विवेचन सारांश
ज्ञान का मार्ग
दीप प्रज्वलन और प्रार्थना के बाद आज का विवेचन सत्र प्रारम्भ हुआ।
गीता जी में श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा-
अर्जुन उवाच
आपके साकार रूप को समर्पित होने वालों को या आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आपको कौन से भक्त अधिक प्रिय हैं? सगुण और निर्गुण में से कौन सी भक्ति उत्तम है? सगुण रूप भक्ति का मार्ग सुलभ है क्योंकि उस साकार रूप की भक्ति में हम भाव विभोर होकर पूजा में मगन हो जाते हैं और लगन लग जाती है। भक्ति के इस प्रकार में भक्त और श्रीभगवान अलग-अलग दो रूप हो जाते हैं जबकि निर्गुण रूप की भक्ति करने से भक्त और श्रीभगवान एक रूप हो जाते हैं या यूँ कहें कि एकाकार हो जाते हैं। इसे अद्वैत रूप कहते हैं। यह मार्ग सगुण साकार रूप की भक्ति से अधिक कठिन है। आदिगुरु शङ्कराचार्य जी ने भी निर्गुण रूप की भक्ति का ही प्रचार किया है और अद्वैत हो जाना भाव एकरूप हो जाना, एकाकार हो जाना इसी भक्ति के मार्ग को माना है।
इस अध्याय में श्री कृष्ण ने अर्जुन को और अधिक विस्तार से आत्मा और परमात्मा के तत्त्व ज्ञान के बारे में बताया है। अर्जुन श्रीकृष्ण के प्रिय शिष्य थे और उनकी बात का अनुसरण भी करते थे। अपने अन्तः करण के ज्ञान से इसी कारण से अर्जुन को वञ्चित नहीं रखना चाहते और उसको तत्त्व ज्ञान के बारे में बताते हैं। हम भी सभी भाग्यशाली हैं कि जो ज्ञान श्रीकृष्ण ने गीता जी के रूप में अर्जुन को दिया वह सब हम जानने का प्रयास कर रहे हैं।
गीता जी में श्रीकृष्ण से अर्जुन ने पूछा-
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥1॥
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥1॥
आपके साकार रूप को समर्पित होने वालों को या आपके अव्यक्त निराकार रूप की आराधना करने वालों में से आपको कौन से भक्त अधिक प्रिय हैं? सगुण और निर्गुण में से कौन सी भक्ति उत्तम है? सगुण रूप भक्ति का मार्ग सुलभ है क्योंकि उस साकार रूप की भक्ति में हम भाव विभोर होकर पूजा में मगन हो जाते हैं और लगन लग जाती है। भक्ति के इस प्रकार में भक्त और श्रीभगवान अलग-अलग दो रूप हो जाते हैं जबकि निर्गुण रूप की भक्ति करने से भक्त और श्रीभगवान एक रूप हो जाते हैं या यूँ कहें कि एकाकार हो जाते हैं। इसे अद्वैत रूप कहते हैं। यह मार्ग सगुण साकार रूप की भक्ति से अधिक कठिन है। आदिगुरु शङ्कराचार्य जी ने भी निर्गुण रूप की भक्ति का ही प्रचार किया है और अद्वैत हो जाना भाव एकरूप हो जाना, एकाकार हो जाना इसी भक्ति के मार्ग को माना है।
इस अध्याय में श्री कृष्ण ने अर्जुन को और अधिक विस्तार से आत्मा और परमात्मा के तत्त्व ज्ञान के बारे में बताया है। अर्जुन श्रीकृष्ण के प्रिय शिष्य थे और उनकी बात का अनुसरण भी करते थे। अपने अन्तः करण के ज्ञान से इसी कारण से अर्जुन को वञ्चित नहीं रखना चाहते और उसको तत्त्व ज्ञान के बारे में बताते हैं। हम भी सभी भाग्यशाली हैं कि जो ज्ञान श्रीकृष्ण ने गीता जी के रूप में अर्जुन को दिया वह सब हम जानने का प्रयास कर रहे हैं।
13.1
इदं(म्) शरीरं(ङ्) कौन्तेय, क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं(म्) प्राहुः, क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥13.1॥
श्रीभगवान् बोले - हे कुन्तीपुत्र अर्जुन ! 'यह' - रूप से कहे जाने वाले शरीर को 'क्षेत्र' - इस नाम से कहते हैं (और) इस क्षेत्र को जो जानता है, उसको ज्ञानी लोग 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से कहते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान अर्जुन को कहते हैं कि हे अर्जुन! यह शरीर एक क्षेत्र की भाँति है और जो इस क्षेत्र के बारे में जानकारी रखता है वह क्षेत्रज्ञ है। श्रीभगवान के शरीर में पूरा विश्व समाहित है। मनुष्य शरीर क्या है? यह किसी भी प्राणी के क्षेत्र की तरह है और क्षेत्र का एक और अर्थ भी है खेत और खेत को जानने वाला कृषक होता है किसान को ही यह पता होता है कि कौन सा बीज बोना है। मिट्टी में क्या कमी है या बीज बोने के लिए और क्या-क्या चाहिए कैसी खाद चाहिए? कितनी खाद डालने से फसल अच्छी होगी या किसका उपयोग करने से फसल के खराब होने का खतरा है? इन सब के बारे में जानकारी उस कृषक को ही होती है और जैसे-जैसे फसल बढ़ती है, उसके आसपास घास-फूँस भी बढ़ती जाती है जिसको वह कृषक समय अनुसार साफ करता रहता है ताकि उसकी फसल खराब न हो।
किसान ही अपने क्षेत्र का जानने वाला होता है इसी प्रकार से मनुष्य के शरीर का क्षेत्रज्ञ वह परमात्मा है।
मनुष्य अपने शरीर के बारे में नहीं जानता। उसके मन में कई तरह के ऐसे विचार होते हैं जो सही होते हैं और कुछ विचार ऐसे होते हैं जो अच्छे नहीं होते। परमात्म तत्व को जानने पर ही हम यह जान पाएँगे कि इसमें कौन से बीज बोना है? जो कर्म हमारे लिए बना है, हमारा जो कर्त्तव्य है। गृहिणी, माँ आदि सभी का कर्त्तव्य क्या है? हम सभी को पता है हमारा कर्त्तव्य क्या है? अगर हम नौकरी करते हैं तो हमारा कर्त्तव्य उस नौकरी को करने से है। जीवन में हम सभी को अपना कर्त्तव्य पता होना चाहिए। अगर हमें हमारा कर्त्तव्य पता है और हम उसको अच्छी तरह से निभाएँगे तो उसका कर्मफल भी अच्छा ही हो होगा।
महारानी अहिल्या देवी होल्कर विदुषी थीं। उनको भी एक बार गीता सीखने की बहुत इच्छा हुई तो उन्होंने भी सोचा कि मैं गीता सीखूँगी। उनको गीता सिखाने के लिए पण्डित की नियुक्ति हो गई और पण्डित आकर उनको गीता सिखाने लगे तो प्रथम अध्याय के पहले श्लोक के शब्दों से ही वह पूरी गीता के सार को ही समझ गईं। उन्होंने दो शब्द ही सुने थे धर्म क्षेत्रे और कुरु क्षेत्रे और कुल मिलाकर इन चार शब्दों से ही उन्होंने पूरी गीता का सार समझ लिया। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे के स्थान पर क्षेत्रे क्षेत्रे धर्म कुरु उन्होंने अपने मन मस्तिष्क में बैठा लिया। हर क्षेत्र में अपने धर्म को करो। अपने कर्तव्य का पालन करो। यही गीता का सार समझ लिया।अपने कर्त्तव्य बहुत अच्छे से निभाना ही धर्म है।
किसान ही अपने क्षेत्र का जानने वाला होता है इसी प्रकार से मनुष्य के शरीर का क्षेत्रज्ञ वह परमात्मा है।
मनुष्य अपने शरीर के बारे में नहीं जानता। उसके मन में कई तरह के ऐसे विचार होते हैं जो सही होते हैं और कुछ विचार ऐसे होते हैं जो अच्छे नहीं होते। परमात्म तत्व को जानने पर ही हम यह जान पाएँगे कि इसमें कौन से बीज बोना है? जो कर्म हमारे लिए बना है, हमारा जो कर्त्तव्य है। गृहिणी, माँ आदि सभी का कर्त्तव्य क्या है? हम सभी को पता है हमारा कर्त्तव्य क्या है? अगर हम नौकरी करते हैं तो हमारा कर्त्तव्य उस नौकरी को करने से है। जीवन में हम सभी को अपना कर्त्तव्य पता होना चाहिए। अगर हमें हमारा कर्त्तव्य पता है और हम उसको अच्छी तरह से निभाएँगे तो उसका कर्मफल भी अच्छा ही हो होगा।
महारानी अहिल्या देवी होल्कर विदुषी थीं। उनको भी एक बार गीता सीखने की बहुत इच्छा हुई तो उन्होंने भी सोचा कि मैं गीता सीखूँगी। उनको गीता सिखाने के लिए पण्डित की नियुक्ति हो गई और पण्डित आकर उनको गीता सिखाने लगे तो प्रथम अध्याय के पहले श्लोक के शब्दों से ही वह पूरी गीता के सार को ही समझ गईं। उन्होंने दो शब्द ही सुने थे धर्म क्षेत्रे और कुरु क्षेत्रे और कुल मिलाकर इन चार शब्दों से ही उन्होंने पूरी गीता का सार समझ लिया। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे के स्थान पर क्षेत्रे क्षेत्रे धर्म कुरु उन्होंने अपने मन मस्तिष्क में बैठा लिया। हर क्षेत्र में अपने धर्म को करो। अपने कर्तव्य का पालन करो। यही गीता का सार समझ लिया।अपने कर्त्तव्य बहुत अच्छे से निभाना ही धर्म है।
क्षेत्रज्ञं(ञ्) चापि मां(म्) विद्धि, सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं(म्), यत्तज्ज्ञानं(म्) मतं(म्) मम॥13.2॥
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! (तू) सम्पूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही समझ और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।
विवेचन- यह शरीर परमात्मा का ही तत्त्व है। जैसे दिन के बारह बजे अगर सौ घड़े धूप में रख दिए जाएँ तो उन सब घड़ो में सूर्य नजर आता है। किन्तु सूर्य तो एक ही है इसका अर्थ यह है कि वह सूर्य उन सब घड़ों में प्रतिबिम्बित होता है। इस प्रकार परमात्मा का तत्त्व सबके शरीर में है। तत्त्व तो वही है। परमात्मा का प्रतिबिम्ब हम सभी मनुष्य जीवन के क्षेत्र अर्थात् शरीर में दिखाई देता है। क्या हम इस शरीर में विद्यमान परमात्मा के उस तत्त्व के ज्ञान को जान पाएँगे? इसके लिए हमें प्रयास करना चाहिए।
चौदहवें अध्याय में भी श्रीभगवान कहते हैं-
श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! क्योंकि तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करते इसलिए मैं तुम्हें विज्ञान सहित परम गुह्म ज्ञान बताऊँगा। जिसे जानकर तुम भौतिक जगत के कष्टों से मुक्त हो जाओगे।
हम गीता प्रेमी हैं। अर्जुन को श्रीभगवान ने चुना तो वहाँ भी श्रीभगवान कहते हैं कि मै तुम्हें बताना चाहता हूँ कि इसको जानने के बाद जानने के लिए और कुछ बचा ही नहीं है।
चौदहवें अध्याय में भी श्रीभगवान कहते हैं-
श्रीभगवानुवाच।
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥1॥
इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥1॥
श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! क्योंकि तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करते इसलिए मैं तुम्हें विज्ञान सहित परम गुह्म ज्ञान बताऊँगा। जिसे जानकर तुम भौतिक जगत के कष्टों से मुक्त हो जाओगे।
हम गीता प्रेमी हैं। अर्जुन को श्रीभगवान ने चुना तो वहाँ भी श्रीभगवान कहते हैं कि मै तुम्हें बताना चाहता हूँ कि इसको जानने के बाद जानने के लिए और कुछ बचा ही नहीं है।
तत्क्षेत्रं(म्) यच्च यादृक्च, यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च, तत्समासेन मे शृणु॥13.3॥
वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिससे जो (पैदा हुआ है) तथा वह क्षेत्रज्ञ (भी) जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप में मुझ से सुन।
विवेचन- श्रीभगवान अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! कितने ही सारे क्षेत्र हैं अर्थात् शरीर जीव जन्तु यह सब नश्वर है जो जन्मता है वह एक दिन मृत्यु को प्राप्त होता है। क्षेत्र तो अनेक हैं परन्तु प्रत्येक क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ परमात्मा ही है। प्रत्येक क्षेत्र में विद्यमान जीवात्मा में मैं ही हूँ।
सारे संसार में फैली हुई विकार सहित प्रकृति निरन्तर परिवर्तित होती है और विकार रहित पुरुष भगवान है। प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे मे जानना ही ज्ञान है।
सारे संसार में फैली हुई विकार सहित प्रकृति निरन्तर परिवर्तित होती है और विकार रहित पुरुष भगवान है। प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे मे जानना ही ज्ञान है।
ऋषिभिर्बहुधा गीतं(ञ्), छन्दोभिर्विविधैः(फ्) पृथक्।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव, हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥13.4॥
यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का तत्त्व- ऋषियों के द्वारा बहुत विस्तार से कहा गया है (तथा) वेदों की ऋचाओं द्वारा बहुत प्रकार से विभागपूर्वक (कहा गया है) और युक्ति युक्त (एवं) निश्चित किये हुए ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी (कहा गया है)।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ मैं तुम्हें पहली बार नहीं बता रहा हूँ। यह बात श्रीभगवान ने चौथे अध्याय में भी कही है। ऋषियों को यह तत्त्व ज्ञान बहुत साधना से, तपस्या करते-करते प्राप्त हुआ है।
गीता के ज्ञान को वेदव्यास जी ने लिखा है। वेद मन्त्र के द्वारा विभाग पूर्वक इसको बताया गया है और इसको आवेदन छन्द भी नहीं ब्रह्म सूत्र द्वारा बताया गया है।
ब्रह्म सूत्र व छन्द में क्या अन्तर है? सूत्र का भाव है फॉर्मूला। जैसे जो भी गणित के फार्मूला है या भौतिक विज्ञान व रसायन विज्ञान के सूत्र (फार्मूला) है उसे हम जान सकते हैं उनको रटना पड़ता है। पाइथागोरस थ्योरम,त्रिकोण (ट्रायंगल) का फॉर्मूला ए और बी का पूर्ण वर्ग(whole squre) इन सूत्रों को रटना पड़ता है। सूत्र (फॉर्मूला) जब हम समझ जाते हैं तो उससे आसानी से सवाल निकाल सकते हैं।
इस तरह से इसे भी सूत्र ही जान सकते हैं और इसको निश्चित ही ऋषि मुनियों के द्वारा बताया गया है।
मैं तुम्हें पहली बार नहीं बता रहा हूँ। इसको ऋषि-मुनियों द्वारा छन्द में और ब्रह्म सूत्र में स्पष्ट रूप से बताया गया है।
गीता के ज्ञान को वेदव्यास जी ने लिखा है। वेद मन्त्र के द्वारा विभाग पूर्वक इसको बताया गया है और इसको आवेदन छन्द भी नहीं ब्रह्म सूत्र द्वारा बताया गया है।
ब्रह्म सूत्र व छन्द में क्या अन्तर है? सूत्र का भाव है फॉर्मूला। जैसे जो भी गणित के फार्मूला है या भौतिक विज्ञान व रसायन विज्ञान के सूत्र (फार्मूला) है उसे हम जान सकते हैं उनको रटना पड़ता है। पाइथागोरस थ्योरम,त्रिकोण (ट्रायंगल) का फॉर्मूला ए और बी का पूर्ण वर्ग(whole squre) इन सूत्रों को रटना पड़ता है। सूत्र (फॉर्मूला) जब हम समझ जाते हैं तो उससे आसानी से सवाल निकाल सकते हैं।
इस तरह से इसे भी सूत्र ही जान सकते हैं और इसको निश्चित ही ऋषि मुनियों के द्वारा बताया गया है।
मैं तुम्हें पहली बार नहीं बता रहा हूँ। इसको ऋषि-मुनियों द्वारा छन्द में और ब्रह्म सूत्र में स्पष्ट रूप से बताया गया है।
महाभूतान्यहङ्कारो, बुद्धिरव्यक्तमेव च।
इन्द्रियाणि दशैकं(ञ्) च, पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥13.5॥
मूल प्रकृति और समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियों के पाँच विषय - (यह चौबीस तत्त्वों वाला क्षेत्र है)
विवेचन- यह शरीर पञ्च महाभूतों से बना है अग्नि, वायु, जल आकाश और धरती इन पञ्च महाभूतों के साथ-साथ हमारे अन्दर अहम्, बुद्धि एवम् एक मूल चेतना भी है। पञ्च महाभूत व अहम्, बुद्धि व अव्यक्त चेतना मिल कर आठ हो गए और दस इन्द्रियाँ हैं।
पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं- हाथ (हस्त), पैर (पाद), वाणी (वाक्), गुदा (वायु), और जननाङ्ग (उपस्थ) और आँख, कान, नासिका, जिह्वा और त्वचा व पाँच ज्ञानेन्द्रियों में वह भी एक प्रकृति है। पाँच इन्द्रियों के विषय-रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्द हैं। आँख के द्वारा हम किसी रूप को देखते हैं। कान से शब्द, नाक से गन्ध, त्वचा से स्पर्श और जिह्वा से रस इन पाँच इन्द्रियों के विषयों को कर्म क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है। जबकि ये शरीर के बाहर रहते हैं।
इच्छा और घृणा, सुख और दुःख, शरीर, चेतना और इच्छा शक्ति ये सब कार्य क्षेत्र में सम्मिलित हैं तथा इसके विकार हैं। श्रीभगवान अब क्षेत्र के गुणों और उसके विकारों को स्पष्ट करते हैं। हम सभी को पता है इच्छा क्या है? जो पाने की इच्छा है या जो त्यागने की इच्छा। यह सकारत्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी हो सकती है। द्वेष इच्छा की पूर्ति न होने पर पैदा होता है। जो हम चाहते हैं उसको नहीं पाते या किसी से हमें वह प्राप्त नहीं होता है तो क्रोध आता है। अनुकूल स्थिति प्राप्त होती है तो बहुत खुश हो जाते हैं। वह सुख और प्रतिकूल स्थिति प्राप्त होने पर दु:ख है।
इसके अलावा एक मन है। मन इन्द्रियों व विषयों के चिन्तन में व्यस्त रहता है और ये पाँच इन्द्रियों के विषय सूक्ष्म रूप से मन में रहते हैं। इन सब के साथ हमारा यह क्षेत्र बना है।
पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं- हाथ (हस्त), पैर (पाद), वाणी (वाक्), गुदा (वायु), और जननाङ्ग (उपस्थ) और आँख, कान, नासिका, जिह्वा और त्वचा व पाँच ज्ञानेन्द्रियों में वह भी एक प्रकृति है। पाँच इन्द्रियों के विषय-रस, स्पर्श, गन्ध, रूप और शब्द हैं। आँख के द्वारा हम किसी रूप को देखते हैं। कान से शब्द, नाक से गन्ध, त्वचा से स्पर्श और जिह्वा से रस इन पाँच इन्द्रियों के विषयों को कर्म क्षेत्र में सम्मिलित किया गया है। जबकि ये शरीर के बाहर रहते हैं।
इच्छा और घृणा, सुख और दुःख, शरीर, चेतना और इच्छा शक्ति ये सब कार्य क्षेत्र में सम्मिलित हैं तथा इसके विकार हैं। श्रीभगवान अब क्षेत्र के गुणों और उसके विकारों को स्पष्ट करते हैं। हम सभी को पता है इच्छा क्या है? जो पाने की इच्छा है या जो त्यागने की इच्छा। यह सकारत्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी हो सकती है। द्वेष इच्छा की पूर्ति न होने पर पैदा होता है। जो हम चाहते हैं उसको नहीं पाते या किसी से हमें वह प्राप्त नहीं होता है तो क्रोध आता है। अनुकूल स्थिति प्राप्त होती है तो बहुत खुश हो जाते हैं। वह सुख और प्रतिकूल स्थिति प्राप्त होने पर दु:ख है।
इसके अलावा एक मन है। मन इन्द्रियों व विषयों के चिन्तन में व्यस्त रहता है और ये पाँच इन्द्रियों के विषय सूक्ष्म रूप से मन में रहते हैं। इन सब के साथ हमारा यह क्षेत्र बना है।
इच्छा द्वेषः(स्) सुखं(न्) दुःखं(म्), सङ्घातश्चेतना धृतिः।
एतत्क्षेत्रं(म्) समासेन, सविकारमुदाहृतम्॥13.6॥
इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात (शरीर), चेतना (प्राणशक्ति) (और) धृति - इन विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप से कहा गया है।
विवेचन- हमारा शरीर शक्ति से कार्य करता हैं। जैसे आज विवेचन सत्र में जुड़े हैं। कोई लैपटॉप से तो कोई मोबाइल से जुड़े हैं। इस लैपटॉप का एक हार्डवेयर होता है और एक सॉफ्टवेयर होता है। लैपटॉप को चलने के लिए दोनों चाहिए सॉफ्टवेयर होने से भी नहीं होता है लेकिन इन सबके साथ-साथ इसे चलने के लिए बिजली भी चाहिए बिजली या बैटरी से ही सम्पर्कता (कनेक्टिविटी) बनती है। बिजली या बैटरी के बिना हम जुड़ नहीं हो पाते हैं। सब सम्पर्क टूट (डिस्कनेक्ट) जाएँगे तो वैसे ही इस शरीर को शक्ति चाहिए। चेतना या चैतन्य, मनुष्य के शरीर के लिए आवश्यक है। मनुष्य का शरीर मनुष्य के शरीर में विकार है। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देह का पिण्ड, चेतना और धृृति इस प्रकार सात विकारों के सहित यह क्षेत्र सङ्क्षेप में कहा गया है।
अव्यक्त को व्यक्त नहीं किया नहीं जा सकता। करेंगे तो उसके अर्थ ही बदल जाएँगे। वह मूल प्रकृति है। जैसे दही दूध से बनता है दूध क्या हुआ मूल प्रकृति। जो कि विकृति के कारण दही बना। दही से मक्खन बनेगा। मक्खन की प्रकृति दही है दही की प्रकृति दूध है जबकि दूध की विकृति दही और दही की विकृति मक्खन है।
इसी तरह हमारे मन की भी विकृतियाँ हैं। हमारे मन में सुख-दु:ख का अगर समन्वय नहीं है तो हम तब तक ज्ञानी नहीं बन सकते।
अव्यक्त को व्यक्त नहीं किया नहीं जा सकता। करेंगे तो उसके अर्थ ही बदल जाएँगे। वह मूल प्रकृति है। जैसे दही दूध से बनता है दूध क्या हुआ मूल प्रकृति। जो कि विकृति के कारण दही बना। दही से मक्खन बनेगा। मक्खन की प्रकृति दही है दही की प्रकृति दूध है जबकि दूध की विकृति दही और दही की विकृति मक्खन है।
इसी तरह हमारे मन की भी विकृतियाँ हैं। हमारे मन में सुख-दु:ख का अगर समन्वय नहीं है तो हम तब तक ज्ञानी नहीं बन सकते।
अमानित्वमदम्भित्वम्, अहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं(म्) शौचं(म्), स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥13.7॥
अपने में श्रेष्ठता का भाव न होना, दिखावटीपन न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता (और) मन का वश में होना।
विवेचन- जीवनयापन करते हुए मनुष्य के अन्दर दम्भ भर जाता है। कुछ प्राप्त करते हैं तो कभी-कभी अभिमान आ जाता है। अगर हमें अभिमान है तो ज्ञानी नहीं बन सकते। अभिमान को हटाना चाहिए। फिर दम्भ भी एक ऐसी विकृती है जो नहीं होनी चाहिए।
ज्ञान को पोषित करने हेतु सभी प्राणियों के प्रति आदर भाव रखना आवश्यक है। इसके लिए अहिंसा का पालन करना भी आवश्यक है। आजकल जैसे युद्ध का वातावरण बना हुआ है, यह देश के लिए हिंसा ही है। हिंसा का कारण किसी को कष्ट देने से है और वह किसी को भी 'मनसा वाचा कर्मा' मन से, वचन से और कर्म से नहीं करनी चाहिए।
इसके साथ-साथ हमारे अन्दर क्षमा का भाव रहना चाहिए कोई भी व्यक्ति अगर हमारे साथ कहीं कुछ गलत करता है तो उसे क्षमा करने का भाव हमारे मन में होना चाहिए। क्षमाशीलता से हम ज्ञान के पथ पर अग्रसर होते हैं।
सरलता व्यक्ति का एक विशेष गुण है।
सादा जीवन उच्च विचार ' हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। सादगी से व्यक्ति का जीवन सरल रहता है।
गुरु की सेवा भी एक ऐसा गुण है जो कि मनुष्य को तत्त्व ज्ञान की ओर ले जाता है।
परमात्मा की उपासना निरन्तर करनी है।
कृष्णम् वन्दे जगतगुरुम् ज्ञान प्राप्ति का मार्ग है। इससे पवित्रता आती है। शुद्धता भी ज्ञानी का लक्षण है।
शुद्ध, स्वच्छ और पवित्र तीनों मिलकर शौच है। हमारा अन्तःकरण भी शुद्ध होना चाहिए है। जो हमारे विचार वह हमारे नियन्त्रण में होने चाहिए।
आचार-विचार में स्थिरता भी ज्ञानी का गुण है। अगर आज मैंने सोचा कि गीताव्रती बनना है और कल तक मेरा वह सङ्कल्प स्थिर न रहा तो ऐसी स्थिरता अज्ञानता है। ज्ञानी अपने सङ्कल्प में जो कार्य उन्होंने सोचा है कि करना है और सही है उसको करने में कभी भी अस्थिर नहीं होते।
जो भी कोई कार्य अगर लगता है कि अच्छा है और सही है उसको करने के लिए उत्साह हमेशा बना रहना चाहिए। आत्म संयम बहुत आवश्यक है। मन हमेशा हमारे नियन्त्रण में रहना चाहिए।
ज्ञान को पोषित करने हेतु सभी प्राणियों के प्रति आदर भाव रखना आवश्यक है। इसके लिए अहिंसा का पालन करना भी आवश्यक है। आजकल जैसे युद्ध का वातावरण बना हुआ है, यह देश के लिए हिंसा ही है। हिंसा का कारण किसी को कष्ट देने से है और वह किसी को भी 'मनसा वाचा कर्मा' मन से, वचन से और कर्म से नहीं करनी चाहिए।
इसके साथ-साथ हमारे अन्दर क्षमा का भाव रहना चाहिए कोई भी व्यक्ति अगर हमारे साथ कहीं कुछ गलत करता है तो उसे क्षमा करने का भाव हमारे मन में होना चाहिए। क्षमाशीलता से हम ज्ञान के पथ पर अग्रसर होते हैं।
सरलता व्यक्ति का एक विशेष गुण है।
सादा जीवन उच्च विचार ' हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए। सादगी से व्यक्ति का जीवन सरल रहता है।
गुरु की सेवा भी एक ऐसा गुण है जो कि मनुष्य को तत्त्व ज्ञान की ओर ले जाता है।
परमात्मा की उपासना निरन्तर करनी है।
कृष्णम् वन्दे जगतगुरुम् ज्ञान प्राप्ति का मार्ग है। इससे पवित्रता आती है। शुद्धता भी ज्ञानी का लक्षण है।
शुद्ध, स्वच्छ और पवित्र तीनों मिलकर शौच है। हमारा अन्तःकरण भी शुद्ध होना चाहिए है। जो हमारे विचार वह हमारे नियन्त्रण में होने चाहिए।
आचार-विचार में स्थिरता भी ज्ञानी का गुण है। अगर आज मैंने सोचा कि गीताव्रती बनना है और कल तक मेरा वह सङ्कल्प स्थिर न रहा तो ऐसी स्थिरता अज्ञानता है। ज्ञानी अपने सङ्कल्प में जो कार्य उन्होंने सोचा है कि करना है और सही है उसको करने में कभी भी अस्थिर नहीं होते।
जो भी कोई कार्य अगर लगता है कि अच्छा है और सही है उसको करने के लिए उत्साह हमेशा बना रहना चाहिए। आत्म संयम बहुत आवश्यक है। मन हमेशा हमारे नियन्त्रण में रहना चाहिए।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्, अनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधि, दुःखदोषानुदर्शनम्॥13.8॥
इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य का होना, अहंकार का भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियों में दुःखरूप दोषों को बार-बार देखना।
विवेचन- हमारा अपनी इन्द्रियों पर भी संयम होना चाहिए। कभी-कभी नियन्त्रण ही नहीं रहता। इन्द्रियों के विषय में आसक्त न होना ज्ञानी का लक्षण है।
अहङ्कार से रहित होना भी अत्यन्त आवश्यक है किसी भी मनुष्य में मैं की भावना ज्ञान के पथ पर अग्रसर होने से रोकती है।
मैंने यह किया, मैंने वह किया, मैंने यह त्याग किया, मैं गीता वृत्ति हूँ ऐसा अहङ्कार न होना ज्ञानी का लक्षण है। जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के बारे में सतत विचार न करना ज्ञानियों के लक्षण है।
अहङ्कार से रहित होना भी अत्यन्त आवश्यक है किसी भी मनुष्य में मैं की भावना ज्ञान के पथ पर अग्रसर होने से रोकती है।
मैंने यह किया, मैंने वह किया, मैंने यह त्याग किया, मैं गीता वृत्ति हूँ ऐसा अहङ्कार न होना ज्ञानी का लक्षण है। जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के बारे में सतत विचार न करना ज्ञानियों के लक्षण है।
असक्तिरनभिष्वङ्ग:(फ्), पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं(ञ्) च समचित्तत्वम्, इष्टानिष्टोपपत्तिषु॥13.9॥
आसक्ति रहित होना, पुत्र, स्त्री, घर आदि में एकात्मता (घनिष्ठ सम्बन्ध) न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलता की प्राप्ति में चित्त का नित्य सम रहना।
विवेचन- श्रीभगवान कहते हैं कि किसी भी वस्तु या व्यक्ति में बहुत अधिक आसक्ति का भाव रखना अज्ञानता है। मेरे पति, मेरी पत्नी, मेरे पुत्र-पुत्री, मेरा घर, मेरा धन, जो मेरा मेरा है, उसमें आसक्ति का भाव नहीं रखना चाहिए।
मयि चानन्ययोगेन, भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वम्, अरतिर्जनसंसदि॥13.10॥
मुझमें अनन्ययोग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और जन-समुदाय में प्रीति का न होना।
विवेचन- एकान्त स्थानों में रूचि होना ताकि मन श्रीभगवान के साथ समन्वय करने में लीन हो सके। इसलिए वे स्वाभाविक रूप से एकान्त स्थानों का चयन करते हैं, जहाँ वे अधिक गहनता से स्वयं को श्रद्धा और भक्ति के साथ श्रीभगवान के चिन्तन में लीन कर सकें।
लौकिक समाज के प्रति विमुखता भी ज्ञानी का लक्षण है। वे बहुत अधिक समूह में इकट्ठे हुए लोगों के बीच में बैठना पसन्द नहीं करते। सांसारिक लोगों के साथ बहुत अधिक बातचीत में संलग्न नहीं होते। मन सांसारिक लोगों और सांसारिक कार्यकलापों के वार्तालाप में आनन्द ढूँढता है। लेकिन जो ज्ञानी है वह इन गतिविधियों से स्वाभाविक दूरी बनाए रखता है और इसलिए लौकिक समाज से विमुख रहता है।
लौकिक समाज के प्रति विमुखता भी ज्ञानी का लक्षण है। वे बहुत अधिक समूह में इकट्ठे हुए लोगों के बीच में बैठना पसन्द नहीं करते। सांसारिक लोगों के साथ बहुत अधिक बातचीत में संलग्न नहीं होते। मन सांसारिक लोगों और सांसारिक कार्यकलापों के वार्तालाप में आनन्द ढूँढता है। लेकिन जो ज्ञानी है वह इन गतिविधियों से स्वाभाविक दूरी बनाए रखता है और इसलिए लौकिक समाज से विमुख रहता है।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं(न्), तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम्, अज्ञानं(म्) यदतोऽन्यथा॥13.11॥
अध्यात्मज्ञान में नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को सब जगह देखना - यह (पूर्वोक्त बीस साधन-समुदाय) तो ज्ञान है (और) जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है - ऐसा कहा गया है।
विवेचन- आध्यात्मिक ज्ञान को क्रियान्वित करना सीखना चाहिए। केवल एक बार अटल सत्यों का श्रवण करने से ऐसा तुरन्त नहीं होता। इनका श्रवण करने के पश्चात हमें बार-बार इनका चिन्तन करना चाहिए। अटल सत्यों पर बार-बार विचार करने से ऐसा आध्यात्मिक ज्ञान पुष्ट होता है जिसकी श्रीकृष्ण यहाँ चर्चा कर रहे हैं।
परम सत्य की तात्त्विक खोज की गतिविधियों में संलग्न रहना ज्ञानी का लक्षण है। श्रीभगवान ने विशेषकर मनुष्य को ज्ञान शक्ति के वरदान से सम्पन्न किया है तो मनुष्य को परम तत्त्व की खोज में निरन्तर कार्यरत रहना चाहिए।
इसी के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ।
परम सत्य की तात्त्विक खोज की गतिविधियों में संलग्न रहना ज्ञानी का लक्षण है। श्रीभगवान ने विशेषकर मनुष्य को ज्ञान शक्ति के वरदान से सम्पन्न किया है तो मनुष्य को परम तत्त्व की खोज में निरन्तर कार्यरत रहना चाहिए।
इसी के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- मलय भैया
प्रश्न- आपने पाँचवें श्लोक में बताया है कि चौबीस अवयवों से हमारा क्षेत्र बना है? कृपया पुनः बता दीजिए।
उत्तर- पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच महाभूत- पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश, मन, चित्त, अहं भाव, बुद्धि, इन्द्रियों के पाँच रस इस प्रकार से चौबीस हुए।
प्रश्नकर्ता- ऋचा दीदी
प्रश्नकर्ता- ऋचा दीदी
प्रश्न- छठे श्लोक की दूसरी पंक्ति का अर्थ पुनः बता दीजिए।
उत्तर-
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतनाधृतिः।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्।।13.7।।
हे अर्जुन! तुम ध्यान पूर्वक संक्षेप में मुझसे इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल पिण्ड आदि विकारों के बारे में सुनो।
प्रश्नकर्ता- मगन भैया
प्रश्न- हमारा शरीर क्षेत्र है। क्षेत्रज्ञ क्या है? जीवात्मा क्या है?
उत्तर- जीवात्मा ही क्षेत्रज्ञ है। आत्मतत्व भी परमात्मा का ही अंश है। अतः जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ कहा गया है।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।