विवेचन सारांश
संसारी से संन्यासी बनने का प्रवास
"मुझे तो कुछ अपना कार्य करना नहीं है। मैं योद्धा हूँ।"
अर्जुन उस समय के सबसे श्रेष्ठ योद्धा थे, किन्तु उन्होंने कह दिया कि मुझे संन्यास लेना है, मुझे यह युद्ध नहीं करना है। वे अपने सारे शस्त्र डाल कर बैठ गये।
"हे भगवन् आप कह रहे हैं कि ज्ञान महान है तो मुझे संन्यास लेना है।"
इस पर श्रीकृष्ण जी कहते है, "अरे! क्या तुम संन्यास का अर्थ जानते हो?"
किसी न किसी रूप में कर्मयोग से जुड़े हुए हैं।
द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं-
अर्जुन ने पहले भी द्वितीय अध्याय के सातवें श्लोक में कहा है-
जब अर्जुन श्रीकृष्ण भगवान् के समक्ष पूर्ण समर्पण कर देते हैं, तब श्रीभगवान् अर्जुन के लिये अपने हृदय के द्वार खोल देते हैं और गीता गङ्गा बहने लगती है। इस संवाद में साङ्ख्यज्ञान और कर्म की बातें आती हैं। अर्जुन कहते हैं कि मेरे लिये श्रेयस्कर क्या है?
5.1
अर्जुन उवाच सन्न्यासं(ङ्) कर्मणां(ङ्) कृष्ण, पुनर्योगं(ञ्) च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं(न्), तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥5.1॥
गीता पढ़ें, पढ़ायें, जीवन में लायें।
साङ्ख्य के विषय में जो भी बातें कही हैं, उनमें ज्ञान की महत्ता आती है, उसमें कर्मयोग की भी महत्ता आती है। इन सारे विषयों पर चर्चा करने के बाद अर्जुन को समझ नहीं आ रहा कि ये बातें मिश्रित क्यों हो रही हैं? कभी कह रहे हो ज्ञान महत्त्वपूर्ण है, कभी कह रहे हो कर्म महत्त्वपूर्ण है, मेरे लिए श्रेयस्कर क्या है? उनका प्रश्न अभी भी वही है।
श्रीभगवानुवाच सन्न्यासः(ख्) कर्मयोगश्च, निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्, कर्मयोगो विशिष्यते॥5.2॥
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ
कर्मयोग-
इसी नौका के समान है जो हम सभी के लिए सुगम है, सरल है और इसके लिए किसी प्रकार का अनुचित त्याग करने की आवश्यकता नहीं है। जब हमारा इस देह में प्रवेश होता है- जब हम जन्म लेते हैं, इस देह में आ जाते हैं तो नैसर्गिक रूप से हमारे कुछ ऐसे सम्बन्ध बन जाते हैं, संस्कार आ जाते हैं, आदतें आ जाती हैं उन्हें छोड़ना सम्भव नहीं है, किसी सम्बन्ध का त्याग करना सम्भव नहीं है। क्या ऐसी परिस्थिति में हम मोक्ष के लिए संन्यास ले पाएँगे? बात ही बड़ी विचित्र है। यह सभी के लिए सम्भव नहीं है। ऐसी परिस्थिति में हम ईश्वर की प्राप्ति कैसे करें? यह प्रश्न जब आता है, तब यह बात समझ में आनी चाहिए कि कर्मयोग ही वह नौका है, जो इस मिथ्या संसार सागर से हमें पार ले जाएगी।
इसके लिए तैरना आवश्यक नहीं है, इसके लिए सारा साङ्ख्य समझने के जितनी बुद्धि हो यह भी आवश्यक नहीं है। कठोर तपस्या करनी पड़े, यह भी आवश्यक नहीं है। अपने जीवन में, अन्त:करण में कुछ परिवर्तन करके ही इस मिथ्या संसार सागर को पार कर सकते हैं। यह सिखाने वाला मार्ग कर्मयोग है, वह श्रेष्ठ है क्योंकि यह सर्व साधारण लोगों के लिए है, सर्व साधारण साधकों के लिए है। सभी को साथ लेकर चलने वाला सुगम मार्ग ही कर्मयोग है, इसलिए श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्मयोग श्रेष्ठ है। यह साधारण मार्ग है।
इसमें योग शब्द को भी सिद्ध करना पड़ेगा। एक बार कह दिया कि यह कर्मयोग है। अब कर्म समझ गए पर योग शब्द को सिद्ध करना पड़े तो इस शब्द के अनुसार जानना थोड़ा कठिन है। क्या कठिनाइयाँ हैं इसमें, क्योंकि योग वह नहीं है कि किसी प्रकार के कर्मकाण्ड में बैठ गये, साधना में बैठ गये, यह नहीं है। योग अन्त:करण से जुड़ा हुआ शब्द है। योग ऐसा है कि जो हमारे अन्त:करण से जुड़ा हुआ है पर आसक्ति भी जुड़ी हुई है। एक शब्द है जिसके साथ हम बचपन से जन्म होते ही चिपक जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहता वह है 'मैं'। 'मैं' ये हूँ, 'मैं' श्रद्धा हूँ। 'मैं', इस शब्द से हम इतने आसक्ति से जुड़े हुए है, इस तरह से चिपक गए हैं कि इसे छोड़ना सरल बात नहीं है। कर्म फल की आसक्ति, कर्म करने काअहङ्कार, इन सारी अन्य चीजों से हम बहुत आसक्त हैं। इन सब चीज़ों से आसक्त हुए बिना, इन्हें छोड़े बिना कर्मयोग भी योग नहीं रह जाता। कर्म में हमे कर्मयोग की सिद्धता लानी है और फिर हम उसी जगह पहुँच जाएँगे जहाँ पर साङ्ख्यदर्शन के ज्ञानयोगी हैं, वहीं हम भी पहुँच सकते हैं।
ज्ञेयः(स्) स नित्यसन्न्यासी, यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो, सुखं(म्) बन्धात्प्रमुच्यते॥5.3॥
पन्द्रहवें अध्याय में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने बताया है-
जब हममें किसी कर्म को करने का अहङ्कार हो जाता है। मेरे द्वारा किये कार्य का श्रेय किसी और को दे रहे हो और यह कार्य तो मैंने किया, श्रेय पाने का यह अहङ्कार भी एक तरह का सङ्ग ही है।
कोई विशेष कार्य करना ही कर्म है।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः(फ्), प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः(स्) सम्यग्, उभयोर्विन्दते फलम्॥5.4॥
यत्साङ्ख्यैः(फ्) प्राप्यते स्थानं(न्), तद्योगैरपि गम्यते।
एकं(म्) साङ्ख्यं(ञ्) च योगं(ञ्) च, यः(फ्) पश्यति स पश्यति॥5.5॥
हमारे हाथ में अगर कोई कोयला पकड़ा दे तो कोयला तो कोयला है यह सबको पता है, किन्तु कोई हीरा पकड़ा दे तो आँखों में एकदम चमक आ जाती है। इन दोनों को किसी वैज्ञानिक के पास ले जाएँ तो वह कहेगा कि ये दोनों ही कार्बन हैं, दोनों का तत्त्व एक ही है। एक का दाब व तापमान कम होता है, इसलिए कोयला है। दूसरे का अधिक होता है तो वह हीरा बन गया। वैज्ञानिक तत्त्व ज्ञानी है, क्योंकि उसे पता है कि दोनों का मूल तत्त्व एक ही है। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम ऐसे तत्त्वज्ञानी बनो जो यह समझ जाता है कि दोनों का मूल तत्त्व एक ही है। जैसे वैज्ञानिक कोयला और हीरा दोनों का मूल तत्त्व समझ जाता है, ऐसे ही तुम बालक बुद्धि मत बनो, एक विद्वान की तरह समझो।
सन्न्यासस्तु महाबाहो, दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म, नचिरेणाधिगच्छति॥5.6॥
योगयुक्तो विशुद्धात्मा, विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा, कुर्वन्नपि न लिप्यते॥5.7॥
आगे के श्लोक में श्रीभगवान् ने साङ्ख्ययोगी के लक्षण का वर्णन किया है। कर्मयोगी विचलित नहीं होते, उनको अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण होता है। उनकी सभी व्यक्तियों के प्रति, सब भूतों के प्रति, हर प्राणी मात्र के प्रति समता की दृष्टि होती है।
नैव किञ्चित्करोमीति, युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्, नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥5.8॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्, नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु, वर्तन्त इति धारयन्॥5.9॥
तृतीय अध्याय मे श्रीभगवान् ने कहा है-
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि, सङ्गं(न्) त्यक्त्वा करोति यः꠰
लिप्यते न स पापेन, पद्मपत्रमिवाम्भसा॥5.10꠱
'श्रीकृष्णार्पणमस्तु'।
'पद्मपत्रमिवाम्भसा' जैसी होती है। संसार के प्रति उनका दृष्टिकोण ऐसा ही होता है इसलिए उनके द्वारा पाप भी हो जाए तब भी उससे लिप्त नहीं होते हैं।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- आदर्श भैया
प्रश्न- मैंने पढ़ा है कि सञ्जय महाभारत युद्ध के दसवें दिन धृतराष्ट्र के पास आये थे, क्या यह सत्य है कि सञ्जय पहले दिन से ही धृतराष्ट्र को युद्ध का आँखों देखा वर्णन चित्रित कर रहे थे?
उत्तर- मैंने भी साधक सञ्जीवनी में पढ़ा है कि नवें दिन सञ्जय धृतराष्ट्र के पास वापस आये, तब उन्होंने पूरी कथा सुनाई।
प्रश्न- भगवान् श्रीकृष्ण एवम् अर्जुन के मध्य होने वाला वार्तालाप श्लोक रूप में हुआ था या साधारण संवाद के रूप में?
उत्तर- यह बात मुझे भी ज्ञात नहीं है, हमारे लिये यह महत्त्वपूर्ण है कि भगवान् वेदव्यास जी ने हमारे समक्ष गीता उस रूप में रखी, जिससे वह हमारे लिये सबसे ज्यादा ग्राह्य हो। सम्भव है कि वह संवाद रूप में हुआ हो।
प्रश्न- आज बहुत से लोग गीता के बारे में चर्चा करते हैं, हमें उस चर्चा में भाग लेना चाहिये या नहीं?
उत्तर- आप जितना गीता के विषय में बोलेंगे, उतना अच्छा ही है। हमारा कर्त्तव्य है कि हम गीता पढ़ें दूसरों को भी उसके विषय में बतायें, यदि हो सके तो उसे हमारे प्रकल्प से जोड़ें। यदि किसी विषय में स्वयम् निश्चित न हों तो उसकी जानकारी न दें।
प्रश्नकर्ता- ललितेश भैया
प्रश्न- पाँचवे अध्याय के तीसरे श्लोक में जो बातें कही गई हैं क्या आज के युग में वह कर पाना सम्भव है?
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
उत्तर- असम्भव तो कुछ भी नहीं है। यदि हमें प्रतीत होता है कि यह दुष्कर है तो इसे अपने जीवन का लक्ष्य बना लें कि हमें वहाँ पहुँचना है। हमारे सामने ही गुरुदेव श्रीगोविन्ददेव गिरि जी महाराज, सन्त ज्ञानेश्वर महाराज, सन्त गुलाबराव महाराज, सन्त तुकाराम महाराज सब कलियुग के ही हैं। यदि कक्षा एक के विद्यार्थी को दसवीं कक्षा के गणित का सवाल करने के लिये देंगे तो वह नहीं कर पायेगा। वही प्रश्न दसवीं मे पहुँचने पर वह सरलता से कर लेगा। हमें अभ्यास द्वारा अपना स्तर धीरे-धीरे ऐसा बढ़ाना है कि हमें सब विषय सम्भव लगने लगें।