विवेचन सारांश
हम स्वयं के मित्र एवम् स्वयं के शत्रु

ID: 7327
हिन्दी
शनिवार, 28 जून 2025
अध्याय 6: आत्मसंयमयोग
1/4 (श्लोक 1-5)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


सुमधुर प्रार्थना, हनुमान चालीसा पाठ, दीप-प्रज्वलन, भगवान श्रीकृष्ण की वन्दना एवम् श्री गुरु चरण-कमल-वन्दना के साथ छठे अध्याय के विवेचन सत्र का आरम्भ हुआ।

आज के इस विवेचन सत्र में जय श्रीकृष्ण के सम्बोधन के साथ सभी बालकों का स्वागत किया गया।

आत्मसंयमयोग नाम का यह छठा अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है यदि जीवन में आत्मसंयम न हो तो हम जीवन में जो करना चाहते हैं वो हम नहीं कर पातें हैं। मन पर संयम (control) करना चाहिये अर्थात हमें हमारे कर्म सही समय पर करने चाहिए। पढ़ाई के समय पढ़ाई और खेल के समय खेलना, यही आत्मसंयम है।

हमारे दोस्त खेलने के लिए बुलाने आ जाते हैं और अधिकतर हम मन पर संयम न रख कर पढ़ाई छोड़कर खेलने चले जाते हैं कि पढ़ाई तो रात में अकेले में की जा सकती है। फिर खेल के आते हैं और थक कर सो जाते है ऐसा नहीं करना चाहिये।

आत्मसंयम की कमी के कारण से ही बालक आवेग में आकर भाई बहन की आइसक्रीम भी खा ले तो उन्हें दुःख होता है।

मन पर संयम होना बहुत महत्वपूर्ण (importanant) है। आत्मसंयम विकसित करने से बालक को अपने आवेगों पर नियन्त्रण रखने और सही निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है और अपने जीवन में सुधार कर सकता है।

भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती का वृतान्त बालकों में आत्मसंयम विकसित करने का सही उदाहरण है। 

पहले समय में गुरुकुल में पढ़ाई होती थी। भगवान् श्रीकृष्ण और सुदामा बहुत अच्छे  मित्र थे।

गुरुकुल में पढ़ाई के साथ-साथ उनको अन्य काम भी कराये जाते थे। जिससे गुरुकुल के काम भी हो जाते थे और बच्चों को भी थोड़ा सा काम देने से वो शारीरिक कर्म (फिजिकल वर्क) भी कर लेते थे। उनको चीजों की समझ अच्छी होती थी।

गुरुकुल में सबको अलग-अलग कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी।

कृष्ण जी को लकड़ी काटने का काम मिला। गुरुमाता ने दोनों के लिये पोटली में चने बाँध कर दे दिए। जंगल में जाकर कृष्ण भगवान पेड़ पर चढ़कर लकड़ी काटने लगे एकदम बिजली कड़कने लगी तूफान आ गया हल्का अंधेरा भी छा गया सुदामा तो पेड़ के नीचे खड़े हो गए और कृष्ण भगवान पेड़ पर ही बैठे रहे। अब सुदामा को भूख लग रही थी तो उन्होंने अपने हिस्से के चने खाने के बाद कृष्ण जी के हिस्से के चने भी खा लिए।

थोड़ी देर बाद जब तूफान कम हुआ और कृष्णजी नीचे आ कर बोलते हैं कि सुदामा मुझे बहुत भूख लगी है मेरे चने दे दो।

सुदामा थोड़ा दु;खी होकर बोले कि मुझे भूख लगी थी और मैंने सारे चने खा लिये।

कृष्ण भगवान् नाराज नहीं हुए, उन्होंने एक दम शान्ति से कहा कि कोई बात नहीं हम गुरुकुल पहुँचकर कुछ खा लेंगे। 

आदर्श स्वभाव / व्यवहार यही होता है कि हम कोई प्रतिक्रिया नहीं करें। जब भी आश्रम में लौटते हैं तो गुरुमाता पूछती है सुदामा चने खा लिए थे। कृष्णजी से पूछा तो सुदामा जी ने डरते हुए उत्तर दिया कि कृष्णजी के हिस्से के चने भी मैंने ही खा लिए क्योंकि मुझे भूख लगी थी। गुरुमाता क्रोधित हो गई उन्हें चिन्ता हुई कि कृष्णजी इतनी देर भूखे रहे उन्होंने सुदामा जी को श्राप दे दिया कि तुमने दूसरों के हिस्से का खाया है तो तुम जीवन पर्यन्त भोजन के लिए कष्ट उठाओगे। सुदामाजी जीवन पर्यन्त गरीबी में रहे क्योंकि उन्होंने स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रखा। फिर जब सुदामाजी कृष्ण जी की शरण में गए तब उनके सारे कष्ट दूर हुए।

 इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः

तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।3.12।।

अर्थात् दूसरों के हिस्से पर यदि हम अधिकार करते हैं तो हमें पाप लगता है। यह शिक्षा मिलती है कि स्वयं पर नियन्त्रण करना बहुत आवश्यक है।


6.1

श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः(ख्) कर्मफलं(ङ्), कार्यं(ङ्) कर्म करोति यः।
स सन्न्यासी च योगी च, न निरग्निर्न चाक्रियः॥1॥

श्रीभगवान् बोले -- कर्मफल का आश्रय न लेकर जो कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; (और) केवल अग्नि का त्याग करने वाला (संन्यासी) नहीं होता तथा (केवल) क्रियाओं का त्याग करने वाला (योगी) नहीं होता।

विवेचन - हम सामान्यत: समझते हैं कि जो भगवा रङ्ग के कपड़े पहनते हैं, माला पहनते है, जूड़ा बनाते है वे ही संन्यासी होते हैं। ऐसा नहीं है केवल वे ही संन्यासी नहीं होते हैं। जो करने योग्य कर्म करते हैं, कर्तव्य कर्म वे भी संन्यासी ही होते हैं। शास्त्रों में जो विदित है वह कार्य करना चाहिए। झूठ नहीं बोलना, चोरी नहीं, दूसरों की निन्दा न करना यह सब कर्म हमें नहीं करने चाहिए।

करने योग्य कर्म अर्थात् सच बोलना चाहिए, अपना काम स्वयं करना चाहिए, दूसरों की सहायता करनी चाहिए। शालीनता का व्यवहार करें, सकारात्मक रहें। गलत कार्य करके हम आधुनिक कहलाऍंगे by using bad words or abusing language we will be called modern it is not good रामजी, कृष्णजी के बारे में हमने पढ़ा-सुना है उनके जैसा व्यवहार करने का प्रयास करना चाहिए। जो अच्छे कार्य करते हैं हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। जो करने योग्य कार्य करते हैं वे ही योगी है और वे ही संन्यासी है। संन्यासी वे होते हैं जो भिक्षा के द्वारा अपना जीवन यापन करते हैं, अग्नि का प्रयोग नहीं करते अर्थात स्वयं का भोजन पकाकर नहीं खाते। कहने का तात्पर्य यह है कि जो शास्त्रों में बताया गया है, करने योग्य कार्य हमें वही करने चाहिए। सोशल मीडिया पर भी हमें सब कुछ नहीं देखना चाहिए क्योंकि जैसा हम देखते हैं वैसा ही सोचते हैं और जैसा सोचते हैं वैसा ही करते हैं।

6.2

यं(म्) सन्न्यासमिति प्राहु:(र्), योगं(न्) तं(म्) विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो, योगी भवति कश्चन॥2॥

हे अर्जुन ! (लोग) जिसको संन्यास ऐसा कहते हैं, उसी को (तुम) योग समझो; क्योंकि संकल्पों का त्याग किये बिना (मनुष्य) कोई-सा (भी) योगी नहीं हो सकता।

विवेचन- जो करने योग्य काम को करते हैं या जो व्यक्ति वह कर्म करता है जिसे करना चाहिए, वही योगी या संन्यासी होते हैं। सर्वप्रथम सङ्कल्प लेना कुछ पाने की इच्छा रखना, कोई लक्ष्य रखना, तभी हम कुछ जीवन में प्राप्त कर पाऍंगे। इसका मतलब यह नहीं कि हम यह सङ्कल्प लें ले किआज मैं पढ़ाई का त्याग कर रहा हूॅं। यह अच्छी बात नहीं है।

6.3

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं(ङ्), कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव, शमः(ख्) कारणमुच्यते॥3॥

जो योग (समता) में आरूढ़ होना चाहता है, (ऐसे) मननशील योगी के लिये कर्तव्य कर्म करना कारण कहा गया है (और) उसी योगारूढ़ मनुष्य का शम (शान्ति) (परमात्म प्राप्ति) में कारण कहा गया है।

विवेचन:- योग का अर्थ होता है श्रीभगवान् से जुड़ना। योग एक प्रक्रिया है। सूर्य नमस्कार कर लिया तो वह योग हो गया ऐसा नहीं है। आरूढ़ जो सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं, मुनि का अर्थ होता है मननशील। उदाहरण के लिए जो हम विवेचन सुनते हैं उसमें जो बात हमें अच्छी लगती है उस पर मनन/चिन्तन करना। उसको हम अपने जीवन में कैसे ला सकते हैं उस बात को बार-बार सोचना उसे मनन या चिन्तन कहते हैं। मौन रहना अर्थात् चुप रहना। विद्यालय में कक्षा में होता है न, हम इतना शोर करते हैं कि हमारे शिक्षकों को समझ में नहीं आता कि हमें चुप कैसे कराऍं। कम से कम कक्षा में जब शिक्षाक हमें कुछ समझाऍं या बात करें तो इतनी देर हम मौन धारण करें अर्थात् बात न करें चुपचाप सुनें। शम अर्थात् मन पर नियन्त्रण करना। दम का अर्थ इन्द्रियों पर नियन्त्रण। हमें अपनी बुद्धि का उपयोग करना है। ऐसा नहीं करना है कि जो मन में आए वह कर लिया। 

एक बार सेठजी अपनी कार में बैठकर कहीं जा रहे थे। रास्ते में कीचड़ था तो कार का टायर कीचड़ में फॅंस गया। ड्राइवर ने कहा कुछ लोगों की आवश्यकता होगी। सेठ जी गाॅंव में से अच्छे हष्ट-पुष्ट युवाओं को ले आए और कहा कि इस गाड़ी को आगे पीछे से धक्का देना होगा। उन युवाओं ने अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं किया। दो युवा कार के आगे से धक्का लगाने लगे और दो कार के पीछे से धक्का लगाने लगे। कार आगे बढ़ ही नहीं पा रही थी। ड्राइवर सेठ जी से बोला कि आपने इनको गलत निर्देश दे दिया है। कार को यदि पीछे से ही धक्का लगाऍंगे तो ही आगे बढ़ेगी। हमें सदा हमारी बुद्धि का उपयोग करना है। मननशील बनना है। तभी हमें सफलता प्राप्त होगी। हम बुद्धिमान व्यक्ति हैं तभी हम गीताजी पढ़ पा रहे हैं और गीताजी पढ़ने से हमारी बुद्धि तीव्र होती है।

6.4

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु, न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी, योगारूढस्तदोच्यते॥4॥

कारण कि जिस समय न इन्द्रियों के भोगों में (तथा) न कर्मों में (ही) आसक्त होता है, उस समय (वह) सम्पूर्ण संकल्पों का त्यागी मनुष्य योगारूढ़ कहा जाता है।

विवेचन - हमारी जो पञ्च इन्द्रियाॅं है उनके अपने-अपने भोग हैं। ऑंखों का भोग है देखना। भोगने का अर्थ होता है इससे हम आनन्द प्राप्त कर सकते हैं जैसे कान का भोग है सुनना। नाक का भोग हो गया सूँघना, जीभ का भोग हो गया स्वाद, त्वचा का भोग होता है स्पर्श। जो व्यक्ति कर्मों के भोगों में आसक्त नहीं होता, कर्म फल की इच्छा नहीं रखता, वह श्रीभगवान् का प्रिय भक्त हो जाता है या भक्त बन जाता है। इसलिए हमें हमारी इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना चाहिए और जो करने योग्य कर्म है वही करने चाहिए।

6.5

उद्धरेदात्मनात्मानं(न्), नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धु:(र्), आत्मैव रिपुरात्मनः ॥5॥

अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है (और) आप ही अपना शत्रु है।

विवेचन:-यह श्लोक बहुत ही महत्वपूर्ण है इसमें यह बात बताई जा रही है कि हम स्वयं ही अपने मित्र हैं और स्वयं ही अपने शत्रु है। स्वयं को आगे बढ़ाना स्वयं की उन्नति करना हमेशा कुछ नया सीखना। कुछ लोग होते हैं आलस में ही जीवन व्यतीत करते रहते हैं कुछ नया सीखने का प्रयास नहीं करते हैं। अपना उद्धार करें अपने आप को नष्ट न करें। हम अपने पतन और उन्नति के लिए स्वयं उत्तरदायी होते हैं। कक्षा में भी ऐसा ही होता है न, शिक्षक सभी विद्यार्थी को समान रूप से पढ़ाते हैं। ऐसा तो नहीं है कि जो सफल होते हैं या कक्षा में प्रथम आते हैं उनको अलग या विशेष शिक्षा दी जाती है। जो सफलता प्राप्त करते हैं या उन्नति करते हैं वे अपने स्वयं के प्रयास से ही करते हैं। जो अपने-आप को आगे बढ़ाना नहीं चाहेंगे तो वे कैसे आगे बढ़ेंगे?

उदाहरण के लिए आप जब पढ़ने बैठे और आपका मित्र आए कि चलो खेलने चलते हैं और यदि आपको अपनी उन्नति और विकास चाहिए तो आप मना कर देंगे कि मैं अभी पढ़ाई कर रहा हूॅं। मेरा पढ़ाई का समय है। मैं बाद में खेलूॅंगा और जो बच्चे कुछ नहीं करना चाहते- वे कहते हैं ठीक है चलो खेलें, बाद में पढ़ाई हो जाएगी। यदि हम स्वयं की उन्नति कर रहे हैं, विकास कर रहे हैं, आगे बढ रहे हैं तो इसका अर्थ हुआ हम स्वयं के मित्र हैं। हम गीता जी से जुड़ गए, गीता जी पढ़ रहे हैं तो यह हमारा जीवन का बहुत ही अच्छा और बढ़िया निर्णय है। कई लोग फार्म भरते हैं। रजिस्ट्रेशन कराते हैं पर सब लोग नहीं जुड़ पाए। इसका अर्थ हुआ श्रीभगवान् की विशेष कृपा उन लोगों पर है जो लोग आगे बढ़ पा रहे हैं।

जैसे भोजन हमारे शरीर के लिए आवश्यक है उसी तरह गीता जी पढ़ना हमारे मन और बुद्धि के लिए आवश्यक है। गीता जी से हमारे मन और बुद्धि को ऊर्जा मिलती है। हम स्वयं को ऐसा बनाऍं कि लोग हमें देखकर हमारा अनुसरण करें। ऐसे कार्य करना जिससे हमारे जीवन का, हमारा कल्याण हो। स्वयं का मित्र स्वयं का मित्र बनने के लिए गीता जी का प्रतिदिन अध्ययन करें, विवेचन सुने, गीता जी के श्लोकों का पठन करें। जो कुछ भी हम सीख रहे हैं उसको जीवन में लाने का प्रयास करें।

हरि नाम कीर्तन के साथ सत्र का समापन हुआ। 

हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् हरि शरणम् ।।

                 
प्रश्नोत्तर सत्र


प्रश्नकर्ता- अहाना सोमानी दीदी
प्रश्न- दीदी, सङ्कल्प  किसे कहते हैं?
उत्तर- सङ्कल्प से हमारा अर्थ होता है हमारी इच्छा को पूर्ण करने का निश्चय और कोई इच्छा भी हो सकती है जैसे मैं 85% अङ्क अर्जित करूं उसके लिए जब हम कार्यरत होते हैं तो वह हमारा सङ्कल्प है यह इच्छा केवल अङ्कों के लिए नहीं किसी और कार्य के लिए भी हो सकती है। जैसे कोई बुरी आदत छोड़ने का सङ्कल्प करना या कोई अच्छा काम शुरू करने का सङ्कल्प करना।


प्रश्नकर्ता- वाणी अग्रवाल दीदी
प्रश्न- रामायण किसने लिखी थी
उत्तर- रामायण महर्षि वाल्मीकि जी ने लिखी थी और रामचरितमानस तुलसीदास जी ने लिखी।


प्रश्नकर्ता- अहाना सोमानी दीदी
प्रश्न-महाभारत किसने लिखी?
उत्तर-महाभारत वेदव्यास जी ने लिखी। ऐसे भी माना जाता है कि वेदव्यास जी ने बोली और श्री गणेश जी ने लिखी।


प्रश्नकर्ता-अर्नव भैया
प्रश्न-गीता किसने लिखी?
उत्तर-गीता वेदव्यास जी ने लिखी। यह महाभारत का ही एक भाग है।


प्रश्नकर्त्ता-दिव्या दीदी
प्रश्न-अर्जुन ने अपने स्वयं के गुरु से ही युद्ध क्यों किया?
उत्तर-अर्जुन के गुरु श्री द्रोणाचार्य जी थे जो हस्तिनापुर की सेना के साथ होने के लिए वचनबद्ध थे। जैसे भीष्म पितामह हस्तिनापुर की सेना के लिए वचनबद्ध थे। कौरवों का युद्ध पाण्डवों से निश्चित हुआ और गुरु द्रोणाचार्य कौरवों की सेना का भाग थे तो इसलिए अर्जुन को उनसे युद्ध करना पड़ा। 


प्रश्नकर्ता-पूर्णिमा दीदी
प्रश्न-अग्नि का त्याग का क्या अर्थ हुआ?
उत्तर-संन्यासी आग का त्याग करते हैं और भिक्षा माँग कर ही खाते हैं। स्वयं अपने लिए अग्नि जलाकर भोजन नहीं बनाते। इसलिए संन्यासी को अग्नि का त्याग करने वाला कहा गया है।


प्रश्नकर्ता-हीर दीदी
प्रश्न-गीताव्रती के लिए कैसे अभ्यास करें?
उत्तर-प्रतिदिन दो श्लोक याद करिए और सबसे पहले गीता जिज्ञासु-तीन अध्याय की परीक्षा दीजिए, फिर गीता पाठक छः अध्याय की परीक्षा दीजिए। बारह अध्याय से गीता पथिक की परीक्षा दें और फिर गीताव्रती समस्त अट्ठारह अध्याय की परीक्षा की तैयारी करें।

प्रश्नकर्ता-देवंशी दीदी
प्रश्न-गीता पथिक के लिए कौन से अध्याय का अभ्यास करें?
उत्तर-गीता पथिक के लिए कोई भी बारह अध्याय का अभ्यास कर सकते हैं।

प्रश्नकर्ता-अहाना सोमानी दीदी
प्रश्न-गीता लर्निंग के कितने लेवल होते हैं ?
उत्तर-गीता लर्निंग के चार लेवल हैं। अभी आप तीसरे लेवल पर हो। उसके बाद छः बड़े अध्यायों का चौथा लेवल होगा। गीता दिवस पर आपने सम्पूर्ण गीता पढ़ी। सुनकर अच्छा लगा परन्तु गीता प्रतिदिन पढ़नी है केवल गीता जयन्ती पर ही नहीं पढ़नी है।