विवेचन सारांश
जीव पर त्रिगुणों का प्रभाव

ID: 7167
हिन्दी
रविवार, 08 जून 2025
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
2/2 (श्लोक 14-27)
विवेचक: गीता व्रती जाह्णवी जी देखणे


आरम्भिक प्रार्थना, गुरु वन्दना, भारत माता और परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज को नमन करते हुए बालकों हेतु विशेष संवादपरक (interactive) विवेचन सत्र का शुभारम्भ हुआ।

परमपूज्य स्वामी गोविन्ददेव गिरि जी महाराज की असीम कृपा है, जिनके कारण हम सब श्रीमद्भगवद्गीता जी का अध्ययन ज़ूम पर सीख रहे हैं। उन्हे शत-शत वन्दन। 

उसके बाद अपने देश, अपनी भारत-माता का वन्दन किया गया, जिसकी पवित्र भूमि पर भगवान् श्रीकृष्णजी ने गीताजी का उपदेश सुनाया था। इस पावन भूमि पर अनेक सन्त-महात्माओं ने जन्म लिया है। हमारा भी जन्म इस पवित्र भारत भूमि पर हुआ, इसलिए हम भी भाग्यवान् हैं। हमें अपने मित्रों को भी गीताजी के विवेचन में बुलाना चाहिए। 

प्रश्न- हम लोग जो अध्याय चौदहवाँ पढ़ रहे हैं इस अध्याय का क्या नाम है? कौन बताएगा! 
राम भैया और वीर भैया ने सही उत्तर दिया- गुणत्रयविभागयोग। 

प्रश्न: तीन प्रकार के गुणों का हम चिन्तन कर रहे हैं, वे कौन-कौन‌ से हैं? 
धीर दीदी ने कहा, सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। 

भगवान् श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि हम जो दिनभर में कार्य करते हैं, वे किस प्रकार से इन तीनों गुणों से प्रभावित होते हैं। 

अगर हम यश सम्पादन कर रहे हैं तो वह किस गुण के कारण हो रहा है? अगर हम नींद ले रहे हैं तो वह किस गुण के कारण है? यदि हमें खेलने की इच्छा होती है तो वह किस गुण के कारण होती है? 

श्रीभगवान् ने हमें तीनों गुणों पर प्रभुत्व, नियन्त्रण (control) करने को कहा हैं। हमें तीनों गुणों मे से कौनसा गुण नियन्त्रित करता है? अगर सुबह पाँच बजे उठने का सोच कर हम देर से आठ बजे उठते हैं तो हमसे तमोगुण जीत गया, उसने हमारे ऊपर नियन्त्रण कर लिया। अगर हम इन तीनों गुणों पर नियन्त्रण करना सीख लेंगे, तभी जीवन में कुछ अच्छा कर पाएँगे। 

अब हम श्लोक देखते हैं। सभी साथ में श्लोकों को शुद्धता से गाएँगे। 

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं(य्ँ) यदा तदा विद्याद्, विवृद्धं(म्) सत्त्वमित्युत॥

14.11
यहाँ श्रीभगवान् क्या बता रहे हैं? 
जो सत्त्वगुणी होते हैं, उनका आचरण कैसा होता है?

हमारे शरीर में भी द्वार होते हैं, जैसे- आँखों से हम सुन्दर वस्तुएँ, श्रीभगवान् की सुन्दर मूरत को देखते हैं। अपने कानों से गीताजी के श्लोकों को, श्रीभगवान् के भजनों को, अच्छे विवेचन, अच्छे विचारों को सुनते हैं। जिह्वा से हम अच्छी वाणी बोल सकते हैं। हमारे आँखें, कान और सभी पाँचो इन्द्रियाँ हमारे शरीर के द्वार हैं। जिस प्रकार दरवाजे से चीजों को अन्दर बाहर किया जाता है, ठीक उसी प्रकार, इन दरवाजों से हमारे शरीर और मन में अच्छी या बुरी बातो को प्रवेश करवा सकते हैं।

प्रकाश उपजायते,
अर्थात् इन द्वारों से अच्छी बातों को ग्रहण करने की इच्छा होना, जैसे- जिह्वा से अच्छी वाणी बोलने की इच्छा होना, आदि। हमारे शरीर के सभी अवयव, प्रत्येक कोशिका, हमारा मन, हमारी सारी इच्छाएँ ज्ञान के इस प्रकाश से ज्ञानमय हो जाती हैं। 

श्रीभगवान् कहते हैं, जो सत्त्वगुणी व्यक्ति होते हैं, उनकी बुद्धि सदा जाग्रत रहती है। उन्हें हर बात का, हर समस्या का अच्छा हल मालूम रहता है। जैसे हमारे माता-पिता हमारी हर समस्या का समाधान हमें तुरन्त बता देते हैं, क्योंकि उनका सत्त्वगुण जाग्रत रहता है। वैसे ही सन्त-महात्मा हमारे बिना पूछे ही हमारे मन में चल रहे प्रश्न का बिना पूछे ही उत्तर दे देते हैं। जिनमें सत्त्वगुण प्रधान है, जाग्रत है। उनमे बुद्धि का, ज्ञान का प्रकाश सदा रहता है। 

यह हमारे विवेक पर निर्भर है कि हमें अच्छी बातें, अच्छी आदतें ग्रहण करनी हैं या बुरी आदतें? अच्छी बातें और अच्छी आदतें हमें अच्छा स्वभाव देती हैं, हमें जीवन में बहुत सफल बनाती हैं, यह बात आप सभी को मालूम है। 

इन गुणों से हमारा व्यक्तित्व बनता है। ऐसा नहीं होता है कि कोई व्यक्ति पूर्णरूप से सत्त्वगुणी या रजोगुणी या तमोगुणी हो। हम कभी रजोगुणी, कभी तमोगुणी, तो कभी रजोगुणी होते हैं। तीनों गुणों का होना आवश्यक होता है। रजोगुण सही मात्रा में आवश्यक है। रजोगुण होगा तभी हमें परीक्षा में अच्छे अङ्क लाने की इच्छा होगी। रजोगुण भी कुछ मात्रा में ठीक होता है। मन की शान्ति के लिए सत्त्वगुण का होना आवश्यक है। हमने बाहरवें अध्याय में पढ़ा था-

यतात्मा दृढनिश्चयः
जो दृढनिश्चयी है वह श्रीभगवान् को प्रिय है। यह दृढनिश्चय सत्त्वगुण से आता है। 

इन तीनों गुणों का सही मात्रा में सन्तुलन (balanced) होना आवश्यक है। 

लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥

रावण रजोगुणी था, उसे सब कुछ पाने की प्रबल इच्छा थी। कुबेर की सोने की लङ्का छीन ली। सीताजी का अपहरण किया। तमोगुणी लोगों को हर समय कुछ न कुछ पाने का अति लालच होता है। आज मुझे साइकल चाहिए, कॉलेज जाएँगे तो स्कूटी, जॉब लगेगा तो कार। छोटा घर, बड़ा घर। इच्छाओं का कोई अन्त नहीं। 

तो इस प्रकार लालच का कोई अन्त नहीं। ये सब जब रजोगुण प्रधान होता है, तब होता है। कुछ बच्चे हर समय हाथ, पैर या कुछ नटखटपन करते रहते हैं, यह भी रजोगुण के कारण होता है। 

रजोगुण के कारण लोभ उत्पन होता है। 

अशम:-
अर्थात् इन्द्रियों पर, इच्छाओं पर विजय न होना। आप लोग यहाँ विवेचन में अपना टी वी, खेल छोड़ कर बैठे हैं, यह सत्त्वगुण के कारण है। सभी की सराहना, सभी को शाबासी। 

लोभ, अशम आदि रजोगुण के कारण आते हैं। 

रजोगुण के कारण हम श्रीभगवान् से हर समय कुछ न कुछ माँगते रहते हैं। आज यह खिलौना दिलवा दो, अच्छे अङ्कों से पास करवा दो आदि। हमें रजोगुण को नियन्त्रित करना चाहिए। अपने अन्दर सत्त्वगुण लाने से रजोगुण थोड़ा कम होता है। 

आगे श्रीभगवान् क्या कहते हैं?

स्पृहा-
अर्थात् किसी चीज से आसक्त (Over attached) हो जाना। 
आज से हम यह निश्चय करें, सङ्कल्प करें कि शाम को श्रीभगवान् के नाम से दीपक जला कर प्रणाम करके, माता पिता को प्रणाम करके, गीताजी के दो अध्यायों का स्पष्ट व उच्च स्वर में पठन करेंगे। सोचिए! यदि आपके पठन करते समय कोई मेहमान आ गए तो वे आपकी कितनी प्रशंसा करेंगे? तब आपको कितना आनन्द आएगा, फिर वह प्रशंसा हमारे मन में यदि बार-बार दूसरे दिन भी आती रहे और इस स्तुति से हम आसक्त रहते हैं तो वह स्पृहा कहलाती है। यह स्पृहा, रजोगुण के कारण होती है। 

हनुमानजी का एक प्रसङ्ग-
जब वे उड़ कर वेग से समुद्र के ऊपर उड़ते हुए लङ्का की ओर जा रहे थे, जटायु के भाई सम्पाती ने उन्हें बता दिया था कि उसने रावण को सीता जी का हरण कर लङ्का की दिशा में ले जाते हुए देखा है। जाम्बवन्त जी ने हनुमान जी को उड़ने के लिए प्रोत्साहित किया था कि सब वानरों में एक आप ही के पास इतनी शक्ति है, कि आप रामजी के काम के लिए उड़ कर जा सकते हैं। हनुमान जी की यात्रा में विघ्न भी आए थे। मैनाक नामक पर्वत ने उनके आगे आकर कहा कि आप यहाँ थोड़ा विश्राम कर लीजिए। आगे समुद्र की सुरसा नामक राक्षसी ने अपने विकराल मुख से हनुमान जी की परछाई पकड़ ली तो हनुमान जी आगे नहीं उड़ पा रहे थे। सुरसा ने उन्हे कहा कि मैं तुम्हे अपने पेट में डालूँगी तब बुद्धिमान हनुमान जी ने एक युक्ति लगाई। उन्होंने अपना शरीर और बड़ा कर दिया तो राक्षसी ने भी अपना शरीर और बड़ा किया और मुँह खोल कर उन्हे खाने को दौड़ी। हनुमान जी ने अपने को और विकराल कर दिया, सुरसा ने भी वैसा ही किया। तब हनुमान जी स्वयं को एकदम सूक्ष्मरूप में लाकर सुरसा के मुँह के से उसके पेट तक जाकर विकराल मुँह को बन्द करने से पहले ही बाहर सुरक्षित निकल आए। सुरसा देखती ही रह गई। हनुमान जी बोले मैं आपके पेट में जाकर आ गया। आपने मुँह बन्द नहीं किया, यह आपकी ग़लती। बस अब मुझे जाने दो। तब सुरसा ने उन्हें जाने दिया। इस कहानी का उद्देश्य यह है कि जब भी कोई हमारी प्रशंसा के लिए सुरसा जैसा बड़ा मुँह खोलता है तो हमें भी हनुमान जी जैसे अपने अच्छे कार्यो को और भी बढ़ा देना है। काम के स्तर (quality) को और भी अच्छा करते जाना है। 

हमें अपने कार्य की प्रशंसा सुनना अच्छा लगता है पर हमें अभिमान नहीं करना है, हनुमान जी जैसे एकदम विनम्र हो जाना है और कहना है, मैं तो कुछ नहीं, सब श्रीभगवान् ही करवा रहे हैं। हमें मन लगाकर अपना काम ठीक से करते जाना है। 

आगे श्रीभगवान् तमोगुण के बारे में बता रहे हैं। 

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥
14.13

तमोगुण बढ़ने से अप्रकाश, अप्रवृत्ति, प्रमाद और मोह बढ़ता है। तमोगुण प्रधान होता है तो अप्रवृत्ति अर्थात् कुछ करने की इच्छा ही नहीं होती, बस पड़े रहने को मन करता है। 

अप्रकाश अर्थात् विवेक जाग्रत न होना। हमें समझ में ही नहीं आयेगा कि किस बात में अपना भला है? किस बात में नहीं। क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए। छुट्टियों में holiday homework (Project) भी जब पाठशाला खुलने का समय आयेगा कि अब किए बिना कोई पर्याय (option) नहीं है, तब करना याद आएगा। जब तक अति आवश्यक नहीं हो तब तक कार्य को आज नहीं कल, फिर कल करते हुए रोज आगे-आगे ढकेलना।  सब तमोगुण के कारण होता है। 

आप लोग गीताजी पढ़ रहे है तो ऐसा नहीं करोगे। सही है न,

प्रमाद में रहना अर्थात् दुनिया भर के सब काम जो नहीं करने हैं, वे पहले करना और जो करने चाहिएं उन्हें नहीं करना। 

इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि हमें अपने जीवन में प्रगति करनी है तो तमोगुण को त्यागना होगा। रात्रि की नींद के लिए जितना आवश्यक है, बस उतना ही तमोगुण रखना चाहिए। अधिक हुआ तो उपरोक्त विकार शरीर में घर कर लेंगे। 

14.14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है (तो वह) उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।

विवेचन- मृत्यु के समय हमारी गति कैसी होगी?

हम हर पल श्रीभगवान् का स्मरण करते रहें, श्रीभगवान् का नाम जप करते रहें। बुरे विचार हमारे मन में कभी न आएँ। हम सबसे अच्छा व्यवहार करते रहें। हमारे माता-पिता सदा हमें यह सब बताते रहते हैं। 

मृत्यु के समय जो मनुष्य सत्त्वगुणों के प्रभाव में होता है, अर्थात् जो श्रीभगवान् का नाम स्मरण कर रहा होता है, जिसके मन में बुरे विचार नहीं होते हैं, मन में समाज के कल्याण का विचार कर रहा है, जिसका मन प्रसन्न और शान्त होता है, उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। 

किसी की मृत्यु जल्दी तो किसी की वृद्धावस्था में होती है। यह किसी को भी, कभी भी आ सकती है, इसलिए हमें हर समय अच्छे विचार, अच्छे कार्य करते रहने चाहिए। इससे सत्त्वगुण बढ़ेंगे और हम सत्त्वगुणी बन जायेंगे। फिर कब, क्या हो किसे चिन्ता।

हम इस जन्म में कितने सात्त्विक बन पाए, इसका हमें ध्यान रखना चाहिए। 

आगे के श्लोक मे श्रीभगवान् रजोगुण में हुई मृत्यु के बारे में बता रहे हैं। 

14.15

रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥

रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

विवेचन: यदि राजसिक गुणों में मृत्यु होती है तो कुछ न कुछ काम करने की योनि अर्थात् मनुष्य योनि में जन्म होता है। मनुष्य सदा कुछ न कुछ कर्म करता रहता है, सुनने का, बोलने का, समझने का, श्रम का आदि। 

यदि तामसिक गुणों के साथ मृत्यु होती है तो मूढ़ योनि अर्थात् जिनके अपने कर्मो के उपर कोई नियन्त्रण (control) नहीं होता जैसे छोटे कीड़े-मकोड़े। ऐसे प्राणियों के रूप में जन्म होता है। 

हमें फल के बारे में जानकारी होनी चाहिए। जो सत्त्वगुणी होते हैं, उनके मन में सबके प्रति अच्छी भावनाएँ रहती हैं। 

रजोगुणी अपनी इच्छाओं के प्रभाव में रहते हैं, एक गाड़ी, दो गाड़ियाँ, छोटा घर, बड़ा घर आदि अनन्त इच्छाएँ। 

तमोगुण में अज्ञान का प्रभाव हम पर होता है। 

14.16

कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥

विवेकी पुरुषों ने – शुभ कर्म का तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख (कहा है और) तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

विवेचन: श्रीभगवान् कर्मफल के बारे में बता रहे हैं। यदि हम कोई काम कर रहे है तो उससे होने वाले लाभ के बारे में हमें पता होना चाहिए कि नहीं! सात्त्विक रहें तो क्या फल मिलेगा और रजोगुणी या तमोगुणी बने रहें तो क्या फल मिलेगा? 

गीताजी हम क्यों पढ़ रहे हैं? ताकि गुणों की वृद्धि हो और हम जीवन में अच्छे व्यक्ति बन पाएँ। छत्रपति शिवाजी महाराज को उनकी माँ, जीजाबाई सुन्दर सुन्दर प्रेरणादायक कहानियाँ, रामायण-महाभारत की कथाएँ, भगवद्गीता जी सुनाया करती थी, जिसके कारण क्या हुआ? शिवाजी महाराज इतने तेजस्वी हुए, कि बड़े हो कर उन्होंने स्वराज्य की स्थापना कर दी, इसलिए अपना जीवन बनाने के लिए हमें ये ग्रन्थ पढ़ने चाहिएं। 

जो सत्त्वगुणी हैं, उनके साथ होने वाले सारे कार्य और उनके द्वारा किए गए सारे कार्यो का फल निर्मल होता है। वे लोगों के बारे में अच्छा ही सोचते हैं। 

यदि हम किसी की निन्दा नहीं करेंगे, बुराई नहीं करेंगे तो हमारा मन निर्मल और शान्त ही रहेगा और हम पढाई में अच्छी तरह से मन लगा पायेंगे। हमें पढाई करते देख हमारे माता-पिता बहुत प्रसन्न होंगे और घर में वातावरण एकदम आनन्ददायक, पवित्र रहेगा। 

तामसिक गुणों से मनुष्य इच्छाओं में उलझा रहता है। इच्छापूर्ति के लिए अपनी क्षमता से ज्यादा काम करता है और दुःखी रहता है। 

ज्ञानी बनने के लिए हमें सत्त्वगुणी बनना आवश्यक है। 

हम सात्त्विक भोजन करेंगे तो हमारे अन्दर सत्त्वगुण विकसित होंगे। यदि हम राजसिक भोजन, बहुत ज्यादा तीखा, चटपटा भोजन खायेंगे तो पेट की बीमारियाँ होंगी और हमारे भीतर राजसिक गुण आयेंगे। 

तामसिक भोजन, माँस, मछली खायेंगे तो हमारे अन्दर तामसिक गुण आयेंगे। 

हमें सत्त्वगुण बढ़ाने हैं तो हमें सात्त्विक भोजन करना चाहिए। सत्त्वगुण होंगे तो इसी जीवन में हमें स्वर्ग समान सुखों की प्राप्ति होगी। 

14.17

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥

सत्त्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं।

विवेचन: श्रीभगवान् कहते हैं, सत्त्वगुण से ज्ञान, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से अज्ञान और प्रमाद की उत्पति होती है। 

हमें अपने अन्दर सत्त्वगुण की प्रधानता रखनी है, जो सात्त्विक भोजन जैसे- दाल, चावल, सब्जी रोटी, दूध, फल, सूखे मेवे (Dry Fruits) आदि खाने से विकसित होती है। 

तमोगुणी और रजोगुणी भोजन की बातें हम पहले ही कर चुके हैं। हमें ऐसे भोजन से दूर रहना चाहिए। 

14.18

ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥

सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं (और) निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।

विवेचन: श्रीभगवान् कहते हैं कि जो सत्त्वगुणी हैं, उन्हे उर्ध्व-लोकों की प्राप्ति होती है। स्वर्ग की, वैकुण्ठ की प्राप्ति होती है। 

जो सत्त्वगुणी होते हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 

भक्त प्रह्लाद के पिता हिरणकश्यपु एक राक्षस थे और हरिभक्ति में लीन रहने के कारण प्रह्लाद को विभिन्न कष्ट देते थे। प्रह्लाद बोले मेरे हरि, मेरे नारायण, मेरा वैकुण्ठ तो मेरे अन्दर हैं, उसे आप कैसे हटाएँगे? 

मन की स्थिति इतनी उच्च हो जाती है कि वह सदा स्वर्ग के आनन्द में रहता है, उसे मङ्गल वस्तुओं के दर्शन होते हैं। उसके मन में सदा वैकुण्ठ जैसा आनन्द रहता है। 

रजोगुणी व्यक्ति मनुष्य योनि में, सदा कर्म में लिप्त रहते हैं।
 
तमोगुणी व्यक्ति अज्ञानी ही रहता है जिसके फलस्वरूप जीवन में कोई उन्नति नहीं कर पाता और उसकी अधोगति (downfall) होती जाती है, उसका स्तर नीचे की ओर गिरता जाता है। 

ज्ञानी व्यक्ति के क्या लक्षण होते है? 
क्या हम इन्ही गुणों के अनुसार चलते रहेंगे? ये गुण हमें नचाते रहेंगे? नहीं, इसलिए श्रीभगवान् आगे के श्लोक में क्या कहते है? 

14.19

नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥

जब विवेकी (विचार कुशल) मनुष्य तीनों गुणों के (सिवाय) अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और (अपने को) गुणों से पर अनुभव करता है, (तब) वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं जो ज्ञानी व्यक्ति होते हैं, वे इन तीनों गुणों से भी परे होते हैं। 

ये लोग विवेकी पुरुष होते हैं और जानते हैं यदि वे अधिक निद्रा ले रहे हैं तो वह तमोगुण के कारण है। यदि वे गीताजी के पठन-मनन में अपना समय बिताते हैं तो वह सत्त्वगुण के कारण है। 

विवेकी व्यक्ति को पता होता है कि उनके अन्दर का चैतन्य-तत्त्व, दैवी-तत्त्व है, वह यह कार्य नहीं कर रहा है। यह कार्य तो गुण कर रहे हैं, इसलिए मुझे इन गुणों से प्रभावित होने की कोई आवश्यकता नहीं है। 

इसे एक सुन्दर कथा से समझते हैं। एक बार, गोकुल में जब भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ वार्तालाप कर रहे थे, ज्ञान की बातें कर रहे थे तो गोपियों ने पूछा कि यहाँ पर तो तुम ज्ञान की बाते कर रहे हो तो तुम हमारे घरों मे घुस कर दही, माखन क्यों चुराते हो? तो श्रीभगवान् कुछ नहीं बोले। थोड़े दिनों बाद गोकुल में महर्षि दुर्वासाजी आए, जिन्होंने केवल दूर्वा खाने का प्रण लिया था। भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों को उनके लिए पञ्च पकवान बनाकर और जाकर भोग अर्पित करने को कहा। जब वे पञ्च पकवान लेकर यमुना नदी के तट पर पहुँचीं तो देखा यमुना का जल बहुत ऊपर तक बह रहा है। एक ने जाकर कृष्णजी को बताया कि अब पार कैसे जाएँ? श्रीभगवान् बोले, यमुनाजी से कहना कि यदि श्रीकृष्ण ने किसी भी स्त्री का मुख नहीं देखा हो तो आप हमें पार जाने के लिए अपना जल स्तर कम कर दें। गोपियाँ सोचने लगी श्रीकृष्ण तो हमारा मुख नित्य देखते हैं, तो वे ऐसी बात क्यों कह रहे हैं? फिर भी उन्होंने यमुना नदी को भगवान् श्रीकृष्ण की कही बात कही तो वे आश्चर्यचकित रह गईं। यमुना जी ने अपना जल स्तर कम करके उन्हें पार जाने का रास्ता बना दिया। पार जाकर गोपियों ने दुर्वासा ऋषि जी की पूजा करके उन्हें सब पञ्च पकवानों का भोग अर्पित किया और कहा भगवान् श्रीकृष्ण ने ये आपके लिए भेजा है। तो दुर्वासा ऋषि ने अपनी केवल दूर्वा ग्रहण करने की प्रतिज्ञा होते हुए भी बिना कुछ बोले सब अन्न ग्रहण कर लिया। गोपियो को आश्चर्य हुआ कि दुर्वासा ऋषि ने तो केवल दूर्वा ही ग्रहण करने की प्रतिज्ञा ली थी। 

घर वापस जाने के लिए जब गोपियाँ यमुना तट पहुँची, तो पानी के ऊँचे स्तर के कारण वापस ऋषिजी के पास पहुँची और अपनी दुविधा बताई। उन्होंने गोपियों से पूछा कि आते समय वे कैसे आई थीं? गोपियों ने श्रीकृष्णजी की कहीं बात उन्हें बताई। दुर्वासा ऋषि बोले कि तुम यमुनाजी से कहना की यदि दुर्वासा मुनि ने दूर्वा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाया हो तो हमें पार जाने का मार्ग बना दो। गोपियाँ अचम्भित रह गयीं, यह सोच कर कि इन्होंने अभी तो पञ्च पकवान खाये थे। जब यमुना तट पर जाकर उन्होंने ऋषिजी की कही बात दोहराई तो यमुनाजी ने अपना जल स्तर कम कर के उन्हें रास्ता बना दिया। 

अचम्भित गोपियाँ भगवान् श्रीकृष्ण के पास दौड़ कर गईं और इन दोनों बातों का मतलब पूछा तो श्रीभगवान् बोले उस दिन आप मुझसे पुछ रही थी न, तो सुनो। मैं इन गुणों में रहता तो हूँ, पर इनसे प्रभावित नहीं होता। मैं आपको देख रहा हूँ, पर आपसे आसक्त (attached) नहीं रहा हूँ, स्पृहा नहीं रख रहा हूँ। उसी प्रकार दुर्वासा ऋषि की वासना उस अन्न में नहीं थी, केवल भगवान् श्रीकृष्ण का आदेश था, इसलिए उन्होंने उसे ग्रहण किया था। मन से तो वे दूर्वा ही ग्रहण कर रहे थे। 

तो हम देखते है कि ये विवेकी पुरुष, मन से इतने पक्के होते हैं कि सब गुणों से अतीत, गुणातीत हो गए हैं। विवेकी मनुष्य सोचता है कि मैं इन गुणों में रहता तो हूँ, पर गुणों से प्रभावित नहीं होता हूँ। 

भगवान् कालभैरव को कुछ लोग तामसिक भोजन चढ़ाते हैं, तो क्या हमें भी तामसिक भोजन लेना चाहिए, नहीं। श्रीभगवान् तो गुणातीत, गुणों से परे हैं, पर हम नहीं हैं। हमें सात्त्विक रहना है। हम सात्त्विक गुणों मे रहते हैं इसलिए हमे अपने खानपान पर, अपनी वाणी पर, अपने रहन-सहन पर ध्यान देना है।

14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुःखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है।

विवेचन- आगे श्रीभगवान् कहते हैं- ज्ञानी लोग गुणों से परे होते हैं, जिसके कारण वे जन्म, जरा, रोग, मरण से भी परे रहते हैं। वें सदैव अपने कार्यो में, प्रभु भक्ति में लीन रहते हैं, अमरता का अनुभव करते हैं।

14.21

अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥

अर्जुन बोले – हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से (युक्त) होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?

विवेचन: अर्जुन ने महत्वपूर्ण प्रश्न श्रीभगवान् से किए कि क्या हम इन तीनों गुणों से परे जा सकते हैं, गुणातीत बन सकते हैं‌? अगर हाँ तो कैसे?

इन गुणों से परे, गुणातीत व्यक्तियों के क्या लक्षण होते हैं? 
उनका आचरण कैसा होता है?

बच्चों के हिसाब से ये श्लोक और आगे के कुछ श्लोक थोड़े कठिन स्तर (advanced level) के लग सकते हैं, इन पर ज्यादा विचार न करते हुए हम बस इन्हे संक्षिप्त (short) में समझ लेंगे। 

14.22

श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥

श्री भगवान बोले – हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृति तथा मोह – (ये सभी) अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी (गुणातीत मनुष्य) इनसे द्वेष नहीं करता और (ये सभी) निवृत्त हो जायँ तो (इनकी) इच्छा नहीं करता।

विवेचन: श्रीभगवान् कहते हैं ज्ञान का प्रकाश, प्रवृत्ति याने कुछ करने की इच्छा होना, यदि ये गुणातीत व्यक्ति में आ भी जाते है तो वे उनका द्वेष नहीं करते, अर्थात् सम भाव में रहते हैं। जैसे किसी सन्त को पञ्च पकवान्न मिलने पर या कभी एकदम सादा भोजन मिलने पर या कभी कोई भी भिक्षा न मिलने पर भी एक से, प्रसन्न भाव में रहते हैं। 

गुणातीत व्यक्ति किसी भी चीज में लगाव नहीं रखते। अपने स्वामीजी के रसोईये (cook) को आज तक यह नहीं पता कि स्वामीजी का प्रिय भोजन क्या है? जो भी मिलता है, वह उसे ही प्रसन्न भाव से, लगाव रहित होकर ग्रहण करते हैं, खाते हैं। 

गुणातीत व्यक्ति को काम करने में भी लगाव नहीं और करना पड़े तो उलाहना (complaint) नहीं, क्योंकि उन्हें पता है कि ये काम मेरे अन्दर का दैवतत्त्व नहीं, पर शरीरतत्त्व कर रहा है। उन्हें इससे कोई लगाव नहीं होता। 

जिस तरह कमल के पत्तों पर पानी की बूँदे नहीं ठहरती, उसी तरह ये लोग संसार में रहते तो हैं, पर संसार के गुणों से इन्हें कोई लगाव नहीं रहता। वे श्रीभगवान् में सदा लीन रहते हैं। 

14.23

उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥

जो उदासीन की तरह स्थित है (और) (जो) गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता (तथा) गुण ही (गुणों में) बरत रहे हैं – इस भाव से जो (अपने स्वरूप में ही) स्थित रहता है (और स्वयं कोई भी) चेष्टा नहीं करता।

विवेचन- जैसे हमने दुर्वासा ऋषि की कथा में सुना कि श्रीभगवान् के कहने पर, उन्होंने भोजन तो ग्रहण कर लिया, पर उससे उनकी केवल दूर्वा ग्रहण करने की शपथ मे कोई अन्तर नही हुआ, क्योंकि उस भोजन से उन्हे कोई लगाव नही था। उसके स्वाद से कोई लगाव नहीं था। उन्होंने उसे उदासीन हो कर प्रभु इच्छा के कारण खाया।

गुणातीत व्यक्ति को शरीर से या उसके गुणों से कोई लगाव नहीं रहता है। 

14.24

समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥

जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम (तथा) अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है, जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है। जो अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है (और) जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। (14.24-14.25)

विवेचन: आगे श्रीभगवान् कहते हैं, ये गुणातीत लोग सुख-दुःख में, स्वर्ण या पत्थर देख कर भी समभाव में रहते हैं। उन्हें तो सभी में श्रीभगवान् ही दिखते रहते हैं। वें प्रिय और अप्रिय दोनों बातो में धैर्यशील होते हैं। 

ज्ञानी लोग संसार की बातों से उदासीन (balanced) रहते हैं। कुछ चला भी जाता है तो श्रीभगवान् का था, उन्होंने वापस ले लिया, यही भाव सदा रखते हैं। स्तुति और निन्दा दोनों में भी वे समभाव में रहते हैं। 

14.25

मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥

विवेचन: मान-अपमान में समान भाव (balanced) रहना। माता-पिता डाँट भी दें तो बुरा नहीं मानें, क्योंकि वे हमारे भले के लिए ही हमें डाँटते हैं। 

मित्र हो या शत्रु दोनों को एक जैसा देखना चाहिए। क्या हमें दोनों से एक समान व्यवहार करना चाहिए?

श्रीभगवान् कहते हैं, नहीं, हमें लोगो से उनकी योग्यता के अनुसार ही व्यवहार करना चाहिए। जैसे कोई अतिथि अगर परिचित हो तो उन्हें हम घर के अन्दर तक लाकर भोजन कराते हैं। 

यदि कोई सन्त आते हैं तो हम उनका हार-फूलों से स्वागत करके उचित आसन पर बिठाते हैं, उनकी फल, प्रसाद आदि से सेवा करते हैं। यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे हम भिक्षा देकर बाहर से ही विदा करते हैं।  

हमें सभी में श्रीभगवान् के दर्शन तो करना चाहिए, पर व्यवहार उनकी योग्यतानुसार ही करना चाहिए। 

गुणातीत व्यक्ति संसार के भौतिक सुखों का त्याग करता है और हर पल ही श्रीभगवान् की भक्ति में लीन रहता है। 

14.26

मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है।

विवेचन: हमारी भक्ति श्रीभगवान् के प्रति पूर्ण समर्पित भाव से होनी चाहिए। एकदम श्रीभगवान् पर केन्द्रित (focused) होनी चाहिए। भक्ति में प्रभु को पाने की एक गहरी छटपटाहट होनी चाहिए। 

श्रीभगवान् आगे कहते हैं, ऐसे व्यक्ति स्वयं ब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं, उन्हें श्रीभगवान् के दर्शन हो जाते हैं। 

14.27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥

क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी अमृत का तथा शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं (ही हूँ)।

विवेचन- हम सांसारिक लोगों को अपने मित्र, स्नेही, प्रिय वस्तु आदि मिलने से आनन्द मिलता है। 

यहाँ श्रीभगवान् गुणातीत लोगों के परम सुख का वर्णन कर रहे हैं। जब श्रीभगवान् शाश्वत रूप में गुणातीत लोगों पर प्रसन्न हो जाते हैं तो ऐसे लोगों को शाश्वत आनन्द की प्राप्ति होती है। अपने भीतरी आनन्द के लिए उन्हें हमारी तरह बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती। वे अपने आन्तरिक शाश्वत आनन्द में लीन रहते हैं।  

बच्चों से पूछा कि व्यायाम कौन-कौन करता है? बाहर मैदानी (out-door) खेल खेलने कौन-कौन जाता है? दोनों ही बच्चों के विकास के लिए आवश्यक है। अभी हमें गुणातीत बनने के लिए अधिक अभ्यास करना पड़ेगा। 
गीता पढ़ें, पढायें, जीवन में लायें। 

तमोगुण से रजोगुण में और फिर रजोगुण से सत्त्वगुण में हमें जाना हैं। 

इसके उपरान्त सभी ने भक्तिभाव से हरि शरणम् धुन का गायन किया। 

गोपालकृष्ण भगवान् की जयकार के साथ सुन्दर सरल विवेचन का समापन हुआ। 

विचार मन्थन (प्रश्नोत्तर)- 
प्रश्नकर्ता : दिव्या दीदी
प्रश्न : जैसे श्रीभगवान् होते हैं, वैसे क्या भूत भी होते हैं? 
उत्तर : सभी प्राणी भूतमात्र कहलाते हैं। अलग-अलग योनियों में प्राणियों का जन्म होता है। देवता भी एक योनि हैं। राक्षस, भूत भी एक योनि हैं, उनसे डरने की कोई बात नहीं है। 

प्रश्नकर्ता : राम भैया
प्रश्न : अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण ने कौरवों के साथ युद्ध क्यों किया था? 
उत्तर : कौरव बुरे थे, अधर्म का आचरण करते थे। जैसे हमने सोलहवें अध्याय में देखा है। पाण्डव धर्म का आचरण करते थे। यह युद्ध धर्म की अधर्म पर जीत के लिए लड़ा गया था। जैसे अभी हमारे देश ने आतंकवादियों से युद्ध किया और उन्हें हराया। 

प्रश्नकर्ता : प्रद्युम्न भैया
प्रश्न : क्या कोई व्यक्ति कोई भी पाप न करे, तो क्या वो देवता या देवदूत (Angel) बन सकता है? 
उत्तर : हाँ, अगर किसी का पुण्यसञ्चय अच्छा हो तो स्वर्गलोक में उन्हें देवत्व की प्राप्ति होती है। श्रीभगवान् हमें यही तो बता रहे हैं कि हमें अपने सत्त्वगुण को बढ़ाने का निरन्तर प्रयास करना चाहिए। 

तकनीकी टीम और सभी सहयोगियों को धन्यवाद देकर समापन प्रार्थना और हनुमान चालीसा के साथ सत्र का समापन हुआ।
 
।। ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।। 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘गुणत्रयविभागयोग’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।