विवेचन सारांश
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत
परम श्रद्धेय लोकमान्य तिलक जी को अंग्रेजों की सरकार ने कालेपानी की सजा दी थी। तब माण्डले के कारागृह में कर्मयोग पर ही उन्होंने यह महत्त्वपूर्ण रहस्य लिखा था। यह ग्रन्थ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है ।
इस अध्याय में प्रवेश करने के पूर्व हम लोग इसके पहले वाले अध्याय का चिन्तन करेंगे। प्रथम अध्याय में दोनों सेनाएं कुरुक्षेत्र में आमने-सामने खड़ी थीं। ऐसे समय में जब अर्जुन ने कहा कि हे केशव! मेरा रथ दोनों सेनाओं के मध्य भाग में ले चलिएगा। मैं दोनों सेनाओं का निरीक्षण करना चाहता हूँ।
1·22
और दूसरी ओर नि:शस्त्र श्रीभगवान् स्वयं।
सज्जन शक्ति सङ्गठित और सशक्त होनी चाहिए।
यही विश्व का कल्याण करेगी।
2·20
2·72
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय कृतनिश्चयः॥
2·37
"मैं यही तो चाहता हूँ। मुझे आत्मज्ञान और शान्ति चाहिए।"
2·47
2·49
3.1
अर्जुन उवाच
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते, मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं(ङ्) कर्मणि घोरे मां(न्), नियोजयसि केशव॥3.1॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन, बुद्धिं(म्) मोहयसीव मे।
तदेकं(व्ँ) वद निश्चित्य, येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥3.2॥
एक बार एक चिकित्सक के पास एक माता-पिता अपने बच्चे को लेकर आते हैं और कहते हैं कि हम चाहते हैं कि हमारा बेटा चिकित्सक बने। आप उसे अपने परामर्श से उसके मस्तिष्क में यह बात भर दीजिये। वे अपने मन की बात सामने वाले व्यक्ति से कहलवाना चाहते हैं। इसी प्रकार मनुष्य अपने माता-पिता या गुरु से अपने मन की बात ही सुनना चाहते हैं, मैंने जो निर्णय लिया है वही बात इनके मुख से आ जाए। यही स्थिति अर्जुन की भी है।
अब अर्जुन श्रीभगवान् से श्रेय की बात करते हैं।
दो प्रकार की बातें होती हैं-
श्रेयस्
प्रेयस्
जैसे मिठाई हमें प्रिय है, उसे खाने के लिए हमें किसी से पूछना नहीं पड़ता, परन्तु हमें शकर की बीमारी (डायबिटीज) है तो मिठाई का सेवन हमारे लिए श्रेयस् है या नहीं यह चिकित्सक ही बताएगा। श्रेष्ठ व्यक्ति अपना श्रेयस ही पूछते हैं। इसी भाॅंति भगवद्गीता सभी के श्रेयस की बात करती है और प्रत्येक व्यक्ति का श्रेयस उसकी प्रकृति, सङ्गोपन (पालन पोषण) पर आधारित होगा। प्रत्येक व्यक्ति का श्रेयस भिन्न-भिन्न होता है।
अर्जुन ने प्रथम अध्याय में ही कह दिया था-
यच्छ्रेयः स्यान्निश्र्चितं ब्रूहि तन्मे, शिष्यस्तेSहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ।।
2·07
हे भगवन् ! मेरी वीर वृत्ति करुणा से ढक गयी है। अब मैं अपना श्रेय समझ नहीं पा रहा हूँ। मैं आपका शिष्य हूँ। मैं आपकी शरण में आया हूँ। आप मुझे उपदेश कीजिये। इसके पश्चात् ही दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक से श्रीभगवान् के मुखारविन्द से शाश्वत ज्ञान की धारा प्रवाहित हुई और उन्होंने स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताये।
ज्ञानेश्वर महाराज ने श्रीभगवान् और अर्जुन दोनों के मनोभाव ज्ञानेश्वरी में अत्यन्त सुन्दर रूप से समाहित किये हैं। अर्जुन पूछते हैं-
श्रीकृष्णा विवेकु याकारणें । पुसिला तुज ॥
मेरी बुद्धि मोहित हो गयी है और मैं मोह से छटपटा रहा हूँ।
भगवद्गीता के दो मुख्य स्वर हैं-
भगवद् भक्ति
विवेक की प्राप्ति
विवेक अर्थात् क्या करना चाहिए क्या नहीं, इसका आकलन करने की सही शक्ति।
मनुष्य द्वन्द्वों में रहता है। विवेक की जागृति ही भगवद्गीता का मुख्य स्वर है। कबीरदास जी कहते हैं-
कृष्णा विवेकु या कारणें । पुसिला तुज ॥
तंव तुझी एकेकी नवाई । एथ उपदेशामाजीं गोवाई ।
तरी अनुसरलिया काई । ऐसें कीजे ॥
हे भगवान्! मैं आपकी शरण में आया, मैंने आपसे पूछा मेरे लिए क्या श्रेयस्कर है, और आप ही मेरे साथ खेल कर रहे हैं । जो आपके चरणकमलों पर आश्रित रहना चाहता है, उसके साथ ऐसा किया जाता है क्या? उसके साथ इस प्रकार से मिश्रित वाक्यों से समाधान दिया जाता है क्या? भगवन् निश्चित करके एक ही बात बताइयेगा जिससे मैं अपने जीवन में श्रेयस प्राप्त कर लूँ।
जो अपने विचारों में उलझा हुआ रहता है उसके कर्ण सुनते नहीं हैं। उसके अन्दर विचारों का कोलाहल होता है। ऐसे व्यक्ति को पहले डाँटना पड़ता है।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं, त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।
2·03
श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, हे पार्थ! नपुंसकता (कायरता) को मत प्राप्त हो; यह तुम पर शोभा नहीं देता। हे शत्रु-तापदायक! हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर उठो और युद्ध करो।
श्रीभगवानुवाच
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा, पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां(ङ्), कर्मयोगेन योगिनाम्॥3.3॥
3:3
साङ्ख्य शब्द का अर्थ है- ज्ञान। इस दर्शनशास्त्र के प्रणेता कपिलमुनि हैं। वे बताते हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों के संयोग से सृष्टि का कार्य चलता है।
परन्तु यहाँ श्रीभगवान् कहते हैं कि दो प्रकार की मनोवृत्तियाँ होती हैं। ज्ञानयोगी और कर्मयोगी।
कुछ लोग विचार प्रधान होते हैं, जिनका मन ध्यान, पूजा में लगता है। वे पुस्तकें पढ़ते हैं। ज्ञान अर्जन करने में मन लगता है। वे बुद्धि का आश्रय लेते हुए तत्त्वों को खोजते हैं। ऐसे लोगों के लिए ज्ञानयोग है।
दूसरे लोग कर्मयोगी होते हैं। ये क्रिया प्रधान होते हैं। ये अपनी कर्मेन्द्रियों से जीते हैं। उनके लिए बैठने से कार्य नहीं होता। यदि उनसे कहें कि विवेचन सुनिए तो वे बैठकर पूरा विवेचन सुन नहीं सकते। ऐसे लोग विवेचन लिख सकते हैं, अनुवाद कर सकते हैं, group coordinator या tech बनते हैं। उन्हें क्रिया चाहिए। ये कर्म प्रधान होते हैं और ऐसे लोगों के लिए कर्मयोग है।
परन्तु हे अर्जुन! उस परमात्म तत्त्व तक, आत्मज्ञान तक, उस निश्रेयस् तक, उस मनुष्य जीवन के अन्तिम कल्याण तक, उस परमात्म प्राप्ति तक पहुँचने के ये दो मार्ग हैं।
ज्ञानेश्वर महाराज अर्जुन के लिए कहते हैं-
औषधि की दुकान पर अनेक दवाइयाँ रखी रहती हैं। परन्तु सभी दवाइयाँ हमारे लिए उपयोगी नहीं होतीं। अपने रोग, पीड़ा या समस्या के लिए ही हम वहाॅं से दवाइयाँ लेकर आते हैं। इसी प्रकार भगवद्गीता में अनेक मार्ग बताये गए हैं।
कर्मयोग
भक्तियोग
आत्मसंयमयोग
संन्यासयोग
क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
गोंधवलेकर महाराज महाराष्ट्र के महान सन्त जिन्होंने नाम-जप की महिमा गायी, उन्होंने कहा कि नाम की बहुत महिमा है और नाम-जप से ही हम लोग परमात्मा तक पहुँच सकते हैं। नाम का दीपक ही अपनी जिह्वा पर लगाना चाहिए। यही उनका उपदेश था जो हमें अन्दर भी प्रकाश देता है और बाहर भी प्रकाश देता है। एक बार वे मन्दिर में ध्यान की आराधना सिखा रहे थे और वहाँ सब लोग जप कर रहे थे। वहाँ निर्माण का कार्य चल रहा था। निर्माण कार्य कर रहे मजदूर लोग आपस में बात कर रहे थे कि देखो ये लोग कितने सौभाग्यशाली हैं कि ये बस बैठे हैं और बैठे-बैठे भजन करते हैं। हम लोग तो धूप में कैसे तप रहे हैं और कष्ट पा रहे हैं। महाराज ने यह सुना तो उन्होंने उन मजदूर को बुलाया और पूछा कि उन्हें कितनी मजदूरी मिलती है। मजदूर ने बता दी। तब महाराज ने कहा कि मैं तुम्हें इससे दोगुनी मजदूरी दूँगा परन्तु तुम्हें यहाँ बैठकर चार घण्टे माला फेरनी है और फिर भोजन करना है और तदुपरान्त चार घण्टे माला फेरनी है। मजदूर प्रसन्न हो गए कि उन्हें कुछ नहीं करना पड़ेगा। महाराज ने माला दे दी। अगले दिन वो माला करने लगे। कुछ देर तो उन्हें बहुत अच्छा लगा। परन्तु थोड़ी देर बाद ही वो पत्थर तोड़ने वाले माला नहीं फेर सके। उन्होंने महाराज को माला लौटा दी कि यह काम हमसे नहीं हो सकेगा। हमारे लिए तो वही काम ठीक है। हर व्यक्ति हर काम के लिए अनुकूल नहीं होता।
श्रीभगवान् कहते हैं कि मैंने दो मार्ग बताये हैं, अब इनमें से मनुष्य को स्वयं ही चयन करना पड़ेगा।
हे अर्जुन! ये कर्मयोग ऐसा है कि अन्तिम साँस तक छूटता नहीं है। इस सृष्टि में आये हैं, यह हमारी कर्मभूमि है। साँस लेना भी कर्म ही है।
न कर्मणामनारम्भान्, नैष्कर्म्यं(म्) पुरुषोऽश्नुते।
न च सन्न्यसनादेव, सिद्धिं(म्) समधिगच्छति॥3.4॥
नैष्कर्म्यं- न कुछ करना है, न पाना बचा बचा है और न ही कुछ जानना बचा है।
कृत- कर्त्तव्य, ज्ञात -ज्ञातव्य , प्राप्त- प्राप्तव्य-
जो प्राप्त करना है कर लिया, जो जानना है जान लिया, जो भी कर्म करना है कर लिया। ऐसी अवस्था आ जाती है कि जो काम हमें करना था कर लिया। आठ घण्टे में काम करना था, तीन घण्टे में ही कर लिया। अब मुझे कुछ करना नहीं है। इसे कहते हैं नैष्कर्म्यं की अवस्था। इस अवस्था को पाने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। बिना कुछ किये यह अवस्था प्राप्त नहीं होती। श्रीभगवान् कहते हैं कि कर्म का आरम्भ किये बिना सिद्धि प्राप्त नहीं होती। सिद्धि का अर्थ है- अन्तिम पड़ाव, दुःखों से मुक्ति। मनुष्य जन्म में दुःखों से मुक्ति प्राप्ति के लिए कुछ करना पड़ेगा तब नैष्कर्म्यं की अवस्था प्राप्त होगी, कि अब कुछ करना आवश्यक नहीं है।
अर्जुन को (युद्ध) कर्म छोड़कर सिद्धि चाहिए। श्रीभगवान् कहते हैं कि कर्म छोड़कर उसका मन से चिन्तन करना, मिथ्याचार है।
इस सृष्टि में आया हुआ मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किये हुए नहीं रह सकता। सोना, विश्रान्ति लेना भी कर्म है।
न हि कश्चित्क्षणमपि, जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः(ख्) कर्म, सर्वः(फ्) प्रकृतिजैर्गुणैः॥3.5॥
जनार्दन महाराज कुछ न कुछ कर्म में रत रहते थे। अपनी फटी हुई चादर को भी स्वयं सीते थे।
बहिरङ्ग में कर्म और अंतरङ्ग में नैष्कर्म्य की अवस्था-
यह मानसिक स्थिति है।
कोई भी व्यक्ति जो इस कर्मभूमि में आया है वह बिना कर्म के नहीं रह सकता। विवेचन करना और सुनना भी कर्म है।
प्रकृतिजैर्गुणैः-
अर्थात प्रकृति से उत्त्पन तीन (सत्त्व, रज और तम) गुणों से जो बॅंधा है।
गुण का अर्थ संस्कृत में होता है रस्सी,
दूसरा अर्थ गुणधर्म
तीन गुण; ज्ञान का प्रकाश (सत्त्व), क्रियाशीलता (रज) और क्रियाशून्यता (तम) हमें बाॅंधते हैं।
इन तीन रस्सियों से मनुष्य बॅंधा हुआ है। क्रिया चलती है, क्रिया रूकती है क्रिया सही दिशा में चलती है, हम कर्म के बिना रह ही नहीं सकते। इसलिए श्रीभगवान् कहते हैं, कर्म छोड़कर जो मन से विषयों का चिन्तन कर रहा है, वह मिथ्याचार कर रहा है। दम्भाचार, पाखण्ड है। यदि हम अपने दोष स्वीकार करते हैं तो भगवद्गीता हमें दोषरहित होने के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी। परन्तु यदि हम दम्भ कर रहे हैं, दिखावा कर रहे हैं ( मनुष्य अपने दोषों को छिपाता है) तो हम मिथ्याचार कर रहे हैं।
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य, य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा, मिथ्याचारः(स्) स उच्यते॥3.6॥
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य- कर्मेन्द्रियों को संयमित करता है
मनसा स्मरन् आस्ते- मन से इन्द्रियों का चिन्तन करता है।
मिथ्याचार: स उच्यते- मिथ्याचार करता है।
मिथ्याचार करने से तो हम यह कहें कि भगवन् मैं इससे अधिक प्रवचन नहीं सुन सकता। मुझे कोई दूसरा मार्ग बताइये। यह उचित है परन्तु विवेचन सुनने बैठे और मन कहीं और है तो मिथ्याचार है।
दो शिष्य भगवान् जगन्नाथ जी के दर्शन के लिए गए। मार्ग में नृत्य का कार्यक्रम चल रहा था। एक शिष्य को लगा कि जगन्नाथ जी के दर्शन बाद में कर लूँगा पहले यह नृत्य देखता हूँ। उसने दूसरे शिष्य से कहा कि तुम चलो मैं बाद में आता हूँ। दूसरा शिष्य चला गया। वह जगन्नाथ जी के दर्शन करता हुआ सोच रहा था कि उसका मित्र अच्छा नृत्य देख रहा होगा। मुझे भी वहीँ रुक जाना चाहिए था। वह वहाँ खड़ा होकर भी नृत्य का चिन्तन कर रहा था जबकि पहला शिष्य नृत्य देखते हुए भी सोच रहा था कि उसका मित्र श्रीभगवान् के दर्शन कर रहा होगा। मैं कहाँ इन विषय में रुक गया। वह नृत्य देखते हुए भी जगन्नाथ जी का चिन्तन कर रहा है।
(हम वहाँ होते हैं जहाँ हमारा मन होता है।)
अर्जुन तुम यह युद्ध छोड़कर चले जाओगे परन्तु ज्ञानयोग की पात्रता तुममे नहीं है। अतः तुम एक स्थान पर बैठोगे तब भी मन से उसका चिन्तन करते रहोगे। तुम ज्ञान के अन्तिम स्थान तक नहीं पहुँच सकते। इसलिए तुम्हें कर्मयोग का ही अनुसरण करना होगा। यही तुम्हारा मार्ग है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं-
जैसे सिद्धसाध्यभोजनीं । तृप्ति एक ॥
यह बहुत सुन्दर उदहारण है।
सिद्ध भोजन- रसोई में पका हुआ भोजन
साध्य- सीधा जैसे आटा, चावल, दाल जिसे अभी पकाना है।
दोनों सिद्ध और साध्य से ही हमारी तृप्ति होगी। सिद्ध भोजन तुरन्त हमारी क्षुधा शान्त करेगा। इसी प्रकार ज्ञानयोगी व्यक्ति को तुरन्त ही तृप्ति हो जाएगी परन्तु कर्मयोगी को अपना भोजन स्वयं पकाना पड़ेगा तभी उसकी क्षुधा शान्त होगी। गन्तव्य तो एक ही है परन्तु दोनों का मार्ग भिन्न है। ज्ञान योगियों के पास पकी-पकाई रसोई है। पर इसे उन्होंने ही पिछले जन्म में पकाया है। पिछले जन्म में ही उन्होंने कर्म के मार्ग से जाते हुए अपने ज्ञान का मार्ग प्रशस्त किया है। अतः हे अर्जुन! तुम अभी कर्मयोग के मार्ग पर ही टिके रहो।
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा, नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः(ख्) कर्मयोगम्, असक्तः(स्) स विशिष्यते॥3.7॥
एक बालक पढ़ने के लिए बैठा है। टेलीविजन पर क्रिकेट का खेल (मैच) चल रहा है। माँ कहती है कि अभी तुम्हें परीक्षा के लिए पढ़ना है। इतने पाठ पढ़ने के बाद ही मैं तुम्हें मैच देखने की अनुमति दूँगी। बालक का मन मैच की ओर लगा हुआ है और पढ़ भी रहा है तो क्या उसके स्मरण में पढ़ाई रह पाएगी? नहीं जाएगी।
That's the way to be happy and gay.
तुम यदि काम कर रहे हो तो काम ही करो, खेलने की बात मत सोचो। खेल रहे हो तो खेलने में मन लगाओ पढ़ाई की बात मत सोचो। जहाँ हो, वहीँ की बात सोचो। इसलिए मन का नियन्त्रित करना आवश्यक होता है। ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि यदि मन भागता है, कहता है कि मुझे अभी विवेचन नहीं सुनना है, टेलीविजन देखना है तो उसकी बात मान लेनी चाहिए। बालक यदि नहीं मानता है तो उसे थोड़ी देर मैच देखने दो तब उसे कहो कि अब पढ़ने जाओ।
ते सन्तोषे सी वाढते, मन चि करी
जो व्यक्ति मन नियन्त्रित करता है और कर्मेन्द्रियों से कर्म करता है तो उसके परिणाम उसके मन पर नहीं होते।
शरीर कर्मरत होता है परन्तु मन परमात्मा के साथ एकाकार होता है।
इसलिए अर्जुन तुम अपना नियत कर्म करो।
नियतं(ङ्) कुरु कर्म त्वं(ङ्), कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते, न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥3.8॥
गृहिणी का विहित कर्म गृहकार्य करना है। बड़ों की सेवा करना, सबके लिए रसोई पकाना है। जो प्रतिदिन होता है, वह नियत कर्म हो गया। जैसे कोई अतिथि आ गया तो उसके लिए रसोई पकाना उसका नियत कार्य हो गया।
आणि तीच परम सेवा मजं परमात्म्याची।
यही भगवद्गीता का आग्रह है कि अपना नियत कर्म मन लगाकर करते रहो।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र, लोकोऽयं(ङ्) कर्मबन्धनः।
तदर्थं(ङ्) कर्म कौन्तेय, मुक्तसङ्गः(स्) समाचर॥3.9॥
विवेचन- नियत कर्म को श्रीभगवान् यज्ञ के समान बताते हैं। यज्ञ के लिए किए गए कर्म के अतिरिक्त, आसक्ति से जो कर्म करते हैं, वे कर्म मनुष्य को कर्मबन्धन में डालते हैं। अतः हे कौन्तेय! तुम आसक्ति न रखते हुए कर्म करो। उस सृष्टिकर्ता लिए कर्म करो। जैसे हम अग्नि में एक-एक आहुति देते हैं, अग्नि प्रज्वलित करते हैं जो पञ्च महाभूतों के सन्तुलन के लिए, शुद्धि के लिए आवश्यक है। देवताओं के वरदान प्राप्त करने के लिए सारे यज्ञ हमारे वेदों में सकाम आराधना के लिए बताए गए हैं। परन्तु यही यज्ञ नहीं है।
यज्ञ की परिभाषा भगवद्गीता के परिप्रेक्ष्य में समझना आवश्यक है।
इदं न मम, राष्ट्राय स्वाहा
(यह मेरा नहीं है)! इस भाव से अपना कर्त्तव्य कर्म करते रहना चाहिए।
गीता के महायज्ञ में प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी आहुति डाल रहा है। जैसे यज्ञ में अग्नि प्रज्वलित करने से ज्वाला ऊपर उठती है उसी प्रकार यज्ञ कर्म करने से हमारे जीवन का उन्नयन होता है। अतः यज्ञ भावना से किया गया हर कर्म तुम्हें मुक्त कराएगा । यह सारी सृष्टि यज्ञ से ही निर्माण होती है।
सृष्टि के लिए किया गया सङ्गठनात्मक कर्म ही यज्ञ है।
सहयज्ञाः(फ्) प्रजाः(स्) सृष्ट्वा, पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वम्, एष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥3.10॥
T- together
E- everyone
A -achieves
M- more
एक-दूसरे के साथ जुड़कर कार्य करने की यन्त्रणा को ही यज्ञ कहा जाता है। प्रत्येक मनुष्य को इसमें अपनी आहुति देनी चाहिए।
ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं कि बड़े बड़े यज्ञ हम नहीं कर सकते तो अपना नित्य कर्म निभाना ही मनुष्य का यज्ञ है।
म्हणौनि वर्ततां तेथ पापां, संशय नाहीं।
देवान्भावयतानेन, ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं(म्) भावयन्तः(श्), श्रेयः(फ्) परमवाप्स्यथ॥3.11॥
परन्तु मैं अपनी क्षुधा तृप्ति के बाद बचा हुआ भोजन दूसरों को देता हूँ, यह संस्कृति है।
मेरे पास नहीं है और दूसरों से छीनना विकृति है।
जो व्यक्ति मिल-बाॅंटकर नहीं खाता और केवल स्वार्थ में जीता है, सृष्टि का शोषण करता है, अपनी कमाई स्वयं ही रखेगा और समाज को कुछ नहीं देगा, इस प्रकार के जीवन जीने वाले को श्रीभगवान् चोर कहते हैं।
इष्टान्भोगान्हि वो देवा, दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो, यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥3.12॥
इस प्रकार श्रीभगवान् सृष्टि का नियम बताते हुए, अपने कर्म को कर्मयोग में परिणित करते हुए कर्म के ही मार्ग से परमतत्त्व प्राप्त करने का सुन्दर वर्णन करते हैं जिसे अगले सत्र में देखा जाएगा।
साधकों की जिज्ञासाओं के समाधान के साथ आज का सत्र सम्पन्न हुआ।
प्रश्न- इस अध्याय के पाँचवे श्लोक में श्रीभगवान् कहते हैं कि कर्म के बिना कोई नहीं रह सकता, और दूसरे अध्याय के सैंतालीसवें श्लोक में वे कहते हैं कि कर्मण्येवाधिकारस्ते, मां फलेषु कदाचन
तो क्या मनुष्य कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है या परतन्त्र?
उत्तर- श्रीभगवान् कह रहे हैं कि कर्मणि एव ते अधिकार: अस्ति। यहाँ अधिकार का अर्थ है योग्यता। केवल कर्म करने में भी तुम्हारी योग्यता है उसके फल पर नहीं क्योंकि फल मिलना बहुत सी बातों पर निर्भर करता है जो हमारे वश में नहीं हैं। यहाँ श्रीभगवान् का एक और अभिप्राय है कि अर्जुन की योग्यता अभी केवल कर्म करने की है, ज्ञान प्राप्त करने की नहीं।
मनुष्य एक क्षण के लिए भी कर्म छोड़कर नहीं रह सकता, क्योंकि ऐसा करने से मन क्रियाशील हो जाता है और विभिन्न विषयों से वह मलीन और बोझिल हो कर अपनी सृजनशीलता को बैठता है।
इसलिए श्रीभगवान् यहाँ कर्म की प्रशंसा करते हैं और उसे मानते हैं। हमारे शरीर की सारी क्रियाएँ श्रीभगवान् की कृपा से ही सम्भव हैं यह हमें मानना चाहिए परन्तु फिर भी हम कर्म करने के लिए स्वतन्त्र हैं अन्यथा श्रीकृष्ण अन्त में अर्जुन से नहीं कहते-
"यथेच्छसि तथा कुरु"
मैंने तो तुम्हें सब कुछ बता दिया है कि क्या सही है और क्या गलत? अब तुम अपनी विवेक बुद्धि से निर्णय लो। विवेक बुद्धि से निर्णय लेने की क्षमता केवल मनुष्य में ही होती है।
प्रश्नकर्ता- श्रीमती नन्दिनी मिश्रा दीदी
प्रश्न- इस अध्याय के सातवें श्लोक में यस्त्विन्द्रियाणि मनसा इसका अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर- हमें अपनी ज्ञानेंद्रियों (आँख, कान,नाक, जिह्वा और स्पर्श) को वश में करना सीखना चाहिए। हमें मीठा बहुत अच्छा लगता है परन्तु हमें शक्कर की बीमारी है तो हमें अपनी जिव्हा पर नियन्त्रण करना आना चाहिए। मन को इस प्रकार सम्बल देना चाहिए कि वह इन्द्रियों को वश में कर सकें। यदि मन इन्द्रियों के वश में होगा तो हम बड़े बड़े काम नहीं कर सकते। जो मन से इन्द्रियों को वश में कर अपने कर्त्तव्य कर्म करते हैं ऐसे मनुष्य श्रेष्ठ कहलाते हैं।
प्रश्नकर्ता- श्री उमाकान्त मिश्रा भैया
प्रश्न- श्लोक, मन्त्र और स्तोत्र में क्या अन्तर है?
उत्तर- स्तोत्र का अर्थ है स्तुति करना जैसे गणपति अथर्व शीर्ष, श्री विष्णु सहस्रनाम आदि जिनमें देवताओं की स्तुति की जाती है।
इन स्तोत्रों के रचनाकार ऋषि मुनियों ने तरङ्गों के माध्यम से आए परमात्मा के ज्ञान को संस्कृत भाषा में ग्रन्थों के रूप में शाश्वत सिद्धान्त बनाकर प्रस्तुत किया है। यही शाश्वत सिद्धान्त मन्त्र कहलाते हैं। हजारों वर्षों बाद भी उनमें परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं होती। मननात् त्रायते इति मन्त्र: अर्थात् जिनको सुनकर मन में जाता है वह मन्त्र है। संस्कृत भाषा मान्त्र भाषा है। यदि मन्त्र समझ में नहीं भी आएं तो भी उनका प्रभाव हमारे मन पर होता है। श्रीमद्भगवद्गीता भी ऐसा ही मन्त्र है जिसका ज्ञान पाँच हजार वर्षों बाद आज भी शाश्वत है।
मन्त्रों की छन्द और अलङ्कार में बाँधकर काव्यात्मक प्रस्तुति श्लोक कहलाती है। मराठी भाषा में इसे ओवी कहते हैं जैसे ज्ञानेश्वर महाराज की ज्ञानेश्वरी।
प्रश्नकर्ता- श्रीमती रम्या दीदी
उत्तर- नहीं,यह तो नित्य कर्म या यज्ञ हो गया। मन विवेचन पर केन्द्रित है और हम कर्मेन्द्रियों से अपने कार्य कर रहे हैं इसका अर्थ है हम अपनी इन्द्रियों के वश में नहीं हैं। इस प्रकार कोई भी काम करते हुए परमात्मा की पूजा कर सकते हैं। हाँ, यदि हम विवेचन सुन तो रहे हैं लेकिन हमारा मन कहीं और भटक रहा है तो यह मिथ्याचार कहलाएगा।