विवेचन सारांश
कर्तव्य कर्म के निर्वहन की आवश्यकता

ID: 8733
हिन्दी
रविवार, 01 फ़रवरी 2026
अध्याय 3: कर्मयोग
2/3 (श्लोक 9-16)
विवेचक: गीता प्रवीण ज्योति जी शुक्ला


हमारी चिर-प्राचीन सनातनी परम्परा का निर्वाह करते हुए ईश-वन्दना, गुरु-वन्दना, राष्ट्र-वन्दना तथा सङ्कटमोचन श्रीहनुमान चालीसा के पाठ के साथ आज के सत्र (बाल साधकों हेतु) का शुभारम्भ हुआ।

तीसरा अध्याय, कर्मयोग में, कर्म की महत्ता के बारे में बताया गया है। भाग्य में लिखा हुआ भी तभी प्राप्त होता है, जब कर्म किया जाए

  • कर्म का अर्थ ही है, कुछ काम करना

परीक्षा में श्रेष्ठ अङ्क लाने के लिये, अच्छे से पढाई करनी होगी। भाग्य में अट्ठानवें प्रतिशत अङ्क लिखे हैं, जो बिना अध्ययन किए हुए प्राप्त हो सकते है क्या? भाग्य को प्राप्त करने के लिए, स्वयं ही कर्म करने होंगे। 

  • कर्म से ही भाग्य को बनाया और बिगाड़ा जा सकता हैकर्म से ही जीवन उन्नत बनता है

हम सभी स्वयं के लिए तो कर्म करते ही हैं। इस अध्याय में बताया गया है कि समाज, देश, सम्बन्धियों, माता-पिता, प्रकृति के लिए हम क्या कर्म कर सकते हैं? स्वयं की सफलता के लिए, चिन्ता करना और कर्म करना अनुचित  नहीं है।

कर्म में स्वयं का लाभ नहीं सोचना चाहिए। कुछ फल तुरन्त नहीं मिलते परन्तु फल मिलता अवश्य है। धीरे-धीरे कर्म कैसे करना चाहिए इसकी स्पष्टता आएगी। हम सभी कर्म कैसे करें, इसकी जानकारी नहीं होने के कारण, अवहेलना कर जाते हैं क्योंकि हमें किसी ने बताया नहीं, न ही हमने कहीं पढ़ा है। 

3.9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र, लोकोऽयं(ङ्) कर्मबन्धनः।
तदर्थं(ङ्) कर्म कौन्तेय, मुक्तसङ्गः(स्) समाचर॥3.9॥

यज्ञ (कर्तव्य पालन) के लिये किये जाने वाले कर्मों से अन्यत्र (अपने लिये किये जाने वाले) कर्मों में लगा हुआ यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है, (इसलिये) हे कुन्तीनन्दन ! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञ के लिये (ही) कर्तव्य कर्म कर।

विवेचन- इस श्लोक में यज्ञ से तात्पर्य हमारे विहित कर्तव्य कर्म से है

  • विहित कर्म के उदाहरण-
हम विद्यार्थी रूप में पढ़ाई करें। घर में माता-पिता की सेवा करें उनकी आज्ञा का पालन करें। ऐसे ही देश, समाज, प्रकृति आदि को समृद्ध करने के लिये, नित्य कर्म करते रहना होगा। प्रकृति से जुड़ाव हेतु पौधे लगा सकते हैं। 

हमारे माता-पिता, हमारे प्रति, जो उनके कर्तव्य होते है, उसकी कभी भी अवहेलना नहीं करते। हमारा पालन-पोषण बहुत अच्छे से करते हैं। उनको उनके कर्तव्य की हमें याद नहीं दिलानी पड़ती। हम अधिकांशत: अपने कर्तव्यों के पालन में चूक जाते हैं। 

  • कर्मों में हमारी आसक्ति और कामना दोनों ही नहीं होनी चाहिये
  • आसक्ति हुई तो उपयुक्त फल नहीं मिलने से हम दुःखी हो जायेंगे। 

कामना से किये हुए कर्म कर्तव्य कर्म नहीं होते हैं। 

3.10

सहयज्ञाः(फ्) प्रजाः(स्) सृष्ट्वा, पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वम्, एष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥3.10॥

प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि के आदिकाल में कर्तव्य कर्मों के विधान सहित प्रजा (मनुष्य आदि) की रचना करके (उनसे प्रधानतया मनुष्यों से) कहा कि (तुम लोग) इस कर्तव्य के द्वारा सबकी वृद्धि करो (और) यह (कर्तव्य कर्मरूप यज्ञ) तुम लोगों को कर्तव्य-पालन की आवश्यक सामग्री प्रदान करने वाला हो।

विवेचन- ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना, संसार के निर्माण के पश्चात् , प्रजा का भी निर्माण कर दिया।

तत्पश्चात् ब्रह्मा जी ने उनको आदेश दिया, तुम लोग अपने कर्मों का सही से निर्वाह करो, तुम्हें उचित फल मिलते रहेंगे।

किसान यदि खेती नहीं करेगा तो हमें भोजन कहाँ से प्राप्त होगा? प्रकृति में फलों के वृक्षों को लगाने से ही खाने को फलों की प्राप्ति होती है। ब्रह्मा जी ने कहा कि कर्मों के अनुरूप सामग्री भी तुम्हें मिलती रहेगी। 

  • कर्तव्य कर्म का फल तभी मिलेगा, जब हम प्रयास करेंगे

3.11

देवान्भावयतानेन, ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं(म्) भावयन्तः(श्), श्रेयः(फ्) परमवाप्स्यथ॥3.11॥

तुम लोग इस यज्ञ के द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम् कल्याण को प्राप्त हो जाओगे।

विवेचन- इस श्लोक में महत्वपूर्ण बात कही गयी है। 

  • तुम यज्ञों के द्वारा देवता को उन्नत करो, देवता तुम्हें उन्नत करेंगे”। 

धारवाहिकों में भी हम देखते हैं, अन्न नहीं है, बारिश नहीं है, जो भी वस्तु का अभाव होता है, उसी के लिए यज्ञ करवा देते हैं। 

अग्नि के देवता हैं, बारिश के, ऊर्जा के, जल के सभी के अलग-अलग देवता है। सूर्य भगवान् नियमित उदित होते हैं, अस्त होते हैं। देवता सुचारू रूप से अपना-अपना कर्म करते हैं। हम उनके लिए यज्ञ करें या नहीं करें। 

हमारे माता-पिता भी बिना अपेक्षा के हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। हमारे भोजन, वस्त्र आदि का ध्यान रखते हैं। वैसे ही देवता भी ध्यान रखते हैं।

  • यदि हम अपने माता-पिता की बात माने उनके चरण स्पर्श करें, बिना बोले ही उनको पानी दे दें, तो उनको बहुत प्रसन्नता होती है। 

वैसे ही यज्ञ में दी जाने वाली आहुति से देवताओं को शक्ति प्राप्त होती है। 

प्रकृति की पूजा अर्थात् प्रकृति का संरक्षण करने से, विश्व का तापमान अनपेक्षित रूप से जो बढ़ रहा है, वह नहीं बढ़ेगा। प्रकृति हरी-भरी रहेगी। 

  • एक महत्वपूर्ण बात और इस श्लोक में आयी है, हम अपना स्वार्थ ही नहीं देखें । दूसरों का भी ध्यान रखें। 

उदाहरण- शिक्षक के दिये हुए गृहकार्य को किसी बच्चे ने पूरा नहीं किया तो उसे दण्ड मिलेगा। बच्चे भी उस पर हँसेंगे। यह नहीं करना चाहिये, उस विद्यार्थी की हर सम्भव सहायता करनी चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है। हमारे लिए यह बहुत कठिन नहीं है। प्रयास करने से सब कुछ सम्भव है। 

हम भी आगे बढ़ेंगे, दूसरों को भी प्रयास करके आगे ले जाने से प्रसन्नता होती है। स्वार्थ भावना भी खत्म होती है। सृष्टि से, संसार से हमें बहुत कुछ मिल रहा है, हम बदले में क्या दे सकते हैं, इसका प्रयास करना चाहिए। 

  • गीता परिवार में बहुत से लोग गीताजी पढ़ना सीखने के बाद नाना प्रकार की सेवा निःस्वार्थ भाव से देने लग गए। 

स्वार्थी होने का उदाहरण- परीक्षा के समय दो मित्रों ने चलचित्र की टिकट ली। एक मित्र, अपनी टिकट दूसरे को देकर बोला, वो आ रहा है। स्वयं जाकर पढ़ने लग गया। यह है, स्वार्थीवृत्ति। 

3.12

इष्टान्भोगान्हि वो देवा, दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो, यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥3.12॥

यज्ञ के द्वारा बढ़ाये हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं के द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है।

विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् ने बोला है कि जो स्वार्थीवृत्ति के होते हैं, स्वयं के बारे में ही सोचते हैं, वे "चोरहोते हैं। 

  • कृतघ्नता के उदाहरण-
माता-पिता की सेवा नहीं करने वाले, उनकी आज्ञा का पालन नहीं करने वालेऔर प्रकृति का ध्यान नहीं रखने वाले चोर होते हैं।

जहाँ से जो ले रहे हैं, वहाँ क्या दे सकते हैं?, इसका विचार करना चाहिए। गीताजी हम पढ़ना सीख रहे हैं तो और भी बच्चे सीखें, इसका प्रयास करना चाहिए। उनको प्रयास से गीताजी की कक्षा से जोड़ना चाहिए। 

उदाहरण- घर में मिठाई आयी। उसमें सभी भाई-बहनों का समान हिस्सा होता है। यदि एक बच्चा, अपने भाई-बहनों के हिस्से को भी खा ले तो पाप लगता है। 

रामायण का एक प्रसङ्ग है जहाँ- श्रीराम जी को वनवास मिला तब भरत जी को राज्य का अवसर मिला। भरत जी ने कहा, राजा बनने का अधिकार एक मात्र उनके बड़े भाई श्रीराम का ही है।

  • सदैव अपने ही अंश का उपभोग करना चाहिए। 

3.13

यज्ञशिष्टाशिनः(स्) सन्तो, मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं(म्) पापा, ये पचन्त्यात्मकारणात्॥3.13॥

यज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करने वाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पाप का ही भक्षण करते हैं।

विवेचन- श्रीभगवान् यहाँ बोल रहे हैं- 

  • जो मनुष्य अपने माता-पिता का पालन-पोषण करते हैं, उनकी आज्ञा पालन करते हैं, उनकी सेवा करते हैं, वे पाप से मुक्त हो जाते हैं।

समाज से हमें बहुत कुछ मिला है, ये मानते हुए जो अपने कर्तव्य कर्म करते हैं, वे पुण्य का कार्य कर रहे हैं। जो नहीं कर रहे हैं, वे पाप का ही भक्षण कर रहे हैं।

समाज से हमें क्या मिला है, इसके बारे में सोचना चाहिए। 

हमारी माताजी रसोई में भोजन परिवार के सभी लोगों के लिए बनाती है। हम कॉफी हो या अन्य कुछ भी खाने का हो, स्वयं के लिए ही बना कर खा लेते हैं। परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में सोचते भी नहीं है, यह अनुचित है। 

3.14

अन्नाद्भवन्ति भूतानि, पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो, यज्ञः(ख्) कर्मसमुद्भवः॥3.14॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं। अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है। यज्ञ कर्मों से सम्पन्न होता है।

विवेचन- यहाँ श्रीभगवान् बोल रहे हैं, सभी प्राणी और जीव अन्न से ही उत्पन्न होते हैं। हम यदि कुछ नहीं खाते हैं तो हमारी शक्ति क्षीण हो जाते है। कई दिन नहीं खाने से तो हमारा जीवित रहना ही कठिन हो जाता है। 

  • शास्त्रों में अन्न को ब्रह्म कहा गया है।

अन्न ही "पूर्णब्रह्म" है।

अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा नहीं होने से खेत सूख जाएँगे। वर्षा यज्ञ से होती है। कई धारावाहिक में हमने देखा है, वर्षा नहीं होती है तो यज्ञ किया जाता है तब बारिश भी हो जाती है। यज्ञ, कर्मों से सम्पन्न होते हैं। 

कुछ करेंगे तो ही यज्ञ होगा। इस प्रकार कर्म करते रहें। 

3.15


कर्म ब्रह्मोद्भवं(व्ँ) विद्धि, ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं(म्) ब्रह्म, नित्यं(य्ँ) यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥3.15॥

कर्मों को (तू) वेद से उत्पन्न जान (और) वेद को अक्षरब्रह्म से प्रकट हुआ (जान)। इसलिये (वह) सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्य कर्म) में नित्य स्थित है।

विवेचन- हमें वेदों से पता चलता है, कर्म कैसे करना चाहिए? 

प्रश्न- वेद कितने हैं? 
उत्तर- कुल चार वेद हैं- ऋग्वेद ,सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद

पन्द्रहवें अध्याय में हमने जाना कि वेदों से ज्ञान की प्राप्ति होती है-

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

इस ज्ञान को जानने वाले को ज्ञानी कहते हैं। कर्तव्य कर्मों को कैसे करना चाहिए, ये हम वेदों से जानते हैं। गीताजी द्वारा भी कर्तव्य कर्म कैसे करना है, इसकी जानकारी हमें प्राप्त होती है।

  • क्या हमारे लिए करणीय  है, क्या अकरणीय है, इसका ज्ञान प्राप्त होता है। 

अर्जुन को सन्देह हुआ तो श्रीकृष्ण ने बताया, यह युद्ध कैसे और क्यों करना है? इसको वर्णित  किया। 

  •  चारों वेदों की उत्पत्ति परमात्मा से हुई है।
  • वेदों को अपौरुषेय भी कहा गया है।

इसका अर्थ हुआ, जिसे मनुष्य ने नहीं बनाया है। इसकी रचना स्वयं श्रीभगवान् ने की है, उनकी प्रेरणा से हुई है। 

इस श्लोक में श्रीभगवान् ने कहा है कि परमात्मा सभी कर्तव्य कर्मों में स्थित है। कर्तव्यों का वेदों से पता चलता है, वेद परमात्मा है। 

गीताजी में परमात्मा प्राप्ति के , उनके प्रिय बनने के कई मार्ग बताये गए हैं। ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग

सभी योगों के द्वारा हमारा उद्देश्य एक ही है, परमात्मा के प्रिय की सूची में आना। 

साधारणतः हम फेसबुक में मित्र बनने के आग्रह को स्वीकार करके, मित्र  बन जाते हैं। हमारी सूची लम्बी हो जाती है। 

श्रीभगवान् को नाना साधनों, योगों से प्रसन्न करके ही, उनके प्रिय और मित्र की सूची में आ सकते हैं। 

उदाहरण- सत्रहवें अध्याय में हमने इसको जाना था। गणपति की शोभा यात्रा में फिल्मी गानों पर उछल-उछल कर गाने एवं नाचने से, स्वयं को ही आनन्द की प्राप्ति होती है। हाथ पर कपूर रखकर जलाने से परमात्मा को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। 

3.16

एवं(म्) प्रवर्तितं(ञ्) चक्रं(न्), नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो, मोघं(म्) पार्थ स जीवति॥3.16॥

हे पार्थ! जो मनुष्य इस लोक में इस प्रकार (परम्परा से) प्रचलित सृष्टि-चक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों के द्वारा भोगों में रमण करने वाला अघायु (पापमय जीवन बिताने वाला) मनुष्य (संसार में) व्यर्थ ही जीता है।

विवेचन- इस श्लोक में श्रीभगवान् कह रहे हैं कि श्रीभगवान् द्वारा बतायी हुई, व्यवस्था का जो अनुकरण नहीं करता है, वह व्यर्थ में ही जीवित है। 

विद्यालय के कुछ नियम बनाये हुए हैं, उनका अनुकरण सभी को करना पड़ता है। अनुशासन को मानना पड़ता है। कोई उसके नियम को तोड़ कर , मनमानी पोशाक, मनमानी जूते-मोजे नहीं पहन सकता। 

  • परमात्मा द्वारा बताये हुए नियमों के विरुद्ध चलने वाले का जीवन पापमय और व्यर्थ है। 

कहानी- एक बार देवता और दानवों दोनों के हाथों की कोहनियों के नीचे लकड़ी बाँध दी गयी। जिसके कारण उनका हाथ मुड़ नहीं सकता था। स्वादिष्ट भोजन सामने रख दिया गया। दोनों को खाने के लिए कहा गया। देवता लोग तो आमने-सामने बैठकर एक दूसरे को खिलाने लगे। दानव स्वयं का भोजन स्वयं खाने लगे, इससे भोजन इधर-उधर गिरने लगा; कारण था कि हाथ नहीं मुड़ने से स्वयं के मुँह तक भोजन पहुँचा नहीं पाये।
दानव स्वार्थी है। 

  • दूसरों के हित का भी विचार करना चाहिए। अच्छी-अच्छी बातों को जीवन में लाने का प्रयास करना चाहिए। 

हमारे कर्तव्य कर्म की एक सूची बनाकर लिख लेना चाहिए। उनको अपने जीवन में लाने का प्रयास करना चाहिए।

थोड़े समय के अन्तराल से स्वयं मूल्याङ्कन करना चाहिए कि कितने प्रतिशत, वे कर्तव्य कर्म हम अपने जीवन में उतार पाए हैं। 

  • जीवन को सुन्दर बनाने का प्रयास करना चाहिए।
  • जीवन की सार्थकता तभी है, जब हम अच्छे मनुष्य बने।

अगले सत्र में सूचीबद्ध कर्तव्य कर्मों को किसने, कितना अपने जीवन में अनुकरण करना प्रारम्भ किया है, उसकी चर्चा करेंगे। हरि नाम कीर्तन से सत्र का विश्राम हुआ। 

।।ॐ श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।