विवेचन सारांश
गुणातीत पुरुष के लक्षण और भगवत्प्राप्ति
आज के सत्र का प्रारम्भ सुमधुर प्रार्थना, हनुमान चालीसा पाठ और दीप प्रज्ज्वलन करके किया गया। भगवान् श्रीकृष्ण तथा गुरुदेव के चरणों में वन्दना की गई।
श्रीमद्भागवद्गीता के अलग-अलग अध्याय हमें यह सिखाते हैं कि जीवन को कैसे अच्छे ढङ्ग से जिया जाए। इन बातों को हम अपने प्रतिदिन के जीवन में कैसे अपनाएँ, यह ज्ञान हमें गीता के सत्रहवें अध्याय से भी मिलता है। पिछले सत्र में हमने प्रकृति के तीन गुणों सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के बारे में जाना था।
यह सत्र बच्चों के लिए रखा गया है, इसलिए इसे बातचीत के रूप में सरल भाषा में समझाया गया। सत्र प्रारम्भ करने से पहले सभी बच्चों से अपने-अपने वीडियो चालू करने के लिए कहा गया, ताकि हम एक-दूसरे को देख सकें और अच्छे से सीख सकें। अब देखते हैं कि आपको पिछले सत्र की कितनी बातें स्मरण हैं।
प्रश्न- श्रीमद्भगवद्गीता के किस अध्याय में गुणों का वर्णन किया गया है?
उत्तर- श्रीमद्भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय में गुणों का वर्णन किया गया है।
प्रश्न- प्रकृति से प्राप्त तीन गुण कौन-से हैं?
उत्तर- सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण।
प्रश्न- सत्त्वगुण का अर्थ क्या है? इसका उत्तर उदाहरण के माध्यम से भी दिया जा सकता है।
उत्तर- मान लीजिए हम पढ़ाई कर रहे हैं और उसी समय हमारे मित्र हमें खेलने के लिए बुलाते हैं। सत्त्वगुण वाला व्यक्ति बिना विचलित हुए पहले अपने कर्त्तव्य को पूरा करता है। वह विनम्रता से कहता है “मैं अभी पढ़ाई कर रहा हूँ, काम पूरा कर लेने के बाद खेलने आऊँगा।” इस प्रकार पहले आवश्यक कार्य को पूरा करना, पढ़ाई के समय मित्रों द्वारा खेलने के लिए बुलाए जाने पर पहले अध्ययन पूरा करना और फिर खेलने जाना यह सत्त्वगुण का स्पष्ट उदाहरण है।
प्रश्न- रजोगुण को कैसे पहचाना जा सकता है? उत्तर उदाहरण के माध्यम से भी दिया जा सकता है।
उत्तर- रजोगुण का अर्थ है मन में निरन्तर विभिन्न प्रकार की इच्छाओं का उत्पन्न होते रहना। इसके प्रभाव से मन चञ्चल हो जाता है और व्यक्ति इधर-उधर भागदौड़ करने लगता है। रजोगुण मनुष्य को लगातार कुछ-न-कुछ पाने की आकाङ्क्षा में लगाए रखता है और उसी में संलग्न रहने के लिए प्रेरित करता है। जब किसी व्यक्ति में सब कुछ होने पर भी और अधिक पाने की तीव्र इच्छा बनी रहती है तथा मन निरन्तर अशान्त रहता है, तो यह रजोगुण का लक्षण है।
प्रश्न- तमोगुण का अर्थ क्या है? आम वाले उदाहरण से कौन-सा गुण स्पष्ट होता है?
उत्तर- तमोगुण प्रायः आलस्य, प्रमाद और निष्क्रियता को जन्म देता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति आवश्यक कार्यों को टालता रहता है और जीवन में प्रगति नहीं कर पाता।
उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। मान लीजिये अजय को एक आम मिला। आम देखकर उसने उसे उठा लिया और एक जगह बैठकर सोचने लगा। पहले उसने अपनी माँ को दिखाया और बोला कि मम्मी, देखो मुझे आम मिला है। फिर वह कल्पनाएँ करने लगा कि अगर मैं इस आम का बीज बोऊँगा तो कई साल बाद बहुत सारे आम मिलेंगे। उन्हें बेचकर मैं पैसा कमा लूँगा। ऐसे सोचते-सोचते उसकी बातें बढ़ती ही चली गईं। अन्त में उसने कहा कि चलो, मैं कल पूरी तैयारी के साथ प्रारम्भ करूँगा। धीरे-धीरे सब कर लूँगा। यह सोचकर उसने आम बाहर ही रख दिया और सोने चला गया।
अगले दिन जब उसने देखा तो पक्षी आम खा चुके थे और बीज फेंक दिया गया था। इस प्रकार आलस्य और टालमटोल के कारण अवसर हाथ से निकल गया।
जो लोग आलसी होते हैं, वे आवश्यक कार्य समय पर नहीं करते। जो काम पहले करना चाहिए, उसे वे टालते रहते हैं और कहते हैं कि यह काम कल कर लूँगा, लेकिन बाद में भी वह कार्य नहीं हो पाता।
आम के उदाहरण से तमोगुण स्पष्ट होता है, क्योंकि वह निर्णय लेने और कर्म करने में देरी करता है।
जिन लोगों को पहले बहुत कम याद था, उन्हें भी अब ये तीनों गुण स्पष्ट रूप से समझ में आ गए हैं। आप सभी ने बहुत अच्छे उत्तर दिए हैं। इसी प्रकार नियमित रूप से पढ़ते रहिए और इन बातों को ध्यान में रखते रहिए।
14.14
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जब सत्त्वगुण की वृद्धि होती है, तब मनुष्य का जीवन उत्तम दिशा में प्रवाहित होने लगता है। यह सत्य है कि जीवन में तीनों गुण, सत्त्व, रज और तम सभी उपस्थित रहते हैं क्योंकि हमें सोना भी पड़ता है और सांसारिक कार्य भी करने पड़ते हैं, परन्तु जिस व्यक्ति में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है, वह जीवन को पूर्णता के साथ जी लेता है।
ऐसा व्यक्ति बचपन में मन लगाकर अध्ययन करता है, युवावस्था में समाज की सेवा करता है, अपने कर्त्तव्यों का ईमानदारी से पालन करता है और वृद्धावस्था में भी दूसरों का मार्गदर्शन करता है, उन्हें ज्ञान और शिक्षा प्रदान करता है। इस प्रकार वह अपने जीवन के प्रत्येक चरण को सार्थक बनाता है।
जब उसकी वृद्धावस्था पूर्ण हो जाती है और मृत्यु का समय आता है जो प्रत्येक प्राणी के जीवन में निश्चित है तो वह सत्त्वगुणी अवस्था में ही देह का त्याग करता है।
इसी कारण हम बार-बार कहते हैं कि सत्त्वगुणी बने रहना चाहिए। इसके लिए अभी से अभ्यास करना आवश्यक है, ताकि जीवन के अन्त तक सत्त्वगुण की प्रधानता बनी रहे।
जब किसी व्यक्ति का देहान्त होता है तो हम कहते हैं कि वह स्वर्गवासी, कैलाशवासी या वैकुण्ठवासी हुआ। ऐसे स्थानों की प्राप्ति उन्हें इसलिए होती है, क्योंकि उनका सम्पूर्ण जीवन सत्त्वगुण से परिपूर्ण रहा होता है। उन्होंने जीवन भर सत्त्वगुण का अभ्यास किया और उससे विचलित नहीं हुए।
रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥
कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥
ऐसे व्यक्ति के मन में मृत्यु के समय भी यही विचार चलता रहता है, मेरे जाने के बाद मेरे बच्चे बँटवारा कैसे करेंगे? इस सम्पत्ति का क्या होगा? जबकि सत्य यह है कि मनुष्य जाते समय इनमें से कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। उसका मन सदा उन्हीं वस्तुओं और कर्मों में आसक्त बना रहता है।
श्रीभगवान् कहते हैं कि “कर्मसङ्गी जायते” अर्थात् ऐसा व्यक्ति कर्मप्रधान योनि में जन्म लेता है। कर्मप्रधान योनि का अर्थ है- मनुष्य योनि। केवल मनुष्य ही यह समझ सकता है कि कौन-सा कर्म पुण्य देता है, कौन-सा कर्म पाप देता है और किस प्रकार सेवा करनी चाहिए। मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार पुण्य और पाप का सञ्चय करता है। सांसारिक सम्पत्ति यहीं रह जाती है, परन्तु पुण्य-पाप की पूँजी जीव अपने साथ ले जाता है।
श्रीभगवान् कहते हैं कि रजोगुणी व्यक्ति पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेता है। मनुष्य बनकर उसके भीतर फिर से इच्छाएँ जागती हैं कि मुझे किसी की सहायता करनी है, मुझे अध्ययन करना है, मुझे अच्छे कार्य करने हैं। इच्छाएँ होना रजोगुण का लक्षण है परन्तु अच्छी इच्छाएँ तब उत्पन्न होती हैं जब रजोगुण के साथ सत्त्वगुण जुड़ जाता है।
हम स्वयम् इसका उदाहरण हैं। हम अभी छोटे-छोटे बालक हैं और गीता का अध्ययन कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि हमारे पूर्व जन्म में मृत्यु के समय हम पूर्णतः रजोगुण में नहीं थे। हम धन-सम्पत्ति की चिन्ता नहीं कर रहे थे अपितु यह सोच रहे थे कि “मैं और अच्छे कार्य कर सकता था”, “मुझे और सेवा करनी थी”। इसी कारण हमें पुनः मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है, अच्छे संस्कार पाने के लिए, सेवा करने के लिए तथा समाज और देश के लिए कार्य करने के लिए।
श्रीभगवान् आगे बताते हैं कि मूढ़ योनि क्या होती है। मूढ़ का अर्थ है, जिसे यह समझ न हो कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। आपने कीट-पतङ्गों को देखा होगा। उनकी आयु बहुत छोटी होती है और उन्हें यह विवेक नहीं होता कि क्या अच्छा है और क्या बुरा?
मनुष्य के भीतर यह विवेक-शक्ति होती है कि यदि मेरे पास भोजन है और सामने कोई भूखा है तो मुझे उसे देना चाहिए। यह विचार-शक्ति न तो कीटों में होती है और न ही अन्य प्राणियों में।
श्रीभगवान् यह भी कहते हैं कि यदि किसी की मृत्यु तमोगुण में होती है तो उसका अगला जन्म मूढ़ योनि में होता है। हमारे समाज में लम्बे समय तक यह धारणा रही है कि श्रीमद्भगवद्गीता और शास्त्रों का अध्ययन केवल बुढ़ापे में करना चाहिए, जबकि वास्तव में यह ज्ञान जीवन को सही दिशा देने के लिए प्रारम्भ से ही आवश्यक है, इसलिए हमें आज से ही अभ्यास करना प्रारम्भ कर देना चाहिए कि हम अधिक से अधिक सत्त्वगुण में बने रहें। इसके लिए हमें अध्ययन करना चाहिए, श्रीभगवान् की पूजा-उपासना करनी चाहिए और लोगों की निःस्वार्थ सेवा करनी चाहिए। इसी प्रकार के अभ्यास से हम अपने जीवन में सत्त्वगुण की वृद्धि कर सकते हैं और सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
हमें सत्त्वगुण में बने रहने के लिए निरन्तर अभ्यास अत्यन्त आवश्यक है।एक दिन में अच्छी आदत नहीं बनती। कोई भी अच्छी बात सीखने या पाने के लिए हमें आदत बनानी पड़ती है, जैसे सुबह जल्दी उठना। हम एक दिन जल्दी उठ जाएँ और कहें कि अब मैं प्रतिदिन जल्दी उठता हूँ तो ऐसा नहीं होता। जब हम पूरे एक महीने तक रोज़ जल्दी उठते हैं, तभी कह सकते हैं कि हमें जल्दी उठने की आदत पड़ गई है।
इसी प्रकार सत्त्वगुणी बनने के लिए भी प्रतिदिन अभ्यास करना होता है। अभी हम जो बातें समझ रहे हैं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि अभी से सत्त्वगुण में बने रहना कितना आवश्यक है। यदि हम अभी से अभ्यास करेंगे, तो आगे चलकर हम वास्तव में सत्त्वगुणी बन सकेंगे।
श्रीभगवान् यहाँ रजोगुण के विषय में बताते हैं कि कोई व्यक्ति जीवन भर यदि रजोगुण की प्रधानता में ही बना रहता है तो उसका मन निरन्तर किसी-न-किसी वस्तु की प्राप्ति में लगा रहता है। वह लगातार भागदौड़ करता रहता है, कर्मों के पीछे, उपलब्धियों के पीछे।
सत्त्वगुणी बनने के लिए भी इसी तरह नित्य प्रतिदिन अभ्यास करना होता है। अभी से सत्त्वगुण में बने रहना आवश्यक है, क्योंकि निरन्तर अभ्यास के द्वारा ही हम आगे चलकर वास्तव में सत्त्वगुणी बन सकेंगे।
आगे श्रीभगवान् यहाँ गुणों के अनुसार होने वाले फलों के विषय में बताते हैं।
सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥
यह गहरा ज्ञान केवल अधिक पढ़ने से ही नहीं, अपितु सत्त्वगुण में स्थिर रहने से आता हैं। वे कभी सत्त्वगुण से विचलित नहीं होते। सत्त्वगुण में स्थिर रहने का अर्थ है प्रातःकाल शीघ्र उठना, श्रीभगवान् की पूजा करना। अपने कर्त्तव्यों का ठीक से पालन करना। माता-पिता को अनावश्यक रूप से परेशान न करना, संयमित जीवन जीना और प्रतिदिन गीता जैसे ग्रन्थों का अध्ययन करना है।
जो व्यक्ति प्रतिदिन इस प्रकार सत्त्वगुण का अभ्यास करता है और सत्त्वगुण में बना रहता है, उसके विषय में श्रीभगवान् कहते हैं कि उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है और वह बुद्धिमान बन जाता है।
श्रीभगवान् यहाँ कहते हैं कि “रजसो लोभ एव च” अर्थात् रजोगुण से लोभ की वृद्धि होती है। किसी व्यक्ति के अधिक समय तक रजोगुण में बने रहने से उसके भीतर लोभ बढ़ता जाता है। एक वस्तु मिलने के बाद दूसरी वस्तु की इच्छा होने लगती है, जैसे हमने पहले उदाहरणों में समझा था।
श्रीभगवान् यहाँ बताते हैं कि जो व्यक्ति तमोगुण में बना रहता है, उसे प्रमाद, मोह और अज्ञान ये तीनों प्राप्त होते हैं। ये तीनों ही अत्यन्त हानिकारक हैं।
प्रमाद का अर्थ है कि जो कार्य करना चाहिए, उसे टालते रहना।
मोह का अर्थ है कि सत्य को न देख पाना।
अज्ञान का अर्थ है कि यह न समझ पाना कि क्या सही है और क्या गलत?
ये तीनों ही तमोगुण से उत्पन्न होते हैं और मनुष्य के जीवन के लिए बहुत घातक हैं। हमें इनसे दूर रहना चाहिए।
श्रीभगवान् स्पष्ट रूप से बताते हैं कि सत्त्वगुण से ज्ञान मिलता है। रजोगुण से लोभ बढ़ता है और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान प्राप्त होते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि तुम्हें ज्ञान चाहिए तो सत्त्वगुण में रहो। लोभ चाहिए तो रजोगुण में रहो। अज्ञान चाहिए तो तमोगुण में रहो।
सही मार्ग चुनने के लिए हम सब यह सङ्कल्प लें कि हम सत्त्वगुण में बने रहने का प्रयास करेंगे।
ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि मनुष्य को यह स्वयम् निर्णय करना होता है कि उसे जीवन में क्या प्राप्त करना है?
सत्त्वगुणी मनुष्य को उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
हमें संस्कृत के कुछ शब्द भी धीरे-धीरे समझ में आने लगे हैं। हमने पन्द्रहवें अध्याय में भी देखा था “ऊर्ध्वमूलमधःशाखम्”।
प्रश्न- उर्ध्व का अर्थ क्या है?
उत्तर- ऊपर की ओर।
श्रीभगवान् कहते हैं कि ‘ऊर्ध्व गच्छन्ति सत्त्वस्था’ अर्थात् सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्व लोकों को प्राप्त होते हैं।
श्रीभगवान् कहते हैं कि ‘मध्ये तिष्ठन्ति राजसा:’ अर्थात् रजोगुण में स्थित मनुष्य मध्य में रहते हैं अर्थात् वे मृत्युलोक में ही जन्म लेते हैं।
‘जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो’ अगला शब्द है अधः।
प्रश्न- अधो का अर्थ क्या है?
उत्तर- नीचे की ओर।
श्रीभगवान् कहते हैं कि
“जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः”
अर्थात् निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित मनुष्य अधोगति को प्राप्त होते हैं।
श्रीभगवान् ऊर्ध्व, मध्य और अधः इन तीन दिशाओं का वर्णन करते हैं।श्रीभगवान् स्पष्ट रूप से बताते हैं कि सत्त्वगुणी व्यक्ति ऊर्ध्वगामी होता है, रजोगुणी व्यक्ति मध्य में रहता है और तमोगुणी व्यक्ति अधोगामी होता है।
सत्त्वगुणी व्यक्ति की गति जीवन में भी अच्छी होती है
और मृत्यु के बाद भी।
रजोगुणी व्यक्ति मध्य अवस्था में रहता है जबकि तमोगुणी व्यक्ति का जीवन पतन की ओर जाता है।
जैसे सत्त्वगुणी व्यक्ति पढ़ाई में, कार्य में और जीवन में निरन्तर प्रगति करता है। मृत्यु के बाद भी उसे उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
तमोगुणी व्यक्ति अधोगामी होता है।
उसके जीवन में गिरावट आती जाती है।
वह अपना ज्ञान, बुद्धि और आरोग्य धीरे-धीरे खो देता है।
जैसे दिनभर सोते रहने से आरोग्य नष्ट होता है। पढ़ाई न करने से बुद्धि का विकास रुक जाता है। श्रीभगवान् कहते हैं कि तमोगुणी व्यक्ति नीचे गिरता रहता है और उसका निरन्तर पतन होता रहता है।
नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण ये तीनों ही गुण मनुष्य को बाँधते हैं। यद्यपि ये गुण जीवन-व्यवस्था में सहायक होते हैं, परन्तु अन्ततः इनसे ऊपर उठे बिना श्रीभगवान् की प्राप्ति सम्भव नहीं है।
एक विवेकी व्यक्ति यह भली-भाँति जानता है कि ये तीनों गुण उसे बाँधकर रखते हैं, इसलिए वह इनके वश में न रहकर इन्हें अपने नियन्त्रण में रखता है।
उदाहरण के लिए, जब कोई व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसका तमोगुण या रजोगुण उसे सुबह जल्दी उठने नहीं दे रहा है, तब वह सत्त्वगुण का आश्रय लेकर स्वयम् को संयम में रखता है।
श्रीभगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, वही गुणातीत कहलाता है और वही श्रीभगवान् की प्राप्ति का अधिकारी होता है।
श्रीभगवान् यह भी कहते हैं कि जो इन तीनों गुणों को पार कर जाता है, वह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त हो जाता है, अर्थात् वह ईश्वर-साक्षात्कार की अवस्था को प्राप्त करता है।
आगे श्रीभगवान् स्पष्ट करते हैं कि तीनों गुणों से ऊपर उठने का क्या अभिप्राय है?
तमोगुण से ऊपर उठने का अर्थ है आलस्य, मोह और अज्ञान से मुक्त होना है।
रजोगुण से ऊपर उठने का अर्थ है— लोभ तथा कर्मों की आसक्ति से मुक्त होना। सत्त्वगुण से ऊपर उठने का अर्थ है—ज्ञान और शान्ति की आसक्ति का भी त्याग करना। इन तीनों गुणों से ऊपर उठने के लिए श्रीभगवान् उपदेश देते हैं कि मनुष्य को विवेक और वैराग्य के द्वारा इन गुणों को पहचानना चाहिए। उसे पूर्ण श्रद्धा के साथ श्रीभगवान् की शरण में जाना चाहिए और सत्य, शान्ति तथा आत्म-ज्ञान की ओर निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए।
गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण इन तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है, वह जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था से उत्पन्न होने वाले सभी सुख-दुःखों से मुक्त हो जाता है।
वह स्पष्ट रूप से यह जान लेता है कि ये सभी अवस्थाएँ और अनुभव गुणों के कारण उत्पन्न होते हैं, न कि उसके वास्तविक स्वरूप से। उसका आत्मस्वरूप इन गुणों से परे शुद्ध, प्रसन्न और नित्य है।
ऐसा गुणातीत व्यक्ति जीवन की किसी भी परिस्थिति में व्यथित नहीं होता। वह किसी भी विषय में अनावश्यक चिन्ता या तनाव नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि सभी क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ तीनों गुणों के द्वारा ही हो रही हैं और वह स्वयं उनसे अलग तथा उनसे ऊपर स्थित है।
अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥
विवेचन- अर्जुन श्रीभगवान् से प्रश्न करते हैं कि गुणातीत पुरुष की पहचान कैसे की जाए? वे जानना चाहते हैं कि ऐसे व्यक्ति के लक्षण क्या होते हैं, ताकि उनसे प्रेरणा लेकर हम भी अपने भीतर उन गुणों का विकास कर सकें और धीरे-धीरे सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों से ऊपर उठने का प्रयास कर सकें।
अर्जुन के प्रश्न इस प्रकार हैं-
जो व्यक्ति तीनों गुणों से परे हो चुका है,
वह कैसा होता है? उसके प्रमुख लक्षण क्या हैं?
उसका आचरण कैसा होता है? उसकी दिनचर्या और व्यवहार किस प्रकार के होते हैं?
मैं स्वयं इन तीनों गुणों से परे कैसे जा सकता हूँ? इन गुणों के बन्धन से मुक्त होने का उपाय क्या है?
श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो व्यक्ति सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणों से मुक्त हो जाता है, वह किसी भी कार्य को करते समय न आसक्ति रखता है और न द्वेष। वह कार्य अपने स्वार्थ के लिए नहीं, अपितु कर्त्तव्य समझकर करता है। वह यह नहीं सोचता कि “मुझे क्या अच्छा लग रहा है” या “मुझे क्या बुरा लग रहा है”, अपितु यह “मेरा कर्त्तव्य है” ऐसा सोचकर करता है।
जैसे हम कई बार कहते हैं कि “मुझे टीवी देखना है इसलिए मैं पढ़ाई नहीं करूँगा।” यह आसक्ति का उदाहरण है। जो व्यक्ति गुणों से मुक्त होता है। वह कहता है कि “जो कार्य मुझे करना चाहिए, वही मैं करूँगा।” वह पढ़ाई हो या कोई और उत्तरदायित्व।
श्रीभगवान् बताते हैं कि ऐसा व्यक्ति किसी भी वस्तु या परिस्थिति के प्रति न अधिक आकर्षित होता है, न ही उससे द्वेष करता है, जैसे बालक को चॉकलेट मिल जाए तो भी वह प्रसन्न रहता है और यदि न मिले तो भी उसका मन विचलित नहीं होता।
इस प्रकार, गुणातीत व्यक्ति का मन व्यवस्थित और शान्त रहता है, क्योंकि उसमें न आसक्ति होती है और न द्वेष।
सुन्दर कथा के माध्यम से समझते हैं-
एक बार गोकुल में भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि “मैंने आज तक किसी भी स्त्री का मुख नहीं देखा है।” यह सुनकर गोपियाँ चकित हो गईं। उन्होंने पूछा कि “प्रभु! आप तो प्रतिदिन हमारा मुख देखते हैं, फिर ऐसा कैसे कह रहे हैं?”
भगवान् श्रीकृष्ण मुस्कराए, पर उस समय कुछ नहीं बोले।
कुछ दिनों बाद गोकुल में महर्षि दुर्वासा पधारे। उन्होंने यह प्रतिज्ञा ले रखी थी कि वे जीवन भर केवल दूर्वा (घास) ही ग्रहण करेंगे। भगवान् श्रीकृष्ण ने गोपियों से कहा कि वे महर्षि दुर्वासा के लिए स्वादिष्ट व्यञ्जन बनाकर ले जाएँ और उन्हें भोग अर्पित करें।
गोपियाँ व्यञ्जन बनाकर जब यमुना नदी के तट पर पहुँचीं तो देखा कि यमुना का जलस्तर बहुत ऊँचा है और नदी पार करना असम्भव है। वे लौटकर भगवान् श्रीकृष्ण के पास गईं और अपनी कठिनाई बताई।
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा कि “यमुना जी से कहना कि यदि भगवान् श्रीकृष्ण ने आज तक किसी भी स्त्री का मुख नहीं देखा हो, तो आप अपना जलस्तर कम कर दें।” गोपियाँ मन ही मन सोचने लगीं कि “भगवान् श्रीकृष्ण तो प्रतिदिन हमारा मुख देखते हैं फिर यह कैसे सत्य हो सकता है?”
उन्होंने फिर भी यमुना जी से श्रीभगवान् की कही बात कह दी। यह कहते ही यमुना जी ने अपना जलस्तर कम कर दिया और गोपियाँ सरलता से पार हो गईं।
पार जाकर उन्होंने महर्षि दुर्वासा की पूजा की और उन्हें सभी व्यञ्जन अर्पित किए। महर्षि दुर्वासा ने बिना कुछ कहे सारे व्यञ्जन ग्रहण कर लिए। यह देखकर गोपियाँ और भी अधिक आश्चर्यचकित हुईं, क्योंकि उन्होंने तो केवल दूर्वा खाने की प्रतिज्ञा ली थी।
जब गोपियाँ लौटने लगीं और पुनः यमुना तट पर पहुँचीं तो जलस्तर फिर से बढ़ा हुआ था। वे वापस महर्षि दुर्वासा के पास गईं और अपनी समस्या बताई।
महर्षि दुर्वासा ने पूछा कि “आते समय तुम कैसे आई थीं?”
गोपियों ने भगवान् श्रीकृष्ण की बात उन्हें बता दी।
महर्षि दुर्वासा तब बोले कि “अब यमुना जी से कहना कि यदि दुर्वासा मुनि ने दूर्वा के अतिरिक्त कभी कुछ भी ग्रहण न किया हो तो आप हमें पार जाने का मार्ग दें।” गोपियाँ यह सुनकर और भी अधिक चकित हो गईं क्योंकि उन्होंने अपनी आँखों से देखा था कि मुनि ने सारे व्यञ्जन खाए थे।
फिर भी उन्होंने यमुना जी से वही बात कही और आश्चर्य! यमुना जी ने फिर से अपना जलस्तर कम कर दिया।
अब गोपियाँ दौड़कर भगवान् श्रीकृष्ण के पास पहुँचीं और बोलीं कि “प्रभु! यह सब कैसे सम्भव हुआ? आप प्रतिदिन हमारे दर्शन करते हैं, फिर यमुना जी ने आपकी बात कैसे मान ली? और महर्षि दुर्वासा ने हमारे बनाए सारे व्यञ्जन खाए फिर भी उनकी बात कैसे सत्य हो गई?”
भगवान् श्रीकृष्ण ने तब कहा कि “उस दिन तुम मुझसे जो प्रश्न कर रही थीं उसका उत्तर अब सुनो।
मैं इन गुणों में रहते हुये भी उनसे प्रभावित नहीं होता। मैं तुम्हें देखता अवश्य हूँ, पर तुम्हारे प्रति आसक्त नहीं होता। मेरे भीतर कोई स्पृहा नहीं है। उसी प्रकार, महर्षि दुर्वासा ने व्यञ्जन श्रीभगवान् की आज्ञा से ग्रहण किए थे, पर उनके मन में उन व्यञ्जनों की वासना नहीं थी। उनके मन में तो केवल दूर्वा ही थी।”
इस प्रकार हम देखते हैं कि विवेकी पुरुष बाहर से कर्म करते हुए भी भीतर से गुणों से परे होते हैं।
वे संसार में रहते हैं किन्तु संसार उन्हें बाँध नहीं पाता। विवेकी मनुष्य यही समझता है कि “मैं गुणों में रहता हूँ, किन्तु गुणों से प्रभावित नहीं होता।” यही गुणातीत अवस्था है।
यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए कि हम क्या खा रहे हैं, क्या बोल रहे हैं और क्या देख रहे हैं, क्योंकि हम अभी गुणातीत अवस्था को प्राप्त नहीं हुए हैं। हम अभी भी तीनों गुणों के प्रभाव में ही जीवन जी रहे हैं।
महाशिवरात्रि पर भगवान् भोलेनाथ का प्रसाद ग्रहण करने से पहले हमें स्वयम् से यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या हम उसके योग्य हैं? क्या हमारा मन शुद्ध और निर्मल है?
महर्षि दुर्वासा ने सभी व्यञ्जन इसलिए ग्रहण किए, क्योंकि वे गुणातीत अवस्था में स्थित थे। उनके मन में न तो आसक्ति थी और न ही द्वेष। वे यह जानते थे कि सब कुछ श्रीभगवान् का है और वे स्वयम् केवल निमित्त मात्र हैं।
श्रीभगवान् आगे के तीन श्लोकों में गुणातीत पुरुष के लक्षणों का वर्णन करते हैं। हम सब मिलकर उन श्लोकों का गायन करें और उनके भावार्थ को समझने का प्रयास करें।
उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥
समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥
मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि गुणातीत व्यक्ति सदा स्थिर रहता है। उसके सामने कैसी भी परिस्थिति आ जाए, उसका मन विचलित नहीं होता। वह यह जानता है कि संसार में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह तीनों गुणों के प्रभाव से हो रहा है और वह स्वयम् केवल निमित्त मात्र है।
ऐसा व्यक्ति सुख और दुःख में समान भाव रखता है। वह सोने और मिट्टी को एक समान देखता है क्योंकि उसे यह अनुभूति होती है कि प्रत्येक स्थान पर श्रीभगवान् ही विद्यमान हैं। इसी भाव को समझाने के लिए यह उदाहरण दिया गया है-
चाहे पाव-भाजी मिले या करेले की सब्जी, गुणातीत व्यक्ति के मन में कोई भेदभाव नहीं होता। वह धैर्यपूर्वक सब स्वीकार करता है और किसी की निन्दा या प्रशंसा से प्रभावित नहीं होता।
शान्त स्वभाव वाला गुणातीत व्यक्ति मान और अपमान को भी समान रूप से देखता है। उसके लिए मित्र और शत्रु में कोई भेद नहीं रहता; वह दोनों के प्रति सम भाव रखता है।
भगवान् श्रीराम ने विभीषण को यह शिक्षा दी थी कि रावण को भी अपना भाई समझकर उसका अन्तिम संस्कार किया जाए क्योंकि मृत्यु के बाद शत्रुता का कोई अर्थ नहीं रह जाता। इस प्रसङ्ग के माध्यम से श्रीराम हमें यह सिखाते हैं कि मित्र और शत्रु दोनों को समान दृष्टि से देखना चाहिए।
इस प्रसङ्ग से यह शिक्षा भी मिलती है कि हमें किसी व्यक्ति को केवल उसके कर्मों के आधार पर नहीं, अपितु उसके भीतर स्थित श्रीभगवान् के अंश के रूप में देखना चाहिए।
इसी प्रकार ऑपरेशन ‘सिन्दूर’ के दौरान भारतीय सेना द्वारा दूसरे शहीद सैनिकों का भी सम्मानपूर्वक अन्तिम संस्कार किया जाना भी इसी गुणातीत भाव का उदाहरण है। शत्रुता समाप्त हो जाने के बाद, विशेषतः मृत्यु के पश्चात् प्रत्येक व्यक्ति को श्रीभगवान् का अंश मानकर सम्मान देना चाहिए।
गुणातीत व्यक्ति का स्वभाव भी ऐसा ही होता है, वह मित्र और शत्रु दोनों को समान दृष्टि से देखता है और सभी के प्रति सम्मान का भाव रखता है।
श्रीभगवान् गुणातीत पुरुष के इन लक्षणों का वर्णन इसलिए करते हैं ताकि हम भी अपने जीवन में इन गुणों को अपनाकर धीरे-धीरे गुणातीत अवस्था की ओर अग्रसर हो सकें।
मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि गुणातीत बनने का एक ही सरल और निश्चित उपाय है अनन्य भक्ति।
जितनी अधिक प्रसन्नता, श्रद्धा और एकनिष्ठ भाव से
श्रीभगवान् की भक्ति की जाती है,
उतना ही साधक तीनों गुणों के बन्धन से ऊपर उठने लगता है।
भक्ति का वास्तविक अर्थ अपने जीवन के समस्त कर्मों को श्रीभगवान् को समर्पित कर देना है। जब हम यह भाव रखकर कार्य करते हैं कि “मैं कुछ भी अपने लिए नहीं कर रहा हूँ, सब कुछ श्रीभगवान् के लिए है”, तब कर्म हमें बाॅंधते नहीं, अपितु मुक्त करने लगते हैं।
ऐसी अनन्य भक्ति के द्वारा साधक गुणातीत अवस्था को प्राप्त करता है और अन्ततः श्रीभगवान् की प्राप्ति करता है।
यही श्रीभगवान् की अन्तिम शिक्षा है। कर्म करते हुए भी उनसे आसक्त न होना और भक्ति के माध्यम से तीनों गुणों से परे उठ जाना।
ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥
विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि गुणातीत अवस्था को प्राप्त करने पर साधक को शाश्वत आनन्द की प्राप्ति होती है। ऐसा आनन्द जो कभी समाप्त नहीं होता। यह आनन्द श्रीभगवान् के सान्निध्य से उत्पन्न होता है। जैसे-जैसे साधक श्रीभगवान् के निकट आता जाता है, वैसे-वैसे उसके भीतर यह दिव्य आनन्द स्वतः प्रकट होने लगता है।
हमें अपने प्रत्येक कार्य का आत्मपरीक्षण करना चाहिए और यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि कौन-सा कर्म तमोगुण से प्रेरित है, कौन-सा रजोगुण से और कौन-सा सत्त्वगुण से। हमें तमोगुण को कम करने का अभ्यास करना चाहिए, रजोगुण को सत्त्वगुण में रूपान्तरित करने का प्रयास करना चाहिए और फिर सत्त्वगुण से भी आगे बढ़कर गुणातीत अवस्था की ओर अग्रसर होना चाहिए।
इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने सभी कर्मों को श्रीभगवान् को समर्पित करें और उनसे प्रार्थना करें कि वे हमें सदा सत्त्वगुण में स्थित रखें तथा हमें विवेक और बुद्धि प्रदान करें, जिससे हम क्रमशः तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत अवस्था को प्राप्त कर सकें। अभी हमें गुणातीत बनने के लिए अधिक अभ्यास करना पड़ेगा।
तमोगुण से रजोगुण में और फिर
रजोगुण से सत्त्वगुण में हमें जाना है।
इसके उपरान्त सभी ने भक्तिभाव से हरि शरणम् धुन का गायन किया। हरि नाम सङ्कीर्तन के साथ आज का सत्र समाप्त हुआ और प्रश्नोत्तर सत्र प्रारम्भ हुआ।
प्रश्नोत्तर सत्र
प्रश्नकर्ता- मानसविनी दीदी
प्रश्न- यदि विवेचन सत्र नहीं सुन पाए तो क्या करें?
उत्तर- आप पुनः उस यू ट्यूब लिङ्क पर जाकर सुन सकते हैं।
।।ॐश्रीकृष्णार्पणमस्तु।।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।