विवेचन सारांश
हम स्वयं के मित्र एवम् स्वयं के शत्रु
सुमधुर प्रार्थना, हनुमान चालीसा पाठ, दीप-प्रज्वलन, भगवान श्रीकृष्ण की वन्दना एवम् श्री गुरु चरण-कमल-वन्दना के साथ छठे अध्याय के विवेचन सत्र का आरम्भ हुआ।
आज के इस विवेचन सत्र में जय श्रीकृष्ण के सम्बोधन के साथ सभी बालकों का स्वागत किया गया।
आत्मसंयमयोग नाम का यह छठा अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है यदि जीवन में आत्मसंयम न हो तो हम जीवन में जो करना चाहते हैं वो हम नहीं कर पातें हैं। मन पर संयम (control) करना चाहिये अर्थात हमें हमारे कर्म सही समय पर करने चाहिए। पढ़ाई के समय पढ़ाई और खेल के समय खेलना, यही आत्मसंयम है।
हमारे दोस्त खेलने के लिए बुलाने आ जाते हैं और अधिकतर हम मन पर संयम न रख कर पढ़ाई छोड़कर खेलने चले जाते हैं कि पढ़ाई तो रात में अकेले में की जा सकती है। फिर खेल के आते हैं और थक कर सो जाते है ऐसा नहीं करना चाहिये।
आत्मसंयम की कमी के कारण से ही बालक आवेग में आकर भाई बहन की आइसक्रीम भी खा ले तो उन्हें दुःख होता है।
मन पर संयम होना बहुत महत्वपूर्ण (importanant) है। आत्मसंयम विकसित करने से बालक को अपने आवेगों पर नियन्त्रण रखने और सही निर्णय लेने में सहायता मिल सकती है और अपने जीवन में सुधार कर सकता है।
भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती का वृतान्त बालकों में आत्मसंयम विकसित करने का सही उदाहरण है।
पहले समय में गुरुकुल में पढ़ाई होती थी। भगवान् श्रीकृष्ण और सुदामा बहुत अच्छे मित्र थे।
गुरुकुल में पढ़ाई के साथ-साथ उनको अन्य काम भी कराये जाते थे। जिससे गुरुकुल के काम भी हो जाते थे और बच्चों को भी थोड़ा सा काम देने से वो शारीरिक कर्म (फिजिकल वर्क) भी कर लेते थे। उनको चीजों की समझ अच्छी होती थी।
गुरुकुल में सबको अलग-अलग कार्य करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी।
कृष्ण जी को लकड़ी काटने का काम मिला। गुरुमाता ने दोनों के लिये पोटली में चने बाँध कर दे दिए। जंगल में जाकर कृष्ण भगवान पेड़ पर चढ़कर लकड़ी काटने लगे एकदम बिजली कड़कने लगी तूफान आ गया हल्का अंधेरा भी छा गया सुदामा तो पेड़ के नीचे खड़े हो गए और कृष्ण भगवान पेड़ पर ही बैठे रहे। अब सुदामा को भूख लग रही थी तो उन्होंने अपने हिस्से के चने खाने के बाद कृष्ण जी के हिस्से के चने भी खा लिए।
थोड़ी देर बाद जब तूफान कम हुआ और कृष्णजी नीचे आ कर बोलते हैं कि सुदामा मुझे बहुत भूख लगी है मेरे चने दे दो।
सुदामा थोड़ा दु;खी होकर बोले कि मुझे भूख लगी थी और मैंने सारे चने खा लिये।
कृष्ण भगवान् नाराज नहीं हुए, उन्होंने एक दम शान्ति से कहा कि कोई बात नहीं हम गुरुकुल पहुँचकर कुछ खा लेंगे।
आदर्श स्वभाव / व्यवहार यही होता है कि हम कोई प्रतिक्रिया नहीं करें। जब भी आश्रम में लौटते हैं तो गुरुमाता पूछती है सुदामा चने खा लिए थे। कृष्णजी से पूछा तो सुदामा जी ने डरते हुए उत्तर दिया कि कृष्णजी के हिस्से के चने भी मैंने ही खा लिए क्योंकि मुझे भूख लगी थी। गुरुमाता क्रोधित हो गई उन्हें चिन्ता हुई कि कृष्णजी इतनी देर भूखे रहे उन्होंने सुदामा जी को श्राप दे दिया कि तुमने दूसरों के हिस्से का खाया है तो तुम जीवन पर्यन्त भोजन के लिए कष्ट उठाओगे। सुदामाजी जीवन पर्यन्त गरीबी में रहे क्योंकि उन्होंने स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रखा। फिर जब सुदामाजी कृष्ण जी की शरण में गए तब उनके सारे कष्ट दूर हुए।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।3.12।।
अर्थात् दूसरों के हिस्से पर यदि हम अधिकार करते हैं तो हमें पाप लगता है। यह शिक्षा मिलती है कि स्वयं पर नियन्त्रण करना बहुत आवश्यक है।
6.1
श्रीभगवानुवाच
अनाश्रितः(ख्) कर्मफलं(ङ्), कार्यं(ङ्) कर्म करोति यः।
स सन्न्यासी च योगी च, न निरग्निर्न चाक्रियः॥1॥
करने योग्य कर्म अर्थात् सच बोलना चाहिए, अपना काम स्वयं करना चाहिए, दूसरों की सहायता करनी चाहिए। शालीनता का व्यवहार करें, सकारात्मक रहें। गलत कार्य करके हम आधुनिक कहलाऍंगे by using bad words or abusing language we will be called modern it is not good रामजी, कृष्णजी के बारे में हमने पढ़ा-सुना है उनके जैसा व्यवहार करने का प्रयास करना चाहिए। जो अच्छे कार्य करते हैं हमें उनका अनुसरण करना चाहिए। जो करने योग्य कार्य करते हैं वे ही योगी है और वे ही संन्यासी है। संन्यासी वे होते हैं जो भिक्षा के द्वारा अपना जीवन यापन करते हैं, अग्नि का प्रयोग नहीं करते अर्थात स्वयं का भोजन पकाकर नहीं खाते। कहने का तात्पर्य यह है कि जो शास्त्रों में बताया गया है, करने योग्य कार्य हमें वही करने चाहिए। सोशल मीडिया पर भी हमें सब कुछ नहीं देखना चाहिए क्योंकि जैसा हम देखते हैं वैसा ही सोचते हैं और जैसा सोचते हैं वैसा ही करते हैं।
यं(म्) सन्न्यासमिति प्राहु:(र्), योगं(न्) तं(म्) विद्धि पाण्डव।
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो, योगी भवति कश्चन॥2॥
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं(ङ्), कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव, शमः(ख्) कारणमुच्यते॥3॥
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु, न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी, योगारूढस्तदोच्यते॥4॥
उद्धरेदात्मनात्मानं(न्), नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धु:(र्), आत्मैव रिपुरात्मनः ॥5॥
प्रश्नकर्ता- अहाना सोमानी दीदी
प्रश्न- दीदी, सङ्कल्प किसे कहते हैं?
उत्तर- सङ्कल्प से हमारा अर्थ होता है हमारी इच्छा को पूर्ण करने का निश्चय और कोई इच्छा भी हो सकती है जैसे मैं 85% अङ्क अर्जित करूं उसके लिए जब हम कार्यरत होते हैं तो वह हमारा सङ्कल्प है यह इच्छा केवल अङ्कों के लिए नहीं किसी और कार्य के लिए भी हो सकती है। जैसे कोई बुरी आदत छोड़ने का सङ्कल्प करना या कोई अच्छा काम शुरू करने का सङ्कल्प करना।
प्रश्नकर्ता- वाणी अग्रवाल दीदी
प्रश्न- रामायण किसने लिखी थी
उत्तर- रामायण महर्षि वाल्मीकि जी ने लिखी थी और रामचरितमानस तुलसीदास जी ने लिखी।
प्रश्नकर्ता- अहाना सोमानी दीदी
प्रश्न-महाभारत किसने लिखी?
उत्तर-महाभारत वेदव्यास जी ने लिखी। ऐसे भी माना जाता है कि वेदव्यास जी ने बोली और श्री गणेश जी ने लिखी।
प्रश्नकर्ता-अर्नव भैया
प्रश्न-गीता किसने लिखी?
उत्तर-गीता वेदव्यास जी ने लिखी। यह महाभारत का ही एक भाग है।
प्रश्नकर्त्ता-दिव्या दीदी
प्रश्न-अर्जुन ने अपने स्वयं के गुरु से ही युद्ध क्यों किया?
उत्तर-अर्जुन के गुरु श्री द्रोणाचार्य जी थे जो हस्तिनापुर की सेना के साथ होने के लिए वचनबद्ध थे। जैसे भीष्म पितामह हस्तिनापुर की सेना के लिए वचनबद्ध थे। कौरवों का युद्ध पाण्डवों से निश्चित हुआ और गुरु द्रोणाचार्य कौरवों की सेना का भाग थे तो इसलिए अर्जुन को उनसे युद्ध करना पड़ा।
प्रश्नकर्ता-पूर्णिमा दीदी
प्रश्न-अग्नि का त्याग का क्या अर्थ हुआ?
उत्तर-संन्यासी आग का त्याग करते हैं और भिक्षा माँग कर ही खाते हैं। स्वयं अपने लिए अग्नि जलाकर भोजन नहीं बनाते। इसलिए संन्यासी को अग्नि का त्याग करने वाला कहा गया है।
प्रश्नकर्ता-हीर दीदी
प्रश्न-गीताव्रती के लिए कैसे अभ्यास करें?
उत्तर-प्रतिदिन दो श्लोक याद करिए और सबसे पहले गीता जिज्ञासु-तीन अध्याय की परीक्षा दीजिए, फिर गीता पाठक छः अध्याय की परीक्षा दीजिए। बारह अध्याय से गीता पथिक की परीक्षा दें और फिर गीताव्रती समस्त अट्ठारह अध्याय की परीक्षा की तैयारी करें।
प्रश्नकर्ता-देवंशी दीदी
प्रश्न-गीता पथिक के लिए कौन से अध्याय का अभ्यास करें?
उत्तर-गीता पथिक के लिए कोई भी बारह अध्याय का अभ्यास कर सकते हैं।
प्रश्नकर्ता-अहाना सोमानी दीदी
प्रश्न-गीता लर्निंग के कितने लेवल होते हैं ?
उत्तर-गीता लर्निंग के चार लेवल हैं। अभी आप तीसरे लेवल पर हो। उसके बाद छः बड़े अध्यायों का चौथा लेवल होगा। गीता दिवस पर आपने सम्पूर्ण गीता पढ़ी। सुनकर अच्छा लगा परन्तु गीता प्रतिदिन पढ़नी है केवल गीता जयन्ती पर ही नहीं पढ़नी है।