विवेचन सारांश
त्रिगुणों का सन्तुलन-उत्कृष्ट जीवनशैली
सुमधुर देश भक्ति गीत, श्रीवल्लभाचार्य कृत मधुराष्टकं, श्रीहनुमान चालीसा पाठ, मङ्गलमयी प्रार्थना, दीप-प्रज्वलन और गुरु चरणों में वन्दना के उपरान्त चौदहवें अध्याय गुणत्रयविभागयोग का विवेचन प्रारम्भ हुआ।
सातवें से तेरहवें अध्याय तक श्रीभगवान् ने ज्ञान योग का वर्णन कर तीनों गुणों का ज्ञान और गुणातीत की सूची दे दी है। श्रीभगवान् ने जिन तीनों गुणों वर्णन अनेकों स्थानों पर किया, उनका विस्तार श्रीभगवान् इस अध्याय में रहे हैं।
समस्त जीवित-जड़, पेड़-पौधे, नदी-जंगल, चन्द्रमा-सूर्य, ग्रह-अंतरिक्ष-आकाश, स्त्री-पुरुष, गोरा-काला इन सब की भिन्नता का कारण ये तीन गुण ही हैं। तीनों गुणों से मिलकर ही सारे ग्रह बने, सूर्य, चंद्र, तारे बने, अंतरिक्ष बना, आकाश बना, समय बना, मनुष्य बने, सारे प्राणी बने। हम सब में भी जो अन्तर दिखता है, वह अन्तर भी इन्हीं तीन गुणों के कारण ही बना। इसी के कारण लोगों के स्वभाव में अन्तर होता है। हमारा स्वयं का स्वभाव भी समयानुसार बदलता रहता है, वह तो क्षण-क्षण में परिवर्तित हो सकता है जिसे हम मूड स्विंग (mood swings) कहते हैं।
संसार में हम जितनी भी विविधता देखते हैं वह इन्हीं तीन गुणों के समन्वय से ही जागृत हुई है।
तीन ही गुणों (सत्, रज और तम) से यह सारा ब्रह्माण्ड (universe) बन गया है! हम कहेंगे यह कैसे सम्भव है? (HOW IS IT POSSIBLE?)
कुछ उदाहरणों से समझते हैं-
ये विचार करने योग्य है कि यदि मनुष्य द्वारा बनाया गया तीन हज़ार रुपये का मुद्रक केवल चार तरह के रङ्गों की स्याही से सोलह मिलियन रङ्गों में प्रिन्ट आउट निकाल सकता है, LED स्क्रीन सिर्फ तीन रङ्गों के समन्वय से अरबों रङ्गों में रोशन हो सकती है तो फिर स्वयं ब्रह्मा जी तीन गुणों से क्या-क्या नहीं कर सकते!!
ऐसा नहीं कि इस तरह केवल पदार्थ, प्राणी, सूरज, तारे बने हैं, हमारा स्वभाव, हमारा डीएनए, हमारी पसन्द भी उन्हीं के संयोजन से बनी हैं। एक ही डीएनए से बने भाई बहन का स्वभाव भी अलग-अलग होता है।हमारे शरीर में बहुत सारी बातें हैं जो अद्वितीय हैं। विशिष्ट बात है कि दुनिया की कुल आबादी अभी 8.2 बिलियन है। यह तो विज्ञान ने ज्ञात कर लिया है कि हम सब के अङ्गुलाङ्क (fingerprints), रेटिना अलग-अलग हैं! पर बहुत सी बातें होंगी जो विज्ञान से अभी भी परे हैं। पूरी प्रकृति विविधता से भरी हुई है।
अध्याय का आरम्भ करते हैं, इसकी चर्चा विस्तार में करेंगे।
सातवें से तेरहवें अध्याय तक श्रीभगवान् ने ज्ञान योग का वर्णन कर तीनों गुणों का ज्ञान और गुणातीत की सूची दे दी है। श्रीभगवान् ने जिन तीनों गुणों वर्णन अनेकों स्थानों पर किया, उनका विस्तार श्रीभगवान् इस अध्याय में रहे हैं।
समस्त जीवित-जड़, पेड़-पौधे, नदी-जंगल, चन्द्रमा-सूर्य, ग्रह-अंतरिक्ष-आकाश, स्त्री-पुरुष, गोरा-काला इन सब की भिन्नता का कारण ये तीन गुण ही हैं। तीनों गुणों से मिलकर ही सारे ग्रह बने, सूर्य, चंद्र, तारे बने, अंतरिक्ष बना, आकाश बना, समय बना, मनुष्य बने, सारे प्राणी बने। हम सब में भी जो अन्तर दिखता है, वह अन्तर भी इन्हीं तीन गुणों के कारण ही बना। इसी के कारण लोगों के स्वभाव में अन्तर होता है। हमारा स्वयं का स्वभाव भी समयानुसार बदलता रहता है, वह तो क्षण-क्षण में परिवर्तित हो सकता है जिसे हम मूड स्विंग (mood swings) कहते हैं।
संसार में हम जितनी भी विविधता देखते हैं वह इन्हीं तीन गुणों के समन्वय से ही जागृत हुई है।
तीन ही गुणों (सत्, रज और तम) से यह सारा ब्रह्माण्ड (universe) बन गया है! हम कहेंगे यह कैसे सम्भव है? (HOW IS IT POSSIBLE?)
कुछ उदाहरणों से समझते हैं-
- जब हम कलर प्रिन्ट निकालने जाते हैं हजारों हजारों तरह के प्रिन्ट विभिन्न रङ्गों में निकलते हैं। एक सामान्य इंकजेट प्रिंन्टर (Inkjet printer) सोलह मिलियन रङ्गों में प्रिंन्ट कर सकता है। परन्तु इंकजेट प्रिन्टर को सोलह मिलियन तरह के रङ्गों की स्याही की जरूरत नहीं है, स्याही तो चार तरह की ही होती है। सीएमवाईके (CMYK) एक रङ्ग मॉडल है जिसका उपयोग मुद्रण (printing) में किया जाता है। यह चार रङ्गों - सियान (Cyan), मैजेंटा (Magenta), पीला (Yellow), और काला (Black)- पर आधारित है। मुद्रण प्रक्रिया में, इन चार रङ्गों की स्याही का उपयोग करके विभिन्न रङ्गों को बनाया जाता है। जब इन चार रङ्गों की स्याही को कागज पर एक साथ मिलाया जाता है, तो वे प्रकाश को सोख लेते हैं और विभिन्न रङ्गों का भ्रम पैदा करते हैं।
- उदाहरण: यदि आप सियान और मैजेंटा को मिलाते हैं, तो आपको नीला रङ्ग मिलेगा।
- यदि आप मैजेंटा और पीले को मिलाते हैं, तो आपको लाल रङ्ग मिलेगा।
- आरजीबी (RGB) का मतलब लाल (Red), हरा (Green), और नीला (Blue) है। यह एक रङ्ग मॉडल है जिसका उपयोग डिजिटल डिस्प्ले, जैसे कि कम्प्यूटर स्क्रीन और टीवी, में रङ्गों को दर्शाने के लिए किया जाता है। RGB LED में तीन अलग-अलग रङ्ग के LED (लाल, हरा और नीला) एक ही पैकेज में होते हैं। इन LED को अलग-अलग तीव्रता से जलाकर, एक विस्तृत रङ्ग सरगम प्राप्त किया जा सकता है। आप चकित होंगे कि तीन रङ्गों की रोशनी विभिन्न अनुपात में मिलकर अरबों रङ्गों का उत्पादन कर सकती है!
ये विचार करने योग्य है कि यदि मनुष्य द्वारा बनाया गया तीन हज़ार रुपये का मुद्रक केवल चार तरह के रङ्गों की स्याही से सोलह मिलियन रङ्गों में प्रिन्ट आउट निकाल सकता है, LED स्क्रीन सिर्फ तीन रङ्गों के समन्वय से अरबों रङ्गों में रोशन हो सकती है तो फिर स्वयं ब्रह्मा जी तीन गुणों से क्या-क्या नहीं कर सकते!!
ऐसा नहीं कि इस तरह केवल पदार्थ, प्राणी, सूरज, तारे बने हैं, हमारा स्वभाव, हमारा डीएनए, हमारी पसन्द भी उन्हीं के संयोजन से बनी हैं। एक ही डीएनए से बने भाई बहन का स्वभाव भी अलग-अलग होता है।हमारे शरीर में बहुत सारी बातें हैं जो अद्वितीय हैं। विशिष्ट बात है कि दुनिया की कुल आबादी अभी 8.2 बिलियन है। यह तो विज्ञान ने ज्ञात कर लिया है कि हम सब के अङ्गुलाङ्क (fingerprints), रेटिना अलग-अलग हैं! पर बहुत सी बातें होंगी जो विज्ञान से अभी भी परे हैं। पूरी प्रकृति विविधता से भरी हुई है।
अध्याय का आरम्भ करते हैं, इसकी चर्चा विस्तार में करेंगे।
14.1
श्रीभगवानुवाच
परं(म्) भूयः(फ्) प्रवक्ष्यामि, ज्ञानानां(ञ्) ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः(स्) सर्वे, परां(म्) सिद्धिमितो गताः॥14.1॥
श्रीभगवान बोले – सम्पूर्ण ज्ञानों में उत्तम (और) श्रेष्ठ ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब के सब मुनि लोग इस संसार से (मुक्त होकर) परमसिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।
विवेचन- ज्ञानमुत्तमम्- ज्ञानों में भी अति उत्तम, श्रेष्ठ ज्ञान।
परं(म्)- परम ज्ञान। श्रीभगवान् ने यहाँ पर ज्ञान की सर्वोच्च स्थिति पर पुनः बल दिया है। ज्ञान और विज्ञान की बात श्रीभगवान् सातवें अध्याय में कर चुके हैं। अब श्रीभगवान् उस परम सिद्ध ज्ञान को और विस्तार से कहना चाहते हैं।
भूयः(फ्)- फिर से
प्रवक्ष्यामि- कहूँगा
यज्ज्ञात्वा- जिसको जानकर
मुनयः(स्) सर्वे- सब मुनिजन
परां(म्) सिद्धिमितो गताः-
इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्रीभगवान् कहते है-
“हे अर्जुन! सम्पूर्ण ज्ञानों में उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञान को मैं पुनः कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से (मुक्त होकर) परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।
परं(म्)- परम ज्ञान। श्रीभगवान् ने यहाँ पर ज्ञान की सर्वोच्च स्थिति पर पुनः बल दिया है। ज्ञान और विज्ञान की बात श्रीभगवान् सातवें अध्याय में कर चुके हैं। अब श्रीभगवान् उस परम सिद्ध ज्ञान को और विस्तार से कहना चाहते हैं।
भूयः(फ्)- फिर से
प्रवक्ष्यामि- कहूँगा
यज्ज्ञात्वा- जिसको जानकर
मुनयः(स्) सर्वे- सब मुनिजन
परां(म्) सिद्धिमितो गताः-
इस संसार से मुक्त होकर परमसिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्रीभगवान् कहते है-
“हे अर्जुन! सम्पूर्ण ज्ञानों में उत्तम और श्रेष्ठ ज्ञान को मैं पुनः कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से (मुक्त होकर) परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।
इदं(ञ्) ज्ञानमुपाश्रित्य, मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते, प्रलये न व्यथन्ति च॥14.2॥
इस ज्ञान का आश्रय लेकर (जो मनुष्य) मेरी सधर्मता को प्राप्त हो गये हैं, (वे) महासर्ग में भी पैदा नहीं होते और महाप्रलय में भी व्यथित नहीं होते।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं-
“इस ज्ञान का आश्रय करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुये पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलय काल में पुनः व्याकुल नहीं होते।“
जिसने इस बात को तथ्य से जान लिया उसका पुनर्जन्म नहीं होगा। आदि शङ्कराचार्य भगवान् तो कहते हैं-
“इस ज्ञान का आश्रय करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुये पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलय काल में पुनः व्याकुल नहीं होते।“
जिसने इस बात को तथ्य से जान लिया उसका पुनर्जन्म नहीं होगा। आदि शङ्कराचार्य भगवान् तो कहते हैं-
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं,
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।।
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।।
हम लोग तो करोड़ों करोड़ों जन्मों से इस संसार के आवागमन में फँसे हुए हैं। अच्छे कर्म करके अच्छी योनि को प्राप्त करते हैं और बुरे कर्म कर नीच योनि को प्राप्त करते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि अगर आवागमन के चक्र से मुक्त हो गए तो प्रलय काल में व्याकुल नहीं होना पड़ेगा।
प्रलय काल क्या होता है?
नित्य-प्रलय- हम प्रतिदिन रात्रि सो जाते हैं। रात को जब हम सो गए तो दुनिया में क्या चल रहा है, हमें पता नहीं चलता है। दुनिया में कोई भी घटना घट जाए, हम उससे अनभिज्ञ ही रहते हैं। दीर्घ निद्रा में पहुँच गए तो कोई स्वप्न भी नहीं है। यह नित्य प्रलय हो गयी। गहरी नींद से उठने के बाद थोड़ा सा समय लगता है वास्तविकता की ओर लौटने के लिए, प्रलय से सर्ग होने में थोड़ा समय लगता है।
- प्रलय: प्रलय का अर्थ है संसार का अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाना, सृष्टि का विनाश हो जाना।
- सर्ग: सर्ग का अर्थ है सृष्टि का निर्माण, नई शुरुआत या रचना।
- समय: प्रलय और सर्ग के बीच, एक अवधि होती है जब प्रकृति शान्त हो जाती है और फिर से सङ्गठित होने लगती है।
सबका कालचक्र भी अलग-अलग है।
- ऐसे ऐसे जीव है हमारी एक चुटकी में उनकी तीन पीढ़ी हो जाती है। हमारा और उनका काल एक सा नहीं है।
- एक चीण्टी के रोचक उदाहरण से हम यह समझ सकते हैं। एक चीण्टी शेव (shave) किए हुए किसी व्यक्ति के बगल से गुजरती है और उनके बारे में इतिहास लिखती है। तीन चार दिन बाद अगली पीढ़ी की चीण्टी वही उस व्यक्ति जिनकी दाढ़ी बढ़ी हुई है के बगल से गुजरती है। हमारे तो तीन-चार दिन होते है पर चीण्टी की तो कई पीढ़ियाँ गुजर जायेंगी। उसे वह इतिहास झूठ लगेगा।
- जीवाणुओं का काल भी हमारे काल से बहुत भिन्न होता है। किसी के स्पर्श से हम एक वायरस को प्राप्त करते हैं और हमारे शरीर में पहुँच कर कुछ ही समय में वे अरबों-खरबों हो जाते हैं। कल्पना करना ही मुश्किल है। इसकी अनुभूति हम सब ने कोरोना काल में की है।
- मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है। हमारे छ: महीने देवताओं का एक दिन होता है, हमारे अगले छ: महीने देवताओं की एक रात्रि होती है। उत्तरायण में देवता जागते हैं, दक्षिणायन में देवता सोते हैं। हमें लगता है देवता छ: महीने सोते रहते हैं, परन्तु हमारे छ: महीने तो उनकी एक रात ही होती है।
- इसी प्रकार मनुष्यों के तीस दिन पितरों के एक दिन के बराबर होते है। पितृ-लोक में हमारा एक महीना उनका एक दिन होता है।
काल गणना को समझते हैं-
यह काल गणना समय के चक्रीय प्रकृति को दर्शाती है, जहाँ सृष्टि का निर्माण, विकास और विनाश का चक्र निरन्तर चलता रहता है। एक चतुर्युगी में चार युग होते हैं-
सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग।
सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग।
- कलियुग: चार लाख बत्तीस हजार मानव वर्ष।
- द्वापरयुग: आठ लाख चौंसठ हजार मानव वर्ष।
- त्रेतायुग: बारह लाख छियानवे हजार मानव वर्ष।
- सतयुग: सत्रह लाख अट्ठाईस हजार मानव वर्ष।
- एक चतुर्युगी: तैयालीस लाख बीस हजार मानव वर्ष (चारों युगों का योग)।
- एक मनु : बहत्तर चतुर्युगी का होता है.
- ब्रह्माजी का एक दिन: चौदह मनु = चौदह x बहत्तर चतुर्युगी, लगभग एक हजार चतुर्युगी = एक हजार x तैयालीस लाख बीस हजार मानव वर्ष
- ब्रह्माजी का जीवन ब्रह्माजी का जीवन सौ वर्षों का होता है। मानव वर्ष में गणना की जाए तो यह खरबों साल (लगभग 1000 000 000 000 000 मानव वर्ष) हो गई।
अभी जो मनु हैं, उनका नाम वैवस्वत मनु है। चौथे अध्याय में उनका नाम आया है। जो श्रीमद्भगवद्गीता हम अभी पढ़ रहे हैं वह हमारे मनु के काल की हैं।
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
4.1
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
4.1
यह सातवें मनु हैं। इसका तात्पर्य है कि अभी ब्रह्माजी का लगभग आधा दिन हुआ है।
वैवस्वत मनु के इकहत्तर (71) चतुर्युगी में से एक चतुर्युग में हम जी रहे हैं। उसमें से कलयुग के अभी तक केवल पाँच हजार वर्ष पूरे हुए हैं।
कलयुग चार लाख बत्तीस हजार मानव वर्ष का है, इस प्रकार कलयुग तो अभी आरम्भ हुआ है। अभी तो हम आराम से गीता पढ़ सकते हैं। वर्षों पश्चात् कलयुग के प्रभाव में यह सम्भव नहीं हो पाएगा।
रात्रि को जब ब्रह्मा जी सोते हैं तब तक चौदह मनु हो जाते हैं अर्थात् चौदह गुणा इकहत्तर चतुर्युगी। रात्रि को जब ब्रह्मा जी सोते हैं तो जितनी उन्होंने सृष्टि बनाई है वह सब विलीन हो जाती है। ब्रह्मा जी जब सुबह उठते हैं तो पुनः सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता है।
सृष्टि के विलीन होने पर जो जीव हैं उनका खाता नहीं समाप्त होता, कर्मफल समाप्त नहीं हो जाते हैं। इसे प्रलय कहते हैं।
सृष्टि का पुनः निर्माण होता है, तो पुराने कर्मफल के अनुसार जीवों को अपनी योनि प्राप्त होती है।
एक ही ब्रह्माण्ड नहीं है, करोड़ों ब्रह्माण्ड है। हर ब्रह्मा का एक अण्ड है एक ब्रह्माण्ड। श्रीभगवान् करोड़ों ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं।
विज्ञान की उन्नत खोजों से अब हम बहुब्रह्माण्ड (MULTIVERSE) के बारे में जान रहे हैं, हमारे यहाँ तो करोड़ों ब्रह्माण्ड की अवधारणा चिरकाल से ही है।
हर क्षण करोड़ों ब्रह्मा पैदा होते हैं और करोड़ों ब्रह्मा समाप्त होते हैं। श्रीभगवान् की सृष्टि इतनी व्यापक है। हर सौ वर्षों के बाद ब्रह्मा जी भी अपने लोकों के साथ शान्त हो जाते हैं। नए ब्रह्मा जी आते हैं और नई सृष्टि का निर्माण होता है। यह न कभी पहली बार हुआ, न कभी अन्तिम बार होगा।
यह समझने में अत्यन्त ही क्लिष्ट है। हमने अनन्त शब्द तो सुना है। इन शब्दों को विस्तार में समझाने की हममें से किसी की भी शक्ति नहीं है। कल्पना कर सकते हैं पर शब्दों में समझाना हम सबकी सामर्थ्य से परे है। सृष्टि कभी खत्म ही नहीं हो सकती, कभी शुरू ही नहीं हुई यह बात हमारी समझ में नहीं आ सकती। श्रीभगवान् ने पन्द्रहवें अध्याय में कहा है-
“नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा”
न मेरा आदि है ना अन्त है।
न मेरा आदि है ना अन्त है।
हम तो पैदा होते हैं फिर मरते हैं, हमारी जड़ बुद्धि में न आदि न अन्त की बात कैसे समझ आ सकती है! जड़ बुद्धि से यह समझना सम्भव नहीं है। जिस प्रकार चीण्टी की बुद्धि हमारी बातचीत को समझने के लिए सीमित है, योग्य नहीं है। हमारे लिए भी परमात्मा की अनन्तता को समझने योग्य बुद्धि नहीं है। श्रीभगवान् की रचना, सृष्टि को समझना क्लिष्ट है।
ऋषियों ने परमात्म तत्त्व को जाना है, उस तत्त्व को समझा है जिसको जानने के बाद कुछ और जानना शेष नहीं रहता।
ऋषियों ने परमात्म तत्त्व को जाना है, उस तत्त्व को समझा है जिसको जानने के बाद कुछ और जानना शेष नहीं रहता।
यह गुन साधन तें नहिं होई।
तुम्हरी कृपा पाव कोई कोई।
तुम्हरी कृपा पाव कोई कोई।
यह साधना से नहीं होता यह कृपा से होता है।
सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई॥
वही आपको जानता है, जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। उस परम तत्त्व को जानते ही जीव उनके साथ एकाकार हो जाता है। इसीलिए श्रीभगवान् कहते हैं-
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्त: स मे प्रिय:
समर्पण में मन और बुद्धि का प्रमुख रूप से महत्त्व होता है। जब ये श्रीभगवान् पर समर्पित हो जाते हैं, तब हमारे व्यक्तित्त्व के शेष सभी अङ्ग भी स्वभाविक रूप से भगवान की सेवा के लिए समर्पित हो जाते हैं।
एक दृष्टान्त-
एक आश्रम में एक जिज्ञासु बालक वेदान्त का अध्ययन कर रहा था। एक दिन गुरुजी ने उपनिषद का उदाहरण देते हुए कहा-
"वत्स! यदि मनुष्य पूरी श्रद्धा और प्रयास से कुछ करे तो एक छोटी-सी प्याली में भी सम्पूर्ण समुद्र समा सकता है।"
बालक इस बात को सुनकर गम्भीर हो गया। उसका आश्रम समुद्र तट पर ही था। वह तुरन्त एक मिट्टी का सकोरा लेकर समुद्र किनारे जा पहुँचा। सकोरा हाथ में लेकर वह लहरों को देख सोचने लगा-
"गुरुजी का वचन असत्य तो हो नहीं सकता… लेकिन यह अथाह समुद्र इस छोटे से सकोरे में कैसे समा सकता है?"
वह इस विचार में डूबा रहा। लहरें आती-जाती रहीं, समय बीतता रहा। सुबह से सन्ध्या हो गई, पर बालक वहीं खड़ा रहा, उत्तर की खोज में।
सायंकाल जब गुरुजी समुद्र तट पर टहलते हुए आए तो उन्होंने बालक को उसी स्थिति में देखकर पूछा-
"वत्स! तुम यहाँ दिनभर क्यों खड़े हो?"
बालक ने श्रद्धापूर्वक कहा-
गुरुदेव! आपने आज जो उपदेश दिया, उसे समझने का प्रयास कर रहा हूँ। मैं यह सोच रहा हूँ कि यह विशाल समुद्र इस छोटे से सकोरे में कैसे समा सकता है? आपकी वाणी शास्त्र-सम्मत है, तर्क-सम्मत है, इसलिए मैं जानना चाहता हूँ- क्या यह वास्तव में सम्भव है?"
गुरुजी हल्के से मुस्कराए। उन्होंने बालक के सिर पर स्नेह से हाथ रखा और बोले-
"वत्स! हाँ, ऐसा सम्भव है।"
बालक की उत्सुकता और बढ़ गई। उसने कहा-
"गुरुदेव! क्या आप सचमुच ऐसा कर सकते हैं… अभी?"
गुरुजी ने सहज भाव से कहा-
"हाँ, अभी भी कर सकता हूँ… किन्तु ध्यान रखना, यदि मैंने कर दिया तो प्याला तुम्हें वापस नहीं मिलेगा।"
बालक ने उत्तर दिया-
"गुरुदेव! वह तो मिट्टी का सकोरा ही है। मुझे वापस नहीं चाहिए। बस आप इसे समुद्र से भरकर दिखा दीजिए।"
गुरुजी ने मुस्कराते हुए कहा-
"ठीक है, लाओ… प्याला मुझे दो।"
गुरुजी ने बालक से सकोरा लिया और उसे बलपूर्वक समुद्र की ओर उछाल दिया। सकोरा लहरों पर डूबता-उतराता हुआ समुद्र में समा गया।
बालक चौंक गया-
"गुरुदेव! यह आपने क्या किया? मैंने तो कहा था कि समुद्र को प्याले में लाइए।"
गुरुजी ने गम्भीर स्वर में कहा-
"वत्स! यही तो उत्तर है। समुद्र को बाहर निकालकर प्याले में नहीं रखा जा सकता, किन्तु प्याले को समुद्र में डाल देने पर वह समुद्र का अङ्ग बन जाता है। उसी क्षण समुद्र उसमें समा जाता है।"
ठीक वैसे ही बुद्धि को बाहर रखकर परमात्मा को नहीं जाना जा सकता। जब बुद्धि, अहङ्कार और विचारों को परमात्मा में समर्पित कर देते हो, तब ही तुम परमात्मा के अनुभव में प्रवेश कर सकते हो। समर्पण से ही सत्य में विलय सम्भव है। परम सत्य को पाने के लिए तर्क, बुद्धि और अहङ्कार से नहीं, पूर्ण समर्पण और श्रद्धा से ही मार्ग खुलता है। इसीलिए श्री भगवान कहते हैं-
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो
जब तक मन और बुद्धि मुझे अर्पित नहीं करोगे, तब तक मुझे प्राप्त नहीं कर सकते, मेरा अनुभव नहीं कर सकते, मुझे जान नहीं सकते। मुझे वही जान सकता है जो मन और बुद्धि का समर्पण कर देता है।
मम योनिर्महद्ब्रह्म, तस्मिन्गर्भं(न्) दधाम्यहम्।
सम्भवः(स्) सर्वभूतानां(न्), ततो भवति भारत॥14.3॥
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्ति स्थान है (और) मैं उसमें जीवरूप गर्भ का स्थापन करता हूँ। उससे सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं,
“हे भारत! मेरी महद् ब्रह्मरूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है, अर्थात् गर्भाधान का स्थान है। उस योनि में चेतन सन्धाय कर मैं ही गर्भ की स्थापना करता हूँ। जड़ और चेतन के संयोग से समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है। प्रकृति जड़ है, चेतना मैं प्रदान करता हूँ।”
“हे भारत! मेरी महद् ब्रह्मरूप मूल प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है, अर्थात् गर्भाधान का स्थान है। उस योनि में चेतन सन्धाय कर मैं ही गर्भ की स्थापना करता हूँ। जड़ और चेतन के संयोग से समस्त भूतों की उत्पत्ति होती है। प्रकृति जड़ है, चेतना मैं प्रदान करता हूँ।”
सर्वयोनिषु कौन्तेय, मूर्तयः(स्) सम्भवन्ति याः।
तासां(म्) ब्रह्म महद्योनि:(र्), अहं(म्) बीजप्रदः(फ्) पिता॥14.4॥
हे कुन्तीनन्दन ! सम्पूर्ण योनियों में प्राणियों के जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीज-स्थापन करने वाला पिता हूँ।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं-
“हे अर्जुन! नाना प्रकार की सभी योनियों में अर्थात् जो भी शरीरधारी प्राणी होते हैं, प्रकृति उन सब का गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज स्थापन करने वाला पिता हूँ।
श्रीभगवान् कह रहे है कि सम्पूर्ण प्रकृति इस पूरे ब्रह्माण्ड की माँ है, और मैं ही बीज़ स्थापना करने वाला पिता हूँ। श्रीमद्भागवत में, विष्णु-पुराण में, महाभारत में और अनेक ग्रन्थों में इसका वर्णन है।
हमारे मन में कभी-कभी प्रश्न आता है काहे को दुनिया बनाई?
“हे अर्जुन! नाना प्रकार की सभी योनियों में अर्थात् जो भी शरीरधारी प्राणी होते हैं, प्रकृति उन सब का गर्भ धारण करने वाली माता है और मैं बीज स्थापन करने वाला पिता हूँ।
श्रीभगवान् कह रहे है कि सम्पूर्ण प्रकृति इस पूरे ब्रह्माण्ड की माँ है, और मैं ही बीज़ स्थापना करने वाला पिता हूँ। श्रीमद्भागवत में, विष्णु-पुराण में, महाभारत में और अनेक ग्रन्थों में इसका वर्णन है।
हमारे मन में कभी-कभी प्रश्न आता है काहे को दुनिया बनाई?
दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई,
काहे को दुनिया बनाई, तूने काहे को दुनिया बनाई।
काहे को दुनिया बनाई, तूने काहे को दुनिया बनाई।
यह प्रश्न बहुत पुराना है काहे को यह दुनिया बनाई? उपनिषदों में भी यह प्रश्न है।
ऋषियों ने उत्तर दिया-
उस चैतन्य परमात्मा में जब उसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है तब उस परमात्मा को एकस्यां बहुधा एक से बहुत होने की इच्छा हुई और वह हो गया।
उस एक परमात्मा से सबसे पहले महत् बुद्धि का निर्माण होता है फिर महत् अहङ्कार का प्रादुर्भाव होता है।
महत् अहङ्कार से सत्त्व रज और तम तीनों गुणों का निर्माण होता है। इन तीनों गुणों से पञ्च महाभूतों का निर्माण होता है। पञ्च महाभूतों से पञ्च ज्ञानेन्द्रियों का और पञ्च तन्मात्राओं का निर्माण होता है।
सबसे पहले जो तत्त्व बनता है वह है आकाश।
- आकाश का गुण है शब्द।
- अन्तरिक्ष में शब्दों को नहीं सुना जा सकता क्योंकि वहाँ पर आकाश नहीं है।
- आकाश से शब्द गुण बना और शब्द की इन्द्रिय हुई कर्ण।
इसलिए कान में भी आकाश है, खालीपन है। खालीपन नहीं हो तो सुनाई नहीं देगा, कान में रुई डाल दें तो कुछ सुन नहीं सकते। यह सब बहुत वैज्ञानिक है।
आकाश से दूसरा तत्त्व उत्पन्न हुआ वायु।
आकाश से दूसरा तत्त्व उत्पन्न हुआ वायु।
- वायु में दो गुण है शब्द और स्पर्श।
- वायु चलती है तो हमें आवाज सुनाई देती है।
- आकाश हर जगह है परन्तु हम उसे स्पर्श नहीं कर सकते। वायु में स्पर्श अनुभव कर सकते हैं। तेज हवा चलती है तो हम वायु का स्पर्श अनुभव कर सकते हैं।
- वायु की इन्द्रिय है त्वचा। वायु को हम अपनी त्वचा पर अनुभव करते हैं।
आकाश और वायु को मिलाकर तीसरे तत्त्व की उत्पत्ति हुई- अग्नि।
- अग्नि में शब्द है, स्पर्श है और रूप भी है।
- अग्नि को हम अपने नेत्रों से देख भी सकते हैं।
इन तीनों तत्त्वों को मिला कर चौथा तत्त्व बना- जल।
- जल में शब्द है। यह कल-कल छल-छल बहती, क्या कहती गङ्गा की धारा।
- जल में स्पर्श है हम उसे छू सकते हैं।
- जल में रूप है हम उसे देख सकते हैं।
- जल में एक और गुण है- रस। हम उसका स्वाद भी ले सकते हैं। रस की इन्द्रिय है- जिह्वा।
इन चारों को मिलाकर जो पाँचवा भूत उत्पन्न हुआ वह है पृथ्वी।
- पृथ्वी में शब्द भी है, स्पर्श भी है, रूप भी है, रस भी है और पाँचवा रस भी है, गन्ध।
- पृथ्वी में गन्ध भी है।
- गन्ध की इन्द्रिय है- नासिका।
पञ्च महाभूत इस प्रकार हुए-
आकाश -> वायु -> अग्नि -> जल -> पृथ्वी
पञ्च तन्मात्रायें हुईं-
शब्द -> स्पर्श -> रूप ->रस -> गन्ध
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ हुईं-
कर्ण -> त्वचा -> नेत्र -> जिह्वा -> नासिका
आकाश -> वायु -> अग्नि -> जल -> पृथ्वी
पञ्च तन्मात्रायें हुईं-
शब्द -> स्पर्श -> रूप ->रस -> गन्ध
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ हुईं-
कर्ण -> त्वचा -> नेत्र -> जिह्वा -> नासिका
अण्डज, पिण्डज, स्वेदज और उद्भिज ये चार प्रकार की योनियाँ हैं।
1. अण्डज (Andaj): वे जीव जो अण्डे से जन्म लेते हैं, जैसे कि पक्षी, सरीसृप, और मछलियाँ।
2. पिण्डज (Pindaj): वे जीव जो माता के गर्भ से जन्म लेते हैं, जैसे कि मनुष्य और ज्यादातर स्तनधारी।
3. स्वेदज (Svedaj): वे जीव जो पसीने, गन्दगी या नमी से उत्पन्न होते हैं, जैसे कि कुछ कीड़े और सूक्ष्मजीव।
4. उद्भिज (Udbhij): वे जीव जो बीज से उगते हैं, जैसे कि पौधे।
इसमें जलचर, नभचर, थलचर, उभयचर, फिर उसमे दो पैर वाले, चार पैर वाले, छ: पैर वाले, आठ पैर वाले ये करोड़ों प्रकार के जीव हैं।
चौरासी लाख तो मूल योनियाँ हैं। चौरासी लाख योनियों में मछली एक प्रकार की योनि है, वह करोड़ों प्रकार की हो सकती हैं।
देवता, पितृ, गन्धर्व, राक्षस, किन्नर, जीव-जन्तु सब चौरासी लाख योनियों में आते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! सब कुछ जो उत्पन्न होता है उनको बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूँ।
इसीलिए हमारे यहाँ कहते हैं-
सब जीव में भगवान् को देखो। कण-कण में भगवान् हैं।
1. अण्डज (Andaj): वे जीव जो अण्डे से जन्म लेते हैं, जैसे कि पक्षी, सरीसृप, और मछलियाँ।
2. पिण्डज (Pindaj): वे जीव जो माता के गर्भ से जन्म लेते हैं, जैसे कि मनुष्य और ज्यादातर स्तनधारी।
3. स्वेदज (Svedaj): वे जीव जो पसीने, गन्दगी या नमी से उत्पन्न होते हैं, जैसे कि कुछ कीड़े और सूक्ष्मजीव।
4. उद्भिज (Udbhij): वे जीव जो बीज से उगते हैं, जैसे कि पौधे।
इसमें जलचर, नभचर, थलचर, उभयचर, फिर उसमे दो पैर वाले, चार पैर वाले, छ: पैर वाले, आठ पैर वाले ये करोड़ों प्रकार के जीव हैं।
चौरासी लाख तो मूल योनियाँ हैं। चौरासी लाख योनियों में मछली एक प्रकार की योनि है, वह करोड़ों प्रकार की हो सकती हैं।
देवता, पितृ, गन्धर्व, राक्षस, किन्नर, जीव-जन्तु सब चौरासी लाख योनियों में आते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! सब कुछ जो उत्पन्न होता है उनको बीज प्रदान करने वाला पिता मैं हूँ।
इसीलिए हमारे यहाँ कहते हैं-
सब जीव में भगवान् को देखो। कण-कण में भगवान् हैं।
सत्त्वं(म्) रजस्तम इति, गुणाः(फ्) प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो, देहे देहिनमव्ययम्॥14.5॥
हे महाबाहो! प्रकृति से उत्पन्न होने वाले सत्त्व, रज (और) तम – ये (तीनों) गुण अविनाशी देही (जीवात्मा) को देह में बाँध देते हैं।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं-
“हे अर्जुन! प्रकृति से उत्पन्न यह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, ये तीनों अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँध कर रखते हैं।"
जीवात्मा अविनाशी है, शरीर विनाशी है। शरीर जब से बना है तब से बदल रहा है, पैदा हुआ तब अलग था, पाँच वर्ष में अलग, बीस में अलग, पचास वर्ष में अलग और वृद्ध होते-होते तो बहुत ही अलग हो जाएगा। हमारी हर एक कोशिका हमारे जीवन काल में अनेक बार बदल जाती है।
“हे अर्जुन! प्रकृति से उत्पन्न यह सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, ये तीनों अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँध कर रखते हैं।"
जीवात्मा अविनाशी है, शरीर विनाशी है। शरीर जब से बना है तब से बदल रहा है, पैदा हुआ तब अलग था, पाँच वर्ष में अलग, बीस में अलग, पचास वर्ष में अलग और वृद्ध होते-होते तो बहुत ही अलग हो जाएगा। हमारी हर एक कोशिका हमारे जीवन काल में अनेक बार बदल जाती है।
हर क्षण यह क्षीण हो रहा है।
Every moment it is dying.
Every moment it is dying.
शरीर के बदलने पर भी अपनेपन का जैसा भाव पाँच वर्ष में था, वही पचास वर्ष में भी है। शरीर बदलता गया परन्तु स्वयं के होने की अनुभूति जन्म से मृत्यु तक कभी नहीं बदलती। शरीर तो बदलता है पर मैं नहीं बदलता। पानी और तेल तो कभी मिलते नहीं, फिर वह अविनाशी जीवात्मा इस विनाशशील शरीर में टिकती कैसे हैं?
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं सत, रज, तम की रस्सी से आत्मा को शरीर से बाँधता हूँ। इस विनाशशील शरीर को जीवात्मा के साथ इन तीनों गुणों से बाँधा जाता है। गोस्वामीजी ने कहा-
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैं सत, रज, तम की रस्सी से आत्मा को शरीर से बाँधता हूँ। इस विनाशशील शरीर को जीवात्मा के साथ इन तीनों गुणों से बाँधा जाता है। गोस्वामीजी ने कहा-
गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥
जो दिखता है, जो नहीं दिखता है, जहाँ तक यह मन जा सकता है, सब माया है, सब नष्ट होने वाला है। ऐसी क्या कल्पना कर सकते हैं जो अविनाशी है। खरबों वर्षों में सूर्य भी नष्ट हो जाएगा। जो भी हम जानते हैं सब विनाशी है।
फिर अविनाशी जीवात्मा बँधती कैसे हैं?
श्रीगोस्वामीजी ने कहा-
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥
श्रीगोस्वामीजी ने कहा कि अविनाशी जीवात्मा शरीर से वैसे ही बँधी है जिस प्रकार एक पक्षी और एक बन्दर। दोनों के सुन्दर सारग्रहित दृष्टान्त इस प्रकार हैं-
बन्धन और मुक्ति — एक दृष्टान्त
पक्षी पकड़ने के लिए एक विशेष प्रकार का यन्त्र बनाया जाता है। यह यन्त्र इतना सूक्ष्म और चतुराई से रचा जाता है कि जैसे ही कोई पक्षी उसमें बैठकर दाना चुगने का प्रयास करता है, वह यन्त्र सक्रिय हो जाता है।
एक सेकण्ड के दसवें हिस्से में ही यन्त्र की पतली तार घुमती है, और पक्षी जिसे इसका भान भी नहीं होता हवा में उल्टा लटक जाता है। आश्चर्य की बात यह होती है कि उस तार में पक्षी वास्तव में बँधा नहीं होता। वह तो केवल स्वयं ही अपने पञ्जों से उस तार को कसकर पकड़ लेता है, भय और असमञ्जस के कारण।
उसके मन में यही भाव रहता है —
"अगर मैंने इस तार को छोड़ा तो शायद मैं गिर जाऊँ, मर जाऊँगा।"
परन्तु सच्चाई यह है कि जिस क्षण वह उस तार को छोड़ देगा, वह स्वतन्त्र होकर उड़ सकेगा।
पक्षी भयभीत होकर उसी को पकड़कर लटका रहता है, जिसे पकड़ने की आवश्यकता ही नहीं है। यही स्थिति मनुष्य की भी है।
हम भी अपने जीवन में कई ऐसी बातों को - चाहे वह चिन्ता हो, भय हो, अहङ्कार हो या मोह कसकर पकड़े रहते हैं, जिनसे बस थोड़ा-सा छोड़ देने पर हम मुक्त हो सकते हैं। परन्तु हम भ्रमवश इन्हीं बातों को पकड़कर स्वयं को बन्धनों में डाल लेते हैं।
मुक्ति बाहर नहीं है, वह तो बस पकड़ को ढीला करने में ही है।
एक और प्रसिद्ध दृष्टान्त है जो बहुत सुन्दर सीख देता है।
बन्दर, सुराही और चने की कहानी— लोभ का बन्धन।
मदारी या बन्दर पकड़ने वाले अक्सर एक रोचक तरकीब अपनाते हैं। वे एक मिट्टी की सुराही लेते हैं, जिसकी गर्दन पतली होती है और अन्दर का हिस्सा थोड़ा चौड़ा। उस सुराही के अन्दर वे चने या मिठाई के दाने डाल देते हैं और उसे पेड़ के नीचे या किसी जगह मिट्टी में गाड़ देते हैं। सुराही का मुँह इतना चौड़ा होता है कि बन्दर खाली हाथ आसानी से उसमें हाथ डाल सकता है। जैसे ही वह अन्दर जाकर चने को मुट्ठी में भरता है, उसकी बन्द मुट्ठी सुराही के मुँह से बाहर नहीं निकल पाती।
बन्दर को चाहिए कि वह चने को छोड़ दे और हाथ बाहर निकालकर भाग जाए। लोभ और लालच के कारण वह चने को छोड़ता नहीं। वह पूरे ज़ोर से हाथ खींचने की कोशिश करता है, उछलता है, कूदता है पर हाथ बाहर नहीं आता।
इसी बीच मदारी आकर उसे पकड़ लेता है। असल में न तो सुराही उसे बाँधती है, न ही कोई रस्सी अपितु उसका अपना लोभ ही उसका बन्धन बन जाता है। मनुष्य भी अक्सर अपने लोभ, मोह, और इच्छाओं के कारण स्वयं को बन्धनों में डाल लेता है।
यदि समय पर इन बन्धनों को, मोह और लोभ को छोड़ दे, तो वह स्वतन्त्र हो सकता है। बन्धन का भ्रम, माया का जाल है। हम सब यही मानते हैं कि हमें इस संसार ने, माया ने, जकड़ रखा है। हम कहते हैं —
“क्या करें, माया ने पकड़ रखा है… दुनिया के झञ्झट हैं… हैं…”
असल में सच यह है कि माया ने हमें नहीं पकड़ा। हमने ही माया को पकड़ रखा है। हम स्वयं अपने मोह, सम्बन्ध और लोभ को इतनी मजबूती से पकड़ कर बैठे हैं, जैसे वह हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो। हम प्रायः कहते हैं—
"माया हमें छोड़ नहीं रही… मोह हमें पकड़ कर बैठा है…"
पर सच तो यह है कि माया ने हमें नहीं पकड़ा, हमने माया को पकड़ रखा है।
जिस दिन यह बात हमारे भीतर उतर जाएगी, उसी दिन हमारे भीतर मुक्ति का द्वार खुल जाएगा।
बन्धन बाहर नहीं है, बन्धन तो हमारे भीतर की पकड़ है।
श्रीभगवान् ने सभी जीवों को अलग-अलग गुण, स्वभाव और प्रवृत्ति के साथ बनाया है।
तोता— तोता सुन्दर होता है, आकर्षक होता है।
यदि आप उसे दस वर्षों तक अपने हाथों से पालें, प्रेम करें, दाना-पानी दें, और फिर पिंजरा खोल दें तो वह बिना पीछे देखे उड़ जाएगा।
क्यों?
क्योंकि श्रीभगवान् ने उसके स्वभाव में मुक्ति की आकाङ्क्षा और स्वतन्त्रता का गुण दिया है, उसे बन्धन सहन नहीं है।
कुत्ता— कुत्ता चाहे सड़क का हो या किसी महल का, यदि आप उसे एक दिन भी प्रेम से रोटी खिला दें, तो वह जीवन भर आपके प्रति वफादार रहेगा।
क्यों?
क्योंकि श्रीभगवान ने उसके स्वभाव में मोह और निष्ठा का गुण रखा है।
घोड़ा— घोड़ा परिश्रमी होता है, कठिन परिश्रम करने वाला।
उसे कितना भी थकाया जाए, वह अपने स्वामी के लिए परिश्रम करता है, परन्तु बन्धन उसे भी पसन्द नहीं।
उसके स्वभाव में परिश्रम और सेवा का गुण है।
मनुष्य—
मनुष्य में इन सभी गुणों का मिश्रण है। मोह भी, स्वतन्त्रता की चाह भी और परिश्रम की शक्ति भी।
एक विशेषता जो श्रीभगवान् ने केवल मनुष्य को दी है— विवेक
जो मनुष्य को यह समझने में सक्षम बनाता है कि "क्या मुझे पकड़ना है और क्या मुझे छोड़ना है।"
माया और मोह तब तक हमें पकड़े रहते हैं जब तक हम स्वयं उन्हें पकड़े रहते हैं।
तोता यदि अपने स्वभाव से मुक्त हो सकता है, कुत्ता अपने स्वभाव में मोह से बँध सकता है, घोड़ा अपने स्वभाव में परिश्रम कर सकता है तो मनुष्य भी अपने विवेक से बन्धनों को तोड़ सकता है।
माया तब तक हमारे साथ है जब तक हम उसे थामे हैं।
मुक्ति उसी दिन मिलेगी जब हम उसे छोड़ देंगे।
तत्र सत्त्वं(न्) निर्मलत्वात्, प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति, ज्ञानसङ्गेन चानघ॥14.6॥
हे पाप रहित अर्जुन! उन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होने के कारण प्रकाशक (और) निर्विकार है। (वह) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से (देही को) बाँधता है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं,-
“हे अर्जुन! इन तीनों गुणों में से सत्त्वगुण निर्मल है। यह प्रकाश उत्पन्न करता है तथा विकारों से मुक्ति दिलाता है। (वह) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से (देही को) बाँधता है।
सभी के अन्दर सत्त्व, रज और तम की अलग-अलग मात्रा होती है। जिसके अन्दर सत्त्व की अधिक प्रधानता होगी, उसकी बुद्धि में जितना सत्त्व होगा, वह उतनी ही निर्मल होगी होगी। कोई भी पूर्ण (absolute) सतोगुणी, या पूर्ण रजोगुणी या पूर्ण तमोगुणी नहीं हो सकता है।
श्रीभगवान् स्पष्ट करते हैं कि —
“हे अर्जुन! इन तीनों गुणों में से सत्त्वगुण निर्मल है। यह प्रकाश उत्पन्न करता है तथा विकारों से मुक्ति दिलाता है। (वह) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से (देही को) बाँधता है।
सभी के अन्दर सत्त्व, रज और तम की अलग-अलग मात्रा होती है। जिसके अन्दर सत्त्व की अधिक प्रधानता होगी, उसकी बुद्धि में जितना सत्त्व होगा, वह उतनी ही निर्मल होगी होगी। कोई भी पूर्ण (absolute) सतोगुणी, या पूर्ण रजोगुणी या पूर्ण तमोगुणी नहीं हो सकता है।
श्रीभगवान् स्पष्ट करते हैं कि —
- कोई भी व्यक्ति केवल सत्त्वगुणी, केवल रजोगुणी या केवल तमोगुणी नहीं होता।
- तीनों गुणों की मात्रा प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न-भिन्न अनुपात में होती है।
- समय, परिस्थिति, सङ्गति और मन की स्थिति के अनुसार ये गुण प्रभाव दिखाते हैं।
- जब हमारी बुद्धि निर्मल हो, निर्णय स्पष्ट हो, विचार शान्त हो तो यह सत्त्वगुण का प्रभाव है।
- जब मन में इच्छा, क्रिया, आकाङ्क्षा, प्रतिस्पर्धा, दौड़, आगे बढ़ने की भावना हो तो यह रजोगुण है।
- जब मन में जड़ता, आलस्य, अज्ञान, मोह, क्रोध, हिंसा आदि भाव हों तो यह तमोगुण है।
कौन-सा गुण कब हावी होता है?
- एक ही व्यक्ति कभी सत्त्व प्रधान होता है जब वह शान्ति से चिन्तन करता है।
- कभी रज प्रधान जब वह उत्साहपूर्वक कार्य करता है।
- और कभी तम प्रधान जब वह निराश होकर अवसाद में चला जाता है।
प्रकाश और स्पष्टता का सम्बन्ध-
यदि अन्धेरे में आपकी कोई कुञ्जी गिर जाए तो आप क्या करेंगे? आप टॉर्च या किसी प्रकाश का सहारा लेकर उसे ढूँढेंगे। यदि उसी क्षण कमरे में तेज़ प्रकाश जल उठे तो आपको कुञ्जी ढूँढने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि प्रकाश में वह स्वयं ही स्पष्ट दिखाई देने लगेगी। ठीक यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है।
जिसके भीतर जितना अधिक सत्त्वगुण का प्रकाश होगा, जिसकी बुद्धि जितनी अधिक निर्मल और शान्त होगी, उसके जीवन में भ्रम, उलझन और दुविधा कम होगी। उसे किसी बात को विशेष रूप से "खोजने" या "सोच-सोचकर थकने" की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि सत्त्वगुण का प्रकाश उसके भीतर ऐसी स्पष्टता पैदा कर देता है कि सब कुछ सहज ही दृष्टिगोचर हो जाता है।
इसलिए जब-जब जीवन में हम असमञ्जस, उलझन या दुविधा में हों, तो यह समझ लेना चाहिए कि उस समय हमारे भीतर सत्त्वगुण का प्रकाश घट गया है। तब आवश्यक है-
यदि अन्धेरे में आपकी कोई कुञ्जी गिर जाए तो आप क्या करेंगे? आप टॉर्च या किसी प्रकाश का सहारा लेकर उसे ढूँढेंगे। यदि उसी क्षण कमरे में तेज़ प्रकाश जल उठे तो आपको कुञ्जी ढूँढने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि प्रकाश में वह स्वयं ही स्पष्ट दिखाई देने लगेगी। ठीक यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है।
जिसके भीतर जितना अधिक सत्त्वगुण का प्रकाश होगा, जिसकी बुद्धि जितनी अधिक निर्मल और शान्त होगी, उसके जीवन में भ्रम, उलझन और दुविधा कम होगी। उसे किसी बात को विशेष रूप से "खोजने" या "सोच-सोचकर थकने" की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि सत्त्वगुण का प्रकाश उसके भीतर ऐसी स्पष्टता पैदा कर देता है कि सब कुछ सहज ही दृष्टिगोचर हो जाता है।
इसलिए जब-जब जीवन में हम असमञ्जस, उलझन या दुविधा में हों, तो यह समझ लेना चाहिए कि उस समय हमारे भीतर सत्त्वगुण का प्रकाश घट गया है। तब आवश्यक है-
- स्वयं को शान्त करना,
- मन को निर्मल करना,
- और सत्त्व गुण को बढ़ाने के लिए साधना करना।
सत्त्वगुण बढ़ेगा तो जीवन का हर उत्तर स्वयं ही सामने आ जाएगा। विवेचन के समय प्रायः यह प्रश्न सामने आता है-
"हम ध्यान तो करते हैं, पर मन नहीं लगता। कभी-कभी लगता है, कभी बिल्कुल नहीं लगता। ऐसा क्यों होता है?"
यह स्वाभाविक है। क्योंकि हमारे भीतर के त्रिगुण— सत्त्व, रज और तम, निरन्तर बदलते रहते हैं। जब भीतर सत्त्वगुण प्रबल होता है, तब मन सहज ही ध्यान में लग जाता है। जब रजोगुण हावी होता है, तब मन इधर-उधर भागता है, स्थिर नहीं रह पाता। और जब तमोगुण बढ़ जाता है, तब आलस्य, थकान या उदासीनता घेर लेती है।
इसलिए जब ध्यान में मन न लगे, तो समझना चाहिए कि उस समय रजोगुण या तमोगुण का प्रभाव बढ़ गया है। ऐसे समय में मन को धैर्यपूर्वक सम्भालना और सतत अभ्यास करना ही उपाय है।
- सत्त्वगुण का सुख शुद्ध, निर्मल और स्थायी होता है। जैसे पूजा, ध्यान, भजन, सेवा में जो सुख मिलता है वह भीतर से शान्ति और सन्तोष देता है। इसका प्रभाव दीर्घकाल तक सकारात्मक होता है।
- रजो गुण का सुख तात्कालिक और ऊपरी होता है। जैसे चटपटे खाने, इन्द्रियों की भोग-विलास में जो सुख मिलता है वह क्षणिक होता है और उसके बाद शरीर व मन को कष्ट देता है। स्वाद के आनन्द के बाद अम्लता या पेट की गड़बड़ इसका उदाहरण है।
- तमोगुण का सुख यह भी दिखने में सुखद प्रतीत होता है, पर असल में जड़ता और गिरावट की ओर ले जाता है। जैसे गहरी नींद में सुख लगता है, परन्तु आवश्यकता से अधिक सोने पर शरीर सुस्त हो जाता है और स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
सच्चा सुख कौन-सा?
वही सुख सच्चा है, जो बाद में दुःख न दे।
यदि पूजा, ध्यान या सेवा में आपको आनन्द मिल रहा है तो यह शुद्ध सत्त्वगुण का सुख है। जब हमें सत्सङ्ग में, गीता के अध्ययन में, पूजा में अथवा ध्यान में आनन्द मिलने लगता है, तो वह आनन्द भी कभी-कभी मन में एक प्रकार की आसक्ति पैदा कर सकता है। यह सब सुख जैसे गीता पढ़ने का सुख, पूजा करने का सुख, सत्सङ्ग का सुख यह शरीर द्वारा भोगा जा रहा है। इसलिए यह आसक्ति जीवात्मा को शरीर से बाँधती है।
रजो रागात्मकं(म्) विद्धि, तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय, कर्मसङ्गेन देहिनम्॥14.7॥
हे कुन्तीनन्दन! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करने वाले रजोगुण को (तुम) रागस्वरूप समझो। वह कर्मों की आसक्ति से देही जीवात्मा को बाँधता है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं,-
"हे अर्जुन! रजोगुण इच्छा तथा आसक्ति से उत्पन्न होता है। वह जीवात्मा को कर्म तथा फल की बेड़ी से बाँध लेता है। रजोगुण में सारा खेल मैं और मेरे का है।
रजोगुण इच्छा (कामना), आसक्ति (मोह) और कर्म में लिप्तता से उत्पन्न होता है। यह जीवात्मा को कर्म और कर्म के फल की बेड़ियों में बाँध देता है। रजोगुण मनुष्य के भीतर निरन्तर कुछ पाने की लालसा जगाता है। यह गुण कभी भी सन्तुष्टि नहीं देता चाहे वह धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, परिवार हो, यश हो, सफलता हो या अधिकार हो। मनुष्य रजोगुण के प्रभाव में "मैं" और "मेरा" के अहङ्कार में फँस जाता है।
"मैं" और "मेरा" का खेल-
"हे अर्जुन! रजोगुण इच्छा तथा आसक्ति से उत्पन्न होता है। वह जीवात्मा को कर्म तथा फल की बेड़ी से बाँध लेता है। रजोगुण में सारा खेल मैं और मेरे का है।
रजोगुण इच्छा (कामना), आसक्ति (मोह) और कर्म में लिप्तता से उत्पन्न होता है। यह जीवात्मा को कर्म और कर्म के फल की बेड़ियों में बाँध देता है। रजोगुण मनुष्य के भीतर निरन्तर कुछ पाने की लालसा जगाता है। यह गुण कभी भी सन्तुष्टि नहीं देता चाहे वह धन हो, पद हो, प्रतिष्ठा हो, परिवार हो, यश हो, सफलता हो या अधिकार हो। मनुष्य रजोगुण के प्रभाव में "मैं" और "मेरा" के अहङ्कार में फँस जाता है।
"मैं" और "मेरा" का खेल-
- मेरी स्थिति (My Position)
- मेरा सम्मान (My Fame)
- मेरा परिवार (My Family)
- मेरी प्रसिद्धि (My Status)
- मेरी बुद्धि (My Intelligence)
- मेरी उपलब्धियाँ (My Achievements)
इन सबका मूल भाव यही होता है — “मैं कौन हूँ” और “मेरा क्या है”
इसीलिए रजोगुण जीवात्मा को निरन्तर बाह्य जगत की ओर खींचता है और कर्म के जाल में बाँधता है।
हमारे मन में अक्सर यह भावना आती है-
इसीलिए रजोगुण जीवात्मा को निरन्तर बाह्य जगत की ओर खींचता है और कर्म के जाल में बाँधता है।
हमारे मन में अक्सर यह भावना आती है-
- "यह खा लूँ तो सुख मिलेगा…"
- "यह पहन लूँ तो खुश हो जाऊँगा…"
- "यह देख लूँ, इस जगह घूम आऊँ तो आनन्द आ जाएगा…"
- "ऐसा मकान बना लूँ, ऐसी गाड़ी ले लूँ, तो जीवन में सच्चा सुख मिलेगा…"
और इसके पीछे एक बहुत सूक्ष्म सत्य काम करता है-
हमारा मन, वास्तविक खुशी से अधिक, उसकी कल्पना में आनन्द लेता है। जब हम किसी वस्तु या उपलब्धि की कामना करते हैं, तो मन में उस वस्तु से जुड़ी सुख की कल्पना इतनी रङ्गीन और मनोहारी होती है कि वह कल्पना ही हमें वास्तविक सुख से अधिक आनन्दित करती है।
उदाहरण के लिए जब हम किसी मनचाही वस्तु को खरीदने की सोचते हैं, तो खरीदने से पहले, उसकी कल्पना करते-करते ही हम खुश हो जाते हैं। लेकिन जैसे ही वह वस्तु हमारे पास आ जाती है, थोड़े समय बाद वह खुशी कम हो जाती है और फिर वही वस्तु सामान्य लगने लगती है। क्या वह नया फोन, नई गाड़ी, नई पोशाक, नया मकान, जिसके लिए महीनों सपने देखे, दिल में उमङ्ग जगाई मिलने के बाद उतनी ही खुशी और उतना ही आनन्द दे पाया?
शायद नहीं…
वास्तविकता में वह सुख क्षणिक होता है। कल्पना में सुख बहुत बड़ा लगता है, वास्तविकता में वह जल्दी ही सामान्य हो जाता है।
यह सब रजोगुण से उत्पन्न इच्छाएँ हैं, जो कभी स्थायी सुख नहीं दे सकतीं। सच्चा सुख तब मिलता है, जब मन अपनी कल्पना से ऊपर उठकर वास्तविकता को स्वीकार करता है और स्वयं के भीतर की पूर्णता को पहचानता है।
उदाहरण के लिए जब हम किसी मनचाही वस्तु को खरीदने की सोचते हैं, तो खरीदने से पहले, उसकी कल्पना करते-करते ही हम खुश हो जाते हैं। लेकिन जैसे ही वह वस्तु हमारे पास आ जाती है, थोड़े समय बाद वह खुशी कम हो जाती है और फिर वही वस्तु सामान्य लगने लगती है। क्या वह नया फोन, नई गाड़ी, नई पोशाक, नया मकान, जिसके लिए महीनों सपने देखे, दिल में उमङ्ग जगाई मिलने के बाद उतनी ही खुशी और उतना ही आनन्द दे पाया?
शायद नहीं…
वास्तविकता में वह सुख क्षणिक होता है। कल्पना में सुख बहुत बड़ा लगता है, वास्तविकता में वह जल्दी ही सामान्य हो जाता है।
यह सब रजोगुण से उत्पन्न इच्छाएँ हैं, जो कभी स्थायी सुख नहीं दे सकतीं। सच्चा सुख तब मिलता है, जब मन अपनी कल्पना से ऊपर उठकर वास्तविकता को स्वीकार करता है और स्वयं के भीतर की पूर्णता को पहचानता है।
तमस्त्वज्ञानजं(म्) विद्धि, मोहनं(म्) सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि:(स्), तन्निबध्नाति भारत॥14.8॥
हे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न होने वाला समझो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा देहधारियों को बाँधता है
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि व्यक्ति का तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है तथा मोह का निर्माण करता है। वह जीवात्मा इसी कारण प्रमाद, आलस्य तथा निद्रा से बन्ध जाता है। प्रमाद, आलस्य और निद्रा के माध्यम से यह जीवात्मा को बाँधता है। तमोगुण का स्वभाव ऐसा है-
जो करना है, वह करना नहीं, उसे टालते रहना।
जहाँ मन नहीं लगना चाहिए, वहीं मन लगाना।
जो कार्य उपलब्धि नहीं दिलाते, उन्हीं में समय बिताना।
तमो गुण का प्रभाव ऐसा होता है कि काम की बात हो तो— "अभी नहीं… बाद में करेंगे… कल देखेंगे…", जहाँ कुछ भी करना नहीं है, जैसे मोबाइल स्क्रॉल करना, यूँ ही बैठे रहना, वहाँ घण्टों समय निकल जाता है।
एक उदाहरण-
मोबाइल खोलते हैं… सोचते हैं "बस दो मिनट देखेंगे…"
देखते-देखते "दो घण्टे निकल जाते हैं!"
और उन दो घण्टों के बाद सोचते हैं "क्या देखा? क्या सीखा?"
उत्तर- कुछ भी नहीं।
सुख मिला? हाँ, क्षणिक मनोरञ्जन मिला… उपलब्धि? शून्य।
शरीर के लिए पाँच-छ: घण्टे की निद्रा आवश्यक है। पाँच-छह घण्टे का यह तमोगुण आवश्यक धारणा है सभी के लिए। पर जब निद्रा आवश्यकता से अधिक हो जाती है, तब वह तमोगुण बन जाती है।
आलस्य, प्रमाद, कार्य से पलायन— यह तमोगुण का सीधा प्रभाव है। अभी का काम अभी नहीं करना है बाद में कभी करेंगे। पड़े हुए हैं, सो रहे हैं।
अब हम विचार करें कि हम किस गुण से प्रभावित है। उसके जीवन का, शरीर का क्या होगा।
यह हमें सतत चिन्तन करते रहना है कि हमें किन गुणों की ओर जाना है? हमें निरन्तर यह सोचते रहना चाहिए कि सत्त्वगुणी बनने के लिए हमें क्या करना होगा?
अब हम विचार करें कि हम किस गुण से प्रभावित है। उसके जीवन का, शरीर का क्या होगा।
यह हमें सतत चिन्तन करते रहना है कि हमें किन गुणों की ओर जाना है? हमें निरन्तर यह सोचते रहना चाहिए कि सत्त्वगुणी बनने के लिए हमें क्या करना होगा?
सत्त्वं(म्) सुखे सञ्जयति, रजः(ख्) कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः(फ्), प्रमादे सञ्जयत्युत॥14.9॥
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में (और) रजोगुण कर्म में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है।
विवेचन- सत्त्वगुण सुख में लगाता है, रजोगुण कर्म में लगाता है और तमोगुण ज्ञान को ढ़क कर प्रमाद में लगाता है। इन तीनों गुणों के द्वारा यह जीवात्मा इस शरीर से बँध जाती है अर्थात् ये तीनों ही गुण बन्धन कारक हैं।
सत्त्वगुण मनुष्य को शान्ति, सन्तोष और आनन्द की ओर आकर्षित करता है। यह गुण जीवन में विवेक, प्रकाश और स्पष्टता लाता है। यदि इससे भी आसक्ति हो जाए—"मुझे तो पूजा में सुख मिलता है… मुझे ध्यान में बहुत आनन्द आता है…",
ऐसा सुख भी बन्धन बन जाता है।
रजोगुण सदा सक्रिय करता है- "यह कर लूँ, वह बना लूँ, यह पा लूँ…"
यह व्यक्ति को कर्म, उसकी फल की इच्छा और उसकी चिन्ता में बाँध देता है। कभी पद, कभी प्रतिष्ठा, कभी सम्पत्ति, कभी यश, यह गुण हमेशा कोई न कोई चाहत जगाता है। रजोगुण का बन्धन अस्थिरता और बेचैनी का कारण है।
तमोगुण तो ज्ञान को ही ढक देता है। आलस्य, प्रमाद, निद्रा और मोह में फँसा देता है। व्यक्ति को न तो कर्म की प्रेरणा मिलती है, न ही ज्ञान की स्पष्टता। तमोगुण का बन्धन पतन और अज्ञान की ओर ले जाता है।
साधक का मार्ग है सत्त्व को बढ़ाना, रज को संयमित करना, तम को घटाना।
सत्त्वगुण मनुष्य को शान्ति, सन्तोष और आनन्द की ओर आकर्षित करता है। यह गुण जीवन में विवेक, प्रकाश और स्पष्टता लाता है। यदि इससे भी आसक्ति हो जाए—"मुझे तो पूजा में सुख मिलता है… मुझे ध्यान में बहुत आनन्द आता है…",
ऐसा सुख भी बन्धन बन जाता है।
रजोगुण सदा सक्रिय करता है- "यह कर लूँ, वह बना लूँ, यह पा लूँ…"
यह व्यक्ति को कर्म, उसकी फल की इच्छा और उसकी चिन्ता में बाँध देता है। कभी पद, कभी प्रतिष्ठा, कभी सम्पत्ति, कभी यश, यह गुण हमेशा कोई न कोई चाहत जगाता है। रजोगुण का बन्धन अस्थिरता और बेचैनी का कारण है।
तमोगुण तो ज्ञान को ही ढक देता है। आलस्य, प्रमाद, निद्रा और मोह में फँसा देता है। व्यक्ति को न तो कर्म की प्रेरणा मिलती है, न ही ज्ञान की स्पष्टता। तमोगुण का बन्धन पतन और अज्ञान की ओर ले जाता है।
साधक का मार्ग है सत्त्व को बढ़ाना, रज को संयमित करना, तम को घटाना।
रजस्तमश्चाभिभूय, सत्त्वं(म्) भवति भारत।
रजः(स्) सत्त्वं(न्) तमश्चैव, तमः(स्) सत्त्वं(म्) रजस्तथा॥14.10॥
हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्व गुण बढ़ता है, सत्त्व गुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण (बढ़ता है) वैसे ही सत्त्वगुण (और) रजोगुण को दबाकर तमोगुण (बढ़ता है)।
विवेचन- अब श्रीभगवान् बहुत ही महत्त्वपूर्ण श्लोक कह रहे हैं। हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सतोगुण, सतोगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण और सतोगुण तमोगुण को दबाकर रजोगुण होता है। यानि दो गुण को दबाएँगे तो तीसरा गुण बढ़ेगा।
श्रीभगवान् कह रहे है कि नष्ट कुछ नहीं कर सकते हैं, इनका योग सौ ही रहने वाला है। किसको किस अनुपात में बढ़ाना है, किसको किस अनुपात में घटाना है, इसका विचार करना होगा।
रजोगुण, तमोगुण आवश्यक है। केवल सतोगुण से काम नहीं होगा। आवश्यक तमोगुण तो चाहिए ही। निरोगी काया के लिए पाँच-छ: घण्टे की नींद तो लेनी ही होगी। भोजन की क्रिया तो करनी है, इसलिए आवश्यक रजोगुण भी चाहिए। पूरा दिन केवल विवेचन ही सुनता रहूँगा, गीताजी ही पढ़ता रहूँगा, न खाऊँगा, न सोऊँगा यह सम्भव नहीं है। मरता ज्ञानी भी है और अज्ञानी भी है। लेकिन अन्तर होता है।
एक कहानी, एक सच्ची घटना है-
पिछले जन्म की एक योगिनी स्त्री थी। बचपन से ही उसका सतोगुण बड़ा प्रबल था। सत्सङ्ग में, भजन कीर्तन में मन लगता था। सबकी सहायता करती थी। भोगों का आकर्षण भी उसका न्यून था।
समय आने पर उसका विवाह हुआ। पति भी सज्जन थे। उत्तम स्त्री मिली तो पति भी उसके सङ्ग सत्सङ्ग में लग गए। समय आने पर एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई। पुत्र की अवस्था दस वर्ष की है। पति कार्यालय गए हैं। दूरभाष का प्रचलन नहीं है।
ऐसे समय में घर के बाहर खेलते हुए पुत्र को सर्प ने आकर दंश किया। जब तक बाहर से चिल्लाने की आवाज आई और स्त्री भाग कर बाहर पहुँची तब तक तो पुत्र समाप्त हो गया। एक ही पुत्र है। मृत्यु हो गयी है।
ऐसे में किसी भी माँ की स्थिति कैसी होगी? इस स्त्री ने तो बचपन से सतोगुण धारण किया है।
आँखों में आँसू आए। हृदय पसीजा। लेकिन सतोगुण के कारण बुद्धि में प्रकाश है, विवेक है। पुत्र के शव को ले जाकर अन्दर रखा। मुख में तुलसी दल डाला, गङ्गाजल डाला, गीता का पारायण किया। शाम को पति के आने का समय हुआ तब तक प्रतीक्षा की।
पतिदेव के आने पर उन्हें बिना कुछ बताए सीधा भोजन लगा दिया। भोजन करते-करते पतिदेव ने पूछा आज तुम्हारे चेहरे पर प्रसन्नता नहीं है, उदास लग रही हो।
पति के पूछने पर स्त्री ने कहा कि क्या बतलाऊँ। हमारे पड़ोस में एक बहन थी, बहुत वर्ष पहले मुझसे काँसे का पतीला माँग कर ले गई थी। मुझे इतने वर्ष काम पड़ा नहीं, मैंने वह पतीला माँगा नहीं। आज मुझे विचार हुआ कि उस काँसे के पतीले में खीर बनती हूँ। मुझे लगा था वह तुरन्त लौटा देगी। परन्तु उसने पतीला तो दिया नहीं, झगड़ा किया और मुझे बहुत अपशब्द कहे।
पति ने कहा यह तो बहुत गलत बात है, जिसकी वस्तु है वह लौटा देने में रोना कैसा? झगड़ा क्यों करना है? ऐसे बात करते-करते पतिदेव का भोजन पूरा हुआ। स्त्री ने कहा सही बात है-
"जिसकी वस्तु है उसको वापस देने में झगड़ा क्यों?"
पतिदेव को कमरे में ले गई। पतिदेव स्तब्ध हो गए। पुत्र का शव रखा हुआ है। धूप जल रही है, पास तुलसी का पौधा रखा हुआ है।
पतिदेव सिहर गए, इकलौता पुत्र इस दशा में। पत्नी की ओर देखा। उसने आँसू अपनी आँखों में दबा कर रखे थे। पति रोने लगे, जोर से रोए। पति भी रो रहे थे, पत्नी भी रो रही थी। रोते-रोते कहा, अभी आप ही तो कह रहे थे, जिसकी वस्तु है उसको वापस देने में रोना कैसा?
हम दोनों को विचार करना चाहिए परमात्मा ने बस इतने दिनों के लिए हमें वह पुत्र दिया था। उसका था उसको वापस दे दिया। अब हमें क्यों रोना है? पतिदेव ने कहा-
"तुम धन्य हो, तुम कैसे सह सकती हो, कोई माँ ऐसा कैसे कह सकती है? मैं तो फिर भी पुरुष हूँ। तुम स्त्री होकर भी इतना धैर्य रखती हो।"
उस स्त्री का विवेक देख पतिदेव को सन्तोष हो गया। बालक का क्रिया कर्म किया। उसके लिए जो भी आवश्यक संस्कार थे, वे पूरे किये। प्रेत कर्म, गीता-पाठ आदि तेरह दिन पूरे करके पत्नी की स्थिति देखकर पति के मन में वैराग्य आ गया।
दोनों ने शेष जीवन वृन्दावन में जाकर व्यतीत किया। पूरा जीवन भजन किया।
यह सत्य घटना है।
सबके घर में इस तरह की घटनाएँ होती हैं। कौन किस बात को किस तरह से लेता है। जब जीवन में सत बढ़ेगा तो इस प्रकार की स्थिति में विवेकपूर्ण निर्णय ले सकेंगे।
सत्त्व को बढ़ाना है तो रजोगुण और तमोगुण को दबाना होगा।
हम सभी के पास चौबीस घण्टे होते हैं। शङ्कराचार्य जी के पास, सन्त ज्ञानेश्वर जी के पास, विवेकानन्द जी के पास भी दिन में चौबीस घण्टे ही थे।
आठ घण्टे सोने खाने पीने के निकाल दे, तो हम सभी के पास सोलह घण्टे जागृत अवस्था के होते हैं।
श्रीभगवान् कह रहे है कि नष्ट कुछ नहीं कर सकते हैं, इनका योग सौ ही रहने वाला है। किसको किस अनुपात में बढ़ाना है, किसको किस अनुपात में घटाना है, इसका विचार करना होगा।
रजोगुण, तमोगुण आवश्यक है। केवल सतोगुण से काम नहीं होगा। आवश्यक तमोगुण तो चाहिए ही। निरोगी काया के लिए पाँच-छ: घण्टे की नींद तो लेनी ही होगी। भोजन की क्रिया तो करनी है, इसलिए आवश्यक रजोगुण भी चाहिए। पूरा दिन केवल विवेचन ही सुनता रहूँगा, गीताजी ही पढ़ता रहूँगा, न खाऊँगा, न सोऊँगा यह सम्भव नहीं है। मरता ज्ञानी भी है और अज्ञानी भी है। लेकिन अन्तर होता है।
एक कहानी, एक सच्ची घटना है-
पिछले जन्म की एक योगिनी स्त्री थी। बचपन से ही उसका सतोगुण बड़ा प्रबल था। सत्सङ्ग में, भजन कीर्तन में मन लगता था। सबकी सहायता करती थी। भोगों का आकर्षण भी उसका न्यून था।
समय आने पर उसका विवाह हुआ। पति भी सज्जन थे। उत्तम स्त्री मिली तो पति भी उसके सङ्ग सत्सङ्ग में लग गए। समय आने पर एक पुत्र की प्राप्ति भी हुई। पुत्र की अवस्था दस वर्ष की है। पति कार्यालय गए हैं। दूरभाष का प्रचलन नहीं है।
ऐसे समय में घर के बाहर खेलते हुए पुत्र को सर्प ने आकर दंश किया। जब तक बाहर से चिल्लाने की आवाज आई और स्त्री भाग कर बाहर पहुँची तब तक तो पुत्र समाप्त हो गया। एक ही पुत्र है। मृत्यु हो गयी है।
ऐसे में किसी भी माँ की स्थिति कैसी होगी? इस स्त्री ने तो बचपन से सतोगुण धारण किया है।
आँखों में आँसू आए। हृदय पसीजा। लेकिन सतोगुण के कारण बुद्धि में प्रकाश है, विवेक है। पुत्र के शव को ले जाकर अन्दर रखा। मुख में तुलसी दल डाला, गङ्गाजल डाला, गीता का पारायण किया। शाम को पति के आने का समय हुआ तब तक प्रतीक्षा की।
पतिदेव के आने पर उन्हें बिना कुछ बताए सीधा भोजन लगा दिया। भोजन करते-करते पतिदेव ने पूछा आज तुम्हारे चेहरे पर प्रसन्नता नहीं है, उदास लग रही हो।
पति के पूछने पर स्त्री ने कहा कि क्या बतलाऊँ। हमारे पड़ोस में एक बहन थी, बहुत वर्ष पहले मुझसे काँसे का पतीला माँग कर ले गई थी। मुझे इतने वर्ष काम पड़ा नहीं, मैंने वह पतीला माँगा नहीं। आज मुझे विचार हुआ कि उस काँसे के पतीले में खीर बनती हूँ। मुझे लगा था वह तुरन्त लौटा देगी। परन्तु उसने पतीला तो दिया नहीं, झगड़ा किया और मुझे बहुत अपशब्द कहे।
पति ने कहा यह तो बहुत गलत बात है, जिसकी वस्तु है वह लौटा देने में रोना कैसा? झगड़ा क्यों करना है? ऐसे बात करते-करते पतिदेव का भोजन पूरा हुआ। स्त्री ने कहा सही बात है-
"जिसकी वस्तु है उसको वापस देने में झगड़ा क्यों?"
पतिदेव को कमरे में ले गई। पतिदेव स्तब्ध हो गए। पुत्र का शव रखा हुआ है। धूप जल रही है, पास तुलसी का पौधा रखा हुआ है।
पतिदेव सिहर गए, इकलौता पुत्र इस दशा में। पत्नी की ओर देखा। उसने आँसू अपनी आँखों में दबा कर रखे थे। पति रोने लगे, जोर से रोए। पति भी रो रहे थे, पत्नी भी रो रही थी। रोते-रोते कहा, अभी आप ही तो कह रहे थे, जिसकी वस्तु है उसको वापस देने में रोना कैसा?
हम दोनों को विचार करना चाहिए परमात्मा ने बस इतने दिनों के लिए हमें वह पुत्र दिया था। उसका था उसको वापस दे दिया। अब हमें क्यों रोना है? पतिदेव ने कहा-
"तुम धन्य हो, तुम कैसे सह सकती हो, कोई माँ ऐसा कैसे कह सकती है? मैं तो फिर भी पुरुष हूँ। तुम स्त्री होकर भी इतना धैर्य रखती हो।"
उस स्त्री का विवेक देख पतिदेव को सन्तोष हो गया। बालक का क्रिया कर्म किया। उसके लिए जो भी आवश्यक संस्कार थे, वे पूरे किये। प्रेत कर्म, गीता-पाठ आदि तेरह दिन पूरे करके पत्नी की स्थिति देखकर पति के मन में वैराग्य आ गया।
दोनों ने शेष जीवन वृन्दावन में जाकर व्यतीत किया। पूरा जीवन भजन किया।
यह सत्य घटना है।
सबके घर में इस तरह की घटनाएँ होती हैं। कौन किस बात को किस तरह से लेता है। जब जीवन में सत बढ़ेगा तो इस प्रकार की स्थिति में विवेकपूर्ण निर्णय ले सकेंगे।
सत्त्व को बढ़ाना है तो रजोगुण और तमोगुण को दबाना होगा।
हम सभी के पास चौबीस घण्टे होते हैं। शङ्कराचार्य जी के पास, सन्त ज्ञानेश्वर जी के पास, विवेकानन्द जी के पास भी दिन में चौबीस घण्टे ही थे।
आठ घण्टे सोने खाने पीने के निकाल दे, तो हम सभी के पास सोलह घण्टे जागृत अवस्था के होते हैं।
Be Watchful, हमें सतर्क रहना होगा।
सोलह घण्टे का उपयोग में हम किस प्रकार कर रहे हैं। कितना सतोगुण और कितना रजोगुण और कितना तमोगुण में लग रहा है? जितना रजोगुण और तमोगुण को कम समय देंगे उतना सतोगुण का समय अपने आप ही बढ़ जाएगा।
जीवन का उद्धार, जीवन का प्रकाश सतोगुण बढ़ने से है।
सतोगुण कैसे बढ़ सकता है इसका विचार अब अगले सत्र में करेंगे।
हरि शरणम्! हरि शरणम् हरि शरणम्!! हरि शरणम् हरि शरणम्!!!
इसी के साथ आज के सत्र का समापन हुआ तथा प्रश्नोत्तर सत्र आरम्भ हुआ।
प्रश्नोतर-सत्र
प्रश्नकर्ता- पलक दीदी
प्रश्न- घर में कुछ हो गया, बच्चे बात नहीं मानते कोई भी परिस्थिति में, मैं ज्योतिष की तरफ भागती हूँ, आप के क्या विचार हैं?
उत्तर- ज्योतिष विज्ञान में कोई समस्या नहीं है। ज्योतिष विज्ञान तो सत्य है। परन्तु उसको सही जानने वाले कितने लोग हैं? यह प्रश्न है। जितना हम उपायों, ताबीज़, रत्नों के पीछे भागेंगे उतना ही हमारा अपना मनोबल कम होता जाएगा। अगर कोई गम्भीर स्थिति हो गई, बहुत अलग सी बात हो गई जो किसी के साथ नहीं हुई थी, आपके साथ हो गई तब इन बातों का विचार कर सकते हैं। मैं इसके विरुद्ध नहीं हूँ। रत्नों के प्रभाव से कई अधिक प्रभाव हमारे अपने मनोबल का होता है। श्रीभगवान् के नाम का विश्वास करें। हम गीता पढ़ते है, हम श्रीभगवान् के प्रेमी हैं। उनका नाम हर पाप का नाश करता है।
प्रश्नकर्ता- बेबी मोदी दीदी
प्रश्न- बच्चों को समझा नहीं पाते हैं, बच्चे बात मानते नहीं है। इसके लिए क्या करें?
उत्तर- बालकों को मनाने के लिए प्रेम और तर्क से समझाना पड़ता है। अन्दर से हाथ देखकर सम्भालता है ऊपर से मारता है, तभी कुम्हार घड़े को रूप दे पता है। इसी प्रकार हमें बालकों को सम्भालना होता है। उनकी कोई बात नहीं मानना उनके सब बातें मानना यह सब अधिकता है। बच्चों को न सुनने की आदत भी होनी चाहिए। उनकी बात भी सुननी चाहिए। विवेक से यह करना पड़ता है अपने मूड से ऐसा नहीं होता। जिस बात से बच्चे का कल्याण है वह बात हमें माननी चाहिए।
प्रश्नकर्ता- मीनू दीदी
प्रश्न- पाँच छह दिन से लगातार कोई न कोई परेशानी आती जा रही है? समय टीवी इत्यादि देखने में जा रहा है।
उत्तर- इसका मतलब हम अपने समय का सदुपयोग नहीं कर रहे हैं। समय पर अपना काम नहीं कर पा रहे हैं। धैर्य के साथ एक एक समस्याओं को अपनी विवेक बुद्धि से सुलझाएँ। समस्या आना बड़ी बात नहीं है, समस्या को हम कैसे देखते हैं वह बड़ी बात है। सभी के जीवन में विपरीत परिस्थितियों आती ही हैं। उन विपरीत परिस्थितियों में अपना धैर्य बनाए रखना अपना सन्तुलन बनाए रखना और उस समस्या के निवारण के लिए अपनी विवेक बुद्धि से समाधान ढूँढना यही उचित है। जो समस्याएं पैसे से खरीदी जा सकती हैं वे सबसे सस्ती हैं। जो पैसे की समस्या पैसे से सुलझ जाती है, वह बहुत आसान है।
प्रश्नकर्ता- सुनन्दा दीदी
प्रश्न- सब कहते हैं कि एक श्रीभगवान् की पूजा करनी चाहिए। मुझसे इस प्रकार नहीं हो पाता। इसका क्या समाधान है?
उत्तर- सभी देवताओं की पूजा करनी चाहिए और उनसे अपने इष्ट की भक्ति माँगनी चाहिए। आपको सुख और दुःख में सबसे पहले जिसकी सर्वप्रथम याद आती है, वही आपके इष्टदेव हैं।
प्रश्नकर्ता- मेधा दीदी
प्रश्न- हमारे अन्दर अहङ्कार न आए, उसके लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर- स्वयं को बहुत विशेष मानने से यह समस्या उत्पन्न होती है। मैंने बचपन में यह प्रश्न ब्रह्मलीन परम सन्त नारायण दास जी भक्त माली से यह प्रश्न पूछा था। उन्होंने मुझे दो उपाय बताए थे, वही मैं आपको बताता हूँ-
जब भी आप मन्दिर में जाएँ भगवान् को आदर पूर्वक प्रणाम करें।
और दूसरा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित विनय पत्रिका का अर्थ सहित प्रतिदिन पाठ करें।
प्रश्नकर्ता- मेधा दीदी
प्रश्न- आत्मा और पितरो में क्या अन्तर है?
उत्तर- जो आत्माएँ पितृलोक में जाकर पितरों का शरीर धारण करती हैं वे पितर कहलाती हैं।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।