विवेचन सारांश
"योगक्षेमं वहाम्यहम्"
गीताजी के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन से संवाद कर रहे हैं, गुरुदेव हमसे कर रहे हैं और इसी प्रकार हम सभी आज इस अध्याय के माध्यम से बाल-साधकों से संवाद कर रहे हैं।
गीताजी के सभी अध्यायों के अन्त में पुष्पिका में हम श्रीकृष्णार्जुन संवाद बोलते हैं। पहले अध्याय में श्रीकृष्ण एक भी शब्द नहीं बोलते हैं, उस अध्याय की पुष्पिका में भी श्रीकृष्णार्जुन संवादे लिखा है, तो श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद कैसे हुआ? गुरुदेव इसके लिए बोलते हैं, अर्जुन बोल तो रहे है, श्रीकृष्ण बोलते नहीं पर सुन रहें हैं। हाँ, हूँ आदि हाव-भाव से अपने मनोभावों को दिखाना भी संवाद ही है।
श्रीभगवान् कहते हैं, राजविद्याराजगुह्ययोग नाम के इस अध्याय में वे जो गहन ज्ञान बता रहे हैं, उसको जानने के बाद कुछ शेष नहीं रहता। यह जान लेने से कल्याण हो जायेगा।
उपनिषद् में श्वेतकेतु की एक कथा है। उनके घर पर आने के बाद , उनके पिता ने पूछा, ऐसी कौन-सी विद्या है, जिसको जानने के बाद कुछ भी जानना शेष न हो। वही विद्या गीताजी, इस अध्याय के माध्यम से हमें बता रही हैं। वह विद्या है, सम्पूर्ण विश्व में श्रीभगवान् का दर्शन करना। हम सबको जो भी प्राप्त है, वह स्वयं के कल्याण के लिए, विश्व के कल्याण के लिए है। इसमें मेरे स्वयं का कुछ भी नहीं है। बीज बोते हैं, उसमें से वृक्ष निकलता है, वह बीज श्रीभगवान् ने दिया है। हमारा जन्म माँ की कोख से होता है, कोख में हमारा सृजन श्रीभगवान् ने किया है, वह बीज श्रीभगवान् ने दिया है।
हमारे शरीर में रक्त है, सब कुछ वैज्ञानिक बना सकते हैं, रक्त नहीं बना सकते हैं। सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी है, वह श्रीभगवान् का दिया हुआ है। श्रीभगवान् को जानने का प्रयास करना चाहिये।
9.12
मोघाशा मोघकर्माणो, मोघज्ञाना विचेतसः।
राक्षसीमासुरीं(ञ्) चैव, प्रकृतिं(म्) मोहिनीं(म्) श्रिताः।।9.12।।
मूढ़ लोगों के सभी कर्म फल की इच्छा से होते हैं। शिक्षा प्राप्त करते हैं, कोई खेल-कूद की प्रतियोगिता में भाग लेते हैं, तो प्रथम आने के लिए ही करते हैं। वे लोग श्रीभगवान् की श्रेष्ठता को नहीं मानते, ऐसे लोगों का कर्मों के प्रति किया गया प्रयास व्यर्थ है। हम जो अध्याय कण्ठस्थ करते हैं वह श्रीभगवान् ने करवा दिया, यह भाव होना चाहिये।
मूढ़ लोगों का सब ज्ञान व्यर्थ हैं, मैं-मैं की भावना, राक्षसी वृत्ति और मोहिनी वृत्ति होती है। हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान् मानता था। वह कहता था, श्रीभगवान् को क्या मानना है। जीवन में जो श्रेष्ठता पाते हैं, उसमें विनम्रता की, श्रीभगवान् को मानने की आवश्यकता होती है।
प्रश्न- स्तर दो के किस अध्याय में दो प्रकार की प्रकृति और गुण देखे थे?
उत्तर- सोलहवें अध्याय, दैवासुरसम्पद्विभागयोग में, देव और असुर दो प्रकार के लोगों को देखा था।
श्रीभगवान् ने दोनों तरह की वृत्तियों के बारे में नौवें अध्याय में संक्षेप में बता दिया है। इसका विस्तार सोलहवें अध्याय में है। इसमें दैवीय और आसुरी दो तरह की प्रकृतियाँ बतायी है। आसुरी प्रकृति के तीन प्रकार होते हैं- आसुरी, राक्षसी और मोहिनी।
राक्षसी- किसी कर्म के करने से स्वयं की हानि होती हो तो भी कर्म करने वाले राक्षसी वृत्ति के होते हैं। बहुत अधिक सोने से समय की बर्बादी, प्रमाद होता है, फिर भी सोते ही रहेंगे।
आसुरी- आसुरी लोगों के कर्मों से किसी को हानि हो रही है, स्वयं को आनन्द की प्राप्ति होती है, पर वे अन्य लोगों की हानि का विचार नहीं करते, स्वयं के आनन्द के बारे में विचार करते हैं।
मोहिनी- ऐसी वृत्ति के लोगों को दूसरों को कष्ट पहुँचाने में, उनका क्रन्दन सुनने में ही आनन्द आता है। आतंकवादी ऐसी वृत्ति के ही होते हैं।
ऐसी तीनो प्रवृति वाले लोग श्रीभगवान् को नहीं जानते हैं।
महात्मानस्तु मां(म्) पार्थ, दैवीं(म्) प्रकृतिमाश्रिताः।
भजन्त्यनन्यमनसो, ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्।।9.13।।
द्रौपदी को भरी सभा में दुःशासन खींच कर ले आया। उसकी साड़ी भरी सभा में खींचने लगा। उस सभा में उसके पाँच पति, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, विदुर, धृतराष्ट्र सभी थे। द्रौपदी दुःखी होकर एक हाथ से साड़ी के छोर को पकड़ कर, सहायता की अपेक्षा कर रही थी। सभी मुख को नीचे कर के बैठे थे।
श्रीकृष्ण द्वारका में अपनी पत्नी सत्यभामा से वार्ता कर रहे थे, अकस्मात् बहुत विचलित हो गये। सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से विचलित होने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया मेरी प्रिय सखी द्रौपदी के साथ ऐसा घटित हो रहा है। सबसे सहायता के लिए बोल रही है पर एक बार भी श्रीकृष्ण का नाम नहीं ले रही है। अन्तिम समय में असहाय द्रौपदी ने साड़ी को छोड़ दिया, पूर्ण शरणागति से दोनों हाथ जोड़ कर श्रीभगवान् को याद किया। श्रीभगवान ने योगशक्ति से साड़ी का ढ़ेर लगा दिया। अन्य किसी से सहायता की कामना छोड़ कर जब सम्पूर्ण शरणागति से, अनन्य भाव से श्रीभगवान् को याद किया, तब श्रीभगवान आये, इसे ही अनन्य भाव कहते हैं।
सततं(ङ्) कीर्तयन्तो मां(य्ँ), यतन्तश्च दृढव्रताः।
नमस्यन्तश्च मां(म्) भक्त्या, नित्ययुक्ता उपासते॥9.14॥
भजन से भी श्रेष्ठ है, कीर्तन। कीर्तन में शीघ्र ध्यान लग जाता है। गीताजी के अध्याय जब गाते हैं ती आनन्द की अनुभूति होती है। लक्ष्य से विचलित नहीं होते हैं। श्लोकों पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है।
सहज प्रश्न उठता है, क्या पढ़ाई या अन्य कर्मों को छोड़ दे? हमारा सारा कार्य कीर्तन जैसा ही है। माली के लिए फुलवाड़ी को जल से सींचना ही कीर्तन है, विद्यार्थी के लिए उसकी पढ़ाई ही कीर्तन है।
स्वाध्याय करना। श्लोकों को गाने के बाद सब कुछ श्रीभगवान् को अर्पण कर देना चाहिये। उससे भी तृप्ति नहीं होती तो अध्याय के अन्त में हम श्रीकृष्णार्पणस्तु कहते हैं। सब कुछ करने के बाद उन्हीं को समर्पित, यह भाव होना चाहिये। समस्त कर्मों को श्रीभगवान् की उपासना समझ कर करने से श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कर्म भी उनको समर्पित कर पायेंगे।
एक कथा है। महाराष्ट्र में एक गोरा नामक कुम्हार था। उसको विट्ठल भगवान् की भक्ति थी। भजन का समय कम मिलता था। पहले मिट्टी के घड़े और बर्तन बहुत उपयोग में आते थे। मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को चिकनी करना पड़ता है। गोरा कुम्हार भगवान् का भजन करते हुए, ध्यान लगा कर मिट्टी को पैरों से रौंदता था। मिट्टी रौंदते समय अचानक उसका छोटा बच्चा वहाँ आ गया, मिट्टी से खेलने लगा। गोरा कुम्हार को इसका पता ही नहीं चला। भजन करते हुए, मिट्टी रौंद रहा था। उसकी पत्नी ने आवाज़ देकर उसे बताया, बच्चा वहाँ आ गया है, उसे चोट लग जायेगी।
गोरा कुम्हार का सारा ध्यान विट्ठल में लगा हुआ था। सारे कार्य श्रीभगवान् के हैं, यह मान कर करने से श्रीभगवान् हमारा ध्यान रखते हैं।
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये, यजन्तो मामुपासते।
एकत्वेन पृथक्त्वेन, बहुधा विश्वतोमुखम्।।9.15।।
द्वैत भाव से श्रीभगवान् को मानने वाले, पूजा करने वाले, भक्त और श्रीभगवान् दोनों को अलग-अलग मानते हैं।
अलग-अलग प्रकार से पूजा करना ठीक है, परन्तु पूरे विश्व में नाना प्रकार की पूजा पद्धति हो गयी हैं, उसके अनुसार उनके अलग श्रीभगवान् हो गए हैं। भेद और लड़ाई का कारण यह है कि मेरे श्रीभगवान् श्रेष्ठ हैं, मेरी पूजा-पद्धति ही सही है।
गीताजी में श्रीभगवान् ने कहा है, सबकी पूजा पद्धति सही है। श्रीभगवान् का निर्गुण और सगुण स्वरूप दोनों ही ठीक हैं। सर्वशक्तिमान् श्रीभगवान् भक्तों की भावना के अनुरूप नाना स्वरूपों में प्रकट होते हैं।
श्रीभगवान् शेषशायी हैं, शेषनाग पर लेटे हुए हैं, बगल में माता लक्ष्मी विराजमान होकर सेवा कर रही हैं। नाभि से कमल निकला हुआ है, उस पर ब्रह्माजी बिराजमान हैं। श्रीभगवान् का मुख प्रसन्न है। हाथ में चक्र और गदा है। कई उपासक ध्यान में इस स्वरूप का ध्यान करते हैं।
रामजी को मानने वाले प्रभु राम के हाथ में धनुष और स्मित हँसी को देखते हैं। भक्त प्रह्लाद के लिए श्रीभगवान् ने नृसिंह अवतार ग्रहण किया था। जो लोग ये नहीं जानते कि श्रीभगवान् नाना रूप धारण करते हैं, वे लोग श्रीभगवान् को एक सीमा में बाँध देते हैं। श्रीभगवान् का यही स्वरूप और यही पूजा पद्धति सही है। इसी एक विचार के कारण विश्व भर में युद्ध हो रहे हैं।
गीताजी में श्रीभगवान् बता रहे हैं, श्रीभगवान् की भक्ति किसी भी स्वरूप में हो, धीरे-धीरे दैवीय गुण आने लगते हैं, इसलिए विश्व में घर-घर में गीताजी जानी चाहिये। तब यह भ्रम भी मिट जायेगा। श्रीभगवान् बता रहे हैं, इस प्रकार लोग अलग-अलग प्रकार से भक्ति कर रहे हैं।
मैं श्रीभगवान् को कहाँ-कहाँ देखूँ, किस स्वरूप की पूजा करूँ, इसको वे अगले श्लोक में बताते हैं।
गङ्गाजी का पूरा जल पवित्र है, फिर भी सभी लोग तीर्थों में जाते हैं। तीर्थों की एक अपनी ऊर्जा है, जिससे उस गङ्गाजल की पवित्रता बढ़ जाती है। इसको विस्तार से श्रीभगवान् ने दसवें अध्याय में बताया है। यहाँ संक्षेप में देखते हैं।
अहं(ङ्) क्रतुरहं(य्ँ) यज्ञः(स्), स्वधाहमहमौषधम्।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम्, अहमग्निरहं(म्) हुतम्॥9.16॥
पितरों को प्रसन्न करने के लिए जो यज्ञ किया जाता हैं, उसमें घी के द्वारा जो आहुति देते हैं, उसमें स्वधा बोला जाता है। गणपति के बाद पितृपक्ष प्रारम्भ हो जायेगा। उसमें हमारे पूर्वजों की अलग-अलग तिथि पर हम श्राद्ध करते हैं। अग्नि, स्वधा बोलकर दी जाने वाली आहुति को पितरो तक पहुँचाती है, स्वाहा बोलकर दी जानेवाली आहुति को देवताओं तक पहुँचाती है।
श्रीभगवान् कह रहे हैं, सभी वनस्पतियाँ भी मैं ही हूँ। मन्त्र भी मैं ही हूँ। भगवद्गीता भी मन्त्रमयी है। हर श्लोक श्रीभगवान् की विभूति है। श्रीभगवान् के दर्शन नहीं हो रहे हैं, एक श्लोक भी गा लिया तो वह गाया जाने वाला श्लोक स्वयं मेरी विभूति ही है।
श्रीभगवान् बोल रहे हैं, यज्ञ के प्रकार भी मैं ही हूँ। अग्नि भी मैं ही हूँ, यज्ञ के समय काम में ली जाने वाली समिधा भी मैं ही हूँ, अर्थात् कार्य भी मैं ही हूँ और कर्म भी मैं ही हूँ।
पिताहमस्य जगतो, माता धाता पितामहः।
वेद्यं(म्) पवित्रमोङ्कार, ऋक्साम यजुरेव च।।9.17।।
एक कथा है-
दक्ष प्रजापति की कन्या सती का विवाह भगवान शिव के साथ हो रहा था। दूल्हे के रूप में शिवजी बैठे हैं। नाना विधानों की पूर्ति के लिए विवाह के समय, पण्डितजी बहुत तरह के प्रश्न पूछते हैं, जैसे- पिता का नाम, दादा का नाम, गोत्र आदि।
दूल्हे के रूप में शिवजी से पण्डितजी ने पूछा, आपके पिताजी का नाम क्या है? शिवजी तो देवाधिदेव महादेव स्वयं हैं, उनके पिता कौन होंगे? शिवजी ने प्रयास करके, पिता का नाम विष्णु बताया। दादाजी का नाम पूछने पर ब्रह्माजी का नाम बताया। पितामह का नाम पूछने पर, शिवजी क्या बोलते? बड़े प्रयास से स्वयं का नाम शिव ही ले लिया। पण्डितजी समझ गए कि और कुछ नहीं पूछना ही ठीक है।
श्रीभगवान् ही अन्तिम हैं, इसलिए यहाँ पर श्रीभगवान् बता रहे हैं, माता-पिता, पितामह मैं ही हूँ। श्रीभगवान् से मित्रता कर लेने से हम निर्भय हो जाते हैं।
जानने योग्य ऊँकार भी श्रीभगवान् स्वयं को बता रहे हैं। श्वेतकेतु के पिता ने पूछा था, जानने योग्य ज्ञान कौन सा है? जिसको जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहता है। ऊँकार की ध्वनि को ही जानना चाहिए। ऊँकार की ध्वनि वेदों में है।
प्रश्न- वेद कितने है?
उत्तर- वेद चार हैं।
प्रश्न- चार वेद कौन-कौन से हैं?
उत्तर- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।
श्रीभगवान् कह रहे हैं, वेद मेरे ही अवतार हैं। इन सारी बातों को बताने का कारण यह है कि विगत कुछ वर्षों में वेदों की महत्ता को लोग नहीं मानते थे, अत: इन वेदों का अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। वेदों पर विश्वास कम होने के कारण ही राक्षसी, आसुरी व मोहिनी वृत्तियाँ बहुत बढ़ गई हैं।
हमारे ग्रन्थों को पढ़ने से ज्ञान और विज्ञान साथ में आयेंगे। ज्ञान के साथ विज्ञान, विज्ञान के साथ ज्ञान, दोनों ही आवश्यक हैं। दोनों बातें एक साथ कैसे लायी जायें? यह हमारे शास्त्र बताते हैं।
आगे हमें बहुत पढ़ाई करनी है, नाना कर्मों में लगना है, पर गीताजी पढ़ना नहीं छोड़ना चाहिये।
गतिर्भर्ता प्रभुः(स्) साक्षी, निवासः(श्) शरणं(म्) सुहृत्।
प्रभवः(फ्) प्रलयः(स्) स्थानं(न्), निधानं(म्) बीजमव्ययम्।।9.18।।
श्रीभगवान् कह रहे हैं, सारे विश्व का शरणस्थान वे ही हैं। श्रीभगवान् सबके कल्याण की भावना ही रखते हैं। सभी जीवों का सृजन करने वाले भी श्रीभगवान् ही हैं, सबका विलय भी श्रीभगवान् में ही होता है। सारे विश्व का अन्तिम निधान भी श्रीभगवान् ही हैं।
तपाम्यहमहं(व्ँ) वर्षं(न्), निगृह्णाम्युत्सृजामि च।
अमृतं(ञ्) चैव मृत्युश्च, सदसच्चाहमर्जुन॥9.19॥
समुद्र के पानी से भाप बनती है, भाप से बादल बनते हैं, बादलों से वर्षा होती है, वर्षा भी उनका ही स्वरूप है, वर्षा के रूप में वे ही बरसते हैं।
एक-एक कर के श्रीभगवान् सबको अपना स्वरूप बताते हैं। श्रीभगवान् बोल रहे हैं, वे स्वरूप से मात्र मूर्ति में या मन्दिर में ही विराजमान नहीं रहते। स्वरूप से निकल कर विश्व भर में कार्य करते हैं।
सूर्य, चन्द्रमा, वर्षा, वनस्पतियों, आस-पास के जीवों, सभी स्वजनों में श्रीभगवान् का निवास है। हमारी भक्ति शुद्ध हुई तो श्रीभगवान् कहीं भी प्रकट हो सकते हैं। प्रह्लाद जी की भक्ति शुद्ध थी, इसलिए श्रीभगवान् खम्भे से प्रकट हो गये।
हम सब घूमने जाते हैं, नदियों के ऊपर से रेलगाड़ी गुजरती है। सभी नदियाँ पवित्र होती है। बड़ी-बड़ी नदियों के नाम भी मालूम होते हैं। कावेरी, यमुना, नर्मदा आदि। बहुतों को अभ्यास होता है, वे उस पवित्र नदी को प्रणाम करते हैं व एक सिक्का भी श्रद्धा के साथ नदी में डाल देते हैं।
आस-पास की वस्तुओं में ईश्वर का दर्शन करना, पुस्तक गिर जाने पर उसको मस्तिष्क के लगाना, कुर्सी पर बैठे हुए अचानक किसी के पैर लग जाये तो उसके पैर को छूकर प्रणाम करना, ये सब प्रमाणित करते हैं कि ईश्वर के स्वरूप को हम सबमें मानते हैं। तभी हमारे अन्दर शुद्ध भाव जागृत होगा।
सबसे छोटा कण होता है, उसे हम अणु (atom) कहते हैं। वह हम अपनी आँखों से कभी नहीं देख सकते। लोहे, एल्युमीनियम (Aluminium) सभी में उसी के छोटे कण विद्यमान होते हैं। इसे हमको वैज्ञानिकों ने बताया, इसलिए हम मानते हैं।
भक्त प्रह्लाद में विश्वास और श्रद्धा है, इसलिए खम्भे में से श्रीभगवान् प्रकट हुए। कण-कण में श्रीभगवान् के दर्शन से ही उनको प्रकट करवाया जा सकता है।
आगे के श्लोकों में श्रीभगवान् बता रहे हैं कि और किस प्रकार से लोग उनकी पूजा करते हैं।
त्रैविद्या मां(म्) सोमपाः(फ्) पूतपापा,
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं(म्) प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकम्,
अश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।9.20।।
स्वर्ग की प्राप्ति मृत्यु के बाद भी होती है, मृत्यु के पहले भी होती है। आनन्द की अनुभूति, मृत्यु के पहले की स्वर्ग की प्राप्ति है।
मोक्ष की प्राप्ति तो मन लगा कर श्रीभगवान् की भक्ति करने से प्राप्त होती है। यज्ञ द्वारा प्राप्त पुण्यों से स्वर्गलोक एवं अच्छे-अच्छे लोकों की प्राप्ति होती है। स्वर्ग में वे देवताओं के साथ रहते हैं। पुण्यों से स्वर्ग की प्राप्ति अर्थात् प्रवेश मिल गया। धीरे-धीरे स्वर्गलोक में रहते-रहते पुण्यों के क्षीण हो जाने पर, समाप्त हो जाने पर पुनः पृथ्वी पर आना पड़ता है।
उदाहरण- किसी पाँच सितारा होटल में जाते है, वहाँ हमारे पास जितने रुपये होते हैं, उतने ही दिन ठहर सकते हैं। उसके बाद अगर हम कहें कि इतने दिन रहे और कुछ दिन रहने दो, तो बिना रूपयों के उस होटल में एक दिन भी नहीं रह सकते।
ठीक वैसे ही, पुण्यों की समाप्ति पर स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक पर आना पड़ता है।
ते तं(म्) भुक्त्वा स्वर्गलोकं(व्ँ) विशालं(ङ्),
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं(व्ँ) विशन्ति।
एवं(न्) त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना,
गतागतं(ङ्) कामकामा लभन्ते॥9.21॥
गुरुदेव एक बात कहते हैं, विष्णु पुराण में देवताओं और भगवान श्रीविष्णु का संवाद है कि स्वर्ग के देवता भी श्रीभगवान् से प्रार्थना करते हैं, मृत्यु लोक में फिर से जाना पड़े तो हमको भारतवर्ष में जन्म प्राप्त हो। यह भारत की महिमा का गान है। देवता भी भारतवर्ष में जन्म लेने के लिये तरसते हैं, उस भारत भूमि पर हमारा जन्म हुआ है, हम कितने भाग्यवान हैं। यहाँ गीता, भागवत् आदि नाना ग्रन्थों के वाचन का सुअवसर प्राप्त होता है। भजन करते हैं।
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां(य्ँ), ये जनाः(फ्) पर्युपासते।
तेषां(न्) नित्याभियुक्तानां(य्ँ), योगक्षेमं(व्ँ) वहाम्यहम्॥9.22॥
यह वाक्य हमने अनेक बार पढ़ा और सुना है। जीवन बीमा निगम (LIC) संस्थान का यह विशेष वाक्य है जो उनके प्रतीक चिह्न (logo) के नीचे लिखा होता है। इसका अर्थ है कि वे कह रहे हैं, “हम आपका ध्यान रखेगें। आपकी चिन्ता हम करेंगें।” जीवन के साथ भी, जीवन के बाद भी।
श्रीभगवान् कहते हैं, “जो भक्त अनन्य भाव से मेरी पूजा करता है। शरणागति से पूजा करता है, उसका योग-क्षेम श्रीभगवान् वहन करते हैं।
श्रीभगवान हमारे माता-पिता हैं, वे योग अर्थात् अच्छी-अच्छी वस्तु, स्थान, और परिस्थिति प्रदान करते हैं। जो हमारे लिए हितकर है, उन्नति देने वाला है, उसको बनाये रखते हैं। क्षेम का अर्थ है कि सुख, समृद्धि व आरोग्य बना रहना चाहिये । इसकी व्यवस्था मैं करता हूँ।
श्रीभगवान् कहते हैं, जब मेरे भक्त मुझसे अनन्यता से एकरूप हो जाते हैं, तब माता पिता के समान उन्हें वह सब प्रदान करता हूँ जो उनके पास नहीं है। क्षेम, अर्थात् जो प्राप्त है- उसकी सुरक्षा करता हूँ।
कई बार ऐसा भी होता है कि हम किसी वस्तु की बहुत कामना करते हैं, पर वह हमें प्राप्त नहीं होती, उस समय हमें यह समझना चाहिए कि वह हमारे लिए श्रेयस्कर नहीं है।
श्रीभगवान् हमारे हित के लिए वस्तु को देकर वापस छीन भी लेते हैं, हमारी सारी अच्छाई को सुरक्षित करने की प्रतिज्ञा एक तरह से श्रीभगवान यहाँ कर रहे हैं।
श्रीभगवान् ने द्रौपदी व अर्जुन के प्रति अपनी प्रतिज्ञा का निर्वाह किया, वैसे ही हम भी अपने जीवन रथ की डोर श्रीभगवान को सौंप देते हैं तो वे हमारा योग-क्षेम वहन करेंगे।
श्रीभगवान् को धन्यवाद देते हैं कि हमें गीता जी पढ़ने का अवसर मिला। दैवीय गुणों का हमारे जीवन में विकास हो और हम भविष्य में भी गीता जी से जुड़े रहें।
हरिनाम संकीर्तन के साथ विवेचन सत्र समाप्त हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- मृत्युञ्जय भैया
प्रश्न- हर कण में श्रीभगवान् हैं, तो फिर हम धरती पर पैर रखते हैं, ऐसा क्यों है?
उत्तर- हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि जब हम सोकर उठते हैं तो धरती माता को प्रणाम करते हैं। अब हम लोग ऐसा नहीं करते हैं, लेकिन हमें ऐसा करने की आदत डालनी चाहिये।
प्रश्न- हमें बताया गया है कि जब हम मन लगाकर पढ़ाई करते हैं, तो श्रीभगवान् प्रसन्न होते है, श्रीभगवान् ने बारहवें अध्याय में बताया है
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥ (२)
ये दोनों बातें भिन्न क्यों है?
उत्तर- श्रद्धा के साथ भक्ति करने का अर्थ है, पूरे मन से हर काम को करते हुए श्रीभगवान् की आराधना करना। भक्ति का तात्पर्य यह नहीं है कि हम अपने नित्य के काम छोड़ कर भक्ति करें। अपने हर काम को श्रीभगवान् को समर्पित करके ही करें, हमारे सन्तों ने भी हमें यही बताया है। हम अपने सारे कामों को नहीं छोड़ सकते। संसार में रहते हुए समस्त कार्यों को करते हुए उन्होंने श्रीभगवान् की आराधना की। श्रीभगवान् ने उन्हें दर्शन दिया। सुबह-शाम हम श्रीभगवान् का स्मरण करें। सन्त जनाबाई सन्त नामदेव भगवान् के यहाँ सेविका का काम करती थीं। सारे दिन कठिन मेहनत करती थीं। एक बार तो किसी ने उन्हें बाँध दिया था, किन्तु भगवान् विट्ठल स्वयम् आकर उनके कार्यों को करते थे। चक्की में आटा पीसते समय वे आकर दूसरी ओर से हाथ लगा देते थे और सरलता से आटा पिस जाता था। प्रति दिन की उपासना हमें करते रहना चाहिये।
प्रश्नकर्ता- वृत्ति दीदी
प्रश्न- आसुरी प्रवृत्ति के लोगों के साथ, जो हमें हर समय परेशान ही करते हैं, कैसा व्यवहार करना चाहिये?
उत्तर- हमें ऐसे लोगों को कोई उपदेश नहीं देना है। हम भगवद्गीता पढ़ रहे हैं तो अपने लिये पढ़ रहे हैं, किसी को उसकी कमियाँ बताने के लिये नहीं। हमें यह देखना है कि यह आसुरी प्रवृत्ति हममें न आ जाये। हमें अपने अन्दर के अच्छे बदलाव पर ध्यान देना है।
प्रश्नकर्ता- जिया दीदी
प्रश्न- स्वर्ग में जाने के बाद पुण्य समाप्त हो जाने पर फिर से पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है, तो क्या नर्क में जाने के बाद पृथ्वी पर जन्म नहीं होता है?
उत्तर- हाँ, नर्क में जाने के बाद भी फिर से जन्म होता है। हमारे पास बहुत से पुण्य हैं, हम इसलिये स्वर्ग में जाते हैं। यदि हमने बहुत से पाप किये हैं तो हम नर्क में जाते हैं। हम नर्क में नहीं जायेंगे, क्योंकि हम गीता जी पढ़ रहे हैं।स्वर्ग में जाने के बाद हम वहाँ के बहुत सारे सुखों का उपभोग करते हैं। धीरे-धीरे हमारे पुण्य समाप्त हो जाते हैं तो हम फिर से जन्म लेते हैं। नर्क में दु:खों को भोग कर पाप भी समाप्त हो जाते हैं। हमें फिर से जन्म मिलता है। आप सब लोग इतनी छोटी आयु से गीता जी से जुडे़ हैं तो पिछले जन्म के कुछ न कुछ पुण्य हैं, जिसके कारण गीता जी पढ़ने-समझने का अवसर मिला है।