विवेचन सारांश
भक्ति की महिमा एवं श्रेष्ठ भक्ति मार्ग
परम पूज्य गुरुदेव को नमन करते हुए ईश वंदना एवं अति सुंदर दीप प्रज्वलन के साथ आज के सुंदर विवेचन का प्रारंभ हुआ | भगवान की अतिशय कृपा हम पर हुई है कि, हम इस मनुष्य जीवन का उद्धार करने के लिए और इसे सार्थक करने के लिये भगवद्गीता गीता को सीखने के पथ पर अग्रसर हुए हैं। अगर हम यह विचार करें कि इस पथ को अपनाना हमारे प्रयासों का फल है तो यह धारणा गलत है क्योंकि भगवान की कृपा बिना इस मार्ग पर चलना संभव नहीं है, भगवान ने अठ्ठाहरवें अध्याय के अड़सठवें श्लोक में स्वयं कहा है कि जो भी इस ग्रंथ को पढ़ता है वह निश्चित मुझे ही प्राप्त होता है और ऐसी कृपा वे उन्हीं पर करते हैं जिनके पूर्व जन्मों के कोई पुण्य हो या उनके पूर्वजों के पुण्य हो अथवा किसी संत महात्मा की कृपा दृष्टि से जिनके पुण्य फलीभूत हो गये हों। भगवद्गीता जैसा कल्याणकारी ग्रंथ पूरे विश्व में उपलब्ध नहीं है। हमें इसको समझने से पूर्व इसकी भूमिका को भी समझना आवश्यक है कि ये ग्रंथ है क्या?
भगवद्गीता महाभारत का अंश है-
जब दुर्योधन ने महाराज युधिष्ठिर का इंद्रप्रस्थ राज्य और वहाँ का वैभव तथा अथाह संपत्ति देखी तो वह ईर्ष्या से भर गया तथा हस्तिनापुर पहुँच कर महाराज धृतराष्ट्र को साफ कह दिया कि उसे उन पांडवों का ऐसा वैभव असहनीय है और वो उसे हड़पना चाहता है पर उसके पास ना इतनी संपत्ति है और ना ही इतनी ताकतवर सैन्यशक्ति कि वह सीधे सीधे उन्हें युद्ध में हरा सके इसलिए उसने कर्ण और शकुनि के साथ मिलकर युधिष्ठिर को द्यूतक्रीड़ा के लिये आमंत्रित करने की योजना बनाई और उस समय क्षत्रिय धर्म के अनुसार एक राजा दूसरे राजा के ऐसे निमंत्रण को ठुकरा नहीं सकता था, और अगर ये निमंत्रण महाराज धृतराष्ट्र की तरफ से जायेगा तो इसकी अस्वीकृति की संभावना कदापि नहीं रहेगी क्योंकि युधिष्ठिर धर्मराज हैं और वे धृतराष्ट्र को पिता समान मानते हैं। विदुरजी ने पांडवों को मना करने के लिये बहुत समझाया पर इसको गलत मानते हुए भी सिर्फ धर्म का पालन करने के लिए युधिष्ठिर वहाँ गये और वहाँ जाकर भी उन्होंने चौसर की बहुत निंदा की, परंतु भीष्म पितामह, विदुरजी और संजय के मना करने के बाबजूद भी यह क्रीड़ा हुई। जिसमें युधिष्ठिर अपना सब कुछ गंवा बैठे और अंत में कर्ण के कहने पर उन्होंने सती द्रोपदी को भी दांव पर लगा दिया। पांच पति होने के बावजूद सती द्रोपदी का चरित्र इतना उत्तम है कि हमारे यहाँ जो प्रातः स्मरणीय सात उत्तम स्त्रियाँ है उनमें उनका नाम आता है, ऐसी सती का उस सभा में अपमान हुआ। भगवान कृष्ण ने द्रोपदी की सहायता की और भीम ने दुर्योधन और दुशासन के वध की प्रतिज्ञा की। जिससे घबराकर महाराज धृतराष्ट्र ने पांडवों को उनका राज्य लौटा दिया और सभी भाइयों को दासत्व से मुक्त कर दिया। वे सभी वहाँ से लौट गये पर दुर्योधन ने फिर चाल चलते हुए महाराज के संदेश द्वारा युधिष्ठिर को वापस वहाँ बुलाया और सबके मना करने के बावजूद वे फिर द्यूत के लिए तैयार हो गये, इस बार शर्त एक ही दांव खेलने की थी और हारने वाले को मृगचर्म धारण कर बारस वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास धारण करना था और अज्ञातवास में खोज लिये जाने पर दोबारा यही क्रम दोहराना था। ना चाहते हुए भी महाराज युधिष्ठिर खेलने बैठे और हार गये तथा पांडवों ने वनवास ग्रहण किया, वहाँ से लौटने के बाद भी दुर्योधन राज्य देने को राजी नहीं हुआ। युधिष्ठिर और कृष्ण युद्ध नहीं चाहते थे इसलिए भगवान स्वयं दूत बनकर गये और सिर्फ पांच गाँव देने की मांग की, जिसे भी दुर्योधन ने ठुकरा दिया और भगवान को बंदी बनाने का आदेश दिया, वहाँ कृष्ण ने अपना विश्वरुप दिखलाया। जब वे माता कुंती से मिलने गये तो कुंती ने दो बातों के लिये अपनी पीड़ा प्रकट की, प्रथम तो कुल वधु का अपमान और दूसरे शांतिदूत बनकर आये कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास, इसलिए माता ने कृष्ण को अपना संदेश युधिष्ठिर को सुनाने के लिये कहा कि जिस दिन के क्षत्राणी पुत्र को जन्म देती है वह दिन आ गया है और अधर्मियों का विनाश करने की आज्ञा दी। अत: ना चाहते हुए भी युधिष्ठिर युद्ध के लिये तैयार हो गये और युद्ध के लिये पूरी तैयारी की गई। जब दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए आमने सामने आ गई तब गीता का आरंभ होता है, क्योंकि तभी अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में अपना रथ ले जाने को कहा।अर्जुन ने इससे पहले भी कौरवों को अनेकों बार युद्ध में हराया था, परंतु ये निर्णायक युद्ध था जिसमें उन्हें भीष्म और द्रोणाचार्य तथा स्वजनों के प्राण भी लेने पड़ सकते थे, इसलिए उनके मन में मोह उत्पन्न हो गया। विद्वान और संत भगवान और अर्जुन के इस संवाद को लगभग चालीस पैंतालीस मिनट का बताते हैं क्योंकि संपूर्ण गीता के पठन में इतना ही समय लगता है, इस गीता को भगवान ने युद्ध के दसवें दिन जब भीष्म शरशैया पर थे तब सुनाना आरंभ किया था। जब धृतराष्ट्र ने संजय से युद्ध का हाल पूछा तब संजय ने महात्मा वेदव्यास द्वारा प्राप्त दिव्यदृष्टि से जैसा देखा वैसा ही हाल धृतराष्ट्र को सुनाया और बाद में वेदव्यास भगवान ने भी उन बातों को वैसा ही लिखा इसलिए भगवद्गीता भगवान की प्रकट वाणी मानी जाती है।
एक प्रेरणादायक कहानी यहाँ पर सुनाई गई। एक नारायण स्वामी नाम के ऐसे उत्तम भक्त थे जिन्हें देख लोगों के मन में भक्ति जागृत होती थी। उसी समय में आचार्य श्रवण नाम के उत्तम आचार्य थे। वे निरंतर वेदों का अध्ययन करते थे परंतु नारायण स्वामी की भक्ति से अति प्रभावित थे और एक दिन उनके घर आये और उनसे भक्ति का उपदेश मांगा। नारायण स्वामी ने उनसे हाथ मुंह धोकर आने को कहा और उनके लिये जल लेकर आये। आचार्य ने थोड़ा जल ग्रहण किया, फिर नारायण स्वामी उनके लिये एक पात्र में शर्बत लाये पर पीने का पात्र अलग से लेकर नहीं आये और उन्होंने उसी पात्र में शर्बत डालना आरंभ कर दिया जिसमें जल था, आचार्य श्रवण यह देख हतप्रभ हो गये, नारायण स्वामी उस पात्र में शर्बत डालते रहे, जब वह पात्र से बाहर गिरने लगा तो आचार्य श्रवण ने कहा इस पहले से भरे गिलास में ये शर्बत कैसे आयेगा तब नारायण स्वामी ने कहा पहली शिक्षा यही है। उसी प्रकार गीता सीखने के लिये भी हमारी पूर्व वृत्तियों को दिमाग से खाली करना आवश्यक है, ठीक वैसे ही जैसे नया श्रंगार धारण करने के लिए पुराने को उतारना आवश्यक होता है, क्योंकि नया भरने के लिये पुरानी दृष्टियों को उतारना आवश्यक है। हम भी गीता सुनें तो पूर्व की धारणाओं से ग्रस्त होकर ना सुनें। सात सौ श्लोकों की इस पुस्तक में अठारह अध्याय हैं, ये महाभारत के भीष्म पर्व से ली गई है, जिसमें पच्चीसवें अध्याय से बयालीसवें अध्याय तक का संकलन करके भगवद्गीता बनाई गई। गीता परिवार में बारहवें अध्याय से पठन करने का कारण यह है कि शास्त्रों के पठन की एक अलग पद्धति होती है। गीता का ये सबसे छोटा और सरल अध्याय है जिसमें अनुष्टुप छंद के केवल बीस श्लोक हैं, गीता में भक्ति योग को मुकुट मणि माना जाता है, जो पूरे अठारह अध्यायों का पठन ना कर पाये उसे भी ये भक्ति योग रुपी मणि मिल जाये तो बहुत कुछ मिल जायेगा इसी दृष्टि से इस अध्याय से पठन प्रारंभ किया जाता है। जब हम गीता का अनवेष्ण करते हैं उसे पढ़ते हैं तो लगता है कि अर्जुन प्रश्न करने वाले कौन हैं? अलग अलग विद्वानों की राय के अनुसार उस समय अर्जुन की आयु चौरासी वर्ष की और भगवान की आयु सत्तासी अथवा नवासी वर्ष की थी। ये अर्जुन ऐसे तेजस्वी है जिन्होंने एक भी युद्ध नहीं हारा, राजसूय यज्ञ में सारे पांडव मिलाकर जितना धन ला पाये उतना अकेले अर्जुन लेकर आये। स्वंय भगवान महादेव से युद्ध कर उन्हें अपनी युद्ध कला से प्रसन्न किया और पाशुपातास्त्र प्राप्त किया। खांडवप्रस्थ में इंद्र सारे देवताओं को लेकर युद्ध करनें आये वे भी अर्जुन के सामने नहीं टिक पाये। वे इतने नीतिवान थे जिन्होंने कभी अपने भाई की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया और स्वर्ग में स्वंय उर्वशी जैसी अप्सरा उनकी सेवा में प्रस्तुत हुई उसे भी उन्होंने माँ का दर्जा दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक वर्ष तक बृहन्नला के रूप में नपुंसक जीवन जीना पड़ा, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और विराटनगर में उत्तरा को नृत्य सिखाया। उनके जैसा पात्र महाभारत में कोई नहीं। अग्नि देव ने खांडव वन प्रसंग में अर्जुन को वरदान देने के बाद संकोच पूर्वक जब भगवान से पूछा कि मैं आपको क्या दे सकता हूँ, क्योंकि भगवान उस समय मनुष्य रुप में थे तो भगवान ने कहा कि आप यही वरदान दीजिये कि मेरी और अर्जुन की प्रीति अखंड रहे, भगवान जिस भक्त की प्रीति मांगे उसकी तो महिमा अकल्पनीय है। युद्ध के पहले जब अर्जुन ने एक अक्षोहिणी सेना न मांगकर निहत्थे भगवान को मांगा तो कारण पूछने पर अर्जुन ने कहा कि तीन लोको की संपत्ति भी हो और दूसरी तरफ आप हो तो भी मुझे आपके सिवा कुछ नहीं चाहिए। इसिलिए भगवान ने ये गीता अर्जुन को सुनाई क्योंकि उन्हें भगवान के सिवा कुछ नहीं चाहिए, इसिलिए भगवान को भी अर्जुन अत्यंत प्रिय है।
सात सौ श्लोकों में एक श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा, इकतालीस श्लोक संजय ने कहे, चौरासी श्लोक और प्रश्न अर्जुन ने कहे और पांच सौ चौहत्तर श्लोक भगवान ने कहे। बहुत सारी बातें होने के बाद अर्जुन ने भगवान के विश्व रुप का दर्शन भी कर लिया। अब अर्जुन के मन में एक प्रश्न खड़ा हुआ।
भगवद्गीता महाभारत का अंश है-
जब दुर्योधन ने महाराज युधिष्ठिर का इंद्रप्रस्थ राज्य और वहाँ का वैभव तथा अथाह संपत्ति देखी तो वह ईर्ष्या से भर गया तथा हस्तिनापुर पहुँच कर महाराज धृतराष्ट्र को साफ कह दिया कि उसे उन पांडवों का ऐसा वैभव असहनीय है और वो उसे हड़पना चाहता है पर उसके पास ना इतनी संपत्ति है और ना ही इतनी ताकतवर सैन्यशक्ति कि वह सीधे सीधे उन्हें युद्ध में हरा सके इसलिए उसने कर्ण और शकुनि के साथ मिलकर युधिष्ठिर को द्यूतक्रीड़ा के लिये आमंत्रित करने की योजना बनाई और उस समय क्षत्रिय धर्म के अनुसार एक राजा दूसरे राजा के ऐसे निमंत्रण को ठुकरा नहीं सकता था, और अगर ये निमंत्रण महाराज धृतराष्ट्र की तरफ से जायेगा तो इसकी अस्वीकृति की संभावना कदापि नहीं रहेगी क्योंकि युधिष्ठिर धर्मराज हैं और वे धृतराष्ट्र को पिता समान मानते हैं। विदुरजी ने पांडवों को मना करने के लिये बहुत समझाया पर इसको गलत मानते हुए भी सिर्फ धर्म का पालन करने के लिए युधिष्ठिर वहाँ गये और वहाँ जाकर भी उन्होंने चौसर की बहुत निंदा की, परंतु भीष्म पितामह, विदुरजी और संजय के मना करने के बाबजूद भी यह क्रीड़ा हुई। जिसमें युधिष्ठिर अपना सब कुछ गंवा बैठे और अंत में कर्ण के कहने पर उन्होंने सती द्रोपदी को भी दांव पर लगा दिया। पांच पति होने के बावजूद सती द्रोपदी का चरित्र इतना उत्तम है कि हमारे यहाँ जो प्रातः स्मरणीय सात उत्तम स्त्रियाँ है उनमें उनका नाम आता है, ऐसी सती का उस सभा में अपमान हुआ। भगवान कृष्ण ने द्रोपदी की सहायता की और भीम ने दुर्योधन और दुशासन के वध की प्रतिज्ञा की। जिससे घबराकर महाराज धृतराष्ट्र ने पांडवों को उनका राज्य लौटा दिया और सभी भाइयों को दासत्व से मुक्त कर दिया। वे सभी वहाँ से लौट गये पर दुर्योधन ने फिर चाल चलते हुए महाराज के संदेश द्वारा युधिष्ठिर को वापस वहाँ बुलाया और सबके मना करने के बावजूद वे फिर द्यूत के लिए तैयार हो गये, इस बार शर्त एक ही दांव खेलने की थी और हारने वाले को मृगचर्म धारण कर बारस वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास धारण करना था और अज्ञातवास में खोज लिये जाने पर दोबारा यही क्रम दोहराना था। ना चाहते हुए भी महाराज युधिष्ठिर खेलने बैठे और हार गये तथा पांडवों ने वनवास ग्रहण किया, वहाँ से लौटने के बाद भी दुर्योधन राज्य देने को राजी नहीं हुआ। युधिष्ठिर और कृष्ण युद्ध नहीं चाहते थे इसलिए भगवान स्वयं दूत बनकर गये और सिर्फ पांच गाँव देने की मांग की, जिसे भी दुर्योधन ने ठुकरा दिया और भगवान को बंदी बनाने का आदेश दिया, वहाँ कृष्ण ने अपना विश्वरुप दिखलाया। जब वे माता कुंती से मिलने गये तो कुंती ने दो बातों के लिये अपनी पीड़ा प्रकट की, प्रथम तो कुल वधु का अपमान और दूसरे शांतिदूत बनकर आये कृष्ण को बंदी बनाने का प्रयास, इसलिए माता ने कृष्ण को अपना संदेश युधिष्ठिर को सुनाने के लिये कहा कि जिस दिन के क्षत्राणी पुत्र को जन्म देती है वह दिन आ गया है और अधर्मियों का विनाश करने की आज्ञा दी। अत: ना चाहते हुए भी युधिष्ठिर युद्ध के लिये तैयार हो गये और युद्ध के लिये पूरी तैयारी की गई। जब दोनों सेनाएँ युद्ध के लिए आमने सामने आ गई तब गीता का आरंभ होता है, क्योंकि तभी अर्जुन ने दोनों सेनाओं के मध्य में अपना रथ ले जाने को कहा।अर्जुन ने इससे पहले भी कौरवों को अनेकों बार युद्ध में हराया था, परंतु ये निर्णायक युद्ध था जिसमें उन्हें भीष्म और द्रोणाचार्य तथा स्वजनों के प्राण भी लेने पड़ सकते थे, इसलिए उनके मन में मोह उत्पन्न हो गया। विद्वान और संत भगवान और अर्जुन के इस संवाद को लगभग चालीस पैंतालीस मिनट का बताते हैं क्योंकि संपूर्ण गीता के पठन में इतना ही समय लगता है, इस गीता को भगवान ने युद्ध के दसवें दिन जब भीष्म शरशैया पर थे तब सुनाना आरंभ किया था। जब धृतराष्ट्र ने संजय से युद्ध का हाल पूछा तब संजय ने महात्मा वेदव्यास द्वारा प्राप्त दिव्यदृष्टि से जैसा देखा वैसा ही हाल धृतराष्ट्र को सुनाया और बाद में वेदव्यास भगवान ने भी उन बातों को वैसा ही लिखा इसलिए भगवद्गीता भगवान की प्रकट वाणी मानी जाती है।
एक प्रेरणादायक कहानी यहाँ पर सुनाई गई। एक नारायण स्वामी नाम के ऐसे उत्तम भक्त थे जिन्हें देख लोगों के मन में भक्ति जागृत होती थी। उसी समय में आचार्य श्रवण नाम के उत्तम आचार्य थे। वे निरंतर वेदों का अध्ययन करते थे परंतु नारायण स्वामी की भक्ति से अति प्रभावित थे और एक दिन उनके घर आये और उनसे भक्ति का उपदेश मांगा। नारायण स्वामी ने उनसे हाथ मुंह धोकर आने को कहा और उनके लिये जल लेकर आये। आचार्य ने थोड़ा जल ग्रहण किया, फिर नारायण स्वामी उनके लिये एक पात्र में शर्बत लाये पर पीने का पात्र अलग से लेकर नहीं आये और उन्होंने उसी पात्र में शर्बत डालना आरंभ कर दिया जिसमें जल था, आचार्य श्रवण यह देख हतप्रभ हो गये, नारायण स्वामी उस पात्र में शर्बत डालते रहे, जब वह पात्र से बाहर गिरने लगा तो आचार्य श्रवण ने कहा इस पहले से भरे गिलास में ये शर्बत कैसे आयेगा तब नारायण स्वामी ने कहा पहली शिक्षा यही है। उसी प्रकार गीता सीखने के लिये भी हमारी पूर्व वृत्तियों को दिमाग से खाली करना आवश्यक है, ठीक वैसे ही जैसे नया श्रंगार धारण करने के लिए पुराने को उतारना आवश्यक होता है, क्योंकि नया भरने के लिये पुरानी दृष्टियों को उतारना आवश्यक है। हम भी गीता सुनें तो पूर्व की धारणाओं से ग्रस्त होकर ना सुनें। सात सौ श्लोकों की इस पुस्तक में अठारह अध्याय हैं, ये महाभारत के भीष्म पर्व से ली गई है, जिसमें पच्चीसवें अध्याय से बयालीसवें अध्याय तक का संकलन करके भगवद्गीता बनाई गई। गीता परिवार में बारहवें अध्याय से पठन करने का कारण यह है कि शास्त्रों के पठन की एक अलग पद्धति होती है। गीता का ये सबसे छोटा और सरल अध्याय है जिसमें अनुष्टुप छंद के केवल बीस श्लोक हैं, गीता में भक्ति योग को मुकुट मणि माना जाता है, जो पूरे अठारह अध्यायों का पठन ना कर पाये उसे भी ये भक्ति योग रुपी मणि मिल जाये तो बहुत कुछ मिल जायेगा इसी दृष्टि से इस अध्याय से पठन प्रारंभ किया जाता है। जब हम गीता का अनवेष्ण करते हैं उसे पढ़ते हैं तो लगता है कि अर्जुन प्रश्न करने वाले कौन हैं? अलग अलग विद्वानों की राय के अनुसार उस समय अर्जुन की आयु चौरासी वर्ष की और भगवान की आयु सत्तासी अथवा नवासी वर्ष की थी। ये अर्जुन ऐसे तेजस्वी है जिन्होंने एक भी युद्ध नहीं हारा, राजसूय यज्ञ में सारे पांडव मिलाकर जितना धन ला पाये उतना अकेले अर्जुन लेकर आये। स्वंय भगवान महादेव से युद्ध कर उन्हें अपनी युद्ध कला से प्रसन्न किया और पाशुपातास्त्र प्राप्त किया। खांडवप्रस्थ में इंद्र सारे देवताओं को लेकर युद्ध करनें आये वे भी अर्जुन के सामने नहीं टिक पाये। वे इतने नीतिवान थे जिन्होंने कभी अपने भाई की आज्ञा का उल्लंघन नहीं किया और स्वर्ग में स्वंय उर्वशी जैसी अप्सरा उनकी सेवा में प्रस्तुत हुई उसे भी उन्होंने माँ का दर्जा दिया, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक वर्ष तक बृहन्नला के रूप में नपुंसक जीवन जीना पड़ा, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और विराटनगर में उत्तरा को नृत्य सिखाया। उनके जैसा पात्र महाभारत में कोई नहीं। अग्नि देव ने खांडव वन प्रसंग में अर्जुन को वरदान देने के बाद संकोच पूर्वक जब भगवान से पूछा कि मैं आपको क्या दे सकता हूँ, क्योंकि भगवान उस समय मनुष्य रुप में थे तो भगवान ने कहा कि आप यही वरदान दीजिये कि मेरी और अर्जुन की प्रीति अखंड रहे, भगवान जिस भक्त की प्रीति मांगे उसकी तो महिमा अकल्पनीय है। युद्ध के पहले जब अर्जुन ने एक अक्षोहिणी सेना न मांगकर निहत्थे भगवान को मांगा तो कारण पूछने पर अर्जुन ने कहा कि तीन लोको की संपत्ति भी हो और दूसरी तरफ आप हो तो भी मुझे आपके सिवा कुछ नहीं चाहिए। इसिलिए भगवान ने ये गीता अर्जुन को सुनाई क्योंकि उन्हें भगवान के सिवा कुछ नहीं चाहिए, इसिलिए भगवान को भी अर्जुन अत्यंत प्रिय है।
सात सौ श्लोकों में एक श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा, इकतालीस श्लोक संजय ने कहे, चौरासी श्लोक और प्रश्न अर्जुन ने कहे और पांच सौ चौहत्तर श्लोक भगवान ने कहे। बहुत सारी बातें होने के बाद अर्जुन ने भगवान के विश्व रुप का दर्शन भी कर लिया। अब अर्जुन के मन में एक प्रश्न खड़ा हुआ।
12.1
अर्जुन उवाच
एवं(म्) सततयुक्ता ये, भक्तास्त्वां(म्) पर्युपासते|
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं (न्), तेषां(ङ्) के योगवित्तमाः||1||
अर्जुन बोले - जो भक्त इस प्रकार (ग्यारवें अध्याय के पचपनवें श्लोक के अनुसार) निरन्तर आप में लगे रहकर आप (सगुण साकार) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निर्गुण निराकार की ही (उपासना करते हैं), उन दोनों में से उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?
विवेचन: अर्जुन ने भगवान ने सीधे सीधे प्रश्न किया कि आपने जो इतनी सारी बातें बतलाई उनमें मेरे लिये उत्तम क्या है? पर जैसे एक अच्छा डाक्टर बीमारी की जड़ तक जाकर फिर दवाई बताता है वैसे ही भगवान भी अर्जुन के प्रश्न की तह तक जाकर फिर उसका उत्तर देते हैं, उत्तम वक्ता की एक पहचान यह भी है कि वह पहले संक्षिप्त में प्रश्न का उत्तर देकर फिर उसे विस्तार से समझाता है, भगवान दूसरे शलोक में अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हैं और फिर उसका विस्तार करते हैं।
श्रीभगवानुवाच
मय्यावेश्य मनो ये मां(न्), नित्ययुक्ता उपासते|
श्रद्धया परयोपेता:(स्), ते मे युक्ततमा मताः||2||
श्रीभगवान् बोले - मुझ में मन को लगाकर नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए जो भक्त परम श्रद्धा से युक्त होकर मेरी (सगुण साकार की) उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।
भगवान लक्ष्मण गीता में कहते हैं,
कहहु ज्ञान विराग असमान, करहुँ सो भगति करहुँ जेहिं दाया
जब अर्जुन ने भगवान से ज्ञान और भक्ति के विषय में प्रश्न किया तो उन्होंने कहा कि उन्हें सगुण भक्ति अधिक प्रिय है, फिर भगवान कहते हैं:-
धर्म ते बिरति जोग ते ग्याना| ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ||
जाते बेगि द्रवउं मैं भाई सो मम भगति भगत सुखदाई ||धर्म के आचरण से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष का देने वाला है, ऐसा वेदों ने वर्णन किया है और हे भाई! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हूँ वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देने वाली है
ऐसा इसलिये हैं क्योंकि:-
सो सुतंत्र अवलंब ना आना| तेहि आधीन ग्यान विग्याना ||
भगति तात अनुपम सुखमूला| मिलहि जो संत होइ अनुकूल ||
लक्ष्मण वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको ज्ञान विज्ञान आदि किसी दूसरे साधन की अपेक्षा नही है| ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं| भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है और तभी मिलती है जब संत प्रसन्न होते हैं|
भगति कि साधन कहउं बखानी|सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ||
प्रथमहिं विप्र चरन अति प्रीती |निज निज कर्म निरत श्रुति रीति ||
भक्ति सुगम मार्ग है जिससे जीव मुझे सहज ही पा जाता है। भक्त के लिये ज्ञानी की तरह कोई बंधन नहीं है, उसकी पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अति प्रीती हो और अपने अपने कर्मों में लगा रहे।
एहिं कर फल पुनि बिषय विरागा| तब मम धर्म उपज अनुरागा ||
श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाही| मम लीला रीति अति मन माही ||
इसका फल फिर बिषयों से वैराग्य होगा। तब मेरे धर्म में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियां दृढ होंगी।
शास्त्रों में नौ प्रकार की भक्ति बताई गई है
श्रवण :भगवान की कथाओं को सुनना जैसे परिक्षित जी महाराज
कीर्तन : भगवान की कीर्ति का गायन जैसे सुखदेव जी महाराज
स्मरण : भक्त प्रह्लाद
पाद सेवनम् :भगवान के चरणों की सेवा करना जैसे लक्ष्मी महारानी
अर्चना :राजा पृथु
वदनम् :अक्रूर जी
दास्य भक्ति: हनुमान जी
साख्य भक्ति :अर्जुन
आत्म निवेदन :राजा बलि की तरह
अर्जुन इनमें से किसी भी प्रकार की भक्ति जो करता है वो मुझे प्रिय है।
सत चरण पंकज अति प्रेमा| मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा ||
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा| सब मोहि कहं जाने दृढ़ सेवा ||
मम गुन गावत पुलक सरीरा | गदगद गिरा नयन बह नीरा ||
काम आदि मद दंभ ना जाके | तात निरंतर बस में ताके ||
मैं उसके वश में हो जाता हूँ .
बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करे निष्काम
तिन्ह के ह्रदय कमल महुँ करउं सदा विश्राम ||
जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं मैं उनके ह्रदय में निवास करता हूँ।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यम्, अव्यक्तं(म्) पर्युपासते|
सर्वत्रगमचिन्त्यं(ञ्) च, कूटस्थमचलं(न्) ध्रुवम्||3||
और जो (अपने) इन्द्रिय समूह को वश में करके चिन्तन में न आने वाले, सब जगह परिपूर्ण, देखने में न आने वाले, निर्विकार, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की तत्परता से उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में प्रीति रखन् वाले (और) सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
विवेचन : भगवान कहते हैं! अर्जुन ज्ञानवान होना बड़ा कठिन है, इसके लिये पहले ये समझना आवश्यक है कि निराकार और निर्गुण कौन है, क्योंकि सगुण का विग्रह तो सरल है, जिसमें ये आठ बातें हो वो निराकार है.
ये त्वक्षर : जो अक्षर हैं, जिसका कभी क्षण नहीं होता, जो हमेशा एकसा रहता है, कभी घटता बढता नहीं, जो ना पैदा होता है और ना मरता है
अनिर्देश्यम् : साकार की तरफ हम इशारा कर सकते हैं पर निराकार वो है जिसकी तरफ इशारा नहीं कर सकते, निर्देश नहीं कर सकते
अव्यक्तम : जिसे व्यक्त ना किया जा सके
सर्वत्र : जो सब जगह पर है
अचिन्त्य : साकार का चिंतन किया जा सकता है परंतु निराकार वो है जिसका ध्यान अथवा चिंतन ना किया जा सके
कूटस्थ : जो कभी बदलता नहीं, कूटस्थ एक लोहे के खंड को कहते है जो सुनार के पास होता और पीढ़ियों से उसके पास होता है जिससे कूट कूट के वो अलग अलग सामान बनाता है, सामान और पीढ़ियां बदल जाती हैं पर वो खंड वैसा ही रहता है ऐसे ही निराकार कूटस्थ है
अचल :जो स्थिर है कहीं नहीं जाता
ध्रुव : जो सदैव रहता है
ये निराकार के गुण हैंं तो इसका भक्त कैसा होता है।
ये त्वक्षर : जो अक्षर हैं, जिसका कभी क्षण नहीं होता, जो हमेशा एकसा रहता है, कभी घटता बढता नहीं, जो ना पैदा होता है और ना मरता है
अनिर्देश्यम् : साकार की तरफ हम इशारा कर सकते हैं पर निराकार वो है जिसकी तरफ इशारा नहीं कर सकते, निर्देश नहीं कर सकते
अव्यक्तम : जिसे व्यक्त ना किया जा सके
सर्वत्र : जो सब जगह पर है
अचिन्त्य : साकार का चिंतन किया जा सकता है परंतु निराकार वो है जिसका ध्यान अथवा चिंतन ना किया जा सके
कूटस्थ : जो कभी बदलता नहीं, कूटस्थ एक लोहे के खंड को कहते है जो सुनार के पास होता और पीढ़ियों से उसके पास होता है जिससे कूट कूट के वो अलग अलग सामान बनाता है, सामान और पीढ़ियां बदल जाती हैं पर वो खंड वैसा ही रहता है ऐसे ही निराकार कूटस्थ है
अचल :जो स्थिर है कहीं नहीं जाता
ध्रुव : जो सदैव रहता है
ये निराकार के गुण हैंं तो इसका भक्त कैसा होता है।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं(म्), सर्वत्र समबुद्धयः|
ते प्राप्नुवन्ति मामेव, सर्वभूतहिते रताः||4||
जो अपनी इन्द्रियों को वश में करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्र के हित में रत और सब जगह समबुद्धि वाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
ये अपनी इंद्रियों पर संयम रखने वाला होता है, हमारी दस इंद्रियाँ है -पंच कर्मेंद्रियां यानि हाथ, पैर मुख और गुदा और पांच ज्ञानेंद्रियाँ है -आंख, कान, नाक, मुख और त्वचा इन्हीं से हम सारे विषय भोग भोगते हैं और जिनका इन इंद्रियों और उनके स्वामी मन पर नियंत्रण है वो ज्ञानी है और वो सबको समान भाव से देखता है, जैसे भेड़ का झुंड हो तो हमारे लिये वो सभी भेड़ है, हम कभी यह जानने का विचार नहीं करते कि वो काली है या गोरी, मोटी है या पतली, नर है या मादा, वो सब भेड़ है वैसे ही ज्ञानी पुरुष के लिये पूरा संसार समान है, वह सबके लिये सम बुद्धि रखता है |उसे पूरा संसार ईश्वर मय दिखता है | उसकी स्थिति कैसी होती है , मानस में चौपाई है :-
छिति, जल , पावक गगन समीरा, पंच रचित अति अधम सरीरा। ये सब होने पर भी भगवान ने एक बात है जो सबके लिये समान बताई हैं वो चाहे ज्ञान योगी हो अथवा कर्मयोगी और वो है - सर्वभूत हिते रता
जो सभी भूतों अर्थात प्राणियों के हित में लगा हुआ है वही ज्ञानी है। लेकिन अर्जुन ऐसी भक्ति बड़ी कठिन है।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषाम्, अव्यक्तासक्तचेतसाम्|
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं(न्), देहवद्भिरवाप्यते||5||
अव्यक्त में आसक्त चित्त वाले उन साधकों को (अपने साधन में) कष्ट अधिक होता है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्त-विषयक गति कठिनता से प्राप्त की जाती है।
विवेचन : ज्ञानी को हमेशा यह क्लेश रहता है कि इतना प्रयास किया फिर भी मन विचलित रहता है पर भक्त को यह दुख नहीं होता, अगर सगुण की कल्पना करने को कहा जाये तो मन भगवान में लगाना आसान है परन्तु अगर ये कहा जाये कि मन सब जगह से हटा लो और कहीं भी मत लगाओ तो ये बड़ा मुश्किल है। भगवान भी यही कह रहें हैं तो फिर क्या करना चाहिए?
ये तु सर्वाणि कर्माणि, मयि सन्न्यस्य मत्पराः|
अनन्येनैव योगेन, मां(न्) ध्यायन्त उपासते||6||
परन्तु जो कर्मों को मेरे अर्पण करके (और) मेरे परायण होकर अनन्य योग (सम्बन्ध) से मेरा ही ध्यान करते हुए (मेरी) उपासना करते हैं।
विवेचन : हमारे यहाँ शंकराचार्य भगवान ने पंच भक्ति का विधान बताया है अर्थात हमारे मंदिर में पांच देवों की प्रतिमा होनी चाहिए। एक विष्णु भगवान का स्वरूप चाहे राम हो या कृष्ण, दूसरा स्वरूप शिवजी का, तीसरा स्वरूप देवी का, चौथा स्वरूप गणेश जी का और पाँचवा स्वरूप सूर्य का होना चाहिए और इनमें से एक हमारे ईष्ट हो जिनकी भक्ति मैं सभी देवों का पूजन करते हुए करूँ। ये निरंतरता रहनी चाहिए, अपना ईष्ट, मंत्र और माला हमें बदलनी नहीं चाहिए। अर्जुन ने प्रश्न किया था एवं सतत युक्ताये, उन्होंने भी साधारण प्रश्न नही किया था क्योंकि वे जानते थे कि सतत् रहना आवश्यक है |
एक कथा सुनाई गई, एक घर में एक देवरानी और जेठानी थी, जेठानी के कोई पुत्र नहीं था परंतु देवरानी को विवाह के कुछ समय बाद ही पुत्र की प्राप्ति हो गई जिससे घर में भी उसका मान बढ़ गया। जेठानी बड़ी दुखी हो कातर भाव से एक सिद्ध महात्मा के पास गई और अपनी समस्या बताई, हमारे शास्त्रों में भी ऐसे समाधान के उल्लेख मिलते हैं। उन्होंने कहा मैं तुम्हारी समस्या का समाधान कर दूंगा पर तुम्हें नौ महीने तक एक व्रत का पालन करना होगा और ये नियम से करना होगा, चाहे कुछ भी हो ये नियम भंग नहीं होना चाहिए और वो नियम ये है कि तुम्हारे घर के पास जो शिवालय हैं वहां जाकर दीपक जलाना है, जल चढ़ाना है और एक मंत्र का जाप करना है। जेठानी ने बड़ी श्रद्धा से इस व्रत का पालन आरंभ कर दिया परंतु समय रहते देवरानी और जेठानी में इतनी ईर्ष्या बढ़ गई कि जैसे ही जेठानी मंदिर में दीपक जला कर आती थोड़ी देर में देवरानी उसे बुझा आती। ये क्रम चलता रहा, एक बार वहाँ भयानक बारिश हुई जो तीन दिन तक चलती रही। दो दिन तक तो जेठानी किसी तरह मंदिर चली गई पर तीसरे दिन बहुत प्रयास के बाद भी नहीं जा सकी और घर लौट आई, थोड़ी देर बाद देवरानी घर से निकली और व्रत भंग करने की चाह में वो मंदिर में पहुंच गयी वहाँ जाकर देखा कि दीपक तो पहले से ही बुझा हुआ था। उसे लगा पानी से बुझ गया होगा तो उसनें बुझे हुए दीपक को फिर से बुझा दिया, इतने में ही वहाँ शिवजी प्रकट हो गये और उसे वरदान मांगने को कहा लेकिन भगवान के दर्शन का प्रभाव ऐसा है कि शिवजी को देखते ही उसके मन से सारा द्वेष समाप्त हो गया उसे लगा कि मैनें तो कोई भक्ति नही की फिर भी जेठानी की वजह से मुझे साक्षात शिवजी के दर्शन हो सके है और उसनें भगवान से जेठानी के लिये पुत्र का वरदान मांग लिया और उसे भी पुत्र प्राप्त हो गया। निरंतरता का फल होता है, और जीवन में भक्ति सफल तभी होती है जब छोटे नियम पकड़े जाये और उनका निरंतर पालन किया जाये चाहे जो भी स्थिति हो।
मम दर्शन फल परम अनूपा, जीव पाये निज सहज सरूपा |
एक कथा सुनाई गई, एक घर में एक देवरानी और जेठानी थी, जेठानी के कोई पुत्र नहीं था परंतु देवरानी को विवाह के कुछ समय बाद ही पुत्र की प्राप्ति हो गई जिससे घर में भी उसका मान बढ़ गया। जेठानी बड़ी दुखी हो कातर भाव से एक सिद्ध महात्मा के पास गई और अपनी समस्या बताई, हमारे शास्त्रों में भी ऐसे समाधान के उल्लेख मिलते हैं। उन्होंने कहा मैं तुम्हारी समस्या का समाधान कर दूंगा पर तुम्हें नौ महीने तक एक व्रत का पालन करना होगा और ये नियम से करना होगा, चाहे कुछ भी हो ये नियम भंग नहीं होना चाहिए और वो नियम ये है कि तुम्हारे घर के पास जो शिवालय हैं वहां जाकर दीपक जलाना है, जल चढ़ाना है और एक मंत्र का जाप करना है। जेठानी ने बड़ी श्रद्धा से इस व्रत का पालन आरंभ कर दिया परंतु समय रहते देवरानी और जेठानी में इतनी ईर्ष्या बढ़ गई कि जैसे ही जेठानी मंदिर में दीपक जला कर आती थोड़ी देर में देवरानी उसे बुझा आती। ये क्रम चलता रहा, एक बार वहाँ भयानक बारिश हुई जो तीन दिन तक चलती रही। दो दिन तक तो जेठानी किसी तरह मंदिर चली गई पर तीसरे दिन बहुत प्रयास के बाद भी नहीं जा सकी और घर लौट आई, थोड़ी देर बाद देवरानी घर से निकली और व्रत भंग करने की चाह में वो मंदिर में पहुंच गयी वहाँ जाकर देखा कि दीपक तो पहले से ही बुझा हुआ था। उसे लगा पानी से बुझ गया होगा तो उसनें बुझे हुए दीपक को फिर से बुझा दिया, इतने में ही वहाँ शिवजी प्रकट हो गये और उसे वरदान मांगने को कहा लेकिन भगवान के दर्शन का प्रभाव ऐसा है कि शिवजी को देखते ही उसके मन से सारा द्वेष समाप्त हो गया उसे लगा कि मैनें तो कोई भक्ति नही की फिर भी जेठानी की वजह से मुझे साक्षात शिवजी के दर्शन हो सके है और उसनें भगवान से जेठानी के लिये पुत्र का वरदान मांग लिया और उसे भी पुत्र प्राप्त हो गया। निरंतरता का फल होता है, और जीवन में भक्ति सफल तभी होती है जब छोटे नियम पकड़े जाये और उनका निरंतर पालन किया जाये चाहे जो भी स्थिति हो।
मम दर्शन फल परम अनूपा, जीव पाये निज सहज सरूपा |
तेषामहं(म्) समुद्धर्ता, मृत्युसंसारसागरात्|
भवामि नचिरात्पार्थ, मय्यावेशितचेतसाम्||7||
हे पार्थ ! मुझ में आविष्ट चित्त वाले उन भक्तों का मैं मृत्युरूप संसार-समुद्र से शीघ्र ही उद्धार करने वाला बन जाता हूँ।
विवेचन : भगवान कहते हैं मेरे जो ऐसे भक्त हैं , मैं उन्हें पुनरपि जन्मम् पुनरपि मरणम् के चक्र से मुक्त कर देता हूँ और इस संसार समुद्र से उनका उद्धार कर देता हूँ।
मय्येव मन आधत्स्व, मयि बुद्धिं(न्) निवेशय|
निवसिष्यसि मय्येव, अत ऊर्ध्वं(न्) न संशयः||8||
(तू) मुझ में मन को स्थापन कर (और) मुझ में ही बुद्धि को प्रविष्ट कर; इसके बाद (तू) मुझ में ही निवास करेगा (इसमें) संशय नहीं है।
विवेचन : भगवान कहते हैं तुम अपने मन और बुद्धि को मुझ में लगा दो यही उत्तम है।
अथ चित्तं(म्) समाधातुं(न्), न शक्नोषि मयि स्थिरम्|
अभ्यासयोगेन ततो, मामिच्छाप्तुं(न्) धनञ्जय||9||
अगर (तू) मन को मुझ में अचल भाव से स्थिर (अर्पण) करने में अपने को समर्थ नहीं मानता, तो हे धनञ्जय ! अभ्यास योग के द्वारा (तू) मेरी प्राप्ति की इच्छा कर।
विवेचन : अगर मन और बुद्धि को मुझमें नहीं लगा पाते है तो कोई बात नहीं अभ्यास करो, ध्यान करने बैठ जाओ और भगवान को कहो अब आप ही संभालिए। रामसुखदास जी महाराज ऋषिकेश में विराजते थे, वे कहते ध्यान नहीं लगता तो कोई बात नहीं बस ये कहते रहो है मेरे नाथ मैं तुझको भूलूँ नहीं, उन्होंने ऐसी पट्टियाँ बनवा दी थी ताकि जिधर देखो वही नजर आये, निरंतर अभ्यास करते रहो तो अपने आप सब काम हो जायेगा।
राम राम रटते रहो जब लक घट में प्राण, कबहूँ तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान |
तभी तो तुलसीदास जी ने कहा है,
तुलसी अपने राम को रीझ भजो चाहे खीज, भौम पड़ा जामे सभी उल्टा सीधा बीज |
बीज चाहे उल्टा डालो या सीधा वो पेड़ बनकर निकलेगा उसी प्रकार कैसे भी भजो बस उस प्रभु का नाम जपते रहो।
राम राम रटते रहो जब लक घट में प्राण, कबहूँ तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान |
तभी तो तुलसीदास जी ने कहा है,
तुलसी अपने राम को रीझ भजो चाहे खीज, भौम पड़ा जामे सभी उल्टा सीधा बीज |
बीज चाहे उल्टा डालो या सीधा वो पेड़ बनकर निकलेगा उसी प्रकार कैसे भी भजो बस उस प्रभु का नाम जपते रहो।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि, मत्कर्मपरमो भव|
मदर्थमपि कर्माणि, कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि||10||
(अगर तू) अभ्यास (योग) में भी (अपने को) असमर्थ (पाता) है, (तो) मेरे लिये कर्म करने के परायण हो जा। मेरे लिये कर्मों को करता हुआ भी (तू) सिद्धि को प्राप्त हो जायगा।
विवेचन: यदि अभ्यास भी ना कर सके तो सारे कर्मों को मुझमें अर्पण कर दो,
ऊँ श्री कृष्णार्पणमस्तु |
ऊँ श्री कृष्णार्पणमस्तु |
अथैतदप्यशक्तोऽसि, कर्तुं(म्) मद्योगमाश्रितः|
सर्वकर्मफलत्यागं(न्), ततः(ख्) कुरु यतात्मवान्||11||
अगर मेरे योग (समता) के आश्रित हुआ (तू) इस (पूर्व श्लोक में कहे गये साधन) को भी करने में (अपने को) असमर्थ (पाता) है, तो मन इन्द्रियों को वश में करके सम्पूर्ण कर्मों के फल की इच्छा का त्याग कर।
विवेचन : मन में यह भाव हो कि भगवान मुझे कुछ नहीं चाहिए आपको जो ठीक लगे वो करें।
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार उदासी मन काहे को करे |
भगवान ने इतने उपाय बताये हैं भक्ति प्राप्त करने के, इनमें से किसी को भी अपनाकर उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
अंत में हरि नाम संकीर्तन से आज का विवेचन समाप्त हुआ।
ऊँ श्री कृष्णार्पणमस्तु |
तेरा रामजी करेंगे बेड़ा पार उदासी मन काहे को करे |
भगवान ने इतने उपाय बताये हैं भक्ति प्राप्त करने के, इनमें से किसी को भी अपनाकर उन्हें प्राप्त किया जा सकता है।
अंत में हरि नाम संकीर्तन से आज का विवेचन समाप्त हुआ।
ऊँ श्री कृष्णार्पणमस्तु |