विवेचन सारांश
आसुरी गुणों का त्याग
16.7
प्रवृत्तिं(ञ्) च निवृत्तिं(ञ्) च, जना न विदुरासुराः।
न शौचं(न्) नापि चाचारो, न सत्यं(न्) तेषु विद्यते।।16.7।।
-प्रकृति से हमें पञ्चमहाभूतों से बना मानव देह मिलता है।
-इसमें प्रविष्ट आत्मा अपने साथ पूर्व जन्म के अनुभवों से युक्त मन, बुद्धि व अहङ्कार लेकर आती है।
-प्रकृति त्रिगुणात्मक होने के कारण हमको सत्त्व, रज और तमोगुण विरासत में मिलते है।
हमारी सङ्गत कैसी है?
हमारा सामाजिक वतावरण कैसा है?
हम क्या पढ़ते है?
हम दूरदर्शन पर, मोबाइल पर क्या देखते है?
ये सब हमारे गुणों के चयन में महत्त्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाते है।
"कोई झूठ कितना ही चला ले पर अन्तिम विजय सत्य की ही होती है।"
कितनी बड़ी बात बता दी उन्होंने कि अन्तिम विजय तो सत्य की होगी, लेकिन जिसे झूठ बोलने में कुछ लगता ही नहीं, जो झूठ बोलते समय सोचते नहीं और ऊपर से बोलते है कि मुझे झूठ बोलना तो आता ही नहीं। मैं तो सत्य ही बोल रहा हूँ। ऐसा कहकर, झूठ ही बोलते हैं।
न सत्यम तेुषु विद्यते, उनके जीवन में कहीं सत्य विद्यमान नहीं रहता। आसुरी सम्पत्ति के लोग इस भाव से भरे हुए रहते है। उनका तत्त्वज्ञान क्या होगा? उनकी सोच क्या होगी?
असत्यमप्रतिष्ठं(न्) ते, जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं(ङ्), किमन्यत्कामहैतुकम्।।16.8।।
एतां(न्) दृष्टिमवष्टभ्य, नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः, क्षयाय जगतोऽहिताः।।16.9।।
काममाश्रित्य दुष्पूरं(न्), दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्, प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः।।16.10।।
आसुरी लोग अपनी दोषपूर्ण धारणाओं को ही सही मानते है।
चिन्तामपरिमेयां(ञ्) च, प्रलयान्तामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा, एतावदिति निश्चिताः।।16.11।।
आशापाशशतैर्बद्धाः(ख्), कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थम्, अन्यायेनार्थसञ्चयान्।।16.12।।
इदमद्य मया लब्धम्, इमं(म्) प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे, भविष्यति पुनर्धनम्।।16.13।।
यदि यह पीढ़ी संस्कारवान न हो तो पिछली पीढ़ियों का कमाया पैसा चला जाता है। बचपन में बच्चों को तीर्थाटन कराएँ, सादगी से धर्मशाला में रहना सिखाएँ। मन्दिरों, धर्मशालाओं में प्रसाद ग्रहण करना सिखाएँ। फाइव स्टार की सुख-सुविधाओं की आदत न लगने दें। विदेश भ्रमण से अच्छा है हम उन्हें पहले भारत दर्शन तो करा दें। उन्हें अपने देश और संस्कृति की विविधताएँ तो देखने, समझने दें। उन्हें चारों-धाम, मथुरा, वृन्दावन आदि घुमाएँ।
और रचना गौण है सब यह शिखर संयोजना है।
कल्पनाएं एक ही उद्देश्य प्रेरित।
जल से पूर्ण विकसित पालना है,
अनुपम गोद में होते क्रियान्वित प्रगति के सोपान उत्तम
ईंट पक्की ढालना है, लोक मन संस्कार करना यह परम गति साधना है।
असौ मया हतः(श्) शत्रु:(र्), हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं(म्) भोगी, सिद्धोऽहं(म्) बलवान्सुखी।।16.14।।
गीता परिवार जेल में बन्दी मानवों को जूम (zoom) पर नित्य सिखाते हैं।
अहङ्कार युक्त लोग भी यज्ञादि कर के अपनी शक्ति बढ़ाते हैं। रावण ने कितने ही यज्ञ किये, अपने मस्तक तक काटकर यज्ञ-कुण्ड में डाल दिए थे।
आढ्योऽभिजनवानस्मि, कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य, इत्यज्ञानविमोहिताः।।16.15।।
अनेकचित्तविभ्रान्ता, मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः(ख्) कामभोगेषु, पतन्ति नरकेऽशुचौ।।16.16।।
आत्मसम्भाविताः(स्) स्तब्धा, धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते, दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।16.17।।
अहङ्कारं(म्) बलं(न्) दर्पं(ङ्), कामं(ङ्) क्रोधं(ञ्) च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु, प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः।।16.18।।
तानहं(न्) द्विषतः(ख्) क्रूरान् , संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभान्, आसुरीष्वेव योनिषु।।16.19।।
आसुरी योनियों में जन्म लेकर ऐसे लोग क्या करते हैं?
आसुरीं(य्ँ) योनिमापन्ना, मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय, ततो यान्त्यधमां(ङ्) गतिम्।।16.20।।
त्रिविधं(न्) नरकस्येदं(न्), द्वारं(न्) नाशनमात्मनः।
कामः(ख्) क्रोधस्तथा लोभ:(स्), तस्मादेतत्त्रयं(न्) त्यजेत्।।16.21।।
एतैर्विमुक्तः(ख्) कौन्तेय, तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः(श्) श्रेयस् , ततो याति परां(ङ्) गतिम्।।16.22।।
श्रीभगवान् कहते हैं, यदि मनुष्य कल्याण का आचरण करने लग जाए तो इन त्रि-द्वारों तक जाकर भी लौटकर आ सकता है। तब वह परागति को प्राप्त होकर मुझसे मिलेगा, इसलिए हे अर्जुन! मनमाने व्यवहार से बाहर निकलो।
यः(श्) शास्त्रविधिमुत्सृज्य, वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति , न सुखं(न्) न परां(ङ्) गतिम् ।।16.23।।
पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत॥
तस्माच्छास्त्रं(म्) प्रमाणं(न्) ते, कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं(ङ्), कर्म कर्तुमिहार्हसि।।16.24।।
इसी के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।
प्रश्नकर्ता- अबीरामी दीदी
न्यन्यानि संयाति नवानि देही।।2.22।।
।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(य्ँ) योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे दैवासुरसम्पद्विभागयोगो नाम षोडशोऽध्याय:।।