विवेचन सारांश
अर्जुन की मन:स्थिति में परिवर्तन

ID: 7718
हिन्दी
शनिवार, 23 अगस्त 2025
अध्याय 1: अर्जुन विषाद योग
2/4 (श्लोक 14-30)
विवेचक: गीता विशारद श्री श्रीनिवास जी वर्णेकर


देश भक्ति गीत, हनुमान चालीसा पाठ, दीप-प्रज्वलन, प्रभु-वन्दना, सद्गुरु श्रीगोविन्द देव गिरि जी महाराज का वन्दन करते हुए आज के विवेचन सत्र का शुभारम्भ हुआ। सबसे पहले श्री गुरु चरणों में नमन तथा श्रीमद्भगवद्गीता जी का ध्यान करते हुए श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय प्रथम की ओर अग्रसर होते हैं, जहाँ महाभारत के युद्ध के समय की परिस्थिति तथा अर्जुन की मनःस्थिति का वर्णन किया गया है। 

वास्तव में  श्रीभगवान् का उपदेश तो द्वितीय अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से प्रारम्भ होता है।

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।2.11।।

 
यह जानना आवश्यक है कि उपदेश सुनने के पूर्व अर्जुन की मन:स्थिति कैसी थी? उस मन:स्थिति में परिवर्तन कैसे होता गया? श्रीभगवान् भी अर्जुन को उपदेश करने हेतु कैसे बाध्य होते गये? श्रीभगवान् किसी के बन्धन में नहीं हैं किन्तु अर्जुन ने ऐसा क्या मोहित किया कि श्रीभगवान् स्वयं उपदेश करने हेतु बाध्य हो गये? उन्होंने अर्जुन को प्रेम से उपदेश किया।

हमने देखा कि धृतराष्ट्र तथा सञ्जय अपने राजमहल में बैठे हैं तथा सञ्जय वेदव्यासजी से प्राप्त दिव्य द्वष्टि के द्वारा युद्धभूमि में हो रही सारी घटनाओं का वर्णन करने हेतु नियुक्त किये गये हैं। धृतराष्ट्र ने उनसे पूछा-

"मेरे तथा पाण्डु के पुत्रों के मध्य में क्या हुआ?"

श्रीमद्भगवद्गीता जी का प्राकट्य इसी श्लोक के साथ होता है। धृतराष्ट्र के मन में स्वयं एवं पाण्डु के पुत्रों से सम्बन्धित यह "अपने तथा पराए" का भाव निश्चित है, इसीलिये महाभारत के युद्ध का सम्पूर्ण कारण भी धृतराष्ट्र ही है

धृतराष्ट्र के प्रश्न के उत्तर में सञ्जय ने बताना प्रारम्भ किया-
किस प्रकार दोनों विरोधी सेनायें खड़ीं थीं?
किस प्रकार दुर्योधन तथा आचार्य द्रोण के मध्य संवाद हुआ?

किस प्रकार पितामह भीष्म ने शङ्‌खनाद किया, सिंह गर्जना की? उसके पश्चात् सारे रण वाद्य कैसे बजने लग गये?

यहाँ तक हमने पिछले सप्ताह के विवेचन सत्र में श्रवण किया।

पितामह भीष्म के द्वारा शङ्‌खनाद करते ही रणभूमि के सम्पूर्ण रणवाद्य एकत्रित होकर सहसा बजने लग गये। अब कल्पना कीजिये कि लाखों की सेना में हजारों रणवाद्‌यों के वादक होंगे तथा हजारों वाद्यों का वादन हो रहा होगा। वे वाद्य भी साधारण नहीं थे।

पण्व, अनक, गोमुख आदि जिनके नाद भी दुर्बल योद्धाओं को अत्यन्त हृदय विदीर्ण कर देने वाली अनुभूति दे रहे थे

जब ये वाद्य बजने लगे होंगे तो वह ध्वनि कैसी होगी? मन ही मन उस कोलाहल के मध्य में पहुँच जाइये। घनघोर ध्वनि हो रही है तथा इसी कोलाहल में श्रीमद्भगवद्गीता जी के हमारे दोनों नायक युद्ध भूमि में प्रवेश करते हैं - भगवान् श्रीकृष्ण एवं अर्जुन।

1.14

ततः(श्) श्वेतैर्हयैर्युक्ते, महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः(फ्) पाण्डवश्चैव, दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः।।1.14।।

इसके पश्चात् सफेद घोड़ों से युक्त महान रथ पर बैठे हुए लक्ष्मीपति भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डुपुत्र अर्जुन ने भी दिव्य शंखों को बड़े जोर से बजाया।

विवेचन- सञ्जय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि श्वेत अर्थात् सफेद तथा हय अर्थात् अश्व जिसका पूर्ण अर्थ हुआ श्वेत अश्व से युक्त महान रथ। यहाँ रथ को महति अर्थात् महान कहा जा रहा है। जिस रथ पर स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण विराजमान हैं। यह महान रथ, अग्निदेव द्वारा अर्जुन को दिया गया है।

यह ज्ञात हो कि अर्जुन ने अग्निदेव से रथ तथा गाण्डीव धनुष दोनों प्राप्त किये हैं। अर्जुन ने दिन-रात परिश्रम करके अर्थात् घोर तपस्या करके इन अस्त्रों-शस्त्रों को प्राप्त किया है। श्रीमद्भगवद्गीता जी पढ़कर हमें अर्जुन जैसा बनने का प्रयास करना है। अर्जुन सामान्य योद्धा नहीं हैं अतः वे सामान्य रथ पर बैठकर भी नहीं आये हैं।

यहाँ बैठने के लिये स्थितौ शब्द का प्रयोग किया गया है। हम हिन्दी, मराठी, अङ्ग्रेजी आदि भाषाओं में एक वचन तथा बहुवचन देखते हैं किन्तु संस्कृत में एक वचन, द्विवचन तथा बहुवचन होते हैं। स्थितौ का अर्थ हुआ, जहाँ दो लोग बैठे हैं- माधव अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण तथा पाण्डुपुत्र अर्जुन। उन्होंने भी अपने-अपने शङ्ख बजाये।

यहाँ अर्जुन की मनःस्थिति को समझना होगा। उस महान रथ में बैठकर अर्जुन, श्रीकृष्ण के साथ युद्ध भूमि में आये हैं तथा पितामह भीष्म द्वारा किये गये शङ्खनाद को सुनकर अर्जुन ने भी शङ्खनाद किया। इसका अर्थ हुआ कि मैं भी युद्ध के लिए तैयार हूँ। दो दिव्य शङ्ख भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुन ने बजाये।

1.15

पाञ्चजन्यं(म्) हृषीकेशो, देवदत्तं(न्) धनञ्जयः।
पौण्ड्रं(न्) दध्मौ महाशङ्खं(म्), भीमकर्मा वृकोदरः।।1.15।।

अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक (तथा) धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक (शंख बजाया और) भयानक कर्म करने वाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।

विवेचनयुद्धभूमि में भीषण शङ्‌ख नाद-
युद्ध के प्रारम्भ होने का सूचक। 

सञ्जय ने भगवान् श्रीकृष्ण तथा अर्जुन के शङ्खों का नाम बताना भी प्रारम्भ किया। श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक शङ्‌ख बजाया।

यहाँ  भगवान् श्रीकृष्ण को हृषिकेश कहा गया है। हृषिक् का अर्थ है इन्द्रियॉं तथा ईश का अर्थ है स्वामी

जिसका अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण है वह हृषिकेश अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण।

देवदत्त नामक शङ्‌ख धनञ्जय अर्थात् अर्जुन ने बजाया।

प्रश्न- अर्जुन का नाम धनञ्जय क्यों पड़ा ?

उत्तर- एक युद्ध में अर्जुन बहुत सारा धन जीत कर लाये थे इसीलिये उनका नाम धनञ्जय हो गया।
धन जीतने वाला- धनञ्जय।

  • भीमकर्मा- भीम का अर्थ है बड़े-बड़े कार्य करने वाले तथा          
  • वृकोदर- वृक अग्नि का नाम है, जो हमारे जठर (उदर) में होता है। जिसके उदर में वृकनामक अग्नि हैं। ऐसे भीम हैं।

हम सभी जानते हैं कि वे बहुत व्यायाम करते थे तथा जितना व्यायाम करते थे, उतना ही भोजन भी करते हैं। वे जो भी भोजन ग्रहण करते थे, उसे बड़े-बड़े कार्य करके पचाते भी थे। उन्होंने पौण्ड्र नामक शङ्ख बजाया। उनके इस शङ्ख को महा अर्थात् भीषण शङ्ख की संज्ञा दी गयी क्योंकि भीम छोटा सा शङ्‌ख नहीं बजायेंगे।

ये सारे शङ्‌ख बजने प्रारम्भ हुए। भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा भीम के साथ अन्य योद्धाओं ने भी अपने-अपने शङ्ख बजाने प्रारम्भ किए ।

1.16

अनन्तविजयं(म्) राजा, कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः(स्) सहदेवश्च, सुघोषमणिपुष्पकौ।।1.16।।

कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक (शंख बजाया तथा) नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक (शंख बजाये)।

विवेचन- कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर-
यहाँ सञ्जय राजा धृतराष्ट्र के सामने ही युधिष्ठिर को राजा कह रहे हैं। जिस प्रकार दुर्योधन के लिये उन्होंने राजा शब्द का प्रयोग किया था-

'राजा वचनमब्रवीत'

वैसे ही युधिष्ठिर के लिये भी वे राजा शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।वास्तव में राज्य पर अधिकार तो युधिष्ठिर का ही है। दुर्योधन द्वारा किए गए छल के कारण, राज्य युधिष्ठिर के हाथ में नहीं है तो क्या हुआ! राजा तो हैं ही इसलिए राजा युधिष्ठिर ने अनन्त विजय नामक शङ्‌ख बजाया- ऐसा सञ्जय ने कहा।

नकुल ने सुघोष तथा सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शङ्ख बजाए।

हमारे मन में यह प्रश्न आ सकता है कि शङ्खों के नाम जानकर क्या करना है ?

यहाॅं महाभारत के युद्ध की परिस्थिति का वर्णन है। सभी योद्धा युद्ध के लिये तैयार हैं। सभी ने शङ्खनाद किया है। अर्जुन ने भी शङ्‌खनाद किया है। युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव सभी ने शङ्‌खनाद किया है। सभी योद्धा युद्ध करने के लिये सिद्ध होकर, उस रणभूमि में आये हैं अतः उसी प्रकार अन्य योद्धाओं ने भी शङ्‌खनाद किया।

1.17

काश्यश्च परमेष्वासः(श्), शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः।।1.17।।

हे राजन्! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि,

1.17 writeup

1.18

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च, सर्वशः(फ्) पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः(श्), शङ्खान्दध्मुः(फ्) पृथक्पृथक्।।1.18।।

राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु (इन सभी ने) सब ओर से अलग-अलग (अपने - अपने) शंख बजाये।

विवेचन- सञ्जय धृतराष्ट्र को सम्बोधित करके कह रहे हैं-

“हे पृथ्वीपते! हे राजन! बड़ा धनुष धारण करने वाले काशिराज, महारथी शिखण्डी, राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न, राजा विराट (जिनके राज्य में पाण्डवों ने अज्ञातवास में आश्रय लिया था), अपराजित सात्यकि इन सभी योद्धाओं ने अपने-अपने शङ्ख बजाए।”

पृथ्वी पर राज्य करने वाला राजा को पृथ्वीपति कहते हैं।

द्रौपदी के पिता राजा द्रुपद ने, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों ने, सभी योद्धाओं ने, सुभद्रा के पुत्र वीर अभिमन्यु (वह बलवान है, श्रेष्ठ योद्धा है इसीलिये उसे महाबाहु कहा गया है)।

इन सभी श्रेष्ठ योद्धाओं ने अपने अलग-अलग शङ्ख बजाये अर्थात् पाण्डव युद्ध के लिए तैयार हैं। आप मानसिक रूप से युद्धभूमि में चलिए। कैसा तुमुल नाद हुआ होगा, जब इतने सारे शङ्ख एक साथ बजे होंगे। ऐसी भयावह ध्वनि का परिणाम क्या होता है? उसका वर्णन सञ्जय धृतराष्ट्र को विस्तार पूर्वक करते हैं।

1.19

स घोषो धार्तराष्ट्राणां(म्), हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं(ञ्) चैव, तुमुलो व्यनुनादयन्।।1.19।।

और (पाण्डव-सेना के शंखों के) उस भयंकर शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुँजाते हुए धार्तराष्ट्रों अर्थात् आपके पक्ष वालों के हृदय विदीर्ण कर दिये।

विवेचनसञ्जय की निर्भिकता का वर्णन 

सञ्जय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं-

“हे राजन! समराङ्गण में रणवाद्यों का इतना भयङ्कर घोष जो पृथ्वी पर हुआ, कोलाहल बन गया तथा आकाश और पृथ्वी, मानो समस्त दिशाएँ, चारों ओर उस भीषण ध्वनि से भर गये। इस ध्वनि से आपके पुत्रों के हृदय विदीर्ण हो गए हैं। वे भयभीत हो गये हैं।”

जब युद्ध का घोष होता है तो इसका उद्देश्य होता है कि योद्धाओं में उत्साह भर जाए। इससे कुछ योद्धा उत्साहित हो जाते हैं। जो सत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, उनका उत्साह युद्ध के लिए बढ़ता है तथा जो अनुचित विचार, पाप विचार से आए हुए हैं, असत्य के पक्ष में खड़े हैं, उनके मन में इन युद्ध घोषों से भय की उत्पत्ति होती है। वे सर्वथा दुर्बल अनुभव करते हैं।

सञ्जय एक पत्रकार हैं
हमें पत्रकार के गुण सञ्जय से सीखने चाहिएं। यदि राजा को भी समाचार देना है तो वे सत्य घटना में झूठ मिलाकर नहीं बोल रहे हैं कि राजा को अच्छा लगेगा। वे भयभीत हुए बिना सत्य ही बता रहे हैं।
सञ्जय स्वच्छ मन के हैं

सामान्य रूप से हम देखते हैं कि अनेक पत्रकार राजा या सरकार को जो कर्ण प्रिय होता है, वही समाचार देते हैं।

किसी भी
 पत्रकार को सदैव निष्पक्ष होना चाहिए

श्रीमद्भगवद्गीता जी के अन्तिम श्लोक में सञ्जय घोषणा करते हैं कि विजय किसकी होने वाली है। वे तनिक भी सङ्कोच नहीं करते हैं क्योंकि वे निष्पाप हृदय के हैं

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।

 तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

1.20

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।1.20।।

हे राजन् इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने शास्त्र चलाने कि तैयारी के समय धनुष उठाकर मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र सम्बन्धियों को देखकर

विवेचन- सञ्जय यहाँ से आगे की कथा बताते हैं। वे कहते हैं-

“धृतराष्ट्र के पुत्रों से युद्ध के लिए उद्धत अर्जुन जिस रथ पर सवार हैं, उस रथ की ध्वजा पर हनुमान जी अङ्कित हैं या बैठे हुए हैं।"

कल्पना कीजिए कि अर्जुन का रथ कितना दिव्य होगा। श्रीहरि रथ को चलाने के लिए बैठे हैं और रथ की ध्वजा पर हर अर्थात् साक्षात रुद्र जी विराजमान हैं। हनुमान जी रुद्र के अवतार हैं। 

अतः श्रीहरि तथा श्रीहर, दोनों के द्वारा सम्भाला हुआ रथ कितना दिव्य होगा।

यहाँ कपिध्वज अर्थात् जिसकी पताका पर हनुमान जी अङ्कित हैं।

अब अर्जुन ने अपना धनुष उठाकर कहा-
“हे ह्रषीकेश! हे महीपति! अब तो शस्त्र चलाने का समय आ गया है, अब युद्ध न करने का कोई प्रश्न ही नहीं है।”

1.21

हृषीकेशं(न्) तदा वाक्यम्, इदमाह महीपते। अर्जुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये, रथं(म्) स्थापय मेऽच्युत।।1.21।।

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को (आप तब तक) खड़ा कीजिये, जब तक मैं (युद्धक्षेत्र में) खड़े हुए इन युद्ध की इच्छा वालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना योग्य है।

विवेचन- सञ्जय कहते हैं कि हे महाराज! अर्जुन ने अपना धनुष उठाकर, भगवान् श्रीकृष्ण  से यह वाक्य कहा, हे महीपते!

मही अर्थात् पृथ्वी
महीपते अर्थात् पृथ्वी का राजा

यहाॅं अर्जुन का पहला वाक्य प्रारम्भ होता है। श्रीमद्भगवद्गीता अर्जुन और श्रीकृष्ण के बीच का संवाद है और वह संवाद यहाॅं से प्रारम्भ होता है। अर्जुन कहते हैं-
"हे अच्युत (भगवान् श्रीकृष्ण)! दोनों सेनाओं के बीच में मेरा रथ स्थापित कीजिए।"

यावत् का अर्थ होता है जब तक।

"जब तक मैं शत्रु की सेना का निरीक्षण करता हूॅं कि किन योद्धाओं के साथ मुझे युद्ध करना है?"

रथी के साथ रथी, महारथी के साथ महारथी, तुल्य बल लोगों के मध्य युद्ध होता है, यही अपेक्षित है। युद्ध में अधर्म भी हुआ है, उसका वर्णन हम आगे देखेंगे कि अभिमन्यु की किस प्रकार अधर्मिता से हत्या की गई।

अर्जुन नियमानुसार, धर्मानुसार युद्ध करना चाहते हैं। इसलिए वे देखना चाहते हैं कि उनके साथ युद्ध करने के लिए योग्य कौन है। इसका अर्थ यह है-
"मेरे साथ युद्ध करने के लिए कौन योग्य है, वह मैं देखना चाहता हूॅं।"

1.22

यावदेतान्निरीक्षेऽहं(य्ँ), योद्धुकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यम्, अस्मिन्रणसमुद्यमे॥1.22

अर्जुन बोले - हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को आप तब तक खड़ा कीजिये, जब तक मैं युद्धक्षेत्र में खड़े हुए इन युद्ध की इच्छावालों को देख न लूँ कि इस युद्धरूप उद्योग में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है।

विवेचन- अर्जुन कहते हैं कि युद्ध की इच्छा रखते हुए युद्ध करने के लिए जो लोग आए हैं, धृतराष्ट्र के पुत्रों की विजय हो यह इच्छा रखने वाले, दुर्योधन का हित चाहने वाले ऐसे योद्धाओं को मैं देखना चाहता हूॅं।

जैसा हमने पिछले सत्र में देखा था कि दुर्योधन का हित चाहने वाले अधिक हैं। दुर्योधन का बड़ा गठबन्धन है।

जब स्वार्थ प्रेरित लोग होते हैं तो उन्हें इकट्ठा होने में अधिक समय नहीं लगता। यहाँ युद्ध की इच्छा हेतु समस्त योद्धा स्वयं की स्वार्थसिद्धि हेतु आए हैं।

"अर्थस्य पुरुषो दास:
"द्रोणाचार्य भी इसी उद्देश्य से आए हैं, "मेरी नौकरी चली जाएगी यह सोचकर आए हैं"।
भीष्म पितामह अपनी प्रतिज्ञा के कारण आए हैं

निरीक्षेहम् अर्थात् मैं देखूॅंगा

श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी हैं इसीलिए अर्जुन उन्हें रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले जाने के लिए कह रहे हैं।

1.23

योत्स्यमानानवेक्षेऽहं(य्ँ), य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे:(र्), युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1.23॥

दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय करने की इच्छा वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आये हुए हैं, युद्ध करने को उतावले हुए (इन सबको) मैं देख लूँ।

विवेचन- अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से कहते हैं कि मुझे उन योद्धाओं को देखने दीजिए जी यहाँ पर धृतराष्ट्र के दुर्बुद्धि पुत्र (दुर्योधन) को प्रसन्न करने की इच्छा से युद्ध में प्रवृत्त हुए हैं।

धृतराष्ट्र के पुत्र को यहाँ धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे अर्थात् दुर्योधन को दुर्मति कहा गया है।     

जिस प्रकार वसुदेव के पुत्र वासुदेव (भगवान् श्रीकृष्ण) हुए।

1.24

सञ्जय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो, गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये, स्थापयित्वा रथोत्तमम्।।1.24।।

संजय बोले - हे भरतवंशी राजन्! निद्रा विजयी अर्जुन के द्वारा इस तरह कहने पर अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के मध्य भाग में उत्तम रथ को खड़ा करके इस तरह कहा-

विवेचनगुडाकेश अर्जुन के लिए विशेषण है।

  • गुडाका अर्थ है नींद अर्थात् निद्रा।
  • ईश अर्थात् स्वामी जिसने अपनी नींद पर विजय प्राप्त कर ली है।
जब चाहे सो सकता है और जब चाहे जाग सकता है। जैसे इन्द्रियों पर नियन्त्रण महत्वपूर्ण है उसी प्रकार निद्रा पर नियन्त्रण महत्वपूर्ण है

अर्जुन ने इस उपलब्धि को प्राप्त करने हेत कठोर अभ्यास किया है, बहुत परिश्रम किया है। रात-रात जाग कर अन्धेरे में धनुर्विद्या का अभ्यास किया है। 

हृषीकेश अर्थात् जिसका इन्द्रियों पर निग्रह है। निद्रा का स्वामी इन्द्रियों के स्वामी से बोल रहे है, यहाॅं पर यह तात्पर्य है। हृषिकेश ने दोनों सेनाओं के मध्य में रथ को स्थापित किया और क्या कहा वह अगले श्लोक में देखते हैं।

1.25

भीष्मद्रोणप्रमुखतः(स्), सर्वेषां(ञ्) च महीक्षिताम्।
उवाच पार्थ पश्यैतान्, समवेतान्कुरूनिति।।1.25।।

पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण के सामने तथा सम्पूर्ण राजाओं के सामने इस तरह कहा कि 'हे पार्थ! इन इकट्ठे हुए कुरुवंशियों को देख'।

.विवेचन- महिक्षित अर्थात् पृथ्वी के राजा। भीष्म पितामह तथा अन्य सारे राजाओं के सामने अर्जुन के उस दिव्य रथ को स्थापित करके श्रीभगवान् ने अर्जुन को क्या कहा यह वृत्तान्त सञ्जय धृतराष्ट्र को सुनते हैं।

श्रीभगवान् ने अर्जुन को एक ही वाक्य कहा कि युद्ध के लिए आतुर यहाँ युद्धक्षेत्र में एकत्रित हुए इन कौरवों को देखो।

1.26

तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः(फ्), पितृ़नथ पितामहान्।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृ़न्, पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा।।1.26।।

उसके पश्चात् पृथानन्दन अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित पिताओं को, पितामहों को, आचार्यों को, मामाओं को, भाइयों को, पुत्रों को, पौत्रों को तथा मित्रों को भी देखा

विवेचन-        तत्र अर्थात् वहाॅं पर

सञ्जय महाराज धृतराष्ट्र को युद्धक्षेत्र का वर्णन करते हुए अर्जुन को पार्थ नाम से सम्बोधित करते हैं अर्थात् पृथा का पुत्र पार्थ

कुन्ती को पृथा के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। अतः पृथा का पुत्र- अर्जुन इसलिए अर्जुन का नाम हुआ पार्थ।

अर्जुन ने पितामह अर्थात् दादाजी, मामाओं को देखा। कोई किसी का पिता है, कोई किसी का पुत्र है, कोई किसी का भाई है, कोई किसी के काका है तथा कोई किसी के पौत्र है।

"वे बन्धु-बान्धव, गुरुजन और सखा अर्थात् युद्धभूमि में उपस्थित समस्त योद्धा एक-दूसरे के सम्बन्धी हैं। ये सभी योद्धा रणभूमि में युद्ध करने के उद्धेश्य से आपस में विरोधी सेनाओं में सम्मिलित हुए हैं।” 

अभी तक हमने अर्जुन की मन:स्थिति देखी है,  वे शंङ्ख बजा कर युद्ध के लिए तैयार है यह घोषणा अर्जुन ने की है। अर्जुन ने यह भी कहा है-

"मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में ले जाकर स्थापित करें, मैं देखना चाहता हूॅं किसके साथ युद्ध करना है।"

यह घोषणा भी अर्जुन ने की है। और अपना धनुष भी उठाया है। अर्जुन की मन:स्थिति में अचानक क्या परिवर्तन हुआ कि वे विषादग्रस्त हो गये

1.27

श्वशुरान्सुहृदश्चैव, सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः(स्), सर्वान्बन्धूनवस्थितान्।।1.27।।

ससुरों को और सुहृदों को (देखा) अपनी अपनी जगह पर स्थित उन सम्पूर्ण बान्धवों को (देखकर) -

विवेचन-
अर्जुन का विषादग्रस्त अनुभव करना 

दोनों ही सेनाओं में कोई किसी का श्वसुर है तो कोई किसी का दामाद है, कोई किसी का हितचिन्तक भी है। अर्जुन ने ऐसे सभी सगे-सम्बन्धी और बन्धुओं को देखा। अर्जुन ने कहा कि हे भगवान् श्रीकृष्ण! इस प्रकार युद्ध की इच्छा रखने वाले अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को अपने समक्ष उपस्थित देख, मैं दुर्बल अनुभव कर रहा हूँ। 

अपने परिजनों तथा सम्बन्धियों को स्वयं के विरुद्ध युद्ध करता देख अर्जुन विषादग्रस्त हो जाते हैं, अर्थात् उनके हृदय में युद्धरत् समस्त योद्धाओं के प्रति करुणाभाव की उत्पत्ति के कारण, फलस्वरूप उन्हें विषाद की अनुभूति होती है तथा जिसके कारण उनके हृदय में उपस्थित वीरता का भाव जाता रहता है एवं उन्हें दुर्बल अनुभूत होता है।

अर्जुन के हृदय में जैसे ही करुणा के भाव का पदार्पण होता है वैसे ही उनकी वीर वृत्ति ने कहा, "मुझे यहाँ नहीं रहना है, मैं तो चली।"

करुणा के साथ वीर-वृत्ति कैसे रह सकती है? यह तो मेरा अपमान है, ऐसा सोचकर अर्जुन की वीर-वृत्ति उन्हें छोड़कर चली गई। अर्जुन एकदम से शिथिल हो गये।

1.28

कृपया परयाविष्टो, विषीदन्निदमब्रवीत्। अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेमं स्वजनं(ङ्) कृष्ण, युयुत्सुं(म्) समुपस्थितम्।।1.28।।

वे कुन्तीनन्दन अर्जुन अत्यन्त कायरता से युक्त होकर विषाद करते हुए ऐसा बोले - डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को देखकर


1.29

सीदन्ति मम गात्राणि, मुखं(ञ्) च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे, रोमहर्षश्च जायते।।1.29।।

मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मुख सूख रहा है तथा मेरे शरीर में कँपकँपी (आ रही है) एवं रोंगटे खड़े हो रहे हैं।

विवेचन- उन सब बन्धु-बान्धवों को देखकर अर्जुन की मन:स्थिति में अचानक परिवर्तन हो गया। अर्जुन के हृदय में अत्यन्त करुणा उत्पन्न हो गयी तथा वे विषादग्रस्त हो गये।

दुःख, शोक तथा विषाद-
ये दुःख की पृथक-पृथक अवस्थाएँ हैं

हमें कोई भी घटना सुनकर दुःख हो जाता है किन्तु यदि वह घटना स्वजन के साथ घटित होती है तो मनुष्य को अधिक दुःख होता है अर्थात् शोक होता है। जब दुःख या शोक इतना अधिक हो जाता है कि मनुष्य अपना कर्त्तव्य भी भूल जाता है तो उस स्थिति को विषाद कहा जाता है।

यही कारण है कि इस अध्याय का नाम “अर्जुनविषादयोग” है।

अर्जुन का विषाद ही उनका श्रीभगवान् से योग का कारण बन गया। अर्जुन को इतना अधिक दुःख हुआ कि अर्जुन सारे कर्त्तव्य भूल गए तथा उस आत्यन्तिक दुःख में उन्हें श्रीभगवान् स्मरण हो आए।

यह दुःख ही अर्जुन को श्रीभगवान् के साथ योग करने के लिए कारण बना।
योग का अर्थ है एक हो जाना

इसीलिए इस अध्याय का नाम “अर्जुनविषादयोग” पड़ गया।

सञ्जय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं-
“अर्जुन अत्यन्त दुःखी दिख रहे हैं और अर्जुन ने श्रीभगवान से कहा।"
यहाँ से अर्जुन का संवाद आरम्भ हो जाता है।

विषाद से भरे हुए अर्जुन श्रीभगवान् से अपनी स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं-

“हे श्रीकृष्ण! मुझे यह क्या हो गया है? युद्ध की इच्छा वाले इन स्वजनों को, परिवार-समुदाय को अपने सामने उपस्थित देखकर मुझे यह क्या हो रहा है? मेरे अङ्ग, मेरे हाथ-पैर शिथिल हो रहे हैं, मेरा मुख सूख रहा है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि मुझे क्या हो रहा है। मेरे शरीर में कम्पन हो रहा है। मेरे रोङ्गटे खड़े हो रहे हैं।”

जब कोई व्यक्ति अत्यधिक दुःखी हो जाता है तो उसकी जो स्थिति बन जाती है, उसी का अर्जुन वर्णन कर रहे हैं।

ऐसा योद्धा, जो युद्ध के लिए पूर्णतः सिद्ध होकर आया है, उसकी क्या स्थिति हो गई। वह कभी पराभूत नहीं हुआ है। सन्त ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं, एक बार शिव जी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए उनके साथ युद्ध किया था। वहाँ भी अर्जुन ने विजय प्राप्त की है। उस अर्जुन की ऐसी अवस्था कैसे हो गई?

ज्ञानेश्वर महाराज, उसका सुन्दर वर्णन करते हैं कि अर्जुन की ऐसी अवस्था क्यों हो गई।

तेथ मनीं गजबज जाहली । आणि आपैसी कृपा आली ।
तेणें अपमानें निघाली । वीरवृत्ति ॥ 185

जिया उत्तम कुळींचिया होती । आणि गुणलावण्य आथी ।
तिया आणिकींते न साहति । सुतेजपणें ॥ 186 


ज्ञानेश्वर महाराज इसकी बहुत सुन्दर उपमा देते हुए अर्जुन की इस स्थिति को वर्णित करते हैं-

एक पुरुष है, उसकी पत्नी है। पत्नी एक कुलीन स्त्री है। ऐसा होते हुए भी यदि वह पुरुष एक पराई स्त्री को घर ले आता है तो वह कुलीन पत्नी यह सहन नहीं कर सकती। अर्जुन की ऐसी ही अवस्था हो गई है।

अर्जुन की मूल वृत्ति कैसी है? वह वीर-वृत्ति के हैं। ऐसी वीर-वृत्ति के साथ अर्जुन रहते हैं। जैसे ही उनके अन्त:करण में करुणा ने प्रवेश किया, इस करुणा के प्रवेश करते ही, वीर-वृत्ति ने कहा,
"मुझे यहाँ नहीं रहना है, मैं तो चली।"

करुणा के साथ वीर-वृत्ति कैसे रह सकती है? यह तो मेरा अपमान है, ऐसा सोचकर अर्जुन की वीर-वृत्ति उसे त्याग कर चली गई। अर्जुन एकदम से शिथिल हो गये।

1.30

गाण्डीवं(म्) स्रंसते हस्तात्, त्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं(म्), भ्रमतीव च मे मनः।।1.30।।

हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है और (मैं) खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ।

विवेचन- अर्जुन कह रहे हैं,
"मेरे हाथ से गाण्डीव धनुष भी गिर रहा है, छूट रहा है। मैं उसे पकड़ भी नहीं पा रहा।"

ऐसे श्रेष्ठ धनुर्धारी होकर यह कह रहे है कि "मैं धनुष भी पकड़ नहीं पा रहा हूँ। मेरी त्वचा भी हर ओर से जल रही है। मेरी स्थिति ऐसी है कि मैं खड़ा भी नहीं हो पा रहा।"

अपने स्वजन देखकर अर्जुन की स्थिति एक पल में परिवर्तित हो जाती है। उनकी स्थिति अत्यधिक करुणामयी हो गयी। वे कहते हैं,
"लग रहा है मेरा मन भ्रमित हो गया है, कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है।"

ऐसी परिस्थितियाँ  हमारे समक्ष भी कभी-कभी बन जाती हैं। श्रीज्ञानेश्वर महाराज इस घटना का बहुत ही सुन्दर वर्णन करते हैं। अर्जुन कितने श्रेष्ठ धनुर्धारी है, उसका वर्णन उन्होंने किया है।

जेणे संग्रामी हरू जिंतिला । निवातकवचांचा ठावो फेडिला ।
तो अर्जुन मोहें कवळिला । क्षणामाजि ॥ 200 ॥

जिसने युद्ध में हर (शिवजी) को भी पराजित किया है, जिसने राक्षसों का संहार किया है, ऐसे अर्जुन क्षणभर में मोह में आ गए। मेरे, अपने, स्वजन इस मोह में आ गए। इन आप्त स्वजनोंं का अर्जुन को मोह हो गया। इस मोह के कारण अर्जुन अपनी मूल वृत्ति, मूल स्वभाव को भी भूल गए। सन्त ज्ञानेश्वर महाराज यहाँ एक उद्धरण देते हैं, वह अप्रतिम है।


जैसा भ्रमर भेदी कोडें । भलतैसें काष्ठ कोरडें ।
परि कळिकेमाजीं सापडें । कोवळियें ॥ 201 ॥

जो भॅंवरा होता है, इतना शक्तिशाली होता है कि वह सूखी लकडी में भी छेद कर देता है। परन्तु पराग कणों को चूसते हुए इतना अधिक मोहित हो जाता है कि सूर्यास्त के बाद वह कमल की पङ्खुड़ियों में ही फॅंस जाता है। जो सूखी लकड़ी में भी छेद कर सकता है, वह स्वतः ही कमल के कोमल पंखुड़ियों में पराग-मोह के कारण फॅंस जाता है।

तेथ उत्तीर्ण होईल प्राणें । परीं ते कमळदळु चिरूं नेणे ।
तैसे कठीण कोवळेंपणे । स्नेह देखा ॥ 202 ॥

पराग के मोह में वह ऐसे जकड़ जाता है कि चाहे वह वहीं मर भी जाए, पर मोह के कारण वह पङ्खुड़ियों को काटकर बाहर नहीं आना चाहता।

यही तो है मोह, जिसने अर्जुन को ग्रसित कर दिया है। श्रेष्ठ धनुर्धारी अर्जुन की ऐसी स्थिति हो गई। जिस क्षण करुणा ने अर्जुन के मन में प्रवेश कर लिया, उसकी वीर श्री उसे छोड़कर चली गयी। वे अपना मूल स्वभाव भूल गए, उनके हाथ पैर फूलने लगे, वे अपना धनुष भी उठाने में असमर्थ हो गए। शरीर में कम्पन भर गया।

अर्जुन, श्रीभगवान् से आगे चलकर क्या कहते हैं अगले सत्र में देखेंगे। परन्तु अर्जुन कैसे आये थे और क्या हो गये, यह समझ लीजिए। देखो तो क्या से क्या हो गया। अर्जुन के भीतर उनकी मन:स्थिति में कैसा परिवर्तन हो गया।

हमें अर्जुन की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि उनके साथ हैं श्रीभगवान् कृष्ण। आगे चलकर अर्जुन श्रीभगवान् को कौन-सा उपदेश दे रहे है, इस रहस्य को आगे देखते हैं। इसके साथ ही आज का सत्र समाप्त  हुआ।

विचार-मन्थन
प्रश्नकर्ता- आदर्श भैया।
प्रश्न
- जब श्रीमद्भगवद्गीता जी का लेखन किया गया तब उनमें आए श्लोकों के आधार पर क्या यह उद्धत किया जा सकता है कि श्रीभगवान् द्वारा अर्जुन के समक्ष श्रीमद्भगवद्गीता जी का प्राकट्य भूतकाल के सन्दर्भ में है या वर्तमानकाल?

उत्तर
-          
धृतराष्ट्र उवाच |
          धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः |
      मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ||

ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीमद्भगवद्गीता जी में आए धृतराष्ट्र के द्वारा उच्चारित इस श्लोक में उन्होंने सञ्जय से जो प्रश्न किया है, वह भूतकाल में है।

परन्तु यह सामान्य बोल-चाल की भाषा के सदृश्य ही प्रतीत होता है।वास्तव में श्रीमद्भगवद्गीता जी को वर्तमान परिपेक्ष में ही श्रीभगवान् द्वारा उच्चारित माना जाना चाहिए। क्योंकि अट्ठारहवें अध्याय में सञ्जय द्वारा उच्चारित यह श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता जी के प्राकट्य तथा धृतराष्ट्र सञ्जय वार्तालाप को वर्तमान काल में होना स्पष्ट करता है।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
        तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

 
प्रश्न- श्रीमद्भगवद्गीता जी के श्लोक क्रमाङ्क तेइस में धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे किसे कहा गया है?
उत्तर
- धृतराष्ट्र के पुत्र को यहाँ धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे अर्थात् दुर्योधन को दुर्मति कहा गया है।
जिस प्रकार वसुदेव के पुत्र- वासुदेव भगवान् श्रीकृष्ण को कहा जाता है।

प्रश्न
- श्रीमद्भगवद्गीता जी के अध्याय एक के श्लोक क्रमाङ्क अट्ठाइस में अर्जुन स्वयं की जो शोक की स्थिति प्रदर्शित कर रहे थे। क्या उनकी यह स्थिति भयवश है या किसी अन्य कारण से?
उत्तर
-
  अर्जुन उवाच |
      दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ||
      सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति |।
इस श्लोक में वर्णित अर्जुन की यह स्थिति भयवश कदापि नहीं है। उनकी यह स्थिति करुणावश है। अपने परिजनों तथा सम्बन्धियों को स्वयं के विरुद्ध युद्ध करता देख अर्जुन विषादग्रस्त हो जाते हैं अर्थात् उनके हृदय में युद्धरत् समस्त योद्धाओं के प्रति स्वतः ही करुणाभाव की उत्पत्ति के कारण, उन्हें विषाद की अनुभूति होती है तथा जिस कारण उनके हृदय में उपस्थित वीरता का भाव जाता रहता है एवं उन्हें दुर्बल अनुभूत होती है।

प्रश्नकर्ता- दीपक भैया।
प्रश्न- इस अध्याय के श्लोक क्रमाङ्क एक से इक्कीस के मध्य सञ्जय एवं धृतराष्ट्र का वार्तालाप मिलता है। तत्पश्चात् श्लोक क्रमाङ्क बाइस से अर्जुन एवं भगवान् श्रीकृष्ण के मध्य हुआ वार्तालाप देखने को मिलता है। क्या कोई वार्तालाप अर्जुन एवं सञ्जय के भी मध्य हुआ है, इस समय?
उत्तर- नहीं, अर्जुन एवं सञ्जय के मध्य कोई वार्तालाप नहीं हुआ है, सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता जी में। सञ्जय एवं धृतराष्ट्र तथा अर्जुन एवं भगवान् श्रीकृष्ण के मध्य होने वाले युद्ध सम्बन्धित वार्तालाप पृथक-पृथक स्थानों में हुए हैं।

जहाँ एक ओर सञ्जय एवं धृतराष्ट्र के मध्य का वार्तालाप धृतराष्ट्र के महल में सम्पन्न हुआ। चूँकि सञ्जय को महर्षि वेदव्यास जी द्वारा कुरुक्षेत्र में हो रहे युद्ध को देखने हेतु दिव्यदृष्टि प्रदान की गई थी अत: वे स्वयं को प्राप्त दिव्यदृष्टि के माध्यम से धृतराष्ट्र के महल में ही उपस्थित हो कौरवों एवं पाण्डवों के मध्य होने वाले युद्ध को देख, उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त अर्थात् विस्तारित विवरण धृतराष्ट्र को दे रहे हैं।

जबकि तत्क्षण युद्ध में प्रवृत्त होने के उद्देश्य से अर्जुन तथा उनके सारथी बने भगवान् श्रीकृष्ण युद्ध भूमि कुरुक्षेत्र में शत्रु सेना का निरीक्षण करते हुए वार्तालाप करते दृष्टिगोचर होते हैं।

।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।