मा अक्षर कहा जाता है।

विवेचन- यहाँ बताया जा रहा है कि संसार में दो तरह के तत्त्व होते हैं-
क्षर तथा अक्षर
  • क्षर का अर्थ है, जिसे नष्ट (destroy) किया जा सकता है।
  • अक्षर का अर्थ है, जिसे नष्ट नहीं किया जा सकता है।
हमारा शरीर क्षर है। मृत्यु के बाद शरीर को जला कर नष्ट कर दिया जाता है।

हमारी आत्मा अक्षर है, जिसे नष्ट नहीं कर सकते। आत्मा अक्षर, शाश्वत तथा सनातन है। अक्षर की कोई जन्म तिथि नहीं होती, न ही इसका कोई अन्त होता है। हमने सातवें श्लोक में देखा था कि यह हमेशा थी और हमेशा रहेगी। इसलिये उसे सनातन कहते हैं।

15.17

उत्तमः(फ्) पुरुषस्त्वन्यः(फ्), परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य, बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।।17।।

उत्तम पुरुष तो अन्य (विलक्षण) ही है, जो ‘परमात्मा’– इस नाम से कहा गया है। (वही) अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर (सबका) भरण-पोषण करता है।

विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् कह रहे हैं कि “हम, पुरुषों में उत्तम जिस उत्तम-पुरुष की बात कर रहे हैं, वे तो कोई अन्य ही हैं। वह उत्तम पुरुष मैं ही हूँ।”

ईश्वर को जानना 
  • वे कैसे दिखते हैं?
  • उनकी क्या शक्तियाँ हैं?
यह हम स्तर चार (Level 4) में जाएँगे, तब अध्याय ग्यारह में पढ़ेंगे। तब हमें पता चलेगा कि पुरुषोत्तम कौन हैं और वे पुरुषों में उत्तम क्यों हैं? क्योंकि श्रीभगवान् क्षर तथा अक्षर, दोनों से श्रेष्ठ (supreme) हैं और उनके पास बहुत सारी दैवीय शक्तियाँ (divine powers) हैं।

15.18

यस्मात्क्षरमतीतोऽहम्, अक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च, प्रथितः(फ्) पुरुषोत्तमः।।18।।

कारण कि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इसलिये लोक में और वेद में ‘पुरुषोत्तम’ (नाम से) प्रसिद्ध हूँ।

विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् कह रहे हैं कि “क्योंकि मैं क्षर (body) और अक्षर (soul) से श्रेष्ठ हूँ, इसलिए मैं पुरुषों में उत्तम हूँ।”

सभी वेदों आदि में श्रीभगवान् का ही वर्णन मिलता है। इसीलिए उन्हें पुरुषोत्तम कहा जाता है।

15.19

यो मामेवमसम्मूढो, जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां(म्),सर्वभावेन भारत।।19।।

हे भरतवंशी अर्जुन ! इस प्रकार जो मोह रहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।

विवेचन-
ज्ञान रूपी नेत्रों द्वारा ईश्वर के दिव्य दर्शन 

यहाँ श्रीभगवान् कह रहे हैं कि जो ज्ञानी व्यक्ति मुझे पुरुषोत्तम के रूप में जानते हैं, वे सब मेरा ही भजन, मेरी ही पूजा करते हैं।”

यदि हम श्रीभगवान् पर, उनके अस्तित्व पर विश्वास करते हैं कि “हाँ! श्रीभगवान् हैं”, तो यह भी श्रीभगवान् का भजन ही है। हमने देखा है कि कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो श्रीभगवान् को नहीं मानते हैं। वे कहते हैं कि “श्रीभगवान् क्या होते हैं? दिखाओ, कहाँ हैं?” हमें ऐसा नहीं कहना चाहिए।

15.20

इति गुह्यतमं(म्) शास्त्रम्, इदमुक्तं(म्) मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्, कृतकृत्यश्च भारत।।20।।

हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर (मनुष्य) ज्ञानवान् (ज्ञात-ज्ञातव्य) (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि “अगर आप बुद्धिमान (intelligent) बनना चाहते हैं तो आपको कुछ जानना पड़ेगा। इस अत्यन्त गोपनीय (top secret) शास्त्र को जानकर आप बुद्धिमान बन जाएँगे।”

अत्यन्त गोपनीय (top secret) क्या होता है?

जो बात हम किसी को बताते नहीं हैं। हमारी भी बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो हम सबको नहीं बताते।
श्रीभगवान् कहते हैं कि “अर्जुन! मैंने यह केवल तुम्हें ही बताया है क्योंकि तुम मेरे बहुत निकट के (close) मित्र हो और मुझे बहुत प्रिय (favourite) हो। तुम कभी कोई पाप नहीं करते हो। तुम हमेशा अच्छे काम करते हो।”
अर्जुन हेतु अनघ सम्बोधन 

अनघ का अर्थ है- जो पाप नहीं करता। इस ज्ञान को जो थोड़ा भी समझ लेता है, वह बुद्धिमान हो जाता है।

हमें भी यदि बुद्धिमान बनना है तो हम ऐसे ही श्रीमद्भगवतगीता जी पढ़ते रहें, पढ़ाते रहें और अपने जीवन में उसे अपनाने का प्रयास करते रहें।

बच्चों से एक प्रश्न पूछा गया -
प्रश्न- पन्द्रहवें अध्याय का नाम क्या है?
विकल्प दिये गये- पुरुषोत्तमयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, साङ्ख्ययोग।
उत्तर- सत्तानवे प्रतिशत (97%) बच्चों ने सही उत्तर बताया।

इस अध्याय का नाम पुरुषोत्तमयोग है। सभी बच्चों का करतल ध्वनि से उत्साह बढ़ाया गया।

इसी के साथ आज का विवेचन सत्र सम्पन्न हुआ तथा प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।

विचार-मन्थन


प्रश्नकर्ता- कृष्णा अग्रवाल
प्रश्न- जब हम भजन आदि सुनते हैं तथा श्लोक का उच्चारण करते हैं तब कभी-कभी पूर्ण रूप से न आने पर भी हम उसे बोलते हैं। क्या ऐसा करना उचित है?
उत्तर- जी, पूर्णत: उचित है। यदि आपको कोई भजन या श्लोक पूर्ण रूप से कण्ठस्थ नहीं है तब भी आप उसे बोल सकते हो तथा ऐसा करने से कोई पाप नहीं लगता है। यह तो आप के लिए अच्छा ही होगा क्योंकि धीरे-धीरे वह भजन आपको कण्ठस्थ हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता- कृष्णा अग्रवाल
प्रश्न- श्रीमद्भगवद्गीता जी को किस प्रकार से कण्ठस्थ कर सकते हैं?
उत्तर- आप जब कक्षा के अगले स्तर में जाते हैं तब आपको श्रीमद्भगवद्गीता जी के कण्ठस्थीकरण हेतु अनेक विधियाँ बताई जाती हैं, जिनका अनुसरण का आप श्रीमद्भगवद्गीता जी को पूर्णत: कण्ठस्थ कर सकते हो। आप निरन्तर अभ्यास द्वारा भी श्लोकों कण्ठस्थ कर सकते हैं।

प्रश्नकर्ता- आशी दीदी
प्रश्न- श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता जी में अर्जुन को पृथक-पृथक नाम से क्यों सम्बोधित करते हैं?
उत्तर- अर्जुन के भिन्न-भिन्न नाम उनके द्वारा अर्जित वे उपाधियाँ हैं जो उन्होंने विशिष्ट कार्यों को सम्पन्न कर प्राप्त की हैं। श्रीभगवान् का अर्जुन को विभिन्न नामों से बुलाया जाना या तो उनके द्वारा उच्चारित श्रीमद्भगवद्गीता जी के उस श्लोक की आवश्यकता थी या वे यह प्रेमवश करते हैं परन्तु हमारे वैदिक शास्त्रों अर्थात महाभारत आदि में भी यही प्रचलन रहा है कि व्यक्ति विशेष (अर्जुन) को उनके प्राप्त विभिन्न नामों जैसे कुन्तीपुत्र, अनघ, पार्थ, आर्यश्रेष्ठ आदि से पुकारा गया है।

ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्याय:॥

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘पुरूषोत्तमयोग’ नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।