विवेचन सारांश
ईश्वर प्राप्ति के मार्ग
आज का सत्र प्रार्थना की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए, पारम्परिक प्रार्थना दीप प्रज्वलन और श्रीनृसिंह जयन्ती की शुभकामनाओं के साथ प्रारम्भ हुआ। बालकों से उनकी कुशल क्षेम पूछी गई, अधिकांश बालक बहुत खुश हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग है, जिसमें अर्जुन की युद्ध भूमि में अपने स्वजन को विरोधी पक्ष में देखकर हुई घबराहट का वर्णन है। अर्जुन की यह मन:स्थिति देखकर श्रीकृष्ण उन्हें वैसे ही समझाने लगते हैं, जैसे हमारे माता-पिता हमें समझाते हैं। अर्जुन अपनी दशा बताते हुए ऐसा दर्शाते हैं जैसे वे बहुत कुछ जानते हों।
दूसरे अध्याय साङ्ख्ययोग के सातवें श्लोक मेँ अर्जुन अपनी कमी समझ लेते हैं और श्रीभगवान को पूरी तरह समर्पित हो जाते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय अर्जुनविषादयोग है, जिसमें अर्जुन की युद्ध भूमि में अपने स्वजन को विरोधी पक्ष में देखकर हुई घबराहट का वर्णन है। अर्जुन की यह मन:स्थिति देखकर श्रीकृष्ण उन्हें वैसे ही समझाने लगते हैं, जैसे हमारे माता-पिता हमें समझाते हैं। अर्जुन अपनी दशा बताते हुए ऐसा दर्शाते हैं जैसे वे बहुत कुछ जानते हों।
दूसरे अध्याय साङ्ख्ययोग के सातवें श्लोक मेँ अर्जुन अपनी कमी समझ लेते हैं और श्रीभगवान को पूरी तरह समर्पित हो जाते हैं।
कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:,
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़चेता:।
यच्छ्रेयं स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे,
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वांप्रपन्नम्।।2.7।।
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढ़चेता:।
यच्छ्रेयं स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे,
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वांप्रपन्नम्।।2.7।।
अर्जुन श्रीकृष्ण का शिष्यत्व स्वीकार कर उनसे प्रार्थना करते हैं कि वही बताएँ कि उनके लिए क्या श्रेष्ठ है? यहीं से भगवद्गीता प्रारम्भ होती है।
संन्यास लेना या समस्याओं से दूर भागना उस समस्या का समाधान नहीं होता। विद्यार्थी यदि परीक्षा के समय कहे कि उसे परीक्षा नहीं देनी है तो इससे उसकी हानि ही होगी। अर्जुन भी युद्ध भूमि छोड़कर संन्यास लेना चाहते थे और वे राजपाठ भी नहीं चाहते थे। तब श्रीकृष्ण तीसरे अध्याय में कर्मयोग के माध्यम से निष्काम कर्म का महत्त्व बताते हैं।
कर्म हम सभी कर रहे हैं किन्तु राग, द्वेष, क्रोध और मोह के बिना किए जाने वाले कर्म निष्काम कर्म हैं और यही कर्मयोग है। हम जो कुछ भी कर रहे हैं श्रीभगवान के लिए कर रहे हैं यह भाव जब मन में आ जाता है तो ज्ञान प्राप्त होता है और परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग सरल हो जाता है।
चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग है, जिसमें ज्ञानी किस प्रकार के कर्म करता है यह समझाया गया है।
कर्म, अकर्म और विकर्म की चर्चा भी की गई है। ज्ञानी का अर्थ है तत्त्व ज्ञानी, परमात्म तत्त्व को जानने वाला।
एक सामान्य मनुष्य जो ज्ञानी नहीं है, वह यदि परमात्मा को प्राप्त करना चाहे तो उसके कर्म कैसे होने चाहिए?
यही बात पाँचवे अध्याय में कही गई है जिसे कर्म संन्यास योग कहा जाता है।
संन्यास लेना या समस्याओं से दूर भागना उस समस्या का समाधान नहीं होता। विद्यार्थी यदि परीक्षा के समय कहे कि उसे परीक्षा नहीं देनी है तो इससे उसकी हानि ही होगी। अर्जुन भी युद्ध भूमि छोड़कर संन्यास लेना चाहते थे और वे राजपाठ भी नहीं चाहते थे। तब श्रीकृष्ण तीसरे अध्याय में कर्मयोग के माध्यम से निष्काम कर्म का महत्त्व बताते हैं।
कर्म हम सभी कर रहे हैं किन्तु राग, द्वेष, क्रोध और मोह के बिना किए जाने वाले कर्म निष्काम कर्म हैं और यही कर्मयोग है। हम जो कुछ भी कर रहे हैं श्रीभगवान के लिए कर रहे हैं यह भाव जब मन में आ जाता है तो ज्ञान प्राप्त होता है और परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग सरल हो जाता है।
चौथा अध्याय ज्ञानकर्मसंन्यासयोग है, जिसमें ज्ञानी किस प्रकार के कर्म करता है यह समझाया गया है।
कर्म, अकर्म और विकर्म की चर्चा भी की गई है। ज्ञानी का अर्थ है तत्त्व ज्ञानी, परमात्म तत्त्व को जानने वाला।
एक सामान्य मनुष्य जो ज्ञानी नहीं है, वह यदि परमात्मा को प्राप्त करना चाहे तो उसके कर्म कैसे होने चाहिए?
यही बात पाँचवे अध्याय में कही गई है जिसे कर्म संन्यास योग कहा जाता है।
5.1
अर्जुन उवाच सन्न्यासं(ङ्) कर्मणां(ङ्) कृष्ण, पुनर्योगं(ञ्) च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं(न्), तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥5.1॥
अर्जुन बोले - हे कृष्ण ! (आप) कर्मों का स्वरूप से त्याग करने की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। (अतः) इन दोनों साधनों में जो एक निश्चित रूप से कल्याण कारक हो ,उसको मेरे लिये कहिये।
विवेचन- श्रीभगवान ने दूसरे और चौथे अध्याय में संन्यासयोग की चर्चा की और उसे भगवत् प्राप्ति का मार्ग कहा। फिर तीसरे अध्याय में कर्मयोग को साङ्ख्य या ज्ञानयोग से श्रेष्ठ बताते हैं, इस कारण अर्जुन दुविधा में पड़ गए कि उन्हें संन्यासी बनना चाहिए या कर्मयोगी? इन दोनों में उनके लिए कौन सा मार्ग श्रेष्ठ है जिससे सबका कल्याण भी हो?
संन्यासी कौन है?
गेरुआ वस्त्र पहनकर, गले में तुलसी या रुद्राक्ष की माला धारण कर जूड़ा बनाकर तिलक लगाने से ही कोई संन्यासी नहीं हो जाता। मात्र वेशभूषा संन्यासी की हो और मन में बुरे विचार हों, स्वार्थ हो तो वह संन्यासी नहीं हो सकता।
सच्चे संन्यासी का मन निर्मल होता है, उसके मन में कोई विकार जैसे राग, द्वेष और क्रोध नहीं होता और श्रीभगवान की प्राप्ति ही उनका लक्ष्य होता है।
संन्यासी कौन है?
गेरुआ वस्त्र पहनकर, गले में तुलसी या रुद्राक्ष की माला धारण कर जूड़ा बनाकर तिलक लगाने से ही कोई संन्यासी नहीं हो जाता। मात्र वेशभूषा संन्यासी की हो और मन में बुरे विचार हों, स्वार्थ हो तो वह संन्यासी नहीं हो सकता।
सच्चे संन्यासी का मन निर्मल होता है, उसके मन में कोई विकार जैसे राग, द्वेष और क्रोध नहीं होता और श्रीभगवान की प्राप्ति ही उनका लक्ष्य होता है।
श्रीभगवानुवाच सन्न्यासः(ख्) कर्मयोगश्च, निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्, कर्मयोगो विशिष्यते॥5.2॥
श्रीभगवान् बोले - संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करने वाले हैं। परन्तु उन दोनों में (भी) कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग) से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
विवेचन- साङ्ख्ययोग और कर्मयोग दोनों ही कल्याणकारी हैं। मार्ग दो हैं परन्तु उनका गन्तव्य (destination) एक ही है, ज्ञान और श्रीभगवान, किन्तु कर्मयोग अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सरल है। अचानक सब कुछ छोडकर संन्यास नहीं ले सकते।
एक बालक की शिक्षा यात्रा बाल मन्दिर से ही प्रारम्भ होती है फिर LKG, UKG से होते हुए दसवीं कक्षा तक एक क्रम से पढ़ते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं।
गीता परिवार की कक्षाओं में बारहवें अध्याय से शुरुआत होती है और फिर धीरे-धीरे बड़े और कठिन अध्याय सीखते हैं। बारहवाँ अध्याय छोटा और सरल है। ऐसे ही साङ्ख्य या ज्ञान तक पहुँचने के लिए पहले कर्मयोग से शुरू करना होगा।
साङ्ख्ययोग में मन में श्रीभगवान के अलावा कुछ नहीं होता, मैं और मेरा की भावना नहीं होती।
कर्मयोग अभ्यास से आता है, हमारी बुरी आदतें भी अभ्यास से ही छूटती हैं। यदि कोई पढ़ाई के समय खेलने जाता है तो यह अच्छी आदत नहीं है और यह अभ्यास के साथ ही दूर होगी।
हमें स्वयं के लिए कर्म नहीं करना है, समाज और प्रकृति के कल्याण के लिए भी करना चाहिए। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी ये सब हमें कितना कुछ देते हैं, हम उनके लिए क्या करते हैं? हम अपने देश के लिए क्या करते हैं? किसी ने कितना सही कहा है-
एक बालक की शिक्षा यात्रा बाल मन्दिर से ही प्रारम्भ होती है फिर LKG, UKG से होते हुए दसवीं कक्षा तक एक क्रम से पढ़ते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं।
गीता परिवार की कक्षाओं में बारहवें अध्याय से शुरुआत होती है और फिर धीरे-धीरे बड़े और कठिन अध्याय सीखते हैं। बारहवाँ अध्याय छोटा और सरल है। ऐसे ही साङ्ख्य या ज्ञान तक पहुँचने के लिए पहले कर्मयोग से शुरू करना होगा।
साङ्ख्ययोग में मन में श्रीभगवान के अलावा कुछ नहीं होता, मैं और मेरा की भावना नहीं होती।
कर्मयोग अभ्यास से आता है, हमारी बुरी आदतें भी अभ्यास से ही छूटती हैं। यदि कोई पढ़ाई के समय खेलने जाता है तो यह अच्छी आदत नहीं है और यह अभ्यास के साथ ही दूर होगी।
हमें स्वयं के लिए कर्म नहीं करना है, समाज और प्रकृति के कल्याण के लिए भी करना चाहिए। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी ये सब हमें कितना कुछ देते हैं, हम उनके लिए क्या करते हैं? हम अपने देश के लिए क्या करते हैं? किसी ने कितना सही कहा है-
।।देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।।
हम तो पेड़-पौधों के फल, फूल और पत्ते तोड़कर उन्हें नुकसान ही पहुँचाते हैं। पशु और पक्षियों को भी सताते हैं।
ज्ञेयः(स्) स नित्यसन्न्यासी, यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो, सुखं(म्) बन्धात्प्रमुच्यते॥5.3॥
हे महाबाहो ! जो मनुष्य न (किसी से) द्वेष करता है (और) न (किसी की) आकांक्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझने योग्य है; क्योंकि द्वन्द्वों से रहित (मनुष्य) सुखपूर्वक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि सच्चा कर्मयोगी वही है जो किसी से द्वेष नहीं करता, किसी का बुरा नहीं सोचता, किसी से कुछ नहीं चाहता। ऐसे कर्मयोगी संन्यासी कहलाते हैं।
द्वेष क्यों होता है?
जब प्रतियोगिता की भावना मन में आती है तब द्वेष उत्पन्न होता है। यदि कोई अच्छा काम करता है, जैसे परीक्षा में अच्छे अङ्क लाता है तो हम उसकी प्रशंसा करने के बदले यह सोचते रह जाते हैं कि हमें उससे अच्छे अङ्क क्यों नहीं मिले? और इसलिए उससे ईर्ष्या करने लगते हैं।
हम सब श्रीभगवान के ही अंश हैं और जिस तरह समुद्र की बूँद समुद्र से मिलकर समुद्र ही कहलाती है, वैसे ही हम श्रीभगवान तक पहुँच उनसे एकत्व प्राप्त करते हैं।
कर्मयोगी बनना कितना सरल लगता है! किसी से द्वेष, क्रोध मत करो, मन में कोई इच्छा न रहे, बस बन गए कर्मयोगी! लेकिन यह इतना सरल भी नहीं है। द्वेष और क्रोध नहीं करना यह तो हो सकता है परन्तु आशाओं को कम करना कठिन तो है, अभ्यास से धीरे-धीरे लगाम कस सकते हैं।
एक सच्चे कर्मयोगी की कहानी सुनते हैं।
बाबा भारती का नाम कई लोगों ने सुना होगा। वे एक सन्त थे जो अपना घर छोड़कर एक मन्दिर में रहते थे। उन्होंने सब कुछ त्याग दिया था परन्तु उनके पास एक सुन्दर, सफेद घोड़ा था सुल्तान, जिसे वे नहीं छोड़ पाए थे। वह घोड़ा बहुत तेज दौड़ता था, स्वस्थ था, जो भी उसे देखता, उसकी प्रशंसा करता। जैसे जब कोई छोटा बच्चा गीताव्रती बन जाता है तो हम सब उसकी खूब प्रशंसा करते हैं, हमें आश्चर्य भी होता है।
उस मन्दिर के पास वन में एक खूँखार डाकू रहता था जिसका नाम खड़गसिंह था। यह मजेदार कविता तो सभी ने सुनी ही होगी-
हम सब श्रीभगवान के ही अंश हैं और जिस तरह समुद्र की बूँद समुद्र से मिलकर समुद्र ही कहलाती है, वैसे ही हम श्रीभगवान तक पहुँच उनसे एकत्व प्राप्त करते हैं।
कर्मयोगी बनना कितना सरल लगता है! किसी से द्वेष, क्रोध मत करो, मन में कोई इच्छा न रहे, बस बन गए कर्मयोगी! लेकिन यह इतना सरल भी नहीं है। द्वेष और क्रोध नहीं करना यह तो हो सकता है परन्तु आशाओं को कम करना कठिन तो है, अभ्यास से धीरे-धीरे लगाम कस सकते हैं।
एक सच्चे कर्मयोगी की कहानी सुनते हैं।
बाबा भारती का नाम कई लोगों ने सुना होगा। वे एक सन्त थे जो अपना घर छोड़कर एक मन्दिर में रहते थे। उन्होंने सब कुछ त्याग दिया था परन्तु उनके पास एक सुन्दर, सफेद घोड़ा था सुल्तान, जिसे वे नहीं छोड़ पाए थे। वह घोड़ा बहुत तेज दौड़ता था, स्वस्थ था, जो भी उसे देखता, उसकी प्रशंसा करता। जैसे जब कोई छोटा बच्चा गीताव्रती बन जाता है तो हम सब उसकी खूब प्रशंसा करते हैं, हमें आश्चर्य भी होता है।
उस मन्दिर के पास वन में एक खूँखार डाकू रहता था जिसका नाम खड़गसिंह था। यह मजेदार कविता तो सभी ने सुनी ही होगी-
खड़गसिंह के खड़कने से खड़कती हैं खिड़कियाँ,
खिड़कियों के खड़कने से खड़कता है खड़गसिंह
खड़गसिंह ने भी बाबाजी के सुल्तान की बात सुनी। वह उसे देखने बाबाजी के आश्रम गया और घोड़े को देखकर उसकी आँखें चुँधिया जाती हैं। उसे लगा कि इतना स्वस्थ और सुन्दर घोड़ा तो उसके पास होना चाहिए। वह डकैती में उसके बहुत काम भी आएगा। वह बाबाजी से कहता है कि वे सुल्तान को उसे दे दें। लेकिन बाबाजी उसे कहते हैं कि वह सुल्तान के सिवाय उनका सब कुछ ले सकता है, वे सुल्तान नहीं दे पाएँगे। इस पर खड्गसिंह उनसे कहता है कि एक दिन सुल्तान उसके पास होगा, वह उसे चुराकर ले जाएगा।
इस बात से बाबा भारती बहुत परेशान हो जाते हैं, सुल्तान की चिन्ता में वे ठीक से सो भी नहीं पाते थे। इस तरह कई महीने बीत गए लेकिन खड़गसिंह ने कोई हरकत नहीं की। अब बाबाजी थोड़े निश्चिन्त हो जाते हैं। एक दिन वे सुल्तान के साथ बाहर घूमने जाते हैं रास्ते में उन्हें कम्बल ओढ़े एक अपङ्ग मिलता है। वह बाबाजी से उसे पास के गाँव तक छोडने की विनती करता है। बाबाजी तो दयालु थे, वे उसे घोड़े पर बैठाकर चलने लगते हैं।
बाल साधकों की जिज्ञासा बनाए रखने के लिए उनसे पूछा गया कि कहानी में आगे क्या होता है? वह अपङ्ग कौन था?
सभी साधक पहचान जाते हैं कि वह अपाहिज खड़गसिंह ही था और वह उनका घोडा लेकर भाग गया। होता भी यही है, घोड़े पर बैठते ही वह अपङ्ग अपना कम्बल हटाता है और बाबाजी से कहता है कि देखिए, मैं हूँ और जैसा मैंने कहा था सुल्तान आज से मेरा है और घोड़ा भगाने लगता है। तब बाबाजी उसे रोक कर कहते हैं कि तुम सुल्तान को ले जाओ लेकिन किसी से यह मत कहना कि तुमने इसे कैसे चुराया है? क्योंकि लोगों का गरीब, अपङ्ग व्यक्ति से विश्वास उठ जाएगा और कोई भी उनकी मदद नहीं करेगा।
यह थी बाबा भारती जी की महानता। उन्हें अपना घोड़ा खोने का दुःख तो था, परन्तु वे क्रोध नहीं करते और समाज का भला चाहते थे। खड़गसिंह घोड़ा ले तो जाता है, लेकिन बाबाजी की बात का उस पर बहुत प्रभाव पड़ता है और वह अपने किए पर दुःखी होता है। एक दिन, रात को वह सुल्तान को वापस आश्रम में छोड़ जाता है।
इस कहानी से क्या सन्देश मिलता है?
यह कि हमें बाबा भारती जी की तरह ही मोह से दूर रहना है और दूसरों की भलाई के बारे में सोचना चाहिए। हमारे कर्मों से दूसरों को प्रेरणा मिलनी चाहिए।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः(फ्), प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः(स्) सम्यग्, उभयोर्विन्दते फलम्॥5.4॥
नासमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोग को अलग-अलग (फल वाले) कहते हैं, न कि पण्डितजन; (क्योंकि) (इन दोनों में से) एक साधन में भी अच्छी तरह से (स्थित) मनुष्य दोनों के फलरूप (परमात्मा को) प्राप्त कर लेता है।
विवेचन- श्रीभगवान आगे कहते हैं कि जो अज्ञानी होते हैं और जिनमें समझ नहीं होती वही साङ्ख्ययोग और कर्मयोग में अन्तर करते हैं।
ज्ञानी समझते हैं कि दोनों मार्ग अलग हैं, परन्तु उनका गन्तव्य एक ही है, दोनों ही हमें परमात्म तत्त्व तक पहुँचाते हैं।
जैसे नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे जाने के लिए हम नाव का उपयोग कर सकते हैं और तैर कर भी जा सकते हैं। तैरकर जाने में मेहनत और समय लगता है और नाव से जल्दी पहुँच सकते हैं। हम कह सकते हैं-
ज्ञानी समझते हैं कि दोनों मार्ग अलग हैं, परन्तु उनका गन्तव्य एक ही है, दोनों ही हमें परमात्म तत्त्व तक पहुँचाते हैं।
जैसे नदी के एक किनारे से दूसरे किनारे जाने के लिए हम नाव का उपयोग कर सकते हैं और तैर कर भी जा सकते हैं। तैरकर जाने में मेहनत और समय लगता है और नाव से जल्दी पहुँच सकते हैं। हम कह सकते हैं-
साङ्ख्ययोग तैरकर जाना है तथा कर्मयोग नाव से जाना है।
इस श्लोक में बाला शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है बालक जो अज्ञानी होते हैं, लेकिन हमारे बाल साधक तो गीता पढ़ रहे हैं तो वे अज्ञानी नहीं हैं।
यत्साङ्ख्यैः(फ्) प्राप्यते स्थानं(न्), तद्योगैरपि गम्यते।
एकं(म्) साङ्ख्यं(ञ्) च योगं(ञ्) च, यः(फ्) पश्यति स पश्यति॥5.5॥
सांख्ययोगियों के द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों के द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। (अतः) जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोग को (फलरूप में) एक देखता है, वही (ठीक) देखता है।
विवेचन- साङ्ख्य योगी का मन एकदम शान्त होता है, वे किसी भी बात से परेशान नहीं होते और वे अत्यन्त ज्ञानी होते हैं। भगवत् प्राप्ति ही उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य होता है।
कर्मयोगी भी भगवत् प्राप्ति के लिए ही प्रयत्नशील होते हैं।
साङ्ख्ययोग और कर्मयोग से फल तो एक ही मिलता है, दोनों की पद्धति भिन्न है। दोनों मार्गों को एक दृष्टि से देखने वाले ही संन्यासी कहलाते हैं।
सन्न्यासस्तु महाबाहो, दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म, नचिरेणाधिगच्छति॥5.6॥
परन्तु हे महाबाहो ! कर्मयोग के बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
विवेचन- अब श्रीभगवान कहते हैं- हे महाबाहु अर्जुन! साङ्ख्य योगी बनने के लिए पहले कर्मयोगी बनना आवश्यक है। कर्मयोग के बिना साङ्ख्ययोग कठिन होता है।
हमें यदि दसवीं कक्षा तक पहुँचना है तो पहले बाल मन्दिर (nursery) LKG, UKG से होते हुए धीरे धीरे पहली, दूसरी कक्षाओं में पढ़कर ही हम दसवीं कक्षा तक पहुँचेंगे, सीधे दसवीं कक्षा में जाएँगे तो हमें कुछ भी समझ नहीं आएगा क्योंकि मूल ज्ञान ही नहीं होगा तो बड़ी कक्षा में हम कैसे समझ पाएँगे?
गणित में जोड़ना, घटाना, गुणा और भाग ये मूल क्रियाएँ हैं, जो हम छोटी कक्षाओं में धीरे-धीरे सीखते हैं, इसके बाद ही हम गणित के कठिन सवाल हल कर सकते हैं।
साङ्ख्य योगी बनने के लिए द्वेष, क्रोध और मोह को पूरी तरह छोड़ना पड़ता है और यह एकदम से नहीं हो सकता। पहले कर्मयोगी बनाकर श्रीभगवान को अच्छे लगने वाले काम करना चाहिए। माता-पिता को अच्छे लगने वाले काम श्रीभगवान को भी पसन्द हैं इसलिए माता-पिता की अनुमति के बिना कोई भी काम नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी को दुःख या तकलीफ़ नहीं देना चाहिए तो यही सब अच्छे कर्म हैं जिनसे हम श्रीभगवान के प्रिय बन जाते हैं।
हमें यदि दसवीं कक्षा तक पहुँचना है तो पहले बाल मन्दिर (nursery) LKG, UKG से होते हुए धीरे धीरे पहली, दूसरी कक्षाओं में पढ़कर ही हम दसवीं कक्षा तक पहुँचेंगे, सीधे दसवीं कक्षा में जाएँगे तो हमें कुछ भी समझ नहीं आएगा क्योंकि मूल ज्ञान ही नहीं होगा तो बड़ी कक्षा में हम कैसे समझ पाएँगे?
गणित में जोड़ना, घटाना, गुणा और भाग ये मूल क्रियाएँ हैं, जो हम छोटी कक्षाओं में धीरे-धीरे सीखते हैं, इसके बाद ही हम गणित के कठिन सवाल हल कर सकते हैं।
साङ्ख्य योगी बनने के लिए द्वेष, क्रोध और मोह को पूरी तरह छोड़ना पड़ता है और यह एकदम से नहीं हो सकता। पहले कर्मयोगी बनाकर श्रीभगवान को अच्छे लगने वाले काम करना चाहिए। माता-पिता को अच्छे लगने वाले काम श्रीभगवान को भी पसन्द हैं इसलिए माता-पिता की अनुमति के बिना कोई भी काम नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए, किसी को दुःख या तकलीफ़ नहीं देना चाहिए तो यही सब अच्छे कर्म हैं जिनसे हम श्रीभगवान के प्रिय बन जाते हैं।
योगयुक्तो विशुद्धात्मा, विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा, कुर्वन्नपि न लिप्यते॥5.7॥
जिसकी इन्द्रियाँ अपने वश में हैं, जिसका अन्तःकरण निर्मल है, जिसका शरीर अपने वश में है (और) सम्पूर्ण प्राणियों की आत्मा ही जिसकी आत्मा है, (ऐसा) कर्मयोगी (कर्म) करते हुए भी लिप्त नहीं होता।
विवेचन- हम देखते हैं कि गीता जी में एक ही बात बार-बार कही गई है ताकि हम उसका अच्छे से अभ्यास कर सकें।
हमारे मन में अनावश्यक इच्छाएँ न आएँ
इसके लिए हमें अपनी पाँचों इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना होगा।
इसके लिए हमें अपनी पाँचों इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना होगा।
प्रश्न- पाँच इन्द्रियाँ कौन-कौन सी हैं? उनके क्या काम हैं?
उत्तर- आँख, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा। आँखों से देखते हैं, कान सुनने में मदद करते हैं, नाक से सूँघते हैं, जिह्वा से स्वाद और त्वचा से स्पर्श का अनुभव होता है।
हमें कानों से अच्छा ही सुनना है, जिह्वा से अच्छा बोलना और अच्छा खाना चाहिए, आँखों से सुन्दरता,अच्छाई ही देखनी चाहिए, इस तरह इन्द्रियों का नियन्त्रण हमारे हाथों में ही है। इससे हमारा अन्त:करण निर्मल होगा।
अन्त:करण मन से थोड़ा श्रेष्ठ होता है।
इन्द्रियाँ हमारे शरीर का ही अङ्ग हैं, तो शरीर को वश में कैसे ला सकते हैं?
हम जब बगीचे में घास पर बैठते हैं तो हमारे हाथ घास निकालते रहते हैं, जब टीवी देखते हैं तो नाखून चबाते हैं या पैर हिलाते रहते हैं, हमें ऐसा नहीं करना चाहिए।
इस तरह हम अच्छे कर्मयोगी बन सकते हैं और श्रीभगवान के प्रिय भी।
नैव किञ्चित्करोमीति, युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्, नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥5.8॥
तत्त्व को जानने वाला सांख्ययोगी (मैं स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' - ऐसा माने (अत:) देखता हुआ, सुनता हुआ, छूता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, चलता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ,
5.8 writeup
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्, नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु, वर्तन्त इति धारयन्॥5.9॥
बोलता हुआ, (मल-मूत्र का) त्याग करता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँखें खोलता हुआ (और) मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में बरत रही हैं' - ऐसा समझे।
विवेचन- साङ्ख्य योगी ज्ञानी हैं, ममत्व या ममकार की भावना उनमें नहीं होती।
जब साङ्ख्य योगी कुछ करते हैं तो उनके मन में कैसी भावनाएँ होती हैं?
खाना, पीना, सोना, श्वास लेना, चलना, बैठना, जीवन की मूलभूत क्रियाएँ वे किस भाव से करते हैं?
वे यही सोचते हैं कि पाँचों इन्द्रियों के अपने अपने कार्य होते हैं, जिन्हें विषय कह सकते हैं तो इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय में बरत रहीं हैं या वे अपना-अपना काम कर रहीं हैं।
आँखों से देख सकते हैं, सुन नहीं सकते, कानों से खा नहीं सकते, इस प्रकार इन्द्रियाँ ही सब काम कर रहीं हैं, इसलिए योगी अपने आपको कर्त्ता नहीं मानते।
मैं कर रहा हूँ, मैं खा रहा हूँ। ऐसी ममकार की भावना उनमें नहीं होती। सामान्यत: बुरा काम करने पर हम उसकी जिम्मेदारी नहीं लेते, जैसे हमसे यदि प्याला टूट जाए तो हम उसके टुकड़े कूड़ादान में छुपा देते हैं और माँ के पूछने पर हम अपनी गलती नहीं मानते या किसी और पर उसका आरोप लगा देते हैं,
जब साङ्ख्य योगी कुछ करते हैं तो उनके मन में कैसी भावनाएँ होती हैं?
खाना, पीना, सोना, श्वास लेना, चलना, बैठना, जीवन की मूलभूत क्रियाएँ वे किस भाव से करते हैं?
वे यही सोचते हैं कि पाँचों इन्द्रियों के अपने अपने कार्य होते हैं, जिन्हें विषय कह सकते हैं तो इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषय में बरत रहीं हैं या वे अपना-अपना काम कर रहीं हैं।
आँखों से देख सकते हैं, सुन नहीं सकते, कानों से खा नहीं सकते, इस प्रकार इन्द्रियाँ ही सब काम कर रहीं हैं, इसलिए योगी अपने आपको कर्त्ता नहीं मानते।
मैं कर रहा हूँ, मैं खा रहा हूँ। ऐसी ममकार की भावना उनमें नहीं होती। सामान्यत: बुरा काम करने पर हम उसकी जिम्मेदारी नहीं लेते, जैसे हमसे यदि प्याला टूट जाए तो हम उसके टुकड़े कूड़ादान में छुपा देते हैं और माँ के पूछने पर हम अपनी गलती नहीं मानते या किसी और पर उसका आरोप लगा देते हैं,
हम अकर्त्ता बन जाते हैं।
वहीं जब अच्छा काम करते हैं तो उसका पूरा श्रेय हम लेना चाहते हैं, कर्त्ता बनकर वाह-वाही लूटना चाहते हैं।
जब यह अकर्त्ता की भावना हमारे प्रत्येक काम में आ जाती है, तब हम कर्मयोगी बन जाते हैं और एक दिन साङ्ख्य योगी भी बन सकते हैं।
।।मैं नहीं, मेरा नहीं, यह तन किसी का है नहीं।।
इसी के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- रुद्र भैया
प्रश्न- गीता कक्षा का नया बैच कब से प्रारम्भ हो रहा है?
उत्तर- गीता कक्षा का नया बैच तीस मई से प्रारम्भ हो रहा है।
प्रश्नकर्ता- इन्दुलेखा दीदी
प्रश्न- L- 4 में कौन-कौन से अध्याय पढ़ाए जाएँगे?
उत्तर- L- 4 में निम्नानुसार अध्याय पढ़ाए जाएँगे-
अध्याय दो, आठ, दस, ग्यारह, तेरह, अट्ठारह।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।