विवेचन सारांश
जीवन में सतोगुण का महत्व
सुमधुर भजन, हनुमान चालीसा, देश भक्ति गीत, सनातन वैदिक परम्परा के अनुसार दीप प्रज्वलन, गुरु वन्दन एवम् आरम्भिक प्रार्थना के साथ सत्र का आरम्भ हुआ बाल संस्करण होने के कारण सत्र संवादपरक रहा।
बच्चों से पूछा गया-
प्रश्न- चौदहवें अध्याय का क्या नाम है?
उत्तर- बच्चों ने उत्साह पूर्वक उत्तर दिया चौदहवें अध्याय का नाम “गुणत्रयविभागयोग” है।
प्रश्न- इस अध्याय में किन-किन गुणों की बात कही गई है?
उत्तर- इस अध्याय में सत्त्व, रज और तम गुणों की बात कही गई है।
हम घर में एक ही माता-पिता की सन्तान होने पर भी हमारा व्यवहार, हमारी आदतें भिन्न-भिन्न होती हैं। इसी तरह इतनी बड़ी सृष्टि में इतने सारे लोगों के अलग-अलग व्यवहार, अलग-अलग सोच, अलग-अलग आदतें, अलग-अलग व्यक्तित्व होता है। एक ही समस्या के अलग-अलग समाधान अलग-अलग व्यक्तियों के होते हैं। वह सब इन तीनों गुणों के कारण ही होता है इसीलिए हम इन तीनों गुणों के बारे में जानने का प्रयास कर रहे हैं। किसी के मन पर सत्त्वगुण का प्रभाव अधिक होता है तो किसी के मन पर तमोगुण का तो किसी के मन पर रजोगुण का प्रभाव अधिक होता है।
हम रसायन शास्त्र (chemistry) में पढ़ते हैं और घर में भी यदि हम नीम्बू पानी बनाते हैं तो नीम्बू की कभी खटास ज्यादा हो जाती है कभी शक्कर या चीनी अधिक हो जाती है। हम सब भी इसी प्रकार हैं। इन तीनों गुणों के कम ज्यादा होने के कारण हमारा स्वभाव, हमारा व्यक्तित्व बनता है। इन गुणों के कम या ज्यादा होने के कारण से हमारा व्यवहार दूसरे से अलग होता है। यह केवल मनुष्यों में ही नहीं पशु पक्षियों में भी होता है। दो लोगों का व्यवहार एक सा नहीं होता है। हमें यदि अपने जीवन में महान सन्तों जैसे स्वामी विवेकानन्द जी, शिवाजी महाराज की तरह, हनुमान जी की तरह कार्य करने हैं तो हमें सत्त्वगुण को बढ़ाना होगा। गीता परिवार में भी इतने सारे सेवी कार्यकर्ता हैं, वे समाज को कुछ अच्छा दे सकें, इस भाव से कार्य करते हैं। समाज की सेवा के भाव से कार्य कर रहे हैं। ऐसी भावना हममें सत्त्वगुण के कारण आती है। सृष्टि में जो भी कुछ होता है इन तीन गुणों के प्रभाव से होता है। अच्छाई हो रही है तो यह सत्त्वगुण है। बुराई हो रही है तो तमोगुण का प्रभाव है। सारे मनुष्य एक जैसे होते हैं फिर अलग-अलग व्यवहार क्यों करते हैं? पन्द्रहवें अध्याय में हमने सुना और पढ़ा है-
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।
15.7
15.7
श्रीभगवान् सभी के हृदय में अंशरूप में निवास करते हैं। जो बुरी घटनाऍं हम सुनते हैं, जो व्यक्ति बुरी घटनाऍं करते हैं, वह क्यों? इन तीन गुणों के कारण ही ऐसा होता है। अभी हमने पहलगाम की बुरी घटना भी सुनी थी तो यह प्रश्न हमारे मन में उठता है। इन गुणों के कम और अधिक होने पर व्यक्ति के व्यवहार पर प्रभाव पड़ता है। इन गुणों की मात्रा हम कैसे कम या ज्यादा कर सकते हैं? इसके बारे में हम इस अध्याय में जानने का प्रयास कर रहे हैं। यदि हमारा तमोगुण हमें गलत दिशा में ले जा रहा है तो हम उसे मोड़कर सत्त्वगुण को बढ़ाकर सही दिशा की ओर कैसे अग्रसर हो सकते हैं। इन तीनों गुणों का समन्वय हमारे जीवन में कैसा होना चाहिए? यह सब जानने का प्रयास हम इस अध्याय में करेंगे।
14.12
लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥
हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।
विवेचन- हमने तीन भाइयों के माध्यम से यह बात समझी थी कि रावण कैसे रजोगुण के प्रभाव में था। एक वस्तु के होते हुए भी और वस्तुओं को प्राप्त करने की लालसा बनी रहती है।
बच्चों से पूछा गया रावण की पत्नी का क्या नाम था?
मन्दोदरी धार्मिक प्रवृत्ति की बड़ी ही सुशील महिला थी। वह रावण की पत्नी थी। इतनी सुन्दर, अच्छी पत्नी होने पर भी रावण को लोभ के कारण सीताजी के अपहरण करने की इच्छा मन में जागृत हो गई। इच्छा होना गलत बात नहीं है। मनुष्य है तो इच्छा भी होगी।
जो इच्छा जागृत हुई है,
वह सही है या गलत?
इसका विवेक होना चाहिए।
वह सही है या गलत?
इसका विवेक होना चाहिए।
सीताजी श्रीराम की पत्नी हैं, अयोध्या की महारानी हैं। यह बात पता होते हुए भी रावण की विवेक बुद्धि नष्ट हो चुकी थी।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।
16.15
16.15
हमने सोलहवें अध्याय में देखा था यही भाव कि मुझ से अधिक बलवान या मुझसे से अधिक अच्छा कोई नहीं। मेरे जैसा कोई नहीं! मुझे जो चाहिए, मतलब चाहिए ही। यह बहुत अधिक रजोगुण के कारण होता है। लोभ रजोगुण के कारण होता है। मन में शान्ति नहीं रहती। एक इच्छा पूर्ण हुई नहीं कि दूसरी इच्छा जागृत हो जाती है। कार्य करने की लगन को यदि अच्छी दिशा में मोड़ दिया जाए तो जीवन में उन्नति की जा सकती है। हमने देखा कि जो इच्छा होती है वह रजोगुण के कारण होती है।
उदाहरण के लिए ही देख लें हमारे गीता परिवार में जो सर्वप्रथम कक्षा शुरू हुई आज उसकी सङ्ख्या इतनी बढ़ गई है। आज हम घर बैठे गीता जी पढ़ना सीख रहे हैं। यह विचार सत्त्वगुणी होने के कारण एक पुण्यकर्म में बदल गया। रजोगुण में सत्त्वगुण के मिलन से कुछ अच्छा कार्य हो सका। इसलिए रजोगुण भी महत्त्वपूर्ण है।
उदाहरण के लिए ही देख लें हमारे गीता परिवार में जो सर्वप्रथम कक्षा शुरू हुई आज उसकी सङ्ख्या इतनी बढ़ गई है। आज हम घर बैठे गीता जी पढ़ना सीख रहे हैं। यह विचार सत्त्वगुणी होने के कारण एक पुण्यकर्म में बदल गया। रजोगुण में सत्त्वगुण के मिलन से कुछ अच्छा कार्य हो सका। इसलिए रजोगुण भी महत्त्वपूर्ण है।
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥
हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह – ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।
विवेचन-
तमोगुण के कारण जीवन में ज्ञान का प्रकाश नहीं होता।
हम बिना सोचे समझे कि क्या गलत है, क्या सही है? क्या अच्छा है, क्या बुरा है? हमें जो अच्छा लगता है, वही कार्य करते हैं तो वह तमोगुण के लक्षण है। पर्यावरण को प्रदूषित करना, आतङ्कवाद सब तमोगुण के प्रभाव के कारण होता है। हम वही कार्य करते हैं जिनमें आराम मिलता है।
तमोगुण के आधिक्य के कारण हमारे जीवन का स्तर घटने लगता है।
तमोगुण के प्रभाव से हम बहुत सा समय व्यर्थ बातों में व्यतीत कर देते हैं। जैसे इंस्टाग्राम पर रील स्क्रोल करना इत्यादि।
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥
जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है (तो वह) उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।
विवेचन- सत्त्वगुण का प्रभाव बढ़ने से हम व्यर्थ के कामों में अपना समय व्यतीत नहीं करते। पर्याप्त सत्त्वगुण का प्रभाव हमारे जीवन में बना रहे तो अन्त समय पर, मतलब हमारे मृत्यु के समीप आने पर सत्त्वगुण का प्रभाव अधिक होगा तो, उत्तम एवम् निर्मल लोक की प्राप्ति होती है।
मृत्यु संसार का अन्तिम सत्य है।
ऐसा नहीं है कि मृत्यु के बाद ही उत्तम लोक की प्राप्ति होगी। जीवन में भी यदि हम में सत्त्वगुण का आधिक्य है तो आस-पास कैसा भी वातावरण हो, कष्टदायक हो तो भी हम आनन्द की अनुभूति कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए हम घर से बाहर निकले और अचानक वर्षा हो गई तो हम।व्यथित हो जाते हैं। बारिश को भी अभी आना था, इतने अच्छे से तैयार होकर आया था, पूरा भीग गया और यदि हम में सत्त्वगुण होंगे तो हम उसका भी आनन्द लेंगे। यही सोचेंगे कि श्रीभगवान् सदा मेरे साथ है, मैं जो भी कार्य करूॅंगा अच्छा ही होगा। हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा।
उदाहरण के लिए हम घर से बाहर निकले और अचानक वर्षा हो गई तो हम।व्यथित हो जाते हैं। बारिश को भी अभी आना था, इतने अच्छे से तैयार होकर आया था, पूरा भीग गया और यदि हम में सत्त्वगुण होंगे तो हम उसका भी आनन्द लेंगे। यही सोचेंगे कि श्रीभगवान् सदा मेरे साथ है, मैं जो भी कार्य करूॅंगा अच्छा ही होगा। हमारा दृष्टिकोण बदल जाएगा।
भक्त प्रह्लाद की कहानी हम सभी जानते हैं। जीवन पर्यन्त उनके पिताजी ने कितने कष्ट दिए? क्योंकि वे श्रीभगवान् का स्मरण करते रहते थे। वे कहते थे-आप मुझे कहीं भी कैसे भी अमङ्गल स्थान पर भेज दो मेरे श्रीभगवान् तो मेरे साथ ही होते हैं। उन्हें आप मेरे जीवन से नहीं निकाल सकते। सत्त्वगुणी व्यक्ति के दृष्टिकोण में बदलाव आ जाता है। फिर जीवन में कितनी ही कठिनाईयाँ आएँ उनका प्रतिकूल प्रभाव उनके जीवन पर नहीं पड़ता।
रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥
रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।
विवेचन- यदि मृत्यु के समय हमारे जीवन में रजोगुण की प्रधानता है तो मरने के उपरान्त हमारा जन्म पुन: कर्म योनि में होता है। रजोगुणी विचारों के कारण मनुष्य योनि में जन्म प्राप्त होता है। इसलिए हम इस मृत्युलोक में आ गए। मनुष्य जन्म अति उत्तम होता है और यदि मृत्यु के समय तमोगुण की प्रधानता रही या विचार रहे तो मूढ योनि में जन्म होता है। जिनमें गलत और सही निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। उनका जन्म कीट-पतङ्गे, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी के रूप में होता है। हमारे कुछ पुण्यकर्म थे इसलिए हमें मनुष्य योनि मिली और रजोगुण और सत्त्वगुण साथ में आ गए।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-
“बड़े भाग मानुष तन पाया”।
देवी देवताओं के लिए भी मनुष्य योनि दुर्लभ होती है क्योंकि स्वर्ग में कर्म करने की आवश्यकता नहीं होती। कर्म के द्वारा जीवन को सुधारने की जो सम्भावना है या अवसर है, वह केवल मनुष्य योनि में ही प्राप्त है। हम सब बड़े ही भाग्यशाली हैं, जो छोटी सी आयु में गीता परिवार से जुड़ गए और गीताजी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है। कितनी ही पढ़ाई बढ़ जाए या कितनी भी व्यस्तता बढ़ जाए गीता जी पढ़ना नहीं छोड़ना है।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।।
9.22
9.22
भगवान् के प्रिय भक्तों के मन में मृत्यु के समय क्या विचार है? उसकी चिन्ता भी स्वयं श्रीभगवान् करते हैं। अर्जुन श्रीभगवान् के प्रिय सखा हैं इसलिए अलग-अलग बातों से भी उनके कल्याण की बात बता रहे हैं। अलग-अलग मार्गों से अर्जुन को समझा रहे हैं कि यह पूरी सृष्टि इन तीनों गुणों के माध्यम से चलती है ताकि अर्जुन अच्छे से समझ सके।
कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥
विवेकी पुरुषों ने – शुभ कर्म का तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख (कहा है और) तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।
विवेचन- सत्त्वगुण का फल निर्मल, शुद्ध पवित्र होता है। अच्छे कार्य करेंगे तो जीवन में अच्छी बातें ही घटित होती हैं। अच्छे लोगों के साथ कुछ बुरा क्यों घट जाता है, क्योंकि उस बुरी घटना के माध्यम से उनके पिछले कर्मों की जो कुछ गलतियाॅं हैं, उसे साफ कर दिया जाता है।
उदाहरण के लिए एक पाइप में एक ओर बहुत सारी मिट्टी है और दूसरी ओर से उसमें स्वच्छ जल डाल रहे हैं। स्वच्छ जल यहाॅं अच्छे गुण का प्रतीक माना गया है। हमारी यह अपेक्षा रहेगी की सत्कर्म रूपी यह स्वच्छ जल डाल रहे हैं तो दूसरी ओर से भी स्वच्छ जल ही बाहर आए। पर एक तरफ मिट्टी है तो पहले वह मिट्टी ही बाहर निकलेगी और जब पाइप से पूरी मिट्टी बाहर निकल जाएगी, उसके पश्चात स्वच्छ जल बाहर निकलता है।
इस प्रकार किसी अच्छे व्यक्ति के साथ कुछ बुरा हो रहा है तो वह उस व्यक्ति के पिछले जन्म के कचरे को बाहर निकालने की प्रक्रिया के समान होता है। यदि सत्कर्मों सदृश्य शुद्ध जल नहीं डालेंगे तो स्वच्छ जल कैसे प्राप्त होगा? अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही मिलता है। रजोगुण का फल दु:ख होता है। एक इच्छा पूरी हो गई तो दूसरी इच्छा पूरी करने की मन आकाङ्क्षा बनी रहती है।
तमोगुण का फल तो अज्ञान ही है। उसका स्वरूप ही अज्ञान है। उससे कुछ भी साध्य नहीं होने वाला।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥
सत्त्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं।
14.17 writeup
ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥
सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं (और) निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।
विवेचन-
तीनों गुणों की भिन्न-भिन्न विशेषताएँ
- सत्त्वगुण से ज्ञान मिलता है।
- रजोगुण से लोभ मिलता है।
- तमोगुण से आलस्य, प्रमाद और अज्ञान मिलता है।
सत्त्वगुण में व्यक्ति की उन्नति होती है। इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझते हैं जैसे ग्राफ में मात्रा अधिक होने पर रेखा ऊपर की ओर जाती है और मात्रा कम होने पर रेखा नीचे की ओर आती है। सत्त्वगुण वाले व्यक्ति की बुद्धि तीव्र होती है। कुछ भी पढ़ते हैं तो शीघ्र याद हो जाता है, निरोगी हो जाते हैं। सत्त्वगुणी व्यक्ति की बुद्धि तेज होती है। शरीर स्वस्थ रहता है। मानसिक और शारीरिक उन्नति होने लगती है। कई बार ऐसा भी होता है हम पूर्णत: स्वस्थ हैं फिर भी कोई काम करने का मन नहीं होता है।
तमोगुणी व्यक्ति की अवनति होती रहती है। जिस स्थिति में है उससे भी नीचे चले जाते हैं। हम मनुष्य योनि में आए हैं तो हमारा कर्त्तव्य यह बनता है कि हम जिस श्रेणी में है उसमें बने रहे। उदाहरण के लिए यदि कक्षा में हमारे अङ्क बीस में से पन्द्रह आ रहे हैं तो हम अगली बार चाहेंगे कि हमारे बीच में से अट्ठारह आएँ, अङ्क बढ़ें कम न हों।
नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥
जब विवेकी (विचार कुशल) मनुष्य तीनों गुणों के (सिवाय) अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और (अपने को) गुणों से पर अनुभव करता है, (तब) वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।
विवेचन- हम जो भी कार्य कर रहे हैं वह इन तीनों गुणों के प्रभाव के नियन्त्रण में कर रहे हैं। चाहे वह अच्छा हो या बुरा।
कोई भी व्यक्ति जो भी कार्य करता है वह इन तीनों गुण के प्रभाव के कारण ही करता है और जब व्यक्ति को यह बात पता चल जाती है कि इन गुणों के बन्धन से कैसे मुक्त हुआ जा सकता है?
ऐसे लोग परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् उनके जैसे बन जाते हैं।
ऐसे लोग परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेते हैं अर्थात् उनके जैसे बन जाते हैं।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥
देहधारी (विवेकी मनुष्य) देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुःखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, जो भी कार्य हम करते हैं, वह हमारे द्वारा नहीं किए जाते। हमारे मन पर इन तीनों गुणों का प्रभाव होता है। उसके द्वारा हम कार्य करने के लिए प्रेरित होते हैं।
सत्त्वगुण का प्रभाव है तो अच्छे कार्य करेंगे। तमोगुण का प्रभाव है तो बुरे कार्य की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं और जब हम यह बात जान लेते हैं कि यह सब कार्य हम गुणों के प्रभाव के कारण कर रहे हैं।
हम गुणों के द्वारा नाचने वाली कठपुतली हैं। इन गुणों के बन्धनों से मुझे श्रीभगवान् मुक्त करेंगे, यह बात समझ में आ जाती है।
हमने श्रीराम के प्रसङ्ग में यह बात समझी थी कि उनके मुख पर जो प्रसन्नता वनवास जाते समय थी वही प्रसन्नता राज्य अभिषेक की बात सुनते समय थी। दोनों स्थितियों में वे सम थे। हमारी स्थिति ऐसी नहीं होती है, क्योंकि हम इन गुणों के नियन्त्रण में रहते हैं।
सत्त्वगुण का प्रभाव है तो अच्छे कार्य करेंगे। तमोगुण का प्रभाव है तो बुरे कार्य की ओर प्रवृत्त हो जाते हैं और जब हम यह बात जान लेते हैं कि यह सब कार्य हम गुणों के प्रभाव के कारण कर रहे हैं।
हम गुणों के द्वारा नाचने वाली कठपुतली हैं। इन गुणों के बन्धनों से मुझे श्रीभगवान् मुक्त करेंगे, यह बात समझ में आ जाती है।
हमने श्रीराम के प्रसङ्ग में यह बात समझी थी कि उनके मुख पर जो प्रसन्नता वनवास जाते समय थी वही प्रसन्नता राज्य अभिषेक की बात सुनते समय थी। दोनों स्थितियों में वे सम थे। हमारी स्थिति ऐसी नहीं होती है, क्योंकि हम इन गुणों के नियन्त्रण में रहते हैं।
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥
अर्जुन बोले – हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से (युक्त) होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?
विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से पूछते हैं कि यह मैं कैसे पहचानूॅं कि जो व्यक्ति गुणों से अतीत हो गए हैं, वे कैसे होते हैं, उन्हें मैं कैसे जान सकता हूॅं? कभी ऐसी स्थिति आ गई कि मैं स्वयं इन गुणों से ऊपर उठने लगा तो वह मैं कैसे जान सकता हूॅं? उनके लक्षण क्या हैं? मैं उनके जैसे बनने का प्रयास करूॅंगा।
ऐसे व्यक्ति अपने कर्त्तव्य कर्मों को ही करते रहते हैं। उदाहरण के लिए मान लो हमने यह निर्णय लिया है कि हम सुबह जल्दी उठकर नित्य पढ़ाई करेंगे तो वह नियम हमें बनाए रखना है।
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥
श्री भगवान बोले – हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृति तथा मोह – (ये सभी) अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी (गुणातीत मनुष्य) इनसे द्वेष नहीं करता और (ये सभी) निवृत्त हो जायँ तो (इनकी) इच्छा नहीं करता।
विवेचन- जो गुणों से ऊॅंचे उठ गए हैं, जो गुणों से अतीत हो गए हैं वे योगी गुणों के अधीन नहीं होते हैं।
एक बार जो कार्य करने का निर्णय ले लिया, उदाहरण से हम इस बात को और अच्छे से समझ सकते हैं कि यदि हमने प्रतिदिन अध्ययन करने का नियम लिया है या प्रतिदिन सुबह शीघ्र उठने का निर्णय लिया है तो कुछ भी हो जाए, हम वह नियम नहीं तोड़ते। अतः हम गुणों से नहीं बन्धते।
उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥
जो उदासीन की तरह स्थित है (और) (जो) गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता (तथा) गुण ही (गुणों में) बरत रहे हैं – इस भाव से जो (अपने स्वरूप में ही) स्थित रहता है (और स्वयं कोई भी) चेष्टा नहीं करता।
विवेचन-
गुणातीत जीव के लक्षण
हमने एक उदाहरण देखा था कि जब कक्षा में शिक्षक नहीं होते है तो बच्चे मस्ती करते हैं।
अपना मनमाना व्यवहार करते हैं और जैसे ही शिक्षक कक्षा में आते हैं तो सभी बालक शान्त बैठकर अपना-अपना कार्य करने लगते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि इन तीनों गुण में रहते हुए भी हम इन गुणों के प्रभाव से विचलित न हों, अपितु इन्हें साक्षी भाव से देखें।
विपरीत परिस्थितियों में भी ऐसा व्यक्ति अपने कार्य में ही स्थित रहता है। वह विचलित नहीं होता, वह डगमगाता नहीं है। यह गुणातीत व्यक्ति के लक्षण होते हैं।
समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥
जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम (तथा) अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है, जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है। जो अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है (और) जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। (14.24-14.25)
14.24 writeup
मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥
विवेचन- गुणातीत व्यक्ति के मन में सदैव समभाव ही होता है। हमने रामजी के प्रसङ्ग के द्वारा यह बात समझी थी। इस तरह सोना हो या मिट्टी हो, गुणातीत व्यक्ति को उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऐसे व्यक्ति के मन में कोई लोभ नहीं होता, कोई आकाङ्क्षा नहीं होती है। ऐसे लोग प्रसन्न या सम रहते हैं। अनुकूल परिस्थिति हो या विपरीत परिस्थिति। मन में चञ्चलता नहीं होती। प्रशंसा होने पर बहुत अधिक प्रसन्न नहीं होंगे और निन्दा होने पर बुरा भी नहीं मानेंगे दु:खी नहीं होंगे। मान हो या अपमान हो मित्र हो या शत्रु हो दोनों के प्रति समभाव होते हैं।। हमें तो पता है कि उनमें श्रीभगवान् का अंश है। हमारे मन में भावना स्थिर होनी चाहिए।
श्री राम जी का एक प्रसङ्ग है-
रावण का वध तो किया लेकिन विभीषण से कहा कि इनका अन्तिम संस्कार करो। विभीषण ने कहा मैं ऐसे दुराचारी का अन्तिम संस्कार नहीं करूॅंगा। रामजी ने कहा ठीक है तुम इसे अपना भाई नहीं मानते, मेरा (श्रीराम का) भाई मानकर इनका अन्तिम संस्कार करो। रावण ने श्रीराम को इतने कष्ट दिए, पर उनके मन में तो यही भाव था कि रावण शिवभक्त है। मित्र हो या शत्रु सभी में श्रीभगवान् का अंश है। भाव समान हो सकते हैं पर व्यवहार में तो अन्तर होता ही है, लाना ही पड़ता है।
मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥
और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है।
विवेचन- गुणों से परे हो जाएँ, गुणों से ऊपर उठ जाएँ, पर साथ में भक्त भी हों तो क्या होगा? वे श्रीभगवान् के स्वरुप को प्राप्त कर लेते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जी का एक प्रसङ्ग आता है-
वह काली माता की बहुत आराधना, उपासना करते थे। उन्हें माताजी के दर्शन स्वयं के हृदय में हो गए। हमें ऐसे भाव या दर्शन क्यों नहीं होते? क्योंकि हम गुणों के अधीन होते हैं। जो माला वे मूर्ति को पहनाने वाले थे, वह माला उन्होंने स्वयं धारण कर ली। ऐसा प्रतिदिन ही होने लगा तो लोग समझ गए कि अब श्रीभगवान् और भक्त में कोई अन्तर नहीं रह गया।
गुणों से परे ऐसे भक्तों में अद्वैत की भावना प्रबल हो जाती है। भक्त और श्रीभगवान् में कोई अन्तर नहीं होता। ऐसे व्यक्ति ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं।
रामकृष्ण परमहंस जी का एक प्रसङ्ग आता है-
वह काली माता की बहुत आराधना, उपासना करते थे। उन्हें माताजी के दर्शन स्वयं के हृदय में हो गए। हमें ऐसे भाव या दर्शन क्यों नहीं होते? क्योंकि हम गुणों के अधीन होते हैं। जो माला वे मूर्ति को पहनाने वाले थे, वह माला उन्होंने स्वयं धारण कर ली। ऐसा प्रतिदिन ही होने लगा तो लोग समझ गए कि अब श्रीभगवान् और भक्त में कोई अन्तर नहीं रह गया।
गुणों से परे ऐसे भक्तों में अद्वैत की भावना प्रबल हो जाती है। भक्त और श्रीभगवान् में कोई अन्तर नहीं होता। ऐसे व्यक्ति ब्रह्म स्वरूप हो जाते हैं।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥
क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी अमृत का तथा शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं (ही हूँ)।
विवेचन- शाश्वत आनन्द का स्रोत परमपिता ही हैं। जो व्यक्ति परमपिता परमात्मा का जितना चिन्तन करता जाएगा मनन करता जाएगा, उसे उतनी ही आनन्द की अनुभूति होगी।
परमपिता परमात्मा ही शाश्वत आनन्द का स्थान हैं। वहाॅं तक कैसे पहुॅंच सकते हैं? वह धीरे-धीरे इस तरह करेंगे कि तमोगुण को कम करेंगे, रजोगुण को बढ़ाऍंगे। रजोगुण को कम करके सत्त्वगुण को बढ़ाऍंगे। फिर धीरे-धीरे गुणों से अतीत होते जाऍंगे।
जैसे किसी घर में विवाह के पश्चात नव वधू आती है तो कई बार हम सुनते हैं कि माताऍं कहती हैं बेटा तो मेरा है, जन्म तो मैंने दिया है पर वह तो बहू का हो गया। इसी तरह भगवान् भी सोचते हैं कि अंश तो मेरा है, पर गुणों के बन्धनों में बन्ध गया। जितना अधिक सत्त्वगुण हम अपने में बढ़ाऍंगे उतनी शीघ्र ही हम परमात्मा का दर्शन स्वयं में कर पाऍंगे। इसी के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।
इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘गुणत्रयविभागयोग’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।