विवेचन सारांश
भगवद्गीता की रचना, रचनाकार, वंशमूल
पारंपरिक तरीके से दीप प्रज्वलन और प्रार्थना के पश्चात इस महत्वपूर्ण और गीता की भूमिका समझाने वाले प्रथम सत्र का आरंभ हुआ।
आज हम अनेक अध्यायों का विवेचन करते करते पहले अध्याय पर पहुंचे हैं। बड़ी विचित्र सी बात है, किसी भी ग्रंथ का पठन करते समय अध्याय एक से शुरुआत कर हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं लेकिन यहां हम कह रहे हैं, कि अन्य अध्यायों का विवेचन करते-करते अब हम पहले अध्याय पर पहुंचे हैं। हमारे यहां शास्त्र अध्ययन और शास्त्र को समझने की अनेक परंपराओं में सर्वोत्तम परंपरा, शास्त्र को गुरु के मार्गदर्शन के अनुसार एक क्रम में पढ़ने की परंपरा है। सामान्य पुस्तक तो हम आरंभ से अंत तक, पहले पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक पढ़ लेते हैं लेकिन शास्त्रों के अध्ययन हेतु सद्गुरु हमारी योग्यता के अनुसार क्रम बताते हैं, जिससे उस विषय में हमारी ग्राह्यता बढ़ती है। कथानक की दृष्टि से तो क्रम महत्वपूर्ण होता ही है, लेकिन उपयोगिता की दृष्टि से एक क्रम का अनुसरण करना कुछ अलग बात है।
भगवद्गीता में प्रथम अध्याय में अर्जुन के विषाद की बात कही गई है, उसके बाद अचानक स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को बताया गया है। आगे कर्मयोग, ज्ञानयोग में कुछ ऐसी भारी - भारी बातें पढ़ने में आती है जो शायद पहली बार गीता को स्पर्श करने वाले व्यक्ति के सिर से ऊपर निकल जाती हैं। गीता जी में उस व्यक्ति की रुचि बैठने की जगह, रुचि छूटने की आशंका बढ़ जाती है। जब परम श्रद्धेय स्वामी जी जैसे संत बताते हैं कि सर्वप्रथम सबसे सुगम ऐसा अध्याय बारह पढ़ा जाए और उसके बाद दिए गए क्रम अनुसार जब हम गीता को पढ़ने लगते हैं तब वह हमारे लिए भगवद्गीता सुगम हो जाती हैं, ग्राह्य हो जाती है।
दिए गए क्रम के अनुसार हम गीता का अध्ययन करेंगे, उसे समझने की कोशिश भी करेंगे, लेकिन आज के सत्र में गीता जी के प्रादुर्भाव के बारे में और उसकी विशेषताओं के बारे में बात करेंगे। गीता जी को समझने के लिए किस भूमिका में उसे कहा गया यह समझना बहुत जरूरी है।
महाभारत - साहित्यिक श्रेणी
हमारे यहां जो साहित्य है, उसे चार प्रकारों में बांटा गया है-
१) श्रुति साहित्य - जिसे सुनकर समझा जाता है (सभी वेद श्रुति साहित्य कहलाते हैं)
२) स्मृति साहित्य - जिसे कंठस्थ किया जाता है (वेदों के कुछ अंग स्मृति साहित्य के अंतर्गत आते हैं, मनुस्मृति यह भी स्मृति साहित्य है)
३) इतिहास - (वाल्मीकी लिखित रामायण और वेद व्यास लिखित महाभारत दो मुख्य आदि इतिहास माने जाते हैं)
४) पुराण - (श्रीमद्भागवदपुराण जो मुख्य हैं जिसे परीक्षित जी को सुखदेव जी ने सुनाया )।
श्रीमद् भगवद्गीता इन चारों प्रकारों में आती है, अर्थात वह श्रुति भी है स्मृति भी है, महाभारत का प्रमुख हिस्सा होने के कारण इतिहास भी है और एक कथानक के रूप में होने के कारण पुराण भी है !!
महाभारत - श्लोक संख्या (असंख्य)
महाभारत विश्व का श्रेष्ठतम ग्रंथ माना जाता है। इसे सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य कहते हैं। हम सभी यह जानते हैं की महाभारत में एक लाख श्लोक हैं, लेकिन इस जानकारी को थोड़ा समझने की जरूरत है। महाभारत के मूल ग्रंथ में साठ लाख श्लाेक है । इनमें से तीस लाख श्लोक देवलोक के लिए है जो स्वर्ग में नारद जी के द्वारा गाए जाते हैं। पंद्रह लाख श्लोक पितृ लोक को दिए गए हैं जो असित और देवल ऋषि यों द्वारा प्रसारित किए जाते हैं। चौदह १४ लाख़ श्लोक यक्ष लोक के हैं जिसे शुकदेव महामुनी द्वारा गाया जाता है, और बचे हुए एक लाख श्लोक मनुष्य लोक में हैं जिसकी जिम्मेदारी वैशंपायन ऋषी की है।
महाभारत - वक्ता और श्रोता
हमारे शास्त्र मौखिक परंपरा से आते हैं, अर्थात उनमे वक्ता और श्रोता का महत्त्व होता है। "किसने किससे कहा" यह महत्वपूर्ण है। रामचरित मानस मे वक्ता भारद्वाज और शिव को माना गया है, जबकि श्रोता याज्ञवल्क और पार्वती जी हैं। महाभारत ग्रंथ मे वक्ता ऋषी वैशंपायन हैं जब कि श्रोता हैं राजा जनमेजय। राजा जनमेजय राजा परीक्षित के पुत्र हैं। हम सभी जानते है परिक्षित जी के पिता अभिमन्यू और अभिमन्यू के पिता अर्जुन। इस प्रकार हम कह सकते है कि अर्जुन के प्रपौत्र को बताया जानेवाला उनके दादाओं का इतिहास है महाभारत।
मूल महाभारत के दो वक्ता और दो श्रोता रहे हैं। वैशंपायन और सूत ये दो वक्ता और जनमेजय तथा शौनक ये दो श्रोता।
महाभारत ग्रंथ - मूल रचनाकार
महाभारत के लेखन को लेकर एक कथा प्रचलित है जो हम सभी जानते हैं। वेदव्यास जी का मानस था कि साठ लाख श्लाेकों से युक्त इस ग्रंथ की रचना की जाए। बहुत कम समय में उन्हें यह काम करना था। मन में शीघ्रता से आते हुए विचारों को लिखना उनके स्वयं के लिए असंभव था, इसलिए उन्होंने सोचा कि लेखन का यह कार्य कोई और करें। गणेश जी को पूछा गया, गणेश जी ने एक शर्त रखी कि मैं तभी लिखूंगा जब बिना रुके श्लोक सुनाए जाएंगे, वेदव्यास जी ने शर्त मान ली लेकिन उन्होंने भी अपनी एक शर्त रखी कि कोई भी श्लोक बिना समझे ना लिखा जाए। बात ऐसी है कि श्लोक रचना के दौरान कुछ समय मिल जाए इसलिए वेदव्यास जी कुछ कठिन श्लोक बीच-बीच में डाल देते थे। महाभारत में इन "कूट श्लोकों" की संख्या अठासी हजार है !! अब ये कूट श्लोक कौन से हैं यह तो हमें नहीं पता, लेकिन इन श्लोकों को बीच-बीच में डालने की वजह से गणेश जी के लिखने की गति कुछ कम हो जाती थी, और व्यास जी को श्लोकों की रचना करने हेतु पर्याप्त समय मिल जाया करता था।
महाभारत ग्रंथ कहां लिखा गया ?
प्राप्त जानकारीनुसार बद्रीनाथ के पास एक माना गांव है, वह आज भी है, वहां अलकनंदा और सरस्वती नदियों का तट पर बैठकर व्यास जी ने इसकी रचना की और गणेश जी ने महाभारत को लिखा। संपूर्ण लेखन में एक निरंतरता रही। जिसे अविरत लेखन कहा जाए उस प्रकार का लेखन हुआ और लगातार लिखते हुए इस ग्रंथ का लेखन तीन वर्षों में संपन्न हुआ।
महाभारत में अध्यायों की संख्या
महाभारत के रचनाकार के लिए अट्ठारह इस संख्या का बहुत महत्व है। महाभारत में अट्ठारह पर्व है, आदि पर्व से लेकर भीष्म पर्व तक। भीष्म पर्व में पचीसवें अध्याय से बयालीसवें अध्याय तक (पुन: अट्ठारह अध्याय) श्रीमद्भगवद्गीता कही गई है।
हम जानते हैं कि ९ यह संख्या कितनी महत्वपूर्ण है
९*१ = ९
९*२ =१८ और १+८ = ९
इसी प्रकार आगे
९*४ = ३६ और ३+६ = ९
इसी क्रम में
९*९ = ८१ और ८+१ = ९
९ संख्या की यह विशेषता हैं यह हम सभी जानते हैं, लेकिन महाभारत कार के लिए १८ यह संख्या बहुत महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। महाभारत में १८ पर्व, महाभारत का युद्ध चला १८ दिन और गीता जी में १८ अध्याय !!
महाभारत मूल नाम
महाभारत ग्रंथ का मूल नाम था जय पुराण। जनमेजय राजा को सुनाया गया था इसलिए जय पुराण। लेकिन बाद में उसका नाम महाभारत कैसे पड़ा, यह कथा बड़ी रोचक है। भारत शब्द का अर्थ है भारी। किसी बात में वजन होना, कोई चीज़ बढ़िया होना, उसे हम कहते हैं भारी !! वेद इसी कारण से भारत कहलाते थे। जब जयपुराण लिखा गया तब उसकी तुलना वेदों से की गई। उनमें से कौन अधिक भारी है यह जानने के लिए तुला के एक पलड़े पर चार वेदों को रखा गया और दूसरे पलड़े पर रखा गया महाभारत का ग्रंथ, वह ग्रंथ चार वेदों से भी भारी पड़ा, इसलिए उसे कहा गया "महाभारत" !! महाभारत को बाद में पंचम वेद की संज्ञा भी दी गई।
महाभारत - पात्र संख्या
महाभारत में पांच हजार पात्र है। सज्जन-दुर्जन सभी प्रकार के पात्र। ऐसा कहा जाता है कि जिस व्यक्ति ने ठीक से महाभारत पढ़ी है उसे महाभारत में अपने जैसा कम से कम एक पात्र तो अवश्य मिल जाएगा। इसीलिए माना जाता है कि जो कुछ इस विश्व में है वह सब कुछ महाभारत में है और जो महाभारत में नहीं है वह और कहीं भी नहीं है।
महाभारत - कथावस्तु
महाभारत की कथा मूलतः कुरु वंश की कथा है। "कुरुवंश वृक्ष" महाराजा कुरु से शुरू होकर शांतनु, देवव्रत, धृतराष्ट्र, पांडु, पांडव और उनके प्रपोत्रों तक फैला हुआ है।
इस वंशवृक्ष मे उल्लेखित शांतनु, सत्यवती, भीष्म, विचित्रवीर्य, धृतराष्ट्र, पांडव इन चरित्रों से जुड़ी अनेकानेक कथाएँ हम सुनते आए हैं।
महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता
गीता शब्द का अर्थ है भगवद् प्राप्ति हेतु गाया जाने वाला गान। इस अर्थ में अनेक गीताएं हैं, लेकिन भगवद्गीता का महत्व अलग ही है। किसी भी अभ्यास के लिए आचार्य बनना हो तो भगवद्गीता पर भाष्य लिखना अनिवार्य था।
इस तरह से शंकर भाष्य, रामानुजम भाष्य, ज्ञानेश्वरी, गीता रहस्य आदि आदि अनेक गीताएं लिखी गई। गीता पर लिखित मान्य और प्रमाणित भाष्यो की संख्या १८०० से अधिक है। जिस प्रकार योगानंद द्वारा लिखी गई गीता और विनोबा जी द्वारा लिखी गीता आज के समय में प्रसिद्ध है, उसी प्रकार सर्वाधिक प्रमाणित और सबसे सहज ऐसी गीता है साधक संजीवनी। गीता तो सब रत्नों की खान है इसमें ऊंच-नीच कोई नहीं, यह गीता उस गीता से अच्छी ऐसा कुछ भी नहीं, लेकिन भगवद्गीता का अध्ययन सबसे अधिक किया जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता व दिव्यदृष्टि
श्रीमद्भगवत गीता का प्रादुर्भाव महाभारत युद्ध के दसवे दिन हुआ। युद्ध के दौरान जब दसवें दिन भीष्म पितामह शर शैय्या पर आए तब यह समाचार घृतराष्ट्र को देने के लिए संजय जी राजमहल में वापस आए। ऐसी बात नहीं है कि संजय जी ने युद्ध भूमि पर बैठकर धृतराष्ट्र जी को गीता सुनाई हो। भीष्म जी के गिरने का समाचार लेकर जब वे राजमहल पहुंचे तब धृतराष्ट्र बहुत व्यथित हो गए और संजय जी से युद्ध का संपूर्ण वृतांत सुनाने की बात कही। संजय जी को जो दिव्य दृष्टि प्राप्त थी उसके आधार पर अपनी स्मृति में बसे हर दिन की गाथा जैसी की तैसी उन्होंने धृतराष्ट्र जी को सुनाई। बाद में त्रिकालदर्शी कहलाने वाले वेदव्यास जी ने वह गाथा वैसी की वैसी लिखी। इसीलिए गीता को भगवान की साक्षात वाणी कहा गया है।
गीता माहात्म्य
भगवद्गीता के आरंभ में ही गीता महात्म्य के सात श्लोक हैं जिनको पढ़ते हुए हम अध्याय एक की शुरुआत करेंगे
भगवद्गीता का यह पहला अध्याय तो एक प्रकार से पात्र परिचय ही है सभी पात्रों से संबंधित अनेक कथाओं का श्रवण करते हुए हम इस अध्याय का विवेचन करेंगे।
1.1
धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे, समवेता युयुत्सवः।
मामकाः(फ्) पाण्डवाश्चैव, किमकुर्वत सञ्जय।।1.1।।
धृतराष्ट्र बोले - हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?
विवेचन : गीताजी का पहला श्लोक धृतराष्ट्र के मुख से है, यह एकमात्र श्लोक है जो धृतराष्ट्र द्वारा कहा गया है। इस श्लोक के दो शब्द महत्वपूर्ण हैं, धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र !! युद्ध भूमि को धर्मक्षेत्र क्यों कहा गया है? गीता का आरंभ भी धर्म शब्द से है जिसका प्रथम अक्षर है "ध" और अठारहवें अध्याय का अंतिम श्लोक देखें तो उसका अंतिम अक्षर है *र्म*!अर्थात आरंभ "ध" शब्द से और अंत *र्म* शब्द से, पूरी गीता ही *धर्म* निहित है।
प्रथम श्लोक में धृतराष्ट्र की मानसिकता समझ में आती है मेरे पुत्र और पांडु के पुत्र, मामकाः पाण्डवाश्चैव ऐसा कहने वाले धृतराष्ट्र पुत्र मोह में अंधे हो गए हैं। धृतराष्ट्र को धर्म का उपदेश देने वाले दो ही व्यक्ति है एक विदुर और दूसरे संजय। इसी धर्मोपदेश की भूमि है कुरु भूमि, इसलिये धर्मक्षेत्र!
इसी प्रकार युद्धभूमि को कुरुक्षेत्र कहने का कारण भी समझा जा सकता है महाभारत का युद्ध कोई अचानक नहीं हुआ उसके पीछे अनेक घटनाएं घटी। संधि प्रस्ताव में पाँच गांव देने से भी दुर्योधन ने मना कर दिया कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयत्न किया। इसके बाद कुंती ने संदेश दिया। क्षत्राणी माता कुंती युद्ध की अनुमति देती है, कुरुवंश की पुत्रवधू द्रोपदी का वस्त्र हरण यही कुंती की पीड़ा थी, अन्याय की चरम सीमा को देखते हुए ही कुंती ने युद्ध की अनुमति दी थी इस महान युद्ध के लिए जिस विशाल भूमि का चयन किया गया वह था कुरुक्षेत्र। यह क्षेत्र कुरुवंश के पूर्वजों की तपस्या के कारण एक तपोभूमि बन गया था इसलिए इस भूमि पर युद्ध करते हुए जिसे भी मृत्यु आए वह मोक्ष का अधिकारी बने इसीलिए युद्ध भूमि को कुरुक्षेत्र कहा गया।
सञ्जय उवाच: दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं(व्ँ), व्यूढं(न्) दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसङ्गम्य, राजा वचनमब्रवीत्॥1.2॥
संजय बोले - उस समय व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर राजा दुर्योधन ने द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।
विवेचन : इस तरह हम देखते हैं कि पहला अध्याय तो युद्ध की तैयारी और पात्रों के परिचय से भरा पड़ा है सभी पात्रों से संबंधित कुछ कथाओं का श्रवण करते हुए हम इस अध्याय में आगे बढ़ेंगे, दूसरे श्लोक में संजय ने धृतराष्ट्र से कहा - आप राजा है परंतु राजा दुर्योधन सभी महत्वपूर्ण निर्णय ले रहेे हैं। पांडवों की युद्ध भूमि में व्यूरचना को देखते हुए दुुर्याधन ने गुरुु द्रोणाचार्य जी से कहा।
पश्यैतां(म्) पाण्डुपुत्राणाम्, आचार्य महतीं(ञ्) चमूम्। व्यूढां(न्) द्रुपदपुत्रेण, तव शिष्येण धीमता।।1.3।।
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा व्यूहकार खड़ी की हुई पाण्डवों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये।
विवेचन : दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य को कहता है, हे आचार्य गुरुवर आप अपने बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र दृस्टद्युम्न द्वारा रचित इस पाण्डव सेना की व्यूहरचना को देखिये।
हरि शरणम ! हरि शरणम !! हरि शरणम !!! के संकीर्तन के संग आज के इस विवेचन सत्र को यहीं पर विश्राम दिया गया।
हरि शरणम ! हरि शरणम !! हरि शरणम !!! के संकीर्तन के संग आज के इस विवेचन सत्र को यहीं पर विश्राम दिया गया।