विवेचन सारांश
हमारे जीवन पर त्रिगुणों का प्रभाव
हमारी चिर-प्राचीन सनातनी परम्परा का निर्वाह करते हुए ईश-वन्दना, गुरु-वन्दना, राष्ट्र-वन्दना तथा सङ्कट-मोचन श्री हनुमान चालीसा के पाठ के साथ आज के सत्र का शुभारम्भ हुआ।
हम सभी अत्यन्त भाग्यशाली हैं कि हमें श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़ने तथा पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ है। ईश्वर ने स्वयं हमारा चयन किया है यह अवसर सभी को प्राप्त नहीं होता। पंञ्जीकरण तो बहुत से बच्चों ने किया था परन्तु कुछ ही बच्चे कक्षा में आ पा रहे हैं और उनमें से भी केवल कुछ ही विवेचन सत्र में सम्मिलित हो पा रहे हैं।
हम गीताजी के अर्थ को समझने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे हम अपने जीवन को और अधिक सुन्दर बना सकें। जैसे-जैसे आप आगे पढ़ते जायेंगे, आपको अनुभव होगा कि आपमें स्पष्टता आती जा रही है। धीरे-धीरे सोचने-समझने की शक्ति बढ़ती जाएगी, विवेक विकसित होता जाएगा। अभी हम बहुत भ्रमित रहते हैं कि क्या करना है और क्या नहीं करना है? क्या उचित है क्या अनुचित है? किन्तु जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते जायेंगे तथा अर्थ समझते जायेंगे हमारा यह भ्रम दूर होता जाएगा तथा जीवन उन्नत होता जाएगा। इस अवसर का हमें पूर्ण रूप से उपयोग करना चाहिए और श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से अपने जीवन को निरन्तर सुन्दर बनाते जाना चाहिए।
हमने बारहवें, पन्द्रहवें तथा सोलहवें अध्याय का अध्ययन किया है। अब हम अध्याय सत्रह का अध्ययन कर रहे हैं।
हमने बारहवें में भक्ति योग का और पन्द्रहवें अध्याय में पुरुषोत्तम योग का अध्ययन किया।
सोलहवें अध्याय में दैवासुरसम्पद्विभाग योग में छब्बीस दैवीय गुणों की बात हुई थी कि एक अच्छे व्यक्ति में क्या क्या गुण होते हैं तथा वह व्यक्ति जो बुरा ही बुरा करता अथवा सोचता है उसमें क्या-क्या अवगुण होते हैं? हमें किन बातों का अनुसरण करना है अथवा नहीं करना है? यह सब हमने सोलहवें अध्याय में देखा था।
हो सकता है कुछ बच्चों ने इन गुणों का अनुसरण भी प्रारम्भ कर दिया हो और यदि नहीं किया हो तो अब अभी से करना प्रारम्भ कर दें क्योंकि इससे आपके स्वभाव में ऐसी बहुत सी अच्छी बातें आयेंगी।
हम धीरे-धीरे दैवीय गुणों को अपना सकते हैं - यह प्रयत्न हमें करते रहना चाहिए। छोटे बच्चों को यह नहीं सोचना चाहिए कि हम अभी छोटे हैं हमें अभी इसकी आवश्यकता नहीं है तथा बड़े बच्चों को यह नहीं सोचना चाहिए कि हम बड़े हैं हमें इसकी क्या आवश्यकता है? चाहे हम छोटे बच्चे हों या बड़े-बूढ़े सभी को इन अच्छे गुणों की आवश्यकता होती है क्योंकि हम अपने जीवन को कितना अच्छा बना सकते हैं, कितना सुन्दर सोच सकते हैं - इसका प्रयास हमें करते रहना चाहिए।
आज का अध्याय है- श्रद्धात्रयविभाग योग।
यहाँ हम श्रद्धा की बात करेंगे। सोलहवें अध्याय के अन्तिम श्लोक में यह बात बताई गई है कि जो श्रद्धा से काम नहीं करता है, उसे सफलता नहीं मिलती है।
तस्मात् शास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञत्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहासि ॥"
जो लोग श्रद्धा से कार्य नहीं करते हैं, उनको न सुख की प्राप्ति होती है न सफलता मिलती है।
गीता जी में पुनः-पुन: श्रद्धा शब्द का प्रयोग हुआ है अतः श्रीभगवान् ने इस अध्याय में श्रद्धा के बारे में विस्तृत ज्ञान दिया है। श्रद्धा तीन प्रकार की होती है - सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक।
बालसाधकों से बीच- बीच में प्रश्न किये गये।
प्रश्न- जो लोग दैवीय गुणों को अपनाना चाहते हैं, जो देवता बनना चाहते हैं, वे नमस्ते की मुद्रा में हाथ जोड़कर बताएँगे और जो आसुरी गुणों को अपनाना चाहते हैं, वे हाथ की मुट्ठी बाँधकर सामने हाथ करके दिखायेंगे।
प्रायः सभी बच्चों ने हाथ जोड़कर छब्बीस दैवीय गुणों को अपनाकर देवता बनने में रुचि प्रकट की। सभी छब्बीस दैवीय गुणों को अपनाकर देवता बनना चाहते हैं।
श्रद्धा का अर्थ क्या है?
किसी बात में कोई भी सन्देह किये बिना विश्वास करना।
हमें अपने माता-पिता पर पूर्ण विश्वास होता है, पूर्ण श्रद्धा होती है। क्या हमें कभी ऐसा लगता है कि वे हमारे साथ कुछ गलत करेंगे? नहीं, क्योंकि हमें उन पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होता है।
यह शङ्कारहित, संशयरहित पूर्ण विश्वास ही श्रद्धा कहलाता है।
इसी प्रकार कुछ लोगों को श्रीभगवान् पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास होता है।
हमारे कुछ मित्र, शिक्षक अथवा सम्बन्धी होते हैं जिन्हें हम कोई भी बात बता सकते हैं। हमें यह ज्ञात होता है कि वह हमारी कोई भी बात किसी और को नहीं बतायेंगे। वह हमें कोई गलत सलाह नहीं देंगे। यह उनके प्रति हमारी श्रद्धा है।
एक साथ कई बातों पर भी हमारी श्रद्धा हो सकती है।
इस बात को हम एक कथा से समझते हैं। कछुए तथा खरगोश की कहानी सभी ने सुनी है। इस कहानी में दोनों में शर्त लगी कि वे दोनों भागकर एक तालाब तक जाने की प्रतियोगिता करेंगे तथा यह देखेंगे कि कौन जीतता है? खरगोश तेज तो होता है किन्तु चुलबुला भी होता है। वह कछुए को चिढ़ाता है और अन्ततः थककर एक पेड़ के नीचे लेट जाता है। मैं थोड़ा आराम कर लूँ, फिर उठकर कर भाग लूँगा, परन्तु उसे नींद लग गई। जब वह सो कर उठा तो भागते हुए तालाब के पास पहुँचा। उसे लगा कि कछुआ तो धीरे-धीरे चलता है इसलिए वह तो पहुँच ही नहीं सकता किन्तु वह गलत था। कछुआ तो वहाँ पहले से ही पहुँच चुका था। अब कछुआ खरगोश को चिढ़ाने लग गया।
इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
यदि कछुए को अपने ऊपर श्रद्धा और विश्वास नहीं होता तो वह कभी नहीं जीत सकता था
इसी प्रकार हमारे जीवन में होता है। जब हम पढ़ाई या कोई अन्य कार्य करते हैं तो कुछ लोग तो सकारात्मक सोचते हैं किन्तु कुछ लोग बिल्कुल नकारात्मक सोचते हैं कि उनसे वह कार्य होगा ही नहीं।जब हमने अपनी श्रद्धा को पहले ही समाप्त कर दिया अथवा उसे पर संशय कर लिया तो हम उस कार्य में कभी विजेता नहीं हो सकते। किसी कार्य को करने के पहले ही उसके बारे में पूर्व धारणा नहीं बनानी चाहिये। किसी भी कार्य को लेकर सकारात्मक विचार रखना चाहिये। जैसी श्रद्धा होगी वैसे परिणाम आयेंगे।
17.1
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य, यजन्ते श्रद्धयान्विताः|
तेषां(न्) निष्ठा तु का कृष्ण, सत्त्वमाहो रजस्तमः||17.1||
शास्त्रों के अन्तर्गत वेद, उपनिषद, दर्शन-शास्त्र, मनुस्मृति, पाराशर स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, रामायण, महाभारत, सभी पुराण, वैष्णव आगम, शैव आगम आदि- इन सबको शास्त्र कहा जाता है।
शास्त्र कोई एक पुस्तक नहीं है जो एक ही स्थान पर रखी हो। गीता-उपनिषद, वेद-पुराण रामायण-महाभारत दर्शन - यह सभी शास्त्रों के अन्तर्गत आते हैं।
जिन्होंने वेद शास्त्र अथवा गीता उपनिषद नहीं पढ़ी है अथवा जिन्होंने कभी भी इन शास्त्रों का अध्ययन नहीं किया, उनकी श्रद्धा किस श्रेणी में आएगी?
श्रीभगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा, देहिनां(म्) सा स्वभावजा|
सात्त्विकी राजसी चैव, तामसी चेति तां(म्) शृणु||17.2||
अब मैं तुम्हें इसके विषय में विस्तार से बताऊँगा।
सात्त्विक का अर्थ है—जितने भी अच्छे कार्य हैं, वे सब सात्त्विक के अन्तर्गत आ जाते हैं। सबके लिये अच्छा सोचते हैं, अच्छा करते हैं, ईश्वर की भक्ति करते हैं, दान करते हैं, किसी की सहायता करते हैं, ये सब सात्त्विक क्रिया और कर्म है।
राजसिक का अर्थ है—बहुत अधिक इच्छाएँ होना।
मनुष्य के अन्दर बहुत-सी इच्छाएँ होना और उन्हें पूरा करने के लिए अत्यधिक सक्रिय रहना। इसमें मनुष्य की आसक्ति वस्तुओं के प्रति बहुत अधिक बढ़ जाती है।
“यह मेरा है”, “यह मैंने बनाया है”, “यह मैंने किया है”, “मैंने यह काम किया”, “मैंने यह प्रतियोगिता जीती है”, “मैंने यह ट्रॉफ़ी प्राप्त की है”, “यह ट्रॉफ़ी मेरी है”, “कोई इसे छूना नहीं है”, “केवल मैं ही इसे छू सकता हूँ”—ये सारे भाव राजसिक भाव हैं।
ऐसा नहीं है कि मन में कोई इच्छाएँ आएँगी ही नहीं, किन्तु आवश्यकता है कि उतनी ही इच्छा होनी चाहिए जितनी आवश्यक हो।
जैसे हमारे पास बहुत-सी पोशाकें हैं, फिर भी नई पोशाक चाहिए; जूते हैं, फिर भी नए जूते चाहिए; घड़ी है, फिर भी नई घड़ी चाहिए; बस्ता है, फिर भी नया बस्ता चाहिए। नया-नया सामान अच्छा लगता है, इसलिए हम नया सामान लेना चाहते हैं।
यदि हम नया सामान लेते भी हैं तो पुराना सामान, पुरानी वस्तुएँ किसी ऐसे व्यक्ति को दान कर देते हैं, जिसे उसकी अधिक आवश्यकता है, तब तो ठीक है। यदि हम ऐसा नहीं करते और अपनी इच्छाओं को बढ़ाते जाते हैं, अधिक से अधिक वस्तुएँ इकट्ठी करते हैं, उतना ही उनमें हमारा लगाव बढ़ता जाता है और आसक्ति बढ़ती जाती है।
तामसिक का अर्थ है—जिनका न सक्रिय रहना है, न उन्हें कोई कार्य करना है। उनके किसी भी कार्य में रुचि नहीं होती। केवल खाना और सोना ही उनका जीवन होता है।
इसका एक बहुत सुन्दर उदाहरण देखते हैं- जैसे हमने विभीषण, रावण और कुम्भकर्ण का नाम सुना है। हम इन तीनों के विषय में जानते हैं। ये तीनों भाई थे।
विभीषण हमेशा भक्ति-भाव में रहते थे, ईश्वर में लीन रहते थे, नाम-जप किया करते थे। विभीषण सात्त्विक व्यक्ति का उदाहरण हो गये।
रावण की बहुत अधिक इच्छाएँ थीं, जैसे—मुझे सोने की लङ्का चाहिए। वह अपने राज्य को हर समय बढ़ाता रहता था। रावण राजसिक था क्योंकि उसे बहुत अधिक इच्छाएँ थीं और अपनी वस्तुओं से बहुत अधिक लगाव था।
कुम्भकर्ण केवल खाता था और सोता था। वह छः महीने खाता था और छः महीने के लिए सो जाता था।
इस प्रकार विभीषण सात्त्विक थे, रावण राजसिक था और कुम्भकर्ण तामसिक था। एक ही घर में तीन अलग-अलग प्रवृत्तियों के अलग-अलग श्रद्धा के व्यक्ति थे।
प्रश्न- श्रद्धा कितने प्रकार की होती है?
विकल्प— तीन, दो, पाँच या चार।
उत्तर- तीन
अधिकांश बच्चों ने सही उत्तर दिया कि श्रद्धा तीन प्रकार की होती है।
ऐसा नहीं होना चाहिए कि हमारे पास पहले से सब कुछ है, फिर भी हमें और चाहिए—वही वस्तुएँ और चाहिए, उनसे भी अच्छी वस्तुएँ चाहिए, जिनकी हमें आवश्यकता भी नहीं है।
विकल्प-सात्त्विक के लिए एक, राजसिक के लिए दो तथा तामसिक के लिए तीन।
अधिकांश बच्चों ने सात्त्विक गुण के विषय में उत्तर दिया।
हमारे अन्दर वैसे तो तीनों प्रकार की श्रद्धाएँ होती हैं किन्तु उनमें से कोई एक श्रद्धा ऐसी होती है जो अधिक मात्रा में होती है। जो समझते हैं कि उनके अन्दर सात्त्विकता अधिक है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उनके अन्दर राजसिकता और तामसिकता नहीं होगी, परन्तु सात्त्विकता अधिक मात्रा में होगी और राजसिकता तथा तामसिकता कम होगी।
किसी के अन्दर यदि तामसिक गुण अधिक होता है, तो वह कुछ भी नहीं करता, केवल खाता है और सो जाता है, कोई कार्य नहीं करता। इसका अर्थ है कि उसके अन्दर तामसिकता अधिक है।
इसी प्रकार जिनमें राजसिकता अधिक होती है, वे हर समय सक्रिय दिखाई देते हैं, हर समय कुछ-न-कुछ कार्य करते रहते हैं। ऐसे लोग राजसिक कहलाते हैं। उनके अन्दर सात्त्विकता कम होती है।
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य, श्रद्धा भवति भारत|
श्रद्धामयोऽयं(म्) पुरुषो, यो यच्छ्रद्धः(स्) स एव सः||17.3||
इसका अर्थ है कि हमारे मन में जैसे विचार आते हैं, वैसी ही हमारी श्रद्धा बनती जाती है और वैसे ही फिर आगे हम काम भी करते हैं। जैसे, हमने कछुए तथा खरगोश वाली कहानी सुनी है।
कछुआ बहुत धीमा चलता था लेकिन उसकी सोचने की जो पद्धति थी, उससे उसने वह दौड़ जीत ली थी। उसकी चाल (speed) बहुत धीमी थी तो भी वह जीत गया।
उसी प्रकार, हमारी जिस बात पर भी श्रद्धा होती है, हम वैसे ही बन जाते हैं। जैसे, यदि हमारी पढ़ाई में बहुत श्रद्धा है तो हम पढ़ाकू कहलाते हैं। ऐसा बहुत बच्चों के साथ हमने सुना होगा कि उनको सब पढ़ाकू बोलते हैं। हो सकता है कि आपमें से भी कुछ बच्चों को पढ़ाकू बोला जाता हो क्योंकि उनकी पढ़ाई में बहुत श्रद्धा है। उनको पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। पढ़ाई में बहुत उनका अधिक विश्वास है।
जिस भी बात में हमारी श्रद्धा होती है, हम वैसे ही बनते चले जाते हैं। हमारी श्रद्धा इस बात पर निर्भर करती है कि हम कैसा सोचते हैं। सकारात्मक (positive) सोचते हैं या नकारात्मक (negative) सोचते हैं।
ऐसे ही, कोई क्रिकेटर है जैसे हम सुनते हैं, विराट कोहली, महेन्द्र सिंह धोनी, रोहित शर्मा आदि। इनकी श्रद्धा क्रिकेट में बहुत अधिक है इसीलिए ये क्रिकेटर कहलाए।
अब यदि मैं अभी क्रिकेट खेलने चली जाऊँ तो क्या मुझे क्रिकेटर बोलने लग जाएँगे?
नहीं! क्योंकि हम तो बस आनन्द के लिए खेलने जा रहे हैं। हम बहुत बड़े खिलाड़ी नहीं हैं। हम क्रिकेटर्स नहीं हैं।
किसी को बिस्तर पर पड़े रहने में, आलस्य में बड़ा आनन्द आता है तो उसको सब आलसी कहने लग जाते हैं।
जो गेम खेलने में बहुत निपुण (expert) है, वह गेमर बन जाता है। ऐसे ही किसी को गायन (singing) में बड़ा शौक है और वह बहुत अच्छा गाने लगता है तो वह गायक बन जाता है।
तो जिस भी बात में हमारी श्रद्धा होती है, हम वैसे ही बनते जाते हैं।
यदि कोई कहे कि मुझे गायन में बिल्कुल रुचि नहीं है तो फिर वह कभी गा ही नहीं सकती लेकिन यही यदि उसका शौक है और वह कहे कि मैं अच्छा गा सकती हूँ तो वह अच्छा गाना सीख जायेगी।
इसलिए, जैसी श्रद्धा हमारी होती है, हम वैसे ही बनते जाते हैं, फिर वह कोई भी विषय हो सकता है। वह सकारात्मक विषय भी हो सकता है तथा नकारात्मक विषय भी हो सकता है।
हमारे घर में हमारे भाई-बहन होते हैं। कई बार हम हँसी-मजाक में कुछ करते हैं लेकिन उसका प्रभाव अच्छा नहीं पड़ता है। हमारे छोटे भाई-बहन हों या बड़े भाई-बहन हों, हम उनको कभी-कभी उल्टा-सीधा बोलने लगते हैं - “तुम तो मूर्ख हो, तुम तो पागल हो, तुम तो बेवकूफ हो। तुम कुछ नहीं कर सकते। एकदम धीमे सीखते हो” आदि। तो अगर ऐसा-ऐसा हम बोलते हैं तो उनके मन में वह सब विचार बनने लग जाता है-
"हाँ! मैं मूर्ख हूँ, मैं बेवकूफ हूँ।”
हमने उनकी श्रद्धा को बिलकुल नकारात्मक बना दिया।
इस प्रकार हम जैसा देखते हैं, जैसा सुनते हैं, जैसा हमारा वातावरण होता है, वैसे ही हमारा मस्तिष्क काम करने लग जाता है। हम जितना सकारात्मक वातावरण में रहते हैं, उतना अच्छा सोचते हैं और जितना नकारात्मक सोचेंगे उतना गलत कार्य करेंगे।
जैसे विचार, वैसे कार्य तथा जैसे कार्य, वैसा हमारा स्वरूप।
हम अगर एक अच्छे व्यक्ति बनना चाहते हैं तब तो हमें सकारात्मक सोचना होगा। फिर सब सकारात्मक करना होगा। अब यदि हम सुबह उठकर कहें कि “आज मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। आज तो बहुत थकान महसूस हो रही है।” ऐसे कहेंगे फिर तो सारा दिन हमें वैसा ही लगेगा। सारा दिन ऐसे ही थका-थका महसूस होगा।
स्वामी विवेकानन्द ने भी कहा था कि “मनुष्य विचारशील प्राणी है।” तो जो जैसा विचार करता है, जो जैसा सोचता है, वह वैसा ही बन जाता है।
इसलिए हम सभी को प्रयास करना चाहिए कि हम हमेशा अच्छा सोचें। केवल अपने लिए नहीं, सभी के लिए अच्छा सोचें। केवल अपने लिए सकारात्मक रहेंगे, दूसरों के लिए नकारात्मक रहेंगे तो वह भी ठीक बात नहीं है। दूसरों के लिए सकारात्मक रहेंगे, अपने लिए नकारात्मक रहेंगे तो वह भी ठीक नहीं है। दोनों के लिए सकारात्मक होना चाहिए- अपने लिए भी और हमारे हमारे आस-पास जितने लोग भी हैं, सभी के लिए अच्छा सोचें और स्वयं के लिए भी अच्छा सोचें।
इस भावना के साथ जब हम आगे बढ़ते हैं तो फिर हम सब अच्छा-अच्छा ही करते हैं। फिर हमें कोई समस्या नहीं होती। फिर हमें बुरा भी महसूस नहीं होता। फिर हमें अच्छा ही महसूस होता है।
श्रीभगवान् आगे के श्लोकों में श्रद्धा के विषय में और अधिक विस्तार से बताएँगे कि कहाँ-कहाँ सात्त्विक श्रद्धा है, कहाँ राजसिक श्रद्धा है और कहाँ तामसिक श्रद्धा है। आगे पूजा की बात की जाएगी कि साात्त्विक पूजा कौन सी है, राजसिक पूजा कौन सी है तथा तामसिक पूजा कौन सी है। आगे के श्लोकों में हम भोजन के विषय में भी जानेंगे कि सात्त्विक भोजन कौन सा है, राजसिक कौन सा है तथा तामसिक कौन सा है।
यजन्ते सात्त्विका देवान्, यक्षरक्षांसि राजसाः|
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये, यजन्ते तामसा जनाः||17.4||
जो राजसिक स्वभाव के लोग होते हैं, वे यक्षों और राक्षसों का भी पूजन करते हैं। वे यज्ञ और हवन भी किसी न किसी भौतिक वस्तु की प्राप्ति के उद्देश्य से करते हैं।
जो तामसिक लोग होते हैं, वे भूत-प्रेतों की भी पूजा करते हैं। जैसा कि हम चलचित्रों (मूवीज) में देखते हैं, ये लोग रात्रि में श्मशान में जाकर भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं। ऐसी पूजा वे किसी दूसरे का अहित हो जाए, इस भावना से करते हैं।
अब आगे इसे विस्तार से समझते हैं।
अशास्त्रविहितं(ङ्) घोरं(न्), तप्यन्ते ये तपो जनाः|
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः(ख्), कामरागबलान्विताः||17.5||
प्रश्न-अध्याय सोलह में आए शब्द 'आर्जवम्' का तात्पर्य क्या है?
बच्चों को सम्भावित उत्तर (options) दिए गए।
बहुत से बच्चों ने स्क्रीन पर अपने उत्तर भेजे। अधिकांश बच्चों ने गलत उत्तरों पर निशान लगाया।
उत्तर-आर्जवम् का सही मतलब है सरलता।
कुछ लोग पूजन में अपने शरीर को अत्यन्त कष्ट में डालते हैं- जैसे कि हम टी.वी. धारावाहिक ‘माता की चौकी’ में देखते हैं कि कोई भक्त अपनी हथेली पर कपूर जला लेता है और दुर्गा माँ से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की माँग करता है। ऐसा करना तामसिक प्रवृत्ति के अन्तर्गत आता है।
जो लोग मन्दिर में भी केवल लोगों को दिखाने के लिए जाते हैं, गणेश उत्सव में भी दिखावे के लिए जाते हैं, फिल्मी गानों पर नाचते हैं, यह सब तामसिक प्रवृत्ति में ही आता है।
ऐसा हमें नहीं करना चाहिए क्योंकि हम श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ते हैं और यह जानते हैं कि क्या सही है और क्या गलत। हमें ऐसे कोई भी कार्य नहीं करने चाहिए, जिनका उल्लेख हमारे शास्त्रों में नहीं किया गया है। गणेश उत्सव में यदि कुछ करना हो, तो भजनों पर नृत्य करें, फिल्मी गानों पर नहीं।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार श्रीभगवान् को केवल श्रद्धा-भाव ही प्रिय होता है।
कर्शयन्तः(श्) शरीरस्थं(म्), भूतग्राममचेतसः|
मां(ञ्) चैवान्तः(श्) शरीरस्थं(न्), तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्||17.6||
आहारस्त्वपि सर्वस्य, त्रिविधो भवति प्रियः|
यज्ञस्तपस्तथा दानं(न्), तेषां(म्) भेदमिमं(म्) शृणु||17.7||
अगले श्लोक में हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि हम कौन सा आहार खाते हैं।
आयुः(स्) सत्त्वबलारोग्य, सुखप्रीतिविवर्धनाः|
रस्याः(स्) स्निग्धाः(स्) स्थिरा हृद्या, आहाराः(स्) सात्त्विकप्रियाः||17.8||
सात्त्विक भोजन स्थिर, रसयुक्त तथा स्निग्ध होता है और वह हमारे शरीर में दीर्घकाल तक रहता है जैसे यदि हम घी, दूध, दही, मक्खन, सब्जियाँ आदि ग्रहण करते हैं, तो इनके पोषक तत्त्व हमारे शरीर में स्थिर रहते हैं और हमें दीर्घकाल तक लाभ पहुँचाते है। सात्त्विक भोजन, घर का बना हुआ दाल, चावल, रोटी, सब्जी, हमें बीमार नहीं करता अपितु लाभ ही करता है; कोई हानि नहीं पहुँचाता हैं। ऐसा भोजन सात्त्विक मनुष्यों को प्रिय होता है।
कट्वम्ललवणात्युष्ण, तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः|
आहारा राजसस्येष्टा, दुःखशोकामयप्रदाः||17.9||
पिज्जा, बर्गर, मोमो, ये सब राजसी भोजन है। इसमें पोषण तत्त्व बहुत कम होते हैं। राजसी भोजन का अत्यधिक सेवन शरीर के अङ्गों जैसे कि किडनी, लिवर को हानि पहुँचाते हैं।
यातयामं(ङ्) गतरसं(म्), पूति पर्युषितं(ञ्) च यत्|
उच्छिष्टमपि चामेध्यं(म्), भोजनं(न्) तामसप्रियम्||17.10||
सभी ने एक कहावत सुनी होगी-
"जैसा खाए अन्न, वैसा होगा मन।"
जितना तीखा और कड़वा हम खाएँगे, हमारे मन में विचार भी वैसे ही होंगे। हम नकारात्मक होने लग जाते हैं, बहुत ही उग्र ( agressive) भी सोचने लग जाते हैं इसलिए हमें सात्त्विक भोजन ही खाना चाहिए, जिससे हमारी सात्त्विक प्रवृत्ति बनेगी।
बच्चों से जब पूछा गया कि चटपटा भोजन कैसा लगता है, तो कुछ बच्चों बताया कि उन्हें चटपटा भोजन अच्छा लगता है पर बहुत से बच्चों ने बताया कि उन्हें सात्त्विक भोजन अच्छा लगता है।
किसी ने कहा चौबीस, किसी ने अठ्ठाइस तो किसी ने तीस। इन बातों को सभी को जानना चाहिए।
सभी बच्चों की प्रशंसा तथा उत्साहवर्धन किया गया। श्रीहरिनाम सङ्कीर्तन के पश्चात प्रश्न-उत्तर सत्र का प्रारम्भ हुआ।
प्रश्न- मुझे नृत्य, कराटे, पढ़ाई पसन्द हैं। मेरी श्रद्धा कौन-सी हुई?
उत्तर- ये आप स्वयं ही बता सकते हैं कि आपकी श्रद्धा किसमें है। इन तीनों में आप कौन सा कार्य अच्छे से कर पाते हो? इन तीनों में से किसी एक को चुनना है तो आप किसको चुनोगे? आपको पता चल जायेगा कि आपकी श्रद्धा किसमें है।
प्रश्न- तामसी क्या हुआ?
उत्तर- तामसी अर्थात् अक्रिय होना। आलसी, काम नहीं करना। केवल खाना और सोना। हमलोगों में कोई भी तामसी नहीं है। हम गीताजी पढ़ते हैं। बहुत काम भी करते है। जितनी आवश्यकता होती है उतना ही सोते हैं।
मैंने सुना है, बहुत से बच्चे विद्यालय भी बहुत कम आते हैं। खाली खाते और सोते हैं। आलसी प्रवृत्ति के होते हैं, उनको तामसी कहते हैं।
प्रश्नकर्ता- अवनि दीदी
प्रश्न- दीदी मैं अभी क्रिसमस की छुट्टियों में जगन्नाथजी के मन्दिर गयी थी।
उत्तर- बहुत अच्छा। छुट्टियों में इधर-उधर जाने की जगह आप धार्मिक स्थल जाकर आये।