विवेचन सारांश
सत, रज, तम तीनों गुण जीव के बन्धन का कारण

ID: 7822
हिन्दी
शनिवार, 06 सितंबर 2025
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
1/2 (श्लोक 1-11)
विवेचक: गीता व्रती जाह्णवी जी देखणे


श्रीमधुराष्टकम्, देशभक्ति गीत, हनुमान चालीसा, परम्परागत दीप प्रज्वलन, गुरु वन्दना, श्रीकृष्ण वन्दना से सत्र का शुभारम्भ हुआ।

बालसाधकों के लिए विशेष सत्र है, संवाद रूप में है। मध्य में प्रश्नोत्तर किये जाएँगे। इसके पहले सोलहवें और नवें अध्याय का विवेचन हो गया। आज चौदहवें अध्याय के विवेचन का शुभारम्भ हो रहा है।

इस अध्याय का नाम है, “गुणत्रयविभागयोग”

इस अध्याय के नाम से ही पता चल जाता है, वेदव्यासजी ने इस अध्याय में तीनों गुणों के बारे में बताया है। तीन गुण कौन से है? इन गुणों को जानना क्यों आवश्यक है? इस अध्याय के माध्यम से क्या महत्वपूर्ण जानने को मिलेगा? 

हम संसार में अच्छा-बुरा दोनों देखते हैं। इस संसार का निर्माण श्रीभगवान् ने किया है, तो कोई बहुत अच्छे, कोई बहुत बुरे, कुछ में बुराई और अच्छाई दोनों ही होती है। अच्छाई है, तो बुराई क्यों बनायी? ऐसे प्रश्न हमारे मन में आते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर ही इस अध्याय में है। 

ये तीनों गुण हमारे जीवन पर प्रभाव डालते हैं। ये गुण हमारी कृति और स्वभाव का निश्चय करते हैं। 



14.1

श्रीभगवानुवाच
परं(म्) भूयः(फ्) प्रवक्ष्यामि, ज्ञानानां(ञ्) ज्ञानमुत्तमम्।
यज्ज्ञात्वा मुनयः(स्) सर्वे, परां(म्) सिद्धिमितो गताः॥14.1॥

श्रीभगवान बोले – सम्पूर्ण ज्ञानों में उत्तम (और) श्रेष्ठ ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब के सब मुनि लोग इस संसार से (मुक्त होकर) परमसिद्धि को प्राप्त हो गये हैं।

विवेचन- इस अध्याय का शुभारम्भ श्रीभगवान् के बोलने से हुआ है। श्रीभगवान् अर्जुन से कहते हैं, उत्तम ज्ञान जिसे जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा वह ज्ञान वह अर्जुन को फिर से बताएँगे। 

माता-पिता, शिक्षक एक ही बात हमको सिखाने के लिए या हम भूल न जायें, इसलिए बार-बार दोहराते रहते हैं। कहीं बाहर विद्यालय में शिक्षकों के साथ भ्रमण पर जाने पर कई बात कई बार दोहराते हैं। शिक्षक जैसे बोलें वैसे करना, नियमों का पालन करना, भोजन और अन्य सामान ठीक से रख लिया-आदि-आदि। ऐसे ही शिक्षक किसी भी विषय को पढ़ाने के बाद पूछते हैं, "ठीक से समझ में आया या नहीं, फिर से दोहराना है क्या?" 

श्रीभगवान् अर्जुन से प्रेम करते हैं। अर्जुन के मन में कोई संशय नहीं रह जाय, ये श्रीभगवान् चाहते हैं। बहुत महत्वपूर्ण ज्ञान श्रीभगवान् अर्जुन को फिर से बताना इसलिए चाहते हैं, जिसको जानने के बाद जीवन महान बन जायेगा। 

ऋषि-मुनि ज्ञान को ग्रहण करते हैं, मनन करते हैं। ऋषि, मुनि दोनों में थोड़ी सी भिन्नता होती है। मुनि, ज्ञान का अर्जन करने के बाद मनन, अभ्यास और चर्चा करते हैं। छोटी-छोटी बातों को गहनता से जानने से उन्हें सिद्धि प्राप्त हो जाती है। विवेक जागृत हो जाता है, बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है, एकाग्रता बढ़ जाती है। ऐसे साधक श्रीभगवान् को अपना प्रिय सखा बना लेते हैं। प्रिय सखा बनाने से वे लोग चिन्तामुक्त हो जाते हैं। 

कितने प्रकार का ज्ञान होता है? 
चित्रकारी, नृत्य, कहानी सुनाना, गाना ये सब ज्ञान है।

इसके अतिरिक्त आतंकवादी जो बम बनाते हैं, उसके लिए भी ज्ञान चाहिये- यह ज्ञान बुरा ज्ञान है।
कौन सा ज्ञान अच्छा है, कौन सा बुरा? यह भी जानना आवश्यक है। किस ज्ञान से हम लोगों की सहायता कर सकते हैं?  एक चिकित्सक किसी की शल्य चिकित्सा करता है, पेट काटता है, वह उसके भलाई के लिए करता हैं। ज्ञान के उपयोग में विवेक की बहुत आवश्यकता है। 

विज्ञान और गणित हम पढ़ते है, किन्तु इसका उपयोग कैसे करे यह, श्रीमद्भगवद्गीता हमें बताती है। ज्ञान का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए ही किया जाना चाहिये। 

14.2

इदं(ञ्) ज्ञानमुपाश्रित्य, मम साधर्म्यमागताः।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते, प्रलये न व्यथन्ति च॥14.2॥

इस ज्ञान का आश्रय लेकर (जो मनुष्य) मेरी सधर्मता को प्राप्त हो गये हैं, (वे) महासर्ग में भी पैदा नहीं होते और महाप्रलय में भी व्यथित नहीं होते।

विवेचन- श्रीभगवान् इस श्लोक में बोल रहे हैं कि जो इस ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, वह श्रीभगवान् के समान हो जाता है। 

प्रश्न- श्रीभगवान् के जैसा बनना, कैसा बनना होता है?
उत्तर- धनुष लेकर घूमना, तिलक लगा कर, बांसुरी लेकर चलना, यह श्रीभगवान् के जैसा बनना नहीं है। हम सब श्रीकृष्ण, श्रीराम, शिवजी की श्रीभगवान् के नाना स्वरूपों की पूजा करते हैं। सभी स्वरूपों में एक भाव ऐसा है जो सभी में है। सबके मुख पर मृदुल हास, प्रसन्नता का भाव रहता है। वे हँसते रहते हैं। 

श्रीकृष्ण ने कालिया नाग का मर्दन किया था। उसके कितने फ़न थे। श्रीकृष्ण चिंता में नहीं आये कि उसे कैसे मारूँगा? श्रीकृष्ण ने उसके फ़नों पर नृत्य किया। 

जीवन में कितनी भी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय, हमें प्रसन्नचित्त रहना है, यही श्रीभगवान् के जैसा होना है। हम तो छोटी बड़ी बातों में भी कह देते हैं, मेरी तो दुनियाँ ही खत्म हो गयी। किसी की परीक्षा में नब्बे प्रतिशत अङ्को की आशा होने पर अगर पिच्यासी प्रतिशत अङ्क आने पर ही हम निराश हो जाते है। सब कुछ खत्म हो गया। कैसे अपने अङ्क किसी को बताऊँगी? सब कुछ कभी भी खत्म नहीं होता। हमें हमेशा दुबारा अवसर मिलता है। उस समय एकाग्रता से प्रयास करने से परिणाम अनुकूल आएँगे। हमेशा प्रसन्न रहना चाहिए।

श्रीभगवान् के उस ज्ञान में स्थित लोग, डिगते नहीं हैं, स्थिर होते हैं, हमेशा  आनन्द में रहते हैं। 

14.3

मम योनिर्महद्ब्रह्म, तस्मिन्गर्भं(न्) दधाम्यहम्।
सम्भवः(स्) सर्वभूतानां(न्), ततो भवति भारत॥14.3॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! मेरी मूल प्रकृति तो उत्पत्ति स्थान है (और) मैं उसमें जीवरूप गर्भ का स्थापन करता हूँ। उससे सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

विवेचन- श्रीभगवान् बोल रहे हैं, प्रकृति के आधार से इन सारे जीवों को उत्पन्न उन्होंने ही किया है। इस सृष्टि का निर्माण उन्होंने ही किया है। 

जीव अर्थात् हम, पक्षी , नाना प्रकार के पशु, नाना प्रकार की वनस्पतियाँ,  जल में रहने वाले, आकाश में उड़ने वाले, पृथ्वी पर चलने वाले सभी का निर्माण श्रीभगवान् ने ही किया है। प्रकृति के आधार से तात्पर्य है कि  श्रीभगवान् ने पृथ्वी, ब्रह्माण्ड से निर्माण किया है। 

श्रीभगवान् अर्जुन को अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। तीसरे अध्याय में श्रीभगवान् ने अर्जुन को “अनुसूय” कहा है। 

प्रश्न- इस श्लोक में श्रीभगवान् ने अर्जुन को किस नाम से पुकारा है? 
उत्तर- भारत। 

भारत हमारे देश का भी नाम है। भारत का अर्थ है, इस देश के लोग ज्ञान अर्जन करने में लगे हुए हैं। यहाँ के लोग विज्ञान और गणित के ज्ञान के परे गीताजी, शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों के ज्ञान को प्राप्त करने में लगे हैं। हमारे शास्त्रों में जो ज्ञान भरा हुआ है, वह छोटा नहीं है। 

कणाद ऋषि को भौतिक शास्त्र का ज्ञान और भास्कराचार्य जी को गणित का सर्वोत्तम ज्ञान था। वेदों में भौतिक शास्त्र का अत्याधुनिक ज्ञान भरा पड़ा है। नासा वाले वेदों का सहारा लेकर कितनी समस्याओं का निराकरण करते हैं। 

ऋषि-मुनियों द्वारा अद्भुत ज्ञान शास्त्रों में भरा पड़ा है। हम सब इसी ज्ञान को प्राप्त करने में लगे हुए हैं। इसीलिए हम सब भारतीय हैं। हर पल अच्छी बातें जानने की चेष्टा कर रहे हैं। 

प्रश्न- हम सबको अपने देश को इंडिया बोलना चाहिए या भारत? 
उत्तर- भारत 
श्रीभगवान् अर्जुन को कह रहे हैं, हे भारत! “तुम जानते हो तुमने ज्ञानियों के देश में जन्म लिया है। मुनियों ने जो ज्ञान प्राप्त किया है, वह तुम प्राप्त कर सकते हो, यही तो मैं तुम्हें दुबारा बता रहा हूँ”

14.4

सर्वयोनिषु कौन्तेय, मूर्तयः(स्) सम्भवन्ति याः।
तासां(म्) ब्रह्म महद्योनि:(र्), अहं(म्) बीजप्रदः(फ्) पिता॥14.4॥

हे कुन्तीनन्दन ! सम्पूर्ण योनियों में प्राणियों के जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीज-स्थापन करने वाला पिता हूँ।

विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् बोल रहे हैं, सारे जीवों में जो प्राण तत्त्व है, उसका निर्माण उन्होंने किया है। जैसे बीज से पेड़ उत्पन्न होता है, उसी प्रकार जीवों को उन्होंने ही बीजों से उत्पन्न किया है। श्रीभगवान् का कितना बड़ा साम्राज्य और प्रशासनिक क्षमता है, जिससे सृष्टि का निर्माण और सञ्चालन हो रहा है।

एक माता-पिता की दो सन्तान भी स्वरुप और स्वभाव से अलग-अलग होती है। ये तो हमने प्रत्यक्ष अनुभव किया है। एक को मीठा पसन्द है, तो एक को मिर्च-मसाला तीखा, एक को गीता पढ़ने में रूचि है तो एक को खेलने में, एक शान्त स्वभाव का है तो एक उग्र। एक पेड़ के दो पत्ते एक जैसे दिखने में एक जैसे लगने पर भी एक जैसे नहीं होते हैं।

हमारी अङ्गुलियों की छाप पहचान पत्र बनवाने के समय ली जाती है।विश्व के जितने मानव है, सबकी अङ्गुलियों की छाप अलग-अलग होती है। विश्व के सभी जीवों की अलग-अलग विशेषता है। शरीर में इतनी भिन्नता है, तो भावों और विचारों में भी भिन्नता हो सकती है। 

14.5

सत्त्वं(म्) रजस्तम इति, गुणाः(फ्) प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो, देहे देहिनमव्ययम्॥14.5॥

हे महाबाहो! प्रकृति से उत्पन्न होने वाले सत्त्व, रज (और) तम – ये (तीनों) गुण अविनाशी देही (जीवात्मा) को देह में बाँध देते हैं।

विवेचन- हम सब प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं। प्रकृति के सहारे से ही जीवों का निर्माण हुआ है। यह प्रकृति तीन गुणों, तीन तत्त्वों से बनी है- सतो, रजो और तमो गुण से। सृष्टि के सम्पूर्ण जीवों, पेड़-पौधों में ये तीनों तत्त्व होते हैं।

विद्यालय में हमने विज्ञान में atom अर्थात् परमाणु के बारे में पढ़ा है। लोहे के उपकरण में लोहे का परमाणु होता है।

परमाणु (atom) के तीन मूल कण होते हैं: इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, और न्यूट्रॉन।

यहाँ प्रत्येक कण का विवरण दिया गया है:
प्रोटॉन (Proton):
यह धनात्मक (positive) आवेशित कण है जो परमाणु के नाभिक में पाया जाता है।

न्यूट्रॉन (Neutron):
यह उदासीन (neutral) कण होता है, जिसका अर्थ है कि इस पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। यह भी परमाणु के नाभिक में ही होता है।

इलेक्ट्रॉन (Electron):
यह ऋणात्मक (negative) आवेशित कण होता है जो नाभिक के चारों ओर विभिन्न ऊर्जा स्तरों या इलेक्ट्रॉन कोशों में गति करता है।

सत्त्व गुण प्रोटॉन की तरह स्थिर, शान्त रहता है। ध्यान, धारणा, श्रीभगवान् के कार्य में ही लगा रहता है। सत्त्व गुणी स्थिर, सन्देह रहित, आनन्द में रहता है। 

रजो गुणी-इलेक्ट्रॉन की घूमता ही रहता है। किसी न किसी कार्य को करता ही रहता है। 

तमो गुणी न्यूट्रॉन की तरह पड़ा रहता है। न दौड़ना है, न ध्यान लगाना है। सिर्फ़ सोना है। 

कुम्भकर्ण- तमो गुणी का अच्छा उदाहरण है। छह महीने सोना, एक दिन के लिए उठता था तो सिर्फ़ भोजन करता था। कितना खाता था ये हम सब जानते हैं। 

रावण- उसको सिर्फ़ कुछ पाना और कामना भरी हुई थी। उसके लिए सतत् प्रयास करते रहना। सीताजी के बारे में सुना तो वह चाहिए, इसलिए सीता माता का अपहरण कर लिया। कुबेर के बारे में पता चला, उसके पास सोने की लङ्का है, तो उसके पास सोने की लङ्का का क्या काम है। कुबेर से सोने की लङ्का छीन लिया। कुछ न कुछ कामना के लिए करते ही रहना. रजो गुण का सटीक उदहारण रावण है. 
विभीषण- सतो गुणी था. ध्यान-धारणा, भगवत-चिंतन करता था। तीनों भाई तीनों गुणों के प्रतीक हैं।
सतो गुणी- क्या सही क्या गलत है- विचार करता है। सही गलत के  बारे में विभीषण ने रावण को बताया भी। प्रभु राम की शरण में जाने की सलाह भी दी। विभीषण सतो गुणी था। 
रजो गुणी जानता है, अच्छा-बुरा, पर क्रियाशील रहेगा।
तमो गुणी- सिर्फ पड़े रहता है. क्रिया रहित। 
सोते तो हम सभी है। थोड़ी मात्रा में सोना आवश्यक है , रजोगुण आवश्यक है. 
सत्त्व गुण अधिक चाहिए, इन गुणों के बारे में बता इसीलिए रहे हैं, हम सभी तमोगुण से रजोगुण में जायें रज से  सत्त्व में। 

14.6

तत्र सत्त्वं(न्) निर्मलत्वात्, प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति, ज्ञानसङ्गेन चानघ॥14.6॥

हे पाप रहित अर्जुन! उन गुणों में सत्त्वगुण निर्मल (स्वच्छ) होने के कारण प्रकाशक (और) निर्विकार है। (वह) सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से (देही को) बाँधता है।

विवेचन- इस श्लोक में अर्जुन का एक ओर नाम आ गया है। 
प्रश्न- इस श्लोक में श्रीभगवान् अर्जुन को किस नाम से पुकारते हैं? 
उत्तर- अनघ 

श्रीभगवान् अर्जुन को बोलते हैं, हे अनघ! तुम निष्पाप हो। तुम्हारे मन में किसी के लिए भी गलत भावना नहीं है। सत्त्व गुण के बारे में विस्तार से इस श्लोक में बता रहे हैं। अर्जुन सत्त्व गुण की प्रतिमूर्ति है। सत्त्व गुणी का मन निर्मल होता है। बुद्धि, वाणी, सम्पूर्ण इन्द्रियों में ज्ञान का प्रकाश होता है। उनके मन में किसी भी प्रकार का संदेह नहीं होता है। 

महाभारत का युद्ध होना निश्चत हो गया था। युद्ध के पहले अर्जुन और दुर्योधन श्रीकृष्ण से कुछ माँगने की इच्छा से गये । सर्वप्रथम दुर्योधन पहुँचा। श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे। दुर्योधन अहङ्कार का प्रतीक श्रीकृष्ण के सिर की तरफ जाकर बैठ गया। अर्जुन आये। अर्जुन भक्त हैं,  विनम्र हैं, श्रीकृष्ण के चरणों के पास बैठ गये। अर्जुन श्रीभगवान् के सखा और प्रिय भी हैं। श्रीकृष्ण को अर्जुन की विनम्रता देखनी और दिखानी थी। इसलिए उन्होंने कहा- अर्जुन क्यों आये हो?  दुर्योधन ने अहङ्कार में भर कर कहा पहले मैं आया हूँ, मुझे भी कुछ माँगना है।

श्रीभगवान ने कहा, अर्जुन पर पहले मेरी दृष्टि पड़ी, इसलिए अर्जुन ही माँगेगा। कौरवों के पक्ष का प्रतिनिधित्व दुर्योधन कर रहा था, पाण्डवों के पक्ष के प्रतिनिधि अर्जुन थे। श्रीभगवान् ने कहा, मेरे पास ग्यारह अक्षौहिणी नारायणी सेना है, वो माँग ले। एक पक्ष से वो लड़ेगी और एक तरफ में स्वयं मैं रहूँगा। पर मैं युद्ध नहीं करूँगा, न ही कोई अस्त्र उठाऊँगा। अर्जुन ने बिना एक पल गँवाये श्रीकृष्ण को माँग लिया। अर्जुन ने कहा आप मेरे रथ के सारथी बनेंगे। अर्जुन पूर्ण समर्पित हो गया श्रीभगवान् के प्रति। आप मुझे जहाँ ले जायेंगे वहीं जाऊँगा। जीवन की डोर ही श्रीकृष्ण को सौंप दी। दुर्योधन सेना ही चाहता था। वो तो भयभीत था, कहीं अर्जुन सेना न माँग ले। नि:शस्त्र कृष्ण को लेकर वह क्या करेगा?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अनघ कहा। अर्जुन निष्पाप है। श्रीभगवान् का प्रिय सखा बनना चाहता है। हर पल श्रीभगवान् के पास कैसे रहूँ, ये सोच है, अर्जुन की। इस प्रकार से ज्ञान का प्रकाश सत्त्व गुणी व्यक्तियों में होता है। 

14.7

रजो रागात्मकं(म्) विद्धि, तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय, कर्मसङ्गेन देहिनम्॥14.7॥

हे कुन्तीनन्दन! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करने वाले रजोगुण को (तुम) रागस्वरूप समझो। वह कर्मों की आसक्ति से देही जीवात्मा को बाँधता है।

विवेचन- तृष्णा- अलग-अलग प्रकार की इच्छा होती है। मनुष्य के पास बहुत कुछ होने के बाद भी कुछ न कुछ इच्छा होती है। 

हमारे पास एक कम्पास का बाक्स जिसमें पेंसिल, रबर, लेखनी सब कुछ होने के बाद भी किसी अन्य बच्चे द्वारा आधुनिक बक्सा लाने पर हमारी भी वैसे ही बाक्स की इच्छा हो जाती है। बात आवश्यकता की नहीं है, अधिक की इच्छा की है। 

कहानी- एक लकड़हारा था। उसके पास एक लोहे की कुल्हाड़ी थी। उससे लकड़ी काट कर अपनी जीविका चलाता था। एक दिन वह कुल्हाड़ी पास के कुँए में गिर गयी । कुएँ की देवी ने रोते हुए लकड़हारे को सोने की कुल्हाड़ी दे दी, इस तरह सोने, चाँदी, ताम्र, लोहे की कुल्हाड़ी दे दी। काम लोहे की कुल्हाड़ी से ही होना था। पर तृष्णा के कारण सभी कुल्हाड़ियाँ ले ली। 

ये तो पुरानी कहानी हम सब ने सुनी है। ये रजो गुण का परिचायक है। ऐसे ही एक और कहानी हम सबने सुनी है। राजा विराट को धन की बहुत तृष्णा थी, उनको वरदान मिला जिसको भी वो छुयेगा, वही वस्तु सोने की हो जाएगी। लालच में महल, उसके सभी समान को छूकर सोने की बना लिया। अचानक प्रातः उनकी पुत्री उठ कर आई। पिता प्रेम में उसने पिता को गले लगा लिया। पिता ने भी बच्ची को गले लगा लिया। वह बच्ची भी सोने की हो गयी। इस कथा कहने का कारण है कि लोभ बहुत घातक होता है। 

अलग-अलग तरह की महत्त्वाकांक्षा होती है। कई लोग धनोपार्जन के लिए बाहर चले जाते हैं, वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ देते हैं। ये ठीक नहीं है। ऐसा और इतना धन कमा कर क्या होगा अगर माता-पिता के साथ आनन्द से नहीं रह सकते हैं। 

रजो गुण, सत्तों गुण के साथ ही ठीक है। किसी को कितनी कामना करनी चाहिये, ये सत्त्व गुण ही बताता है। 

14.8

तमस्त्वज्ञानजं(म्) विद्धि, मोहनं(म्) सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि:(स्), तन्निबध्नाति भारत॥14.8॥

हे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न होने वाला समझो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा देहधारियों को बाँधता है

विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् ने अर्जुन को फिर से भारत कह कर सम्बोधित किया है। हमने रजो गुण, तमो गुण के बारे में पढ़ा। स्वतः हमारे मन में भी आता है, हमारे में कौन से गुण की प्रधानता है, ये जानने की इच्छा जाग जाती है। स्वतः ही स्वतः का विश्लेषण करने लगते हैं। 

अर्जुन के मन में भी ऐसी भावना आ सकती है, इसलिए श्रीभगवान् ने पहले ही अर्जुन को कह दिया तुम तो भारत हो, तुम तो ज्ञान में ही रत होने वाले हो। भारतीय लोग तो हर पल ज्ञान की बात करने वाले होते हैं। तुम तो भारत हो। ज्ञान की बात में तो तमो गुण आता ही नहीं है। 

हे भारत! तुम्हें तो ये ज्ञान होना चाहिए कि तमो गुण के कारण सृष्टि का कार्य चलता है। हमें और सभी को सोना पड़ता ही है। सोना अर्थात् तमो गुण उतना ही जीवन में होना चाहिए, जितनी की आवश्यकता हो। 

अभी तमो गुण का स्वरूप प्रमाद, आलस्य, निद्रा हो गया है। हमें गृह कार्य विद्यालय में मिला है। हम निद्रा, आलस्य करते रहते हैं। दो घण्टे सो जाते हैं। बाद में गृहकार्य पूर्ण करूँगा। सोकर उठने के बाद खेलने चले जाते हैं। खेल कर आने के बाद माँ द्वारा बनाये हुए , स्वादिष्ट भोजन करने लगते हैं। फिर मन ही नहीं होता। बाद- बाद करते हुए गृहकार्य करते ही नहीं है। यही आलस्य और प्रमाद है। जो कार्य करना है, वह कार्य नहीं करके, अन्य कार्यो में उलझे रहते हैं। 

इसका चिन्तन हमको स्वयं के लिए भी करना चाहिए। अगर हमारे में भी आलस्य और प्रमाद हो तो उसे छोड़ने का प्रयास करना चाहिये। अपने आपको सुधारना चाहिये। श्रीभगवान् हमें इन गुणों के बारे में इसीलिए बता रहे हैं, जिससे हम स्वयं के लिए चिंतन कर सकें। 

श्रीभगवान् आगे के श्लोक में अर्जुन को बता रहे हैं कि ये तीनों गुण हमें बाँधे रखते हैं। हम भी शरीर में है, हमको भी तीनों गुणों की आवश्यकता होती है। 

सुबह उठते हैं, पढ़ाई करते हैं, भगवद नाम करते हैं, सत्त्वगुण में आ गये। 

विद्यालय गये, खेलते हैं, अच्छे अङ्क लाऊँगा, ये रजो गुण है। किन्तु यह इच्छा अच्छी है। गीता पथिक बन जाऊँगी, गीताजी के श्लोकों को याद कर लूँ, किसी की सहायता कर दूँ, तो ये रजो गुण की सत्तों गुण से मित्रता हुई। ये मित्रता हुई, इस कारण अच्छे कार्य करेंगे। रजो गुण के साथ, सत्तों गुण की मित्रता हुई तो अच्छे कार्य करेंगें। हमारे माता-पिता भी अच्छे मित्र बनाने के लिए बोलते हैं। ये सारे गुण, हमें बाँधे रखते हैं। 

14.9

सत्त्वं(म्) सुखे सञ्जयति, रजः(ख्) कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः(फ्), प्रमादे सञ्जयत्युत॥14.9॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में (और) रजोगुण कर्म में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है।

विवेचन- सत्त्व गुणी व्यक्ति हमेशा आनन्द में रहता है, अच्छे कार्य करता है। गीताजी के श्लोक पढ़ेगा, भगवद् भाव में आनन्द में रहेगा, पढ़ाई करेगा, ध्यान करेगा, लोगों की सहायता करेगा। 

रजो गुणी कर्म करने में लीन रहेगा। रजो गुणी की इच्छायें बहुत होती है। रजो गुणी को साइकिल मिल जाएगी, तो स्कूटर की इच्छा करेगा, स्कूटर मिल गया तो मोटर गाड़ी की इच्छा करेगा। 

तमो गुणी सोता ही रहेगा। 

ये सारे गुण ही हमारा नियन्त्रण करते हैं। हमें ये देखना है, हमें कौन सा गुण नियन्त्रित करता है। इस तरह से हम गुणों के बन्धन से निकल कर सत्त्व गुण में आते हैं। 

14.10

रजस्तमश्चाभिभूय, सत्त्वं(म्) भवति भारत।
रजः(स्) सत्त्वं(न्) तमश्चैव, तमः(स्) सत्त्वं(म्) रजस्तथा॥14.10॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्व गुण बढ़ता है, सत्त्व गुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण (बढ़ता है) वैसे ही सत्त्वगुण (और) रजोगुण को दबाकर तमोगुण (बढ़ता है)।

विवेचन- श्रीभगवान् कह रहे हैं,  तीनों गुणों में संघर्ष चलता रहता है। तीनों गुण हमारे जीवन में आगे आना चाहते हैं। सतो गुण में रजो गुण, तमो गुण कम होते हैं। हम रजो गुणी हैं, बहुत ठंड होने पर आलस्य में रजाई में से निकलना नहीं चाहते हैं। प्रमाद में पड़े रहते हैं। 

हमें अभ्यास से रजो गुण, तमो गुण को दबा कर सत्त्व गुण को बढ़ाना चाहिये। 

14.11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं(म्) यदा तदा विद्याद्, विवृद्धं(म्) सत्त्वमित्युत॥14.11॥

जब इस मनुष्यशरीर में सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्तःकरण) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

विवेचन- हमारे घर के भी द्वार और खिड़कियाँ होती है। वहाँ से हम बाहर का सब देख पाते हैं। वैसे ही हमारे शरीर के भी द्वार होते हैं। आँख, जिससे हम अच्छा देख पाते हैं। नाक, अच्छा सूँघ पाते हैं, कान, अच्छा सुन सकते हैं, मुख, अच्छी वाणी का उपयोग कर सकते हैं। ये सब शरीर के द्वार हैं, इस सबसे अच्छा-अच्छा देखना, बोलना, सूँघना और सुनना है। सत्व गुणी के लक्षण भी है। 

स्वामी विवेकानन्द जी की एक कथा है। स्वामीजी विदेश गये थे। शिकागो में ग्यारह सितम्बर को एक सम्मेलन में भाषण दिया था। उनके भाषण से लोगों की भारतोयों के प्रति धारणा ही बदल गयी। उन लोगों ने जाना, भारतीय बहुत ज्ञानी होते हैं। विवेकानन्दजी ने अपने भाषण के शुरू में सम्बोधन स्वरूप अंग्रेजी में ladies and gentleman नहीं कहा, वरन भाईयों और बहनों कहा। इस भाषण के बाद वहाँ पर इनका सम्मान बहुत बढ़ गया। 

एक दिन विवेकानन्द जी नदी के किनारे टहल रहे थे। नदी के ऊपर जल पर बहुत सारी वस्तुऐं तैर रही थी। जल के हिलने के कारण कोई भी वस्तु स्थिर नहीं थी। कुछ बच्चे निशाना साध रहे थे। विवेकानन्दजी बड़े ध्यान से उनको देख रहे थे। विवेकानन्दजी सफेद वस्त्रों में तेजस्वी लग रहे थे। उन्होंने अंग्रेजी में ही पूछा,
“क्या आप निशाना लगाना चाहते हैं”
स्वामीजी ने कहा प्रयास कर सकता हूँ। स्वामीजी ने इसके पहले कभी भी बन्दूक नहीं पकड़ी थी और न ही निशाना लगाने का अभ्यास था। उन्होंने एकाग्रता से निशाना साधा और निशाना सही लग गया। उन बच्चों को बड़ा आश्चर्य  हुआ। उस कथा को यहाँ कहने का कारण एक मात्र यही है कि सत्त्व गुणी व्यक्ति में एकाग्रता की वृद्धि हो जाती है। 

पहले श्लोक में श्रीभगवान् ने यही बात कही है,  
यज्ञोपवीत त्वा मुनयः सर्वे 
जिस सिद्धि और शक्ति की बात कही थी, वह यही है। जो भी कार्य जिस समय करते हैं, उस समय हमारा मन पूर्ण रूप से उसमें लग जाता है। फलस्वरूप कार्य को हम कुशलता से पूर्ण कर पाते हैं। एकाग्रता की वृद्धि हो जाती है।

श्रीभगवान् से हम प्रार्थना करेंगे कि हमारे जीवन में तीनों गुणों का सन्तुलन बना रहे और सत्त्व गुण की वृद्धि हो। हम अधिक से अधिक गीताजी का अध्ययन करे, उसके श्लोकों को कण्ठस्थ करे, अच्छे कार्य करें। हमको सद्गुण प्रदान करें। सीधे बैठ कर, श्रीभगवान् की वात्सल्यमयी छवि का ध्यान करते हुए, हरि नाम संकीर्तन से विवेचन सम्पन्न हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र

प्रश्नकर्ता-
रेयांश भैया
प्रश्न- इस चौदहवें अध्याय का अर्थ क्या है?
उत्तर- इस अध्याय के नाम गुणत्रय विभाग में ही इसका अर्थ छुपा हुआ है, इस अध्याय में तीनों गुण सत्त्व रजो और तमोगुण के विषय में बताया गया है।


प्रश्न
- पहले वाले अध्याय की परीक्षा नहीं दे पाई थी, फिर से दे सकते हैं क्या?
उत्तर- गीता गुंजन परीक्षा आप हर महीने निश्चित किये गये दिन दे सकती हैं। यह परीक्षा बारहवें पन्द्रहवें एवम् सोलहवें अध्याय को कण्ठस्थ करके दी जाती है।

प्रश्नकर्ता- वृत्ति दीदी
प्रश्न- हम अपने को और अच्छा कैसे बना सकते हैं? कोई दूसरा जब हमें विचलित कर रहा है तो क्या करें?
उत्तर- और अच्छा बनने के लिये हमें छोटी-छोटी चीज़ों का ध्यान रखना चाहिये। हर दिन कुछ न कुछ पढ़ना चाहिये, गीता जी के दो अध्याय तो कम से कम पढ़ना चाहिए। घर का बना भोजन करना चाहिये। शिवा जी महाराज या अम्बेडकर जी या अन्य महापुरुष अपनी छोटी छोटी बुराइयों को छोड़ते हुये एवम् अच्छी आदतों को अपनाते हुए ही महान बने।
जब हम अपना ध्यान अध्ययन की ओर एवम् गीता जी का नियमित अध्ययन करने से हमारी बुद्धि एकाग्र होती है और हमें अपने रास्ते से हटा नहीं सकता। संजय भैया ने अपने विद्यालय में एक प्रयोग किया था, जिससे सिद्ध हुआ कि गीता जी पढ़ने के बाद ध्यान अधिक लगा।