विवेचन सारांश
ज्ञान और भक्ति का अद्भुत सङ्गम
जन्माष्टमी के इस पावन अवसर पर सुमधुर प्रार्थना, हनुमान चालीसा पाठ, दीप-प्रज्वलन, भगवान् श्रीकृष्ण वन्दना, श्री गुरु चरण-कमल-वन्दना एवम् माँ भारती की वन्दना के साथ आज के सुन्दर और भक्तिमय सत्र का शुभारम्भ हुआ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुःगुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुःसाक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।
ॐकृष्णायवासुदेवाय हरये परमात्मनेः ।
प्रणतः क्लेशनाशायः गोविन्दाय नमो नमः।।
रत्नाकराधौ तपदां हिमालय किरीटिनीम् ।
ब्रह्मराजर्षि रत्नाढयां वन्दे भारतमातरम् ।।
जय श्रीकृष्ण के सम्बोधन के साथ सभी साधकों का ह्रदय से स्वागत करते हुए आज का विवेचन सत्र आरम्भ हुआ। नवें अध्याय के इस विवेचन सत्र में सभी बालकों से वीडियो ऑन रखने का आग्रह किया गया।
आज का दिन सुन्दर, महत्त्वपूर्ण एवम् विशेष है क्योंकि आज कृष्णजन्माष्टमी के साथ-साथ सन्त ज्ञानेश्वर महाराज का भी जन्मदिवस है। यह संयोग बहुत ही अद्भुत है।
श्रीमद्भागवद्गीता का मूलज्ञान संस्कृत में है।
ज्ञानेश्वर महाराज महाराष्ट्र के एक महान सन्त थे जिन्होंने भगवद्गीता का मराठी में अनुवाद किया, जिसे हम ‘ज्ञानेश्वरी’ के नाम से जानते हैं। गीता का ज्ञान संस्कृत में है लेकिन आठ सौ वर्ष पूर्व लोगों को संस्कृत समझ में नहीं आती थी। इसका कारण यह था कि देश पर मुगलों का राज़ था। लोगों की रुचि और शिक्षा की दिशा बदल रही थी और संस्कृत का प्रयोग धीरे-धीरे कम हो रहा था। ज्ञानेश्वर महाराज ने गीता का मराठी में अनुवाद करके लोगों को गीता के ज्ञान को समझने का अवसर प्रदान किया।
आजकल, गीता परिवार और अन्य संस्थाओं के प्रयासों से, पूज्य स्वामी जी की कृपा से, हम फिर से संस्कृत और गीता के ज्ञान से जुड़ रहे हैं। यह बालकों हेतु विशेष विवेचन सत्र होने के कारण यहाँ कथाओं के माध्यम से समझाया गया है। ज्ञानेश्वर महाराज का योगदान हमें गीता के ज्ञान को समझने और आत्मसात करने में मदद करता है। श्रीमद्भागवद्गीता का ज्ञान लोगों की भाषा में समझाने का कार्य ज्ञानेश्वर माऊली ने किया।
माऊली का अर्थ माता है।
जैसे विट्ठल भगवान् को माऊली कहते हैं उसी प्रकार ज्ञानेश्वर महाराज को भी माऊली कहते हैं। श्रीमद्भागवद्गीता का ज्ञान भगवान् श्रीकृष्ण ने दिया। उनके पश्चात् बहुत सारे सन्त-महात्माओं ने इस ज्ञान को सरल भाषा में समझाने का प्रयास किया, परन्तु ‘ज्ञानेश्वरी’ के स्वरूप में प्राप्त ज्ञान विशिष्ट है इसलिए स्वामी जी भी ज्ञानेश्वर महाराज को भगवान् श्रीकृष्ण का ही अवतार कहते हैं।
जन्माष्टमी के साथ, आज उनका सात सौ पचासवाँ जन्म दिवस मना रहे हैं। इस अवसर पर आनन्दी में उनके समाधि मन्दिर पर सन्त ज्ञानेश्वर महाराज का जन्मोत्सव हर साल बहुत उत्साह और भक्तिभाव से मनाया जाता है। सन्त समाधि लेते हैं उनकी मृत्यु नहीं होती है। उस समय सन्त अपने प्राणों को एकाग्र करके आज्ञा चक्र पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। तिलक लगाने का भी यही उद्देश्य है- यह हमें याद दिलाता है कि हमें अपनी चेतना को हमेशा जागृत रखना चाहिए।
योग की सहायता से हम अपने मन और प्राणों को आज्ञा चक्र में स्थिर कर सकते हैं। जब हम अपनी चेतना को आज्ञाचक्र में केन्द्रित करते हैं तो हमारा ध्यान श्रीभगवान् के चिन्तन में मगन हो जाता है और धीरे-धीरे हम भगवद् स्वरूप में लीन हो जाते हैं।
ज्ञानेश्वर महाराज ने आनन्दी में जब समाधि ली तो उनके सामने ज्ञानेश्वरी का नौवाँ अध्याय खुला था और वे नौवें अध्याय का चिन्तन करते हुए समाधि में लीन हो गए और वैसे ही आज भी आनन्दी में समाधिस्थ हैं।आज ही के दिन हम भी नौवें अध्याय का अध्ययन कर रहे हैं जो ज्ञानेश्वर महाराज की समाधि के साथ जुड़ा हुआ होने के कारण बहुत विशेष और महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
इसी भाव को साथ लेते हुए हम ज्ञानेश्वर महाराज का स्मरण करते हैं और इस अध्याय की ओर आगे बढ़ते हुए इस के नाम की चर्चा करते हैं।
प्रश्न- नौवें अध्याय का नाम क्या है?
उत्तर- राजविद्याराजगुह्ययोग।
नटखट कान्हा स्वरूप कई बालकों ने सही उत्तर दिया।
राजविद्याराजगुह्ययोग में
"राज" का अर्थ है सबसे श्रेष्ठ या उत्कृष्ट।
यहाँ "राजविद्या" का अर्थ है सबसे बढ़िया या उत्कृष्ट ज्ञान और "राजगुह्य" का अर्थ है सबसे महत्त्वपूर्ण या गुप्त रहस्य। इस प्रकार, राजविद्याराजगुह्ययोग का अर्थ है सबसे उत्कृष्ट ज्ञान और गुप्त रहस्य का योग, जो हमें आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा के साथ जुड़ने का मार्ग दिखाता है।
जब कोई हमें अपना सबसे बड़ा और सबसे विशेष रहस्य बताता है तो हम बहुत अच्छा महसूस करते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण भी इस नवें अध्याय में यही कह रहे हैं।
श्रीभगवान् इस अध्याय में जिस ज्ञान को 'राजविद्या' अर्थात् उत्कृष्ट ज्ञान और 'राजगुह्य' अर्थात् महत्त्वपूर्ण रहस्य कहते हैं, वह सचमुच बहुत अनमोल है। वे यह ज्ञान केवल उन्हीं को बताते हैं जो उनके बहुत प्रिय होते हैं।
यह ज्ञान हमें श्रीभगवान् से 'योग' अर्थात जुड़ने का रास्ता दिखाता है। यह एक ऐसा बन्धन है जो हमें हमेशा के लिए श्रीभगवान् का प्रिय मित्र बना देता है।
इसी भाव के साथ हम श्रीमद्भगवद्गीता के नौवें अध्याय के पहले श्लोक पर चर्चा शुरू करते हैं।
9.1
श्रीभगवानुवाच
इदं(न्) तु ते गुह्यतमं(म्), प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं(व्ँ) विज्ञानसहितं(य्ँ), यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥9.1॥
विवेचन- यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को 'अनसूयवे' कहकर सम्बोधित करते हैं जिसका अर्थ है 'ईर्ष्या रहित' क्योंकि अर्जुन उनके प्रिय हैं। यह विशेषण अर्जुन की ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा और श्रीभगवान् के प्रति उनकी पूर्ण समर्पण भावना को दर्शाता है।
इस ज्ञान को राजविद्याराजगुह्य कहा जाता है जिसका अर्थ है सबसे श्रेष्ठ ज्ञान और सबसे गुप्त रहस्य। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को यह ज्ञान इसलिए दे रहे हैं ताकि वह अपने जीवन को सही दिशा में आगे बढ़ा सकें।
महाभारत के युद्ध में अर्जुन की स्थिति बहुत ही जटिल है। अर्जुन की चिन्ता यह है कि वे अपने गुरुजनों जैसे- द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और कृपाचार्य को कैसे मार सकते हैं? वे अपने बन्धुओं और परिवार के सदस्यों के साथ युद्ध करने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं, लेकिन दूसरी तरफ, कौरवों ने पाण्डवों के साथ बहुत अन्याय किया था, जैसे कि भीम को लड्डू में जहर मिला कर मारने का प्रयास और लाक्षागृह में पाण्डवों को मारने का प्रयास किया था। अर्जुन के मन में कौरवों के प्रति कोई द्वेष या वैर-भाव नहीं था बल्कि वे उन्हें अपने बन्धु और परिजन के रूप में देखते थे। अर्जुन का यह शुद्ध और निर्मल मन भगवान् श्रीकृष्ण को बहुत प्रिय था।
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि तुम्हारे मन में किसी के प्रति भी दोष-दृष्टि नहीं है इसलिए वे उन्हें गुप्त रहस्य और श्रेष्ठ ज्ञान बता रहे हैं। अर्जुन की इस शुद्धता और निर्मलता के कारण ही श्रीभगवान् उन्हें अपना प्रिय मानते हैं।
आगे श्रीभगवान् हमें हमारे चैतन्य तत्त्व और आत्मा के बारे में बताएँगे।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।।
इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि
आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
आत्मा एक चैतन्य तत्त्व है जो हमारे शरीर में निवास करती है और यह परमात्मा का अंश है। जब हम यह समझ लेते हैं कि शरीर और आत्मा अलग-अलग हैं तो हमें यह भी समझ में आता है कि शरीर को यातनाएँ दी जा सकती हैं लेकिन आत्मा को नहीं।
आत्मा अजर, अमर है और यह शरीर के नाश होने पर भी समाप्त नहीं होती।
भगत सिंह ने फाँसी पर चढ़ने से पहले यही कहा था और उन्होंने पढ़ने के लिए गीताजी की पुस्तक माँगी थी। जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें डर नहीं लग रहा है? तो उन्होंने जवाब दिया कि डर कैसा? उन्होंने कहा,
"आप मेरे शरीर को मार सकते हैं लेकिन मेरी आत्मा को नहीं मार सकते।"
भगत सिंह की बात से यह स्पष्ट होता है कि वे अपने शरीर और आत्मा के बीच के अन्तर को समझते थे। वे जानते थे कि शरीर नाशवान है लेकिन आत्मा अमर है, इसी तरह श्रीभगवान् भी हमें आत्मा और शरीर के बीच के अन्तर को समझने की शिक्षा देते हैं। वे हमें ज्ञान और विज्ञान दोनों की प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं।
हमने पन्द्रह अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस मनाया जो हमारे देश की आजादी की याद दिलाता है। हमने यह स्वतन्त्रता अपने (फ्रीडम फाइटर्स) स्वतन्त्रता सेनानियों के कारण प्राप्त की थी।
जिनमें भगत सिंह, सुखदेव जी, लोकमान्य तिलक और कई अन्य वीर सपूत शामिल थे।
जिसमें इन (फ्रीडम फाइटर्स) स्वतन्त्रता सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी और अपने सङ्घर्षों से हमें स्वतन्त्रता दिलाई।
हम अक्सर ज्ञान को केवल बौद्धिक स्तर पर समझते हैं लेकिन उसका अनुभव नहीं कर पाते। श्रीभगवान् कहते हैं कि वे हमें न केवल ज्ञान देंगे बल्कि विज्ञान भी देंगे जिससे हम उस ज्ञान को अनुभव कर सकें। स्कूल में हम विज्ञान (साइंस) पढ़ते हैं और प्रयोगशाला में प्रयोग करके उसका अनुभव करते हैं, इसी प्रकार श्रीभगवान् हमें आत्मा और परमात्मा के बारे में ज्ञान देते हैं और हमें उसका अनुभव करने का तरीका भी बताते हैं जिससे हम अपने जीवन को सार्थक बना सकें।
हम (साइंस) विज्ञान पढ़ते समय पहले लिखित ज्ञान (थ्योरी) पढ़ते हैं और फिर प्रैक्टिकल (व्यवहारिक ज्ञान) करके उसका अनुभव करते हैं। इसी तरह श्रीभगवान् हमें ज्ञान के साथ-साथ विज्ञान भी देंगे जिससे हम उस ज्ञान का अनुभव कर सकें और अपने जीवन को सार्थक बना सकें।
श्रीभगवान् कहते हैं कि वे हमें न केवल ज्ञान देंगे बल्कि हमें उसका अनुभव करने का तरीका भी बताएँगे जिससे हम जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकें। जब हम किताबों में पढ़ते हैं कि बीज बोने से पौधे उगते हैं और फिर घर पर बीज बोकर देखते हैं कि वास्तव में पौधे उगते हैं तो हमें अपने ज्ञान की पुष्टि होती है।
दुनिया में दो प्रकार के ज्ञान होते हैं-
अच्छा ज्ञान और बुरा ज्ञान।
अच्छा ज्ञान हमें सकारात्मक और निर्माणात्मक कार्यों में मदद करता है, जैसे कि नृत्य, पढ़ाई, श्लोक गायन, चित्रकारी (पेंटिङ्ग), रङ्गोली बनाना आदि।
बुरा ज्ञान हमें नकारात्मक और विनाशकारी कार्यों में लगा सकता है। चोरी करना, बम बनाना, और आतङ्कवादी गतिविधियों में शामिल होना, बुरे ज्ञान के उदाहरण हैं।
श्रीभगवान् अगले श्लोक में इस ज्ञान की विशेषताएँ बता रहे हैं-
राजविद्या राजगुह्यं(म्), पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं(न्) धर्म्यं(म्), सुसुखं(ङ्) कर्तुमव्ययम्।।9.2।।
विवेचन- उपनिषदों में भी एक कहानी आती है-
श्वेतकेतु नाम का एक बालक था जो अपने गुरु के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने गया था। वह बहुत बुद्धिमान था और हर बार कक्षा में प्रथम आता था। जब वह घर लौटा तो उसके पिताजी ने उसकी परीक्षा लेनी चाही और पूछा-
"ऐसी कौनसी विद्या है जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता?"
श्वेतकेतु ने विभिन्न उत्तर दिए लेकिन पिताजी को सन्तुष्टि नहीं हुई। पिताजी ने कहा, "ऐसी कौनसी विद्या है जो परिपूर्ण है और जिसके बाद कुछ भी जानने की आवश्यकता नहीं है?" श्वेतकेतु इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाए और शरणागत होकर स्वीकार किया कि उन्हें नहीं पता। पिताजी ने कहा, "ब्रह्मविद्या ही वह विद्या है जो जीवन को सार्थक बनाती है। अन्य विद्याएँ महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन ब्रह्मविद्या जानना अत्यन्त आवश्यक है। उनके पिता ने उन्हें समझाया कि-
सच्चा ज्ञान तो वह है जिससे आत्मा और परमात्मा के सम्बन्ध को जाना जा सके।
श्रीभगवान् कहते हैं कि राजविद्याराजगुह्यम् सबसे विशेष और पवित्र ज्ञान है। यह ज्ञान हमें पवित्र बनाता है और जीवन को सार्थक बनाता है। गङ्गा जी के जल की तरह जो शुद्ध, स्वच्छ और पवित्र होता है यह ज्ञान भी उसी तरह का है। इस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए श्रद्धा आवश्यक है, जैसे हम स्कूल में पढ़ाई करते हैं या कोई कला सीखते हैं तो हमें उसमें रुचि और श्रद्धा होनी चाहिए।
श्रीभगवान् कहते हैं कि यदि श्रद्धा है तो ही इस ज्ञान को प्राप्त कर पाओगे अन्यथा नहीं कर पाओगे। श्रद्धा ही इस ज्ञान को प्राप्त करने की कुञ्जी है। यह ज्ञान हमें पवित्र बनाता है जबकि कुछ अन्य ज्ञान, जो नकारात्मक उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं, पवित्र नहीं होते।
गङ्गा जी के जल की बात करते समय हम तीन बातों पर विचार करते हैं-
शुद्धता, स्वच्छता और पवित्रता।
पहले हम देखते हैं कि जल स्वच्छ है या नहीं, उसमें कोई अशुद्धियाँ तो नहीं हैं फिर हम उसकी शुद्धता और पवित्रता की जाँच करते हैं परन्तु यह ज्ञान भी उसी को मिलेगा जिसमें श्रद्धा होगी।
श्रद्धा का अर्थ है किसी विषय या गुरु में विश्वास और रुचि होना।
जब हमें किसी विषय में रुचि होती है तो हम उसे सीखने के लिए प्रयास करते हैं और उसमें सफलता पा सकते हैं, जैसे कि नृत्य या किसी अन्य कला में यदि हमें श्रद्धा है तो हम उसे सीखने के लिए नियमित प्रयास करते हैं और उसमें सफलता प्राप्त करते हैं। लता मङ्गेशकर जी जैसे महान कलाकार नियमित अभ्यास करते थे क्योंकि उन्हें गायन का शौक था और उसमें उनकी श्रद्धा थी। श्रद्धा का अर्थ है किसी विषय या गतिविधि में गहरी रुचि और समर्पण होना।
श्रीभगवान् कहते हैं कि आत्म-साक्षात्कार के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए भी श्रद्धा आवश्यक है। यदि हमें इस ज्ञान में श्रद्धा होगी तो हम इसे प्राप्त करने के लिए प्रयास करेंगे और सफल होंगे।
श्रीभगवान् अगले श्लोक में कह रहे हैं कि जिन की श्रद्धा इस ज्ञान पर नहीं है, उन्हें यह ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता।
अश्रद्दधानाः(फ्) पुरुषा, धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां(न्) निवर्तन्ते, मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जिनकी इस धर्म, ज्ञान पर श्रद्धा नहीं है, वे बार-बार जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसे रहते हैं। वे विभिन्न योनियों में जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं लेकिन उन्हें आत्म-साक्षात्कार या श्रीभगवान् के साथ का अनुभव नहीं होता है। उनका उद्देश्य भौतिक जीवन और उसके सुखों में ही केन्द्रित रहता है और वे श्रीभगवान् को जानने या उनके साथ जुड़ने का प्रयास नहीं करते। इस प्रकार वे जन्म-मृत्यु के चक्र में ही फँसे रहते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि मनुष्य जन्म पाना बहुत बड़ी बात है और इसे सम्भालकर रखना चाहिए। मनुष्य जन्म दुर्लभ है और इसका सही उपयोग करना बहुत आवश्यक है। जैसे कि आप किसी विशेष चीज के लिए प्रयास करते हैं और उसे प्राप्त करने के बाद उसका सही उपयोग करते हैं, वैसे ही मनुष्य जन्म का भी सही दिशा में उपयोग करना चाहिए। आत्म-साक्षात्कार और श्रीभगवान् के साथ जुड़ने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीभगवान् के साथ एकता या उनका (बेस्ट फ्रेंड) सच्चा मित्र बनने के लिए श्रद्धा और विश्वास आवश्यक है। यदि हमारे मन में श्रद्धा नहीं है तो यह सम्भव नहीं है। जब (साइंस) विज्ञान की बात करते हैं तो उसमें भी हमें सिद्धान्तों और नियमों पर विश्वास करना होता है तभी हम प्रयोग करके परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। किसी ने (एटम) अणु नहीं देखा, फिर भी मानते हैं कि विश्व की उत्पत्ति अणु (एटम) से हुई है।
हमें श्रद्धा रखनी पड़ती है। श्रद्धा रखने से ही ज्ञान प्राप्त होता है। हम ज्ञान प्राप्ति से ही अच्छे कार्य कर सकते हैं। श्रीभगवान् के वचनों पर विश्वास करने से हम आत्म-साक्षात्कार की ओर बढ़ सकते हैं।
मया ततमिदं(म्) सर्वं(ञ्), जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि, न चाहं(न्) तेष्ववस्थितः।।9.4।।
न च मत्स्थानि भूतानि, पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो, ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि वे अव्यक्त रूप से सर्वत्र स्थित हैं और सभी जीव जैसे पेड़, कीट, पञ्छी, जलचर और अन्य सभी जीवमात्र श्रीभगवान् में ही स्थित हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सभी के हृदय में स्थित हैं।
श्रीभगवान् की बातें गहन और रहस्यमय हो सकती हैं लेकिन उनका उद्देश्य अर्जुन को आत्म-साक्षात्कार और ज्ञान की ओर ले जाना है। श्रीभगवान् अर्जुन को युद्ध के बारे में नहीं बल्कि जीवन के उद्देश्य और कर्त्तव्य के बारे में समझाने की कोशिश कर रहे हैं।
यह भगवद्गीता का एक महत्वपूर्ण श्लोक है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन को समझाते हैं कि वे सर्वव्यापी हैं और सभी जीवों में वास करते हैं। यह श्लोक हमें श्रीभगवान् की सर्वव्यापकता और उनके साथ एकता की भावना को समझने में मदद करता है।
श्रीभगवान् का तात्पर्य यह है कि वे सर्वव्यापी हैं लेकिन वे किसी एक जीव में सीमित नहीं हैं। यह बात अर्जुन को समझाने के लिए है कि-
"श्रीभगवान् की उपस्थिति और शक्ति सर्वत्र है।"
श्रीभगवान् के लिए सारा विश्व उन्हीं का स्वरूप है। श्रीभगवान् की बातें अर्जुन को युद्ध के सन्दर्भ में उनके कर्त्तव्य और धर्म को समझने में मदद करने के लिए हैं, न कि उन्हें और उलझाने के लिए। गहराई से देखें तो हम सभी आन्तरिक रूप से जुड़े हुए हैं और श्रीभगवान् का चैतन्य स्वरूप सभी में है। यह अद्वैतवाद की भावना है जिसमें सभी जीवों में एक ही परमात्मा की उपस्थिति को देखा जाता है।
श्रीभगवान् की दृष्टि में सभी जीवों में चैतन्य स्वरूप का वास है और शारीरिक भिनन्ताओं के कारण हमें लगता है कि हम अलग-अलग हैं।उनके लिए सभी जीव समान हैं और उनके चैतन्य स्वरूप में कोई अन्तर नहीं है। यह दृष्टिकोण हमें प्रेम, सहानुभूति और एकता की भावना को समझने में मदद करता है।
कन्हैया की मिट्टी खाने की लीला बहुत प्रसिद्ध है। कन्हैया ने मिट्टी खा ली। सखाओं ने उन्हें मना किया लेकिन वे नहीं माने। अब सखाओं ने यशोदा मैया को बुलाया और कहा कि कन्हैया मिट्टी खा रहा है। मैया आई और कन्हैया को मिट्टी न खाने के लिए कहा। यह लीला कन्हैया की बाल सुलभता और नटखट स्वभाव को दर्शाती है। कन्हैया की मिट्टी खाने की लीला में मिट्टी खाने के बाद वे कहते हैं कि उन्होंने मिट्टी नहीं खाई। इससे यह प्रतीत होता है कि कन्हैया झूठ बोल रहे हैं पर वास्तव में उनकी बात का गहरा अर्थ है।
कन्हैया की बात को शाब्दिक रूप से नहीं लेना चाहिए बल्कि उनके दिव्य स्वरूप और लीलाओं को समझने का प्रयास करना चाहिए। उनकी बातों में एक गहरा अर्थ छुपा होता है जो हमें उनकी दिव्यता और प्रेम को समझने में मदद करता है। कन्हैया ने मैया से कहा कि उन्होंने मिट्टी नहीं खाई लेकिन वास्तव में वे यह कहना चाहते थे कि सारा विश्व उनका स्वरूप है और मिट्टी भी उसी का हिस्सा है।
कन्हैया के अनुसार-
उन्होंने मिट्टी नहीं खाई क्योंकि मिट्टी और वे एक ही हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सर्वव्यापी हैं और सभी जीवों में वास करते हैं। उनके लिए सभी जीव एक ही हैं, अलग-अलग नहीं हैं। जैसे पानी में पानी मिल जाए तो अलग-अलग नहीं दिखता, उसी प्रकार श्रीभगवान् के दृष्टिकोण से सभी जीव एक ही हैं और उनका अलग अस्तित्व नहीं है। यह अद्वैतवाद की भावना है जिसमें श्रीभगवान् और जीवों की एकता को देखा जाता है।
लहरों को पकड़ना और उन्हें अलग से बाल्टी में भरना सम्भव नहीं है क्योंकि लहरें पानी का ही एक रूप हैं। जब हम लहरों को बाल्टी में भरने की कोशिश करते हैं तो वास्तव में हम पानी ही भर रहे होते हैं। लहरें पानी की गति और ऊर्जा का ही एक रूप हैं लेकिन वे पानी से अलग नहीं हो सकतीं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि सभी जीव उनके अन्दर रहते हैं, जैसे लहरें समुद्र में रहती हैं। जब हम लहरों को अलग से पकड़ने की कोशिश करते हैं तो भी वे पानी का ही रूप होती हैं और समुद्र में वापस मिलने पर एकरूप हो जाती हैं। श्रीभगवान् के साथ एकता प्राप्त करने पर जीव श्रीभगवान् के स्वरूप में एकरूप हो जाते हैं और उनका अलग अस्तित्व नहीं रहता।
जब हम अपने जीवन को शुद्ध बनाने का प्रयास करते हैं और अपने कर्त्तव्यों को अच्छे से निभाते हैं तभी हम श्रीभगवान् के साथ एकता की भावना को प्राप्त कर सकते हैं।
इस एकता की भावना में हमें एहसास होता है कि श्रीभगवान् और हम अलग नहीं हैं बल्कि हम एक ही हैं। यह अनुभूति हममें पूर्णता और सन्तुष्टि की भावना प्रदान करती है और हमें जीवन के उद्देश्यों को समझने में मदद करती है।
श्रीभगवान् कहते हैं कि यह ज्ञान जानने के बाद सब कुछ पता चल जाता है। यह ज्ञान आत्मा और परमात्मा की एकता को समझने से सम्बन्धित है।
यथाकाशस्थितो नित्यं(व्ँ), वायुः(स्) सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि, मत्स्थानीत्युपधारय॥9.6॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि वायुमण्डल पृथ्वी के चारों ओर एक निश्चित सीमा तक होता है, उसके बाद अन्तरिक्ष शुरू होता है। वायुमण्डल में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन और अन्य गैसें होती हैं जो जीवन के लिए आवश्यक हैं। वायुमण्डल की सीमा समाप्त होने पर अन्तरिक्ष की विशालता शुरू होती है, जहाँ वायुमण्डलीय गैसें नहीं होती हैं।
अन्तरिक्ष की विशालता और अनन्तता में पृथ्वी, चन्द्रमा और अन्य ग्रह छोटे कणों की तरह होते हैं।
श्रीभगवान् की अनन्त सत्ता में हम सभी जीव-जन्तु और भूत-प्रेत एक छोटे से हिस्से के रूप में स्थित हैं। हमारी समस्याएँ और क्लेश हमें अक्सर श्रीभगवान् की अनन्तता और हमारी वास्तविक स्थिति को समझने से रोकते हैं।
पृथ्वी और चन्द्रमा जैसे ग्रहों के न होने से अन्तरिक्ष को कोई अन्तर नहीं पड़ेगा। अन्तरिक्ष वैसा ही रहेगा, चाहे चन्द्रमा और सूरज हों या न हों।विशाल अन्तरिक्ष में पृथ्वी, चन्द्रमा और अन्य ग्रह उसी प्रकार स्थित हैं जिस प्रकार श्रीभगवान् में सभी जीव-जन्तु और भूत-प्रेत स्थित हैं, उसी प्रकार हम सब भी अनन्त अस्तित्व का एक छोटा सा हिस्सा हैं।
श्रीभगवान् का अस्तित्व बहुत विशाल है।
श्रीभगवान् की अनन्त सत्ता में हम सभी एक छोटे से हिस्से के रूप में स्थित हैं। हम इतने छोटे हैं फिर भी बड़े-बड़े क्लेश करते रहते हैं। यह सच है कि हम हमेशा छोटी-छोटी बातों पर झगड़ते हैं और एक दूसरे को दु:ख पहुँचाते हैं। हमें अपनी छोटी सी स्थिति को समझते हुए विनम्रता का भाव अपनाना चाहिए। इससे हम जीवन को अधिक अर्थपूर्ण बना सकते हैं और दूसरों के साथ बेहतर ढङ्ग से जुड़ सकते हैं। श्रीभगवान् का यह ज्ञान हमें इसी दिशा में ले जाने का प्रयास है। हम एकदम छोटे हैं तो हमें वैसे ही नम्रता का भाव अपने मन में लेकर हमेशा रहना चाहिए।
यही बात श्रीभगवान् अगले श्लोक में बता रहे हैं।
सर्वभूतानि कौन्तेय, प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥9.7॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि सभी भूत मात्र (जीव और संसार) का निर्माण उन्होंने प्रकृति की मदद से किया है।
प्रकृति का अर्थ है संसार की रचना और व्यवस्था, जिसमें पृथ्वी, आकाश, जल, वायु आदि शामिल हैं। जैसे परमात्मा की ऊर्जा और चैतन्य शक्ति से प्रकृति कार्य करती है उसी प्रकार विद्युत से लैपटॉप और फोन चलते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि वे केवल दिशा-निर्देश देते हैं और उनकी अध्यक्षता में प्रकृति कार्य करती है।
प्रश्न- पहला युग कौन सा था?
उत्तर- सतयुग।
प्रश्न- दूसरा युग कौन सा था?
उत्तर- त्रेतायुग।
प्रश्न- तीसरे युग कौन सा था?
उत्तर- द्वापरयुग।
प्रश्न- चौथा युग कौन सा है?
उत्तर- कलयुग।
हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार चार युग होते हैं- सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। ये युग सृजन और विनाश की प्रक्रिया को दर्शाते हैं।
ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं और भगवान् विष्णु के साथ मिलकर सृष्टि का सञ्चालन करते हैं। भगवान् विष्णु विभिन्न अवतारों में आकर सृष्टि को स्थिर और सन्तुलित बनाए रखते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि वे प्रकृति की मदद से सृष्टि का निर्माण करते हैं और काल के अन्त में प्रकृति का नाश भी करते हैं।
यह सृजन और विनाश की प्रक्रिया एक चक्र के रूप में चलती रहती है।
मिट्टी के साथ खेलने वाले बच्चे मिट्टी को आकार देते हैं और फिर उसे तोड़कर नया आकार देते हैं। श्रीभगवान् भी सृष्टि को बनाते हैं और फिर एक निश्चित समय के बाद उसे नष्ट कर देते हैं, जिससे एक नया चक्र शुरू हो सके।
प्रकृतिं(म्) स्वामवष्टभ्य, विसृजामि पुनः(फ्) पुनः।
भूतग्राममिमं(ङ्) कृत्स्नम्, अवशं(म्) प्रकृतेर्वशात्।।9.8।।
न च मां(न्) तानि कर्माणि, निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनम्, असक्तं(न्) तेषु कर्मसु।।9.9।।
विवेचन-श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सारे कार्य करते हैं लेकिन उन्हें इसका कोई अहङ्कार नहीं है जबकि हमें अक्सर अपने कार्यों और उपलब्धियों का अहङ्कार हो जाता है, जैसे कि अच्छे अङ्क लाने या कोई परीक्षा पास करने पर।
श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सुन्दर सृष्टि की रचना करते हैं। पहले भी सृष्टि की सुन्दरता और विविधता की बात की गई है-
जैसे हमारे उँगलियों के निशान (फिङ्गरप्रिंट्स) की विशिष्टता।
हर व्यक्ति के उँगलियों के निशान (फिङ्गरप्रिंट्स) अलग होते हैं। अब तक अरबों लोगों का जन्म हुआ है और हर किसी के ये निशान अद्वितीय हैं। किन्हीं भी दो लोगों के उँगलियों के निशान एक जैसे नहीं होते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सृष्टि की रचना करते हैं लेकिन उससे अलिप्त रहते हैं और अभिमान नहीं करते हैं। पङ्खा भी हवा देता है लेकिन हवा देने का श्रेय नहीं लेता। पङ्खे का केन्द्र उसकी गति और अनुशासन को बनाए रखता है। श्रीभगवान् सृष्टि के कार्यों को सञ्चालित करते हैं लेकिन उनसे परे रहते हैं। यह श्रीभगवान् की नि:स्वार्थता और उदासीनता को दर्शाता है। श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सृष्टि के केन्द्र में हैं और उनकी उपस्थिति से सारे कार्य चलते रहते हैं।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः(स्), सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय, जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि वे सृष्टि के अधिपति हैं और उनकी उपस्थिति से जगत के परिवर्तन होते रहते हैं।
जैसे सूर्य की उपस्थिति से दिन और रात का चक्र चलता है, उसी प्रकार श्रीभगवान् की चेतना सृष्टि में व्याप्त है और उसके कारण सारे कार्य सुव्यवस्थित रूप से चलते रहते हैं। श्रीभगवान् को इसके लिए कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। उनकी उपस्थिति ही पर्याप्त है।
अवजानन्ति मां(म्) मूढा, मानुषीं(न्) तनुमाश्रितम्।
परं(म्) भावमजानन्तो, मम भूतमहेश्वरम्।।9.11।।
विवेचन- श्रीभगवान् का जन्मोत्सव मनाने का अर्थ है, उनके अवतार का उत्सव मनाना, न कि उनके वास्तविक जन्म का। श्रीभगवान् का अस्तित्त्व शाश्वत है और उनका जन्म केवल एक दिव्य अवतार के रूप में होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म एक अवतार के रूप में हुआ था लेकिन उनका वास्तविक अस्तित्त्व इससे परे है। यह अवतारों की अवधारणा को दर्शाता है, जहाँ श्रीभगवान् विभिन्न रूपों में अवतरित होते हैं।
श्रीभगवान् के अवतार और उनके भौतिक शरीर के न रहने के बाद भी उनकी चेतना और तत्त्व सर्वत्र व्याप्त रहते हैं। यह हमारी धारणा और दृष्टिकोण को व्यापक बनाने की एक प्रक्रिया है। पूजा के दौरान हम मूर्ति में श्रीभगवान् की उपस्थिति को महसूस करते हैं और उनकी चेतना को अनुभव करते हैं। विसर्जन के बाद हमारा दृष्टिकोण बदलता है और हम श्रीभगवान् की उपस्थिति को पूरे विश्व में और प्रकृति में महसूस करते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि कुछ लोग उनके अस्तित्त्व को सीमित समझते हैं और केवल जन्म और मृत्यु तक ही उनकी उपस्थिति मानते हैं। वे श्रीभगवान् के परमात्म तत्त्व को नहीं समझ पाते हैं जो सर्वव्यापी और शाश्वत है। समझ की कमी के कारण ही वे श्रीभगवान् की वास्तविकता को पूरी तरह से नहीं जान पाते हैं और उनकी लीलाओं को भी नहीं समझ पाते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि वे मनुष्य से परे हैं और उनका अस्तित्त्व विशाल और दिव्य है। श्रीभगवान् की सत्ता सर्वव्यापी और शाश्वत है और हम उनके अंश मात्र हैं।
इसी के साथ ही आज के विवेचन सत्र का समापन होता है और प्रश्नोत्तर सत्र का आरम्भ होता है।प्रश्नोत्तरी सत्र
प्रश्नकर्ता- श्रीनिधि वर्मा
प्रश्नकर्ता- अर्पित भैया।
धर्मराज युधिष्ठिर जो पाण्डवों में सबसे बड़े थे, उन्होंने कौरवों के सामने ऐसा प्रस्ताव भी रखा था कि हमें सिर्फ पाँच गाँव ही दे दो। हम उसमें भी खुश रहेंगे, बाकी का राज्य आप करो। उनके विचार शुद्ध थे परन्तु दुर्योधन की सोच तो इतनी बुरी थी कि वह तो एक सुई की नोक के बराबर भी जमीन नहीं देना चाहते थे जबकि पूरा राज्य पाण्डवों का ही था।
धृतराष्ट्र महाराज तो पाण्डवों के संरक्षक बनकर राज्य कर रहे थे। जब सम्राट वापस आ गए तो उन्हें पाण्डवों का राज्य वापस दे देना चाहिए था, परन्तु पुत्र मोह के कारण उन्होंने ऐसा नहीं किया तो यह बात धर्म के विरुद्ध हो गयी। यहाँ पर अधर्म की जय हो रही थी, इसी कारण यह महाभारत का युद्ध हुआ।
जो धर्म के रास्ते पर चलते हैं उन्हें जीवन में कुछ कष्ट झेलने पड़ते हैं, परन्तु आखिर में विजय तो जो धर्म के साथ खड़ा होता है उसी की होती है और अधर्म का नाश होता है। इसी विचार को प्रस्थापित करने के लिए महाभारत का युद्ध लड़ा गया।