विवेचन सारांश
सत्व, रज एवं तम तीन गुणों का जीव पर प्रभाव
प्रश्न- चतुर्दश अध्याय का नाम बताइए।
प्रश्न- ये तीन गुण कौन कौन से हैं?
14.12
लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥
अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥
रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥
कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥
सात्त्विक कर्म का फल निर्मल होता है, प्रसन्नता देता है।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥
ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥
सत्त्वगुणी बालक पढ़ाई अच्छी तरह से कर पाएँगे, सारे कार्य अच्छी तरह कर पाएँगे। सतोगुण होने पर कम समय में अपना पढ़ाई का कार्य जल्दी पूरा कर पाएँगे। इससे समय बचेगा और बालकों को अन्यान्य गतिविधियों जैसे नृत्य, चित्रकला आदि के लिए समय मिल जाएगा।
रजोगुणी व्यक्ति जितना आवश्यक है उतना ही कार्य करेंगे। ये मध्यम श्रेणी के होते हैं।
नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥
गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥
अर्जुन श्रीभगवान् से पूछते हैं कि क्या इन तीनों गुणों पर नियन्त्रण पाया जा सकता है?
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥
प्रश्न- श्रीभगवान् ने अर्जुन को यहाँ किस नाम से सम्बोधित किया है।
उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥
समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥
मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥
गुणातीत व्यक्ति अपने मार्ग पर डटे रहते हैं, विचलित नहीं होते हैं। सुख-दु:ख हर परिस्थिति में उनका व्यवहार स्थिर रहता है। सभी पदार्थों में समान भाव रहता है। निन्दा और स्तुति में भी समान भाव वाला व्यवहार रहता है। मान-अपमान में भी सम रहते हैं, ऐसे व्यक्ति को गुणातीत कहा जाता है।
मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥
बालकों को बताया गया कि सद्गुणों की वृद्धि के लिए उन्हें गीताजी के कम से कम दो अध्यायों का पठन नित्य करना ही चाहिए। संस्कृत के श्लोक के अध्ययन से हमारी एकाग्रता बढ़ती है।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- धनुष्या दीदी
प्रश्न- श्रीभगवान् अर्जुन को अलग अलग नामों से क्यों बुलाते हैं? अर्जुन ने श्रीभगवान् की ग्यारहवें अध्याय में प्रशंसा की तो श्रीभगवान् ने क्या कहा?
उत्तर- श्रीभगवान अर्जुन से बहुत प्रेम करते थे, हम सब को भी माता-पिता, भाई-बहन प्यार से अलग-अलग नाम से बुलाते हैं। श्रीभगवान भी उसी तरह से अर्जुन को विभिन्न नामों से बुलाते थे।
श्रीभगवान् ने तो अर्जुन को अपना विश्वरूप ही दिखा दिया। उन्होंने उसका पूरा उत्तर बारहवें अध्याय में बताया और भक्ति के मार्ग बताये।
प्रश्नकर्ता- शरयू दीदी
प्रश्न- जब श्रीभगवान् अर्जुन को उपदेश दे रहे थे, तो बाकी सेना क्या युद्ध कर रही थी?
उत्तर- श्रीभगवान् ने जब अर्जुन को उपदेश दिया तब युद्ध शुरू ही नहीं हुआ था। श्रीभगवान् ने अर्जुन को टहलते हुये ही पैन्तालीस मिनट में सम्पूर्ण गीता का उपदेश दे दिया। बाद में लेखन के समय हम लोगों को समझाने के लिये श्री वेदव्यास जी ने अट्ठारह अध्यायों में लिखा।
प्रश्नकर्ता- वृत्ति दीदी
प्रश्न- जब सबको दिव्य दृष्टि प्राप्त थी तो युद्ध रोकने की कोशिश क्यों नहीं हुई?
उत्तर- भगवान वेदव्यास जी को दिव्य दृष्टि थी और युद्ध रोकने के भी अनेक प्रयास किये गये, अन्त में भगवान् श्रीकृष्ण स्वयम् शान्ति वार्ता करने के लिये गये। वहाँ जाकर उन्होंने कौरवों से कहा कि यदि आप पाँच गाँव भी पाण्डवों को दे दें तो युद्ध नहीं होगा। किन्तु दुर्योधन ने अहङ्कार से कहा कि वे सुई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं देंगे। उसके बाद ही युद्ध हुआ।
प्रश्नकर्ता- अर्पित भैया
प्रश्न- श्रीकृष्ण एवम् अर्जुन संवाद (सम्पूर्ण गीता) मात्र पैन्तालीस मिनट में कैसे पूर्ण हो गया?
उत्तर- हाँ- यह संवाद पैन्तालीस मिनट का ही था, हमारे स्वामी जी श्रीगोविन्द देव गिरि जी महाराज जब विद्यार्थी जीवन में गीता जी का पठन करते थे, तो वे भी पैन्तालीस-पचास मिनट में ही पूरा पाठ कर लेते थे। उन्होंने किसी प्रश्न के उत्तर में यह बताया था।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।