विवेचन सारांश
मोक्ष प्राप्ति का मार्ग
देश भक्ति गीत, भजन, हनुमान चालीसा, वैदिक सनातन धर्म का पालन करते हुए दीप प्रज्वलन तथा गुरु वन्दना और प्रारम्भिक प्रार्थना के साथ आज के सत्र का आरम्भ हुआ।
आज हम नवें अध्याय का विवेचन आरम्भ कर रहे हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में कुल अट्ठारह अध्याय हैं। यह नवाँ अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता के मध्य में आता है। इसका महत्व बहुत अधिक है। ज्ञानेश्वर महाराज समाधि के समय इसी अध्याय को खोलकर समाधि में लीन हुए थे। इस अध्याय में श्रीभगवान् अपने तत्त्व रूप को व्यक्त करते हैं। प्रकृति क्या है, पुरुष क्या है, इसका अस्तित्व क्या है, इन सभी पर प्रकाश डालते हैं।
ज्ञान और विज्ञान के विषय में बताते हैं। सातवें अध्याय में श्रीभगवान् ने अर्जुन को ज्ञान-विज्ञान के विषय में बताया था। अर्जुन ने आठवें अध्याय में श्रीभगवान् से कुल सात प्रश्न पूछे थे- अध्यात्म क्या है? आदि दैव क्या है? इत्यादि।
पहले छः प्रश्नों के उत्तर अर्जुन को मिल गए थे। इसे ही श्रीभगवान् आगे बढ़ाते हैं। श्रीभगवान् ज्ञान तथा विज्ञान के विषय में अपने भाव व्यक्त करने के लिए इस अध्याय का आरम्भ करते हैं। इस अध्याय का नाम ही राजविद्याराजगुह्ययोग है। विद्या का अर्थ हम सभी जानते हैं और विद्या में भी जो सर्वोत्तम विद्या है, उसे राजविद्या कहा गया।
इसी प्रकार राजगुह्य का अर्थ भी अत्यन्त गुह्य या अत्यधिक रहस्यमय है। इसलिए इन दोनों बातों के विषय में श्रीभगवान् ने यहाँ बताना आरम्भ किया।
9.1
श्रीभगवानुवाच
इदं(न्) तु ते गुह्यतमं(म्), प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।
ज्ञानं(व्ँ) विज्ञानसहितं(य्ँ), यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥9.1॥
श्रीमद्भवद्गीता में अर्जुन को पच्चीस नामों से पुकारा गया है। उनमें से एक नाम अनसूय है। यह सम्बोधन बहुत विशिष्ट है। यह हर व्यक्ति के लिए नहीं हो सकता।
अत्रिस्मृति में एक श्लोक आता है जिसमें अनसूय के तीन लक्षण बताए गए हैं।
न अन्य दोषेस्तु रमते, साऽनसूय प्रकीर्तित: ।।
हम लोग क्या करते हैं? दूसरों में अवगुण ढूँढते रहते हैं। हमारे मन की इस प्रकार की प्रवृत्ति होती है लेकिन अनसूय के मन में कभी इस प्रकार की प्रवृत्ति नहीं आती। यह उनका पहला गुण है।
दूसरा लक्षण है- कम जानने वाले, अयोग्य व्यक्तियों की भी वह स्तुति करता है। वह हर प्राणी में कोई न कोई गुण ढूंढ लेता है। बुरे व्यक्तियों में भी कोई न कोई गुण होता है। वह बुरे व्यक्ति में भी अच्छा ही ढूॅंढता है।
वह मन्दबुद्धि में भी अच्छाई ही ढूॅंढता है।
अनसूय का तीसरा लक्षण है- वह अन्य व्यक्तियों के दोषों में रमता नहीं है।
कोई दूसरा व्यक्ति किसी के विषय में कुछ बुरा बोलता है तो हम उसमें आनन्द लेते हैं और अपने बारे में अगर कोई कुछ कहता है तो हमें उससे दु:ख प्राप्त होता है।
ऐसे तीन गुणों वाले जो व्यक्ति हैं उन्हें अनसूय कहा गया है। इसलिए श्रीभगवान् ने अर्जुन को निमित्त बनाकर मानवमात्र के कल्याण के लिए गीताजी का उपदेश एक गीत के रूप में प्रस्तुत किया। निमित्त बनने के लिए भी योग्यता चाहिए तो वह योग्यता अर्जुन में है। इसलिए उन्हें अनसूय कहा गया।
ज्ञान तथा विज्ञान के विषय में अनेक सन्तों, महात्माओं ने बहुत विस्तारित व्याख्या की है । जैसे, हम गीता परिवार में श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ रहे हैं तो यह ज्ञान है। हमारे प्रशिक्षक हमें पढ़ाते हैं, हमें ज्ञान प्राप्त होता है, हम कुछ सुनते हैं या कुछ देखते हैं तो उससे हमें ज्ञान प्राप्त होता है किन्तु यह ज्ञान हमारे मोक्ष के लिए कारण नहीं बनेगा। यह एक सीढ़ी बन सकता है।
इसी ज्ञान के माध्यम से हमें मोक्ष प्राप्त होगा। वह एक सिद्धि मन्त्र है। जब तक हम उस ज्ञान को विज्ञान में रूपान्तरित नहीं करेंगे तब तक हमें मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी। हमें उसे ज्ञान को विज्ञान में परिवर्तित करना ही होगा तभी मोक्ष की प्राप्ति होगी।
ज्ञान को अनुभव पूर्वक जब तक नहीं जान लेंगे तब तक वह विज्ञान नहीं बनेगा। जब तक हम इसे स्वयं में अनुभव नहीं करते हैं, अपने जीवन में नहीं उतारते हैं, तब तक यह विज्ञान नहीं कहलाता।
गीता परिवार का ध्येय वाक्य भी यही है- गीता पढ़ें, पढ़ाएँ, जीवन में लाएँ।
इसका अर्थ है ज्ञान को विज्ञान में बदलो तभी मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसलिए यहाॅं ज्ञान विज्ञान की बात कही गई है।
मान लीजिए, हमें किसी ने एक सेब दिखाया और बताया कि यह बहुत अच्छा होता है, मीठा होता है, इसका रङ्ग लाल होता है। यह ज्ञान है। यह ज्ञान तो हमें प्राप्त हो गया लेकिन जब तक हम उसे चखकर नहीं देखेंगे, उसका स्वाद स्वयं नहीं अनुभव करेंगे, तब तक हमें वास्तव में पता नहीं चलेगा कि सेब का स्वाद कैसा होता है? जब हम उसको चखकर उसका स्वाद महसूस करेंगे, तभी हम दूसरे व्यक्ति को बता सकते हैं कि हाँ! यह स्वादिष्ट है, यह मीठा है।
यह विज्ञान है। इसीलिए गुरु महात्मा हमें ज्ञान को विज्ञान में व्यवस्थित होना सिखाते हैं। करना तो हमें ही है।
इसमें श्रीभगवान् अपने तत्त्व के बारे में बता रहे हैं, इसलिए यह गुह्यतम शास्त्र है। ज्ञान को समझने के लिए हमारी मानसिक स्थिति भी उस प्रकार की होनी चाहिए। यदि मैं प्रथम कक्षा में हूँ और मुझे कोई बड़ी कक्षा का ज्ञान दिया जाए तो मुझे कुछ भी समझ में नहीं आएगा। वह मेरे लिए गुह्य होगा, रहस्यमय होगा क्योंकि उस समय मेरी स्थिति उस प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने की नहीं है। ऐसे व्यक्तियों के लिए वह गुह्य है और गुह्यतम का अर्थ अत्यन्त गोपनीय।
श्रीभगवान् को प्राप्त करने के तीन मार्ग होते हैं। इसमें हम कर्ममार्ग को गुह्य (secretive) कह सकते हैं, ज्ञानमार्ग को गुह्यतर (more secretive) कह सकते हैं और तीसरा भक्तियोग का मार्ग, उसे हम गुह्यतम (most secretive) कह सकते हैं। जब यह दोनों भक्तियोग में मिल जाते हैं तब उसमें दो नहीं रह जाते। उसमें केवल एक का ही स्थान होता है। श्रीभगवान् और भक्त के एक होने पर ही व्यक्ति उस भक्तिमार्ग में प्रवेश कर सकता है।
श्रीभगवान् इसके विषय में बताने जा रहे हैं कि भक्ति क्या होती है, श्रद्धा क्या होती है, अश्रद्धा क्या होती है। श्रीभगवान् कहते हैं कि एक बार यह सब जानने के बाद क्या होता है?
अशुभ का अर्थ होता है जो प्रतिदिन परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दुःखालय और अशाश्वत है। हम जन्म लेते हैं, फिर थोड़ा बड़े होते हैं, फिर मृत्यु, फिर जन्म, फिर मृत्यु। इसी चक्र में इस मृत्युलोक में हम घूमते रहते हैं। इसीलिए इसको अशुभ कहा गया है। इस मृत्युलोक में मोक्ष कैसे प्राप्त करेंगे? इस ज्ञान-विज्ञान रूपी ज्ञान प्राप्त करने के बाद इस जगत से मुक्त हो जाएँगे।
श्रीभगवान् इस लोक से मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं “यह जानने के बाद तुम मोक्ष को प्राप्त कर लोगे अर्थात् तुम मुझ में प्रवेश कर जाओगे और परमधाम के लिए तैयारी शुरू हो जाएगी।
आगे श्रीभगवान् ज्ञान के लक्षण बताने वाले हैं।
राजविद्या राजगुह्यं(म्), पवित्रमिदमुत्तमम्।
प्रत्यक्षावगमं(न्) धर्म्यं(म्), सुसुखं(ङ्) कर्तुमव्ययम्।।9.2।।
जल तो सभी शुद्ध होता है लेकिन गङ्गाजल पवित्र होता है। यह विद्या उत्तम भी है। प्रत्यक्ष रूप से इसके सुख का अनुभव कर सकते हैं या प्राप्त कर सकते हैं। यह धर्मयुक्त है। किसी से अपेक्षा रहेगी ही नहीं, इसलिए इसमें सुख ही सुख है।
जैसे चार प्रकार के आश्रम हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, संन्यास और वानप्रस्थ। वर्ण व्यवस्था भी चार प्रकार की है- ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र। जो भी कार्य हम हमारे वर्ण-आश्रम के अनुसार करेंगे तो वह धर्मयुक्त होगा। अभ्यास करना बहुत सुलभ और सरल है। हमें कोई वेद पढ़ने की, जप करने की, या तपस्या करने की आवश्यकता नहीं है।
भक्ति मार्ग सबसे सरल है। जो भी कार्य करें, श्रीभगवान् को अर्पण करते हुए करें। श्रीभगवान् हमारे बहुत निकट हैं।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।।15.7।।
उन्हें प्राप्त करने के लिए अभ्यास करना है। अव्यय अर्थात जो कभी व्यय नहीं होता, अक्षर अर्थात जिसका कभी क्षय नहीं होता। परमात्मा परिपूर्ण हैं।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
पूर्ण में से हम कुछ भी ले लें, तब भी वह पूर्ण ही रहेगा। न उनका जन्म होता है, न उनका अन्त होता है। वह अनन्त, अनादि है।
तो यह प्रश्न उठता है कि यदि यह ज्ञान इतना सरल है तो हर व्यक्ति क्यों नहीं प्राप्त कर सकता?
अश्रद्दधानाः(फ्) पुरुषा, धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां(न्) निवर्तन्ते, मृत्युसंसारवर्त्मनि।।9.3।।
श्रीभगवान् यहाॅं पर अर्जुन को परन्तप कहकर सम्बोधित करते हैं क्योंकि अर्जुन के समान तप करने वाला कोई नहीं है। तप का अर्थ होता है,जब हम कोई कार्य करते हैं और उसे करने में कितनी भी कठिनाई आ जाए हमें वह कार्य करना ही है, उसे तप कहते हैं। अर्जुन ने छ: महीने तक निद्रा का त्याग करके धनुष विद्या सीखी इसलिए वे परन्तप कहलाए। अर्जुन कभी कोई युद्ध नहीं हारे।
अश्रद्धा, अविद्या के कारण साधारण मनुष्य मुझे प्राप्त नहीं कर पाते और बार-बार इस संसार में आते-जाते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्म लेते हैं और बार-बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इन तीन श्लोकों में श्रीभगवान् ने ज्ञान के बारे में बताया है और अब अगले श्लोक में विज्ञान के बारे में बताते हैं।
मया ततमिदं(म्) सर्वं(ञ्), जगदव्यक्तमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि, न चाहं(न्) तेष्ववस्थितः।।9.4।।
वे इस सृष्टि का सृजन करते हैं, इसमें स्थित सभी चराचर जीवों की उत्पत्ति करते हैं, उनका भरण पोषण करते हैं उन सभी में श्रीभगवान् विद्यमान हैं परन्तु उनका स्वरूप उन प्राणियों में नहीं है।
श्रीभगवान् निराकार हैं।
न च मत्स्थानि भूतानि, पश्य मे योगमैश्वरम्।
भूतभृन्न च भूतस्थो, ममात्मा भूतभावनः।।9.5।।
वहीं दूसरी ओर श्रीभगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि वे स्वयं हमारे अन्दर या इस जड़ प्रकृति में स्थित नहीं हैं। इसका कारण यह है कि प्रकृति नाशवान है और जड़ है, जबकि श्रीभगवान् सनातन और चेतना के स्रोत हैं; वे केवल अपनी शक्ति (प्रकृति) द्वारा सृष्टि का सञ्चालन करते हैं, लेकिन जड़ता उनका गुण नहीं है, इसलिए वे उसमें व्याप्त नहीं हैं। यह विरोधाभास (Contradiction) तब उत्पन्न होता है जब हम द्वैत (प्रकृति और पुरुष) को अलग दृष्टि से देखते हैं, लेकिन जब अद्वैत दृष्टि अपनाई जाती है- यह समझते हुए कि प्रकृति और पुरुष (श्रीभगवान्) दोनों वास्तव में एक ही सत्ता हैं, जैसे लहरें और समुद्र, तब यह विरोधाभास समाप्त हो जाता है, क्योंकि एक ही होने के कारण न पुरुष में प्रकृति है और न प्रकृति में पुरुष।
इस प्रकार, श्रीभगवान् अपनी अति-सूक्ष्म, अनादि और सनातन प्रकृति के कारण, जिसे केवल वह स्वयं ही वर्णित कर सकते हैं, इस दृश्यमान जगत के कण-कण को धारण करते हुए भी, स्वयं को उससे अलिप्त (detached) और ऊपर रखते हैं।
यथाकाशस्थितो नित्यं(व्ँ), वायुः(स्) सर्वत्रगो महान्।
तथा सर्वाणि भूतानि, मत्स्थानीत्युपधारय॥9.6॥
वायु जैसे सर्वत्र आकाश में घूमती रहती है और आकाश तो शून्य है, जिसमें कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड समाए हुए हैं। उसी प्रकार हम सब भी श्रीभगवान् में हैं। हम पूरा जन्म-मरण (और जो कुछ भी होता है) अपने कर्मों और सञ्चित संस्कारों के अनुसार भोगते हैं, लेकिन हम हैं श्रीभगवान् के अन्दर ही। इसलिए, श्रीभगवान् के अन्दर हम सब घूमते रहते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वायु आकाश में स्थित है। इसी बात को समझाने के लिए एक उदाहरण रूप में बताया गया है।
सर्वभूतानि कौन्तेय, प्रकृतिं(य्ँ) यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि, कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥9.7॥
यहाँ काल की बात आ गई है—कल्पक्षय, कल्प का अर्थ है ब्रह्मा जी का कालचक्र। जैसा कि हम जानते हैं, चार युग हैं: सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, और कलियुग (जो अभी पाँच हज़ार एक सौ से अधिक वर्षों से चल रहा है)। कलियुग का कालमान चार लाख बत्तीस हज़ार मानव वर्ष है, और सतयुग इसका चार गुना अर्थात सत्रह लाख अट्ठाईस हज़ार वर्ष होता है। इन चारों युगों को मिलाकर एक महायुग बनता है। ऐसे एक सहस्त्र महायुग ब्रह्मा जी का एक दिन (बारह घण्टे) होता है। संख्या में यह (4.32 अरब) (4.32 बिलियन) वर्षों के बराबर है।
ब्रह्मा जी का एक दिन-रात 8.64 अरब वर्ष का होता है। उनका सौ वर्षों का जीवनकाल इतना विशाल है कि इसे किसी कम्प्यूटर द्वारा पूरी तरह से गणना करना सम्भव नहीं है। ब्रह्मा जी की भी मृत्यु होती है; वे भी अपना शरीर त्यागकर श्रीभगवान् में विलीन हो जाते हैं।
ब्रह्माण्ड के विराट स्वरूप में, ब्रह्मा जी का अस्तित्व भी महासागर में एक बुलबुले जैसा है। जब उनका एक दिन ही 4.32 अरब वर्षों का होता है और हमारी अधिकतम आयु केवल सौ वर्ष है, तो इस विशाल ब्रह्माण्ड में हमारा क्या अस्तित्व है?
हम शून्य हैं, लेकिन हम स्वयं को नायक समझते हैं, इसीलिए हम अहङ्कार और ममता में डूबकर दुखी होते हैं। यह कालमान इसलिए दिया गया है ताकि हमें अपनी तुच्छता /अल्पता का भान हो जाए। जब कल्प का क्षय होता है (ब्रह्मा जी का दिन समाप्त होकर रात की ओर जाता है), तो यह जितने भी पिण्ड (सृष्टि की गुड़िया) हमने बनाए हैं, वह सब एक हो जाते हैं। “हे कुन्तीपुत्र! मेरी प्रकृति में समाहित हो जाते हैं (यान्ति मामिका) फिर, कल्प के आरम्भ में (कल्पादौ) मैं(परमात्मा) पुनः उन सभी को सृजित (विसृजाम्यहम्) करता हूँ। इस प्रकार, यह सृष्टि निरन्तर चलती रहती है।
यह भूत समुदाय अवश अर्थात् अपने वश में नहीं क्योंकि उनके कर्मों के कारण उनका जीवन-मरण उनके हाथ में नहीं है, बल्कि उन्हें जाना ही है। (they must go)
प्रकृतिं(म्) स्वामवष्टभ्य, विसृजामि पुनः(फ्) पुनः।
भूतग्राममिमं(ङ्) कृत्स्नम्, अवशं(म्) प्रकृतेर्वशात्।।9.8।।
न च मां(न्) तानि कर्माणि, निबध्नन्ति धनञ्जय।
उदासीनवदासीनम्, असक्तं(न्) तेषु कर्मसु।।9.9।।
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः(स्), सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय, जगद्विपरिवर्तते।।9.10।।
न किसी से द्वेष हो और न ही प्रेम, यही वैराग्य भाव है।
मैंने तो तुम्हें मार्ग बता दिया है अब तुम जैसा चाहो वह मार्ग अपना सकते हो।