विवेचन सारांश
सत्व, रज एवं तम तीन गुणों का जीव पर प्रभाव

ID: 7858
Hindi - हिन्दी
शनिवार, 13 सितंबर 2025
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
2/2 (श्लोक 12-27)
विवेचक: गीता व्रती जाह्णवी जी देखणे


श्रीमधुराष्टकम्, देशभक्ति गीत, हनुमान चालीसा पाठ, परम्परागत दीप प्रज्वलन, गुरु वन्दना एवं श्रीकृष्ण वन्दना से सत्र का शुभारम्भ हुआ।

बालसाधकों के लिए विशेष सत्र है अत: संवाद रूप में है। मध्य में प्रश्नोत्तर किये गये। इसके पहले सोलहवें और नवें अध्याय का विवेचन हो गया है। आज चौदहवें अध्याय के उत्तरार्द्ध के  विवेचन का शुभारम्भ हुआ। इस अध्याय का नाम है, “गुणत्रयविभागयोग”।

विवेचन के प्रारम्भ में साधकों को पिछले सप्ताह के विवेचन की संक्षिप्त जानकारी देते हुए प्रश्न पूछा गया।

प्रश्न- भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का नाम क्या है?
उत्तर- अर्जुनविषादयोग

प्रश्न- 
चतुर्दश अध्याय का नाम बताइए।
उत्तर- गुणत्रयविभागयोग 

साधकों को बताया गया कि अध्याय के नाम में ही अध्याय का भावार्थ छिपा है। गुण त्रय- पिछली बार इसका अर्थ साधकों को बताया गया था। यहाँ साधकों से प्रश्न पूछा गया। 
प्रश्न- गुण त्रय का तात्पर्य क्या है?
उत्तर- इस अध्याय में तीन गुणों के बारे में बतलाया गया है। 

प्रश्न-
ये तीन गुण कौन कौन से हैं?
उत्तर- सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण।

विवेचन को आगे बढ़ाते हुए बताया गया कि हम लोग सदैव कुछ न कुछ कार्य कर रहे होते हैं। हम कुछ भी नहीं कर रहे हों ऐसा होता नहीं है।
या तो हम सुन रहे होते हैं, या सो रहे होते हैं या सोने की क्रिया कर रहे होते हैं, बेठे हैं तो बैठने की क्रिया कर रहे होते हैं, ध्यान में हैं तो ध्यान की क्रिया कर रहे होते हैं।

हमारा हृदय हर पल धड़कता रहता है, अर्थात् हम हर पल कुछ न कुछ तो कर ही रहे होते हैं। हम हर पल, हर क्षण हर दिन, पूरे जीवन में सदैव कुछ न कुछ कर ही रहे होते हैं तो हमें यह जानना चाहिए कि वे कौन से तत्त्व हैं जिनकी वजह से हम अलग-अलग तरह के कार्य कर रहे होते हैं।
ये तीन गुण ही है जिनकी हमने सत्र के शुरुआत में चर्चा की है। ये तीन कारण हैं- सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण।

हमारे सभी कार्य इन तीन गुणों के कारण ही होते हैं। हम सवेरे उठते हैं, प्रसन्नता से उठते हैं, फिर सोचते हैं श्रीभगवान् की पूजा करेंगे, फिर स्कूल जाएँगे तो यह जो श्रीभगवान् की पूजा करने का विचार है- यह सतोगुण से होता है। फिर स्कूल में जाकर अच्छे से पढ़ेगे, यह रजोगुण के कारण होता है। स्कूल से आने के बाद हम थकान महसूस करते हैं, आराम की इच्छा होती है, यह तमोगुण के कारण है।

ये तीन गुण हमारे जीवन में इतनी भूमिका निभाते हैं कि उनके बारे में हम सभी को जानना ही चाहिए। श्रीभगवान् ने इन तीनों गुणों को हमें अच्छे से समझाने के लिए ही इस अध्याय के माध्यम से बताया है कि ये तीन गुण क्या होते हैं। क्या इन्हें नियन्त्रित किया जा सकता है? 

श्रीभगवान् कहते हैं कि हाँ! इन्हें नियन्त्रित करना सम्भव है। श्रीभगवान् इस अध्याय के अन्त में हमें ये सारी बातें समझायेंगे।

सतोगुण से हमें सदैव अच्छा करने की इच्छा होती है। रजोगुण कभी-कभी गलत प्रभाव भी दे देता है, जैसे हम कभी किसी के जन्म दिवस समारोह में जाते हैं, वहाँ सभी बच्चे नए-नए परिधान में आते हैं तो रजोगुण आपको आपसे अधिक अच्छे परिधान की तरफ आकर्षित करता है और आपके मन में विचार आता है कि ऐसा ही परिधान मुझे भी चाहिए जबकि आपके पास पहले से ही बहुत से परिधान हैं। यह विचार रजोगुण कहलाता है जो बिना आवश्यकता ही आपको नए परिधान लाने का विचार देता है।


14.12

लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

 विवेचन- पिछले सत्र के विवेचन में सतोगुण पर चर्चा की गई। आज रजोगुण पर बात करेंगे। रजोगुण लोभ उत्पन्न करता है।

प्रश्न- इस अध्याय में श्रीभगवान् ने अर्जुन को किस नाम से सम्बोधित किया है?
उत्तर- भरतर्षभ
 
भरत का मतलब है भारत वंश में। ऋषभ का तात्पर्य है, अत्यन्त ताकतवर। ऋषभ का अर्थ है बैल। बैल बहुत ताकतवर होता है। 

श्रीभगवान् यहाँ अर्जुन के बल (ताकत) की प्रशंसा करते हैं और कहते हैं कि रजोगुण से लोभ की वृद्धि होती है, सत्त्वगुण से ज्ञान की वृद्धि होती है। आगे जानते हैं कि तमोगुण की वृद्धि में क्या होता है?

14.13

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥

हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह – ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।

 विवेचन- श्लोक के पठन के बाद बच्चों से पूछा गया-
प्रश्न- इस श्लोक में श्रीभगवान् ने अर्जुन को किस नाम से सम्बोधित किया है? 
उत्तर- कुरुनन्दन 

श्रीभगवान् यहाँ बतलाते हैं कि तमोगुण के प्रभाव से ज्ञान की कमी होती है। जीव हर पल भ्रमित रहता है। उसका प्रमाद बढ़ता है, कार्य करने के प्रति अनिच्छा रहती है, उदाहरणार्थ जैसे बालकों में होमवर्क, जो स्कूल से दिया जाता है, उसे न करने की इच्छा होना, पढ़ाई में मन नहीं लगना आदि। इसको प्रमाद कहते हैं। प्रमाद में जीव का व्यर्थ की चेष्टाओं में प्रवाह रहता है। ये बातें श्रीभगवान् अर्जुन के माध्यम से हमें समझा रहे हैं।

अर्जुन तो महा ज्ञानी हैं, विद्वान हैं, उनको ये सारी बातें बताने की जरूरत नहीं है। श्रीभगवान् ने उनको माध्यम बनाकर यह हमारे लिए ही बतलाया है।

14.14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है (तो वह) उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।

 विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं, मान लें कि मृत्यु का समय नजदीक आ गया और मन में सद्गुण विचार हैं, जैसे भगवत् चिन्तन, विश्व के कल्याण के विचार, जीव दया, गरीबों की मदद, ये सब सद्गुणी विचार हैं तो उस जीव को मरणोपरान्त उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है- जैसे वैकुण्ठ लोक, स्वर्ग लोक, कैलाश लोक। 
 
यह तो मृत्यु समय की बात हुई पर यदि जीवन में भी हम इन गुणों (सतोगुणों) का पालन करें तो हम हमारे आसपास के वातावरण को आनन्दित कर सकते हैं, अच्छा बना सकते हैं। 

यहाँ बालकों को भक्त प्रह्लाद की शिक्षाप्रद कहानी सुनाई गई, जिसमें बताया गया कि भक्त प्रह्लाद सदैव भगवत् चिन्तन करते थे, परन्तु उनके पिता हिरणाकश्यप को यह सब पसन्द नहीं था। वह राक्षसी एवं क्रूर प्रवृत्ति के थे। वह हरदम भक्त प्रह्लाद को यातनाएँ देते थे, लेकिन भक्त प्रह्लाद अपने पिता से सदैव यही कहते थे कि पिताजी आप चाहें मुझे कितनी भी यातनाएँ दें, पर मुझे मेरे भगवान् पर पूरा भरोसा है कि वे सदैव मेरी रक्षा करेंगे। यह सब भक्त प्रह्लाद में सतोगुणों की प्रबलता का ही परिणाम था।

14.15

रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥

रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

 विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि रजोगुणी व्यक्ति को हर पल कुछ न कुछ लालसाएँ व इच्छाएँ रहती हैं। व्यक्ति के पास जो है उससे अधिक पाने की इच्छा को लालसा कहते हैं। रजोगुणी व्यक्ति के पास गाड़ी है तो उसे बङ्गले की इच्छा होती है, बङ्गला मिल जाए तो और बड़ा बङ्गला मिल जाए ऐसी इच्छा रहती है। यह सब रजोगुण के प्रभाव के कारण होता है।

रावण भी ऐसी ही वृत्ति (रजोगुणों) के प्रभाव में था। रावण बलशाली था, बुद्धिमान था, भगवान शिव का परम भक्त था, बहुत बड़े साम्राज्य का मालिक था, संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान था, शिव ताण्डव स्त्रोत का रचयिता था परन्तु उसमें रजोगुण बहुत अधिक था। इसी कारण से उसे हर पल कोई न कोई कामना रहती थी। स्वर्ण की लङ्का का स्वामी कुबेर था पर रावण को इसकी कामना हो गई तो वह कुबेर से लूट कर स्वर्ण की लङ्का का स्वामी बन गया।

विवेचन में बालकों को बताया गया कि रजोगुण के प्रभाव में बालक पढ़ाई अच्छी तरह से नहीं कर पाऐंगें। पढ़ाई क्या, कोई भी कार्य ठीक से नहीं कर पाऐंगें, क्योंकि मन तो इधर-उधर दौड़ रहा है, भटक रहा है। 
 
श्रीभगवान् कहते हैं कि हमें हमारे रजोगुणों को नियन्त्रित रखना चाहिए ताकि जीवन में सुख शान्ति बनी रहे।

आगे श्रीभगवान् कहते हैं कि तमोगुण के प्रभाव से हमारे सारे निर्णय गलत होते जाते हैं क्योंकि तमोगुण अज्ञान का ही प्रतीक है। तमोगुणों के प्रभाव में आए व्यक्ति को अगले जन्म में मूढ़ योनि प्राप्त होती है।
 
बाल साधकों को इस बात को अच्छे से समझाने के लिए पूछा गया कि यदि आपके सामने एक ही समय में दो विकल्प रखे जाए, जिसमें पहला विकल्प टेलीविजन पर एक प्रसिद्ध चलचित्र देखने का हो और दूसरे विकल्प में ठीक उसी समय गीता जी का विवेचन हो रहा हो तो आप कौन सा विकल्प चुनेंगे? आप उस वक्त जिन गुणों के प्रभाव में होंगे वह गुण आपकी निर्णायक क्षमता को प्रभावित करेगा। सतोगुण के प्रभाव वाला बालक गीता जी के विवेचन को सुनने का निर्णय लेगा।

श्रीभगवान् कहते हैं कि आप मनुष्य योनि में होने के बाद भी यदि तमोगुण के प्रभाव में हैं तो अगले जन्म में मूढ़ योनि प्राप्त होगी। मूढ़ योनि जैसे कि कीट-पतङ्ग आदि‌।

अगले श्लोक में श्रीभगवान् बतलाते हैं कि इन तीनों गुणों के प्रभाव से और क्या होगा?

14.16

कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥

विवेकी पुरुषों ने – शुभ कर्म का तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख (कहा है और) तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

 विवेचन- श्रीभगवान् यहाँ बता रहे हैं कि इन तीन गुणों का फल कैसा होता है?

सात्त्विक कर्म का फल निर्मल होता है, प्रसन्नता देता है। 
विवेचन में बताया गया कि श्रीभगवान् भी ऐसे ही थे। वे जब मुरली बजाते थे तो वहाँ सभी जीव, जैसे मोर, हिरण, गौ माता, उनके छोटे-छोटे बछड़े वे सभी भगवान् कृष्ण के आसपास खेलते थे क्योंकि श्रीभगवान् में सतोगुण था। उनसे सभी आनन्दित होते थे। 

बाल साधकों को बताया गया कि पढ़ाई के लिए हमें अधिकाधिक सतोगुणी होना आवश्यक है ताकि हमारा मन निर्मल रहे। ऐसा होने पर हमें सब अच्छी तरह से याद हो जाता है। 

यहाँ श्रीभगवान् ने रजोगुण के प्रभाव भी बताये हैं। रजोगुण वाला व्यक्ति सदैव दुःखी रहता है क्योंकि वह हरदम किसी न किसी लालसा की पूर्ति में लगा होता है। ऐसे व्यक्ति का ध्यान भटका रहता है और उसमें एकाग्रता नहीं रहती। 

समझाने के लिए बालकों को बताया गया, मान लें कि आप विवेचन में बैठे तो हैं, सुन तो रहे हैं मगर ध्यान कहीं और भटक रहा है तो आपको ध्यान ही नहीं रहेगा कि विवेचन में क्या बताया गया है। पढ़ते समय यदि आपका ध्यान इधर-उधर भटक रहा है तो परीक्षा में आपको अच्छे अङ्क प्राप्त नहीं होंगे। परिणामस्वरूप आपको दुःख ही प्राप्त होगा।

यहाँ श्रीभगवान् हमें कहते हैं कि व्यक्ति को सतोगुण में ही ज्यादा रहना चाहिए। तमोगुण वाला व्यक्ति सदैव आलस्य में पड़ा रहता है इसलिए वह सदैव अज्ञानी ही बना रहता है।

14.17

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥

सत्त्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं।

 विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् कहते हैं कि सतोगुण से ज्ञान की वृद्धि होती है। रजोगुण से लोभ की वृद्धि होती है और तमोगुण से प्रमाद और लोभ की वृद्धि होती है जिससे अज्ञान बढ़ता है।

14.18

ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥

सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं (और) निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।

 विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् बताते हैं कि जब हम सत्त्वगुण में रहते हैं तो जीवन में प्रगति होती है, निर्मल लोकों की प्राप्ति होती है। 

सत्त्वगुणी बालक पढ़ाई अच्छी तरह से कर पाएँगे, सारे कार्य अच्छी तरह कर पाएँगे। सतोगुण होने पर कम समय में अपना पढ़ाई का कार्य जल्दी पूरा कर पाएँगे। इससे समय बचेगा और बालकों को अन्यान्य गतिविधियों जैसे नृत्य, चित्रकला आदि के लिए समय मिल जाएगा।

रजोगुणी व्यक्ति जितना आवश्यक है उतना ही कार्य करेंगे। ये मध्यम श्रेणी के होते हैं।

तमोगुणी व्यक्ति अधोगति अर्थात् नीचे की योनि को प्राप्त होते हैं। उनकी कभी प्रगति नहीं होती है।

बालकों को बताया गया कि जैसे हमने गीताजी के इतने अध्याय पढ़े हैं मगर उनको वापस वापस नहीं पढ़ा तो क्या हम उनको सदैव याद रख पाएँगे? नहीं! हम भूल जाएँगे, अतः हमें पढ़ाई करते समय भी सदैव अपने विषय का पुनः-पुनः अध्ययन करते रहना चाहिए। 

बालकों को बताया गया कि हमें नियमित रूप से गीता जी के किसी ने किसी अध्याय का पठन करते रहना चाहिए, इससे सत्त्वगुणों की वृद्धि होगी। यहाँ सभी बच्चों ने विश्वास दिलाया कि वे सदैव गीताजी का पठन करते रहेंगे।

14.19

नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥

जब विवेकी (विचार कुशल) मनुष्य तीनों गुणों के (सिवाय) अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और (अपने को) गुणों से पर अनुभव करता है, (तब) वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

 विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि इस प्रकार से जो भी व्यक्ति इन गुणों को समझ लेता है, वह धीरे-धीरे इन गुणों को नियन्त्रित कर मुझे ही प्राप्त होता है। मेरी ही तरह बन जाता है। जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि भिन्न-भिन्न इन तीनों गुणों का कैसा प्रभाव होता है, तो वह व्यक्ति मेरे ही स्वभाव को प्राप्त कर लेता है।
 
व्यक्ति तीनों गुणों से अतीत होकर जन्म-मृत्यु के समस्त दु:खों से मुक्त होकर अमृत-तत्त्व का पान करता है। यहाँ अर्जुन प्रश्न करते हैं। क्या प्रश्न करते हैं यह हम अगले श्लोक में जानेंगे।

14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुःखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है।

 विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् बता रहे हैं कि इन तीन गुणों से भी आगे जाना सम्भव है। सत्त्वगुणों से आगे जाने का अर्थ है, अहङ्कार का त्याग। अहङ्कार का न होना।

मनुष्य का स्वभाव होता है कि उसे जो प्राप्त हो जाता है, जो ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, उसका अहङ्कार हो जाता है और जो इस पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह तीन गुणों से आगे बढ़ जाता है। वह अपने आप को, अपने प्राप्त ज्ञान को भगवत् कृपा मानता है, उसका अहङ्कार नहीं करता है। इसे ही गुणातीत होना कहते हैं।

14.21

अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥

अर्जुन बोले – हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से (युक्त) होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?

 विवेचन- यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण श्लोक है, इसमें अर्जुन श्रीभगवान् से प्रश्न करते हैं कि क्या ऐसे लोगों को जो तीनों गुणों पर नियन्त्रण पा लेते हैं, उनको पहचाना जा सकता है? क्या उनके आचार-विचार-व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है?

अर्जुन श्रीभगवान् से पूछते हैं कि क्या इन तीनों गुणों पर नियन्त्रण पाया जा सकता है?

अगले श्लोक में श्रीभगवान् ने इसी प्रश्न का उत्तर दिया है।

14.22

श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥

श्री भगवान बोले – हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृति तथा मोह – (ये सभी) अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी (गुणातीत मनुष्य) इनसे द्वेष नहीं करता और (ये सभी) निवृत्त हो जायँ तो (इनकी) इच्छा नहीं करता।

 विवेचन-
प्रश्न- श्रीभगवान् ने अर्जुन को यहाँ किस नाम से सम्बोधित किया है। 
उत्तर- पाण्डव। (क्योंकि अर्जुन पाण्डव हैं ) 

गुणातीत अर्थात् तीन गुणों से ऊपर उठा व्यक्ति मानता है कि मैं कुछ नहीं करता, जो कुछ हो रहा है वह श्रीभगवान् स्वयं कर रहे हैं।

इसी सन्दर्भ में आदि शङ्कराचार्य जी का शिवोहम् सुनाया जाता है जिसमें शङ्कराचार्य जी अपने परिचय में कहते हैं- शिवोहम् शिवोहम्।

यहाँ बालकों को एक कथा सुनाई गई। कथानुसार एक बार भगवान् श्रीकृष्ण एक पेड़ के नीचे बैठे थे, लीला कर रहे थे, बाँसुरी बजा रहे थे, उनके साथ गोपियाँ भी वहाँ बैठी थी। वहाँ वार्तालाप में श्रीभगवान् बोलते हैं कि मैंने तो जीवन में कभी भी किसी स्त्री का दर्शन ही नहीं किया है तो गोपियाँ आश्चर्यचकित होकर सोचती हैं कि श्रीभगवान् ऐसा कैसे कह सकते हैं? अरे! हमारे साथ ये नित्य रहते हैं, क्रीड़ा करते हैं, फिर यह कैसे ऐसा कह सकते हैं?

गोपियाँ कहती हैं, कन्हैया! नित्य तो तुम हमारे साथ रहते हो तो कृष्ण कहते हैं कि मैं सत्य बोल रहा हूँ।

कुछ दिन बाद यमुना नदी के तट के पार दुर्वासा ऋषि का आगमन होता है। दुर्वासा ऋषि अत्यन्त क्रोधी थे मगर प्रखर ज्ञानी थे इसलिए सब उनका बहुत आदर करते थे। गोपियों के मन में उनके दर्शन की अभिलाषा होती है, वे श्रीकृष्ण से उनके दर्शन के लिए जाने का मन्तव्य बतलाती हैं तो श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह तो अति उत्तम विचार है पर साथ में यह कहा कि जब आप लोग उनके दर्शन हेतु जा ही रहीं हैं तो उनके लिए व्यञ्जन भोग जरूर लेकर जाना। 

यहाँ शास्त्रों में ऐसा उल्लेख आता है कि दुर्वासा मुनि केवल दुर्वांङ्कुर का सेवन करते हैं। अब गोपियाँ असमञ्जस में हैं कि श्रीकृष्ण तो उनके लिए भोग ले जाने के लिए कह रहे हैं, उधर दुर्वासा मुनि तो केवल दूर्वाङ्कुर का ही सेवन करते हैं, पर भगवान् कृष्ण गोपियों को पुनः कहते हैं कि मैं कह रहा हूँ कि उनके लिए व्यञ्जन लेकर जाइए। गोपियों ने ऐसा ही किया। 

जब गोपियाँ दुर्वासा मुनि के दर्शन करने जा रही थीं, तब यमुना तट पर पानी का बहाव बहुत तेज था, उसे पार कर पाना सम्भव नहीं था इसलिए गोपियाँ वापस लौट आईं और कन्हैया से सारी बात कही। कन्हैया ने कहा कि आप यमुना नदी के पास पुनः जाइए और यमुना नदी से कहें कि यदि हमारे कन्हैया ने कभी भी किसी स्त्री का दर्शन नहीं किया हो तो हमें जाने का मार्ग दे दें।

गोपियों ने यमुना जी से यही सब कुछ कहा तो यमुना जी ने उन्हें जाने का मार्ग दे दिया। गोपियाँ अत्यन्त विस्मित हो गईं। वे दूसरे तट पर दुर्वासा ऋषि के पास पहुँच गईं, उनके दर्शन किए और उनको व्यञ्जन प्रस्तुत कर दिए। दुर्वासा मुनि ने उनका सेवन कर लिया। 

गोपियाँ पुन: लौटी तो रास्ते में फिर यमुना नदी में पानी का तेज बहाव था। वे फिर दुर्वासा मुनि के पास लौटी और कहा कि यमुना को कैसे पार करें, वहाँ पानी का बहुत तेज बहाव है। दुर्वासा मुनि ने कहा, यमुना मैया से कहना कि यदि दुर्वासा मुनि ने कभी भी दूर्वांकुर के अतिरिक्त कुछ भी सेवन नहीं किया हो तो यमुना मैया! हमें जाने का मार्ग दे दीजिए।
गोपियों ने ऐसा ही किया और यमुना मैया ने उन गोपियों को जाने का मार्ग दे दिया।
 
यहाँ गुणातीत होने का गूढ़ार्थ इस कहानी में छिपा है। गुणातीत अर्थात् तीनों गुणों से ऊपर उठना। यहाँ बालकों को बताया गया कि हमें इस तरह कुछ भी सेवन करने के लिए उद्यत नहीं होना चाहिए। हम गुणातीत नहीं हैं। भगवान् शङ्कर को शिवरात्रि के दिन अनेक ऐसे भोग लगाए जाते हैं जिन्हें हम ग्रहण नहीं कर सकते। उन्हें हमें ग्रहण करना भी नहीं चाहिए, क्योंकि हम गुणातीत नहीं हैं।

14.23

उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥

जो उदासीन की तरह स्थित है (और) (जो) गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता (तथा) गुण ही (गुणों में) बरत रहे हैं – इस भाव से जो (अपने स्वरूप में ही) स्थित रहता है (और स्वयं कोई भी) चेष्टा नहीं करता।

 

14.24

समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥

जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम (तथा) अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है, जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है। जो अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है (और) जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। (14.24-14.25)

 

14.25

मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥

विवेचन- यहाँ तीन श्लोकों का एक साथ विवेचन किया गया है। इन तीनों श्लोकों में श्रीभगवान् ने गुणातीत होने के लक्षणों का वर्णन किया है। 

गुणातीत व्यक्ति अपने मार्ग पर डटे रहते हैं, विचलित नहीं होते हैं। सुख-दु:ख हर परिस्थिति में उनका व्यवहार स्थिर रहता है। सभी पदार्थों में समान भाव रहता है। निन्दा और स्तुति में भी समान भाव वाला व्यवहार रहता है। मान-अपमान में भी सम रहते हैं, ऐसे व्यक्ति को गुणातीत कहा जाता है।

14.26

मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है।

 विवेचन- गुणातीत व्यक्ति को ब्रह्म की अर्थात् श्रीभगवान् की प्राप्ति होती है। वह सदैव भक्ति में लीन रहता है। भगवत् प्राप्ति के लिए घर छोड़ना जरूरी नहीं है। श्रीभगवान् कहते हैं कि जो भी कार्य करो पूर्ण श्रद्धा से करो। यदि गृहस्थ हैं तो गृहस्थ धर्म का पालन करो, विद्यार्थी हैं तो पढ़ाई एकाग्रता से करो, यदि आप माता-पिता हैं तो माता-पिता के कर्त्तव्य अच्छे से निर्वाह करो। निष्कर्ष स्वरूप यह है कि हम जो भी कार्य कर रहे हैं, उसे पूर्ण लगन व निष्ठा से, प्रभु को समर्पित करते हुए करें। 

बालकों को बताया गया कि सद्गुणों की वृद्धि के लिए उन्हें गीताजी के कम से कम दो अध्यायों का पठन नित्य करना ही चाहिए। संस्कृत के श्लोक के अध्ययन से हमारी एकाग्रता बढ़ती है।

14.27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥

क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी अमृत का तथा शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं (ही हूँ)।

 विवेचन- यह इस अध्याय का अन्तिम श्लोक है। 
श्रीभगवान् कहते हैं, हे अर्जुन! गुणातीत व्यक्ति मुझको ही प्राप्त होता है।
यहाँ बालकों को बताया गया कि सद्गुणों के प्रभाव से श्रीभगवान् हमारे अच्छे दोस्त बन जाते हैं, अतः हमें आलस्य को त्यागना है, रजोगुण से सतो गुणों की ओर बढ़ना है। इसके लिए हमें सङ्कल्प लेना होगा कि हम सदैव अच्छा ही कार्य करेंगे, माता-पिता व गुरुजनों का सम्मान करेंगे।

हरि नाम संकीर्तन के साथ पुष्पिका का पठन किया गया। इसी के साथ विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।

प्रश्नोत्तर सत्र

प्रश्नकर्ता- धनुष्या दीदी

प्रश्न- श्रीभगवान् अर्जुन को अलग अलग नामों से क्यों बुलाते हैं? अर्जुन ने श्रीभगवान् की ग्यारहवें अध्याय में प्रशंसा की तो श्रीभगवान् ने क्या कहा?

उत्तर- श्रीभगवान अर्जुन से बहुत प्रेम करते थे, हम सब को भी माता-पिता, भाई-बहन प्यार से अलग-अलग नाम से बुलाते हैं। श्रीभगवान भी उसी तरह से अर्जुन को विभिन्न नामों से बुलाते थे।

श्रीभगवान् ने तो अर्जुन को अपना विश्वरूप ही दिखा दिया। उन्होंने उसका पूरा उत्तर बारहवें अध्याय में बताया और भक्ति के मार्ग बताये।

प्रश्नकर्ता- शरयू दीदी

प्रश्न- जब श्रीभगवान् अर्जुन को उपदेश दे रहे थे, तो बाकी सेना क्या युद्ध कर रही थी?

उत्तर- श्रीभगवान् ने जब अर्जुन को उपदेश दिया तब युद्ध शुरू ही नहीं हुआ था। श्रीभगवान् ने अर्जुन को टहलते हुये ही पैन्तालीस मिनट में सम्पूर्ण गीता का उपदेश दे दिया। बाद में लेखन के समय हम लोगों को समझाने के लिये श्री वेदव्यास जी ने अट्ठारह अध्यायों में लिखा।

प्रश्नकर्ता- वृत्ति दीदी

प्रश्न- जब सबको दिव्य दृष्टि प्राप्त थी तो युद्ध रोकने की कोशिश क्यों नहीं हुई?

उत्तर- भगवान वेदव्यास जी को दिव्य दृष्टि थी और युद्ध रोकने के भी अनेक प्रयास किये गये, अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयम् शान्ति वार्ता करने के लिये गये। वहाँ जाकर उन्होंने कौरवों से कहा कि यदि आप पाँच गाँव भी पाण्डवों को दे दें तो युद्ध नहीं होगा। किन्तु दुर्योधन ने अहङ्कार से कहा कि वे सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं देंगे। उसके बाद ही युद्ध हुआ।


प्रश्नकर्ता- अर्पित भैया

प्रश्न- श्रीकृष्ण एवम् अर्जुन संवाद (सम्पूर्ण गीता) मात्र पैन्तालीस मिनट में कैसे पूर्ण हो गया?

उत्तर- हाँ- यह संवाद पैन्तालीस मिनट का ही था, हमारे स्वामी जी श्रीगोविन्द देव गिरि जी महाराज जब विद्यार्थी जीवन में गीता जी का पठन करते थे, तो वे भी पैन्तालीस-पचास मिनट में ही पूरा पाठ कर लेते थे। उन्होंने किसी प्रश्न के उत्तर में यह बताया था।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘गुणत्रयविभागयोग’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।