विवेचन सारांश
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से अच्छा है गुणातीत होना

ID: 9333
हिन्दी
रविवार, 19 अप्रैल 2026
अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग
2/2 (श्लोक 7-27)
विवेचक: गीता विशारद डॉ. संजय जी मालपाणी


प्रभु स्मरण, राष्ट्र समर्पण भावना गीत, गीता जी की स्तुति, श्रीहनुमान चालीसा पाठ, प्रभु वन्दना, गुरु वन्दना और दीप-प्रज्वलन आदि सभी परम्पराओं का अनुपालन करते हुए तथा गुरु परम्परा के सभी गुरुओं और परम श्रद्धेय स्वामीजी गोविन्द गिरि जी महाराज को वन्दन करते हुये विवेचन आरम्भ हुआ।

गुणत्रयविभागयोग अध्याय के पहले भाग के विवेचन में हमने सुना था कि तीन प्रकार के गुण, किसी स्वत: निर्मित सॉफ्ट वेयर की तरह, हमें प्रकृति से स्वत: ही प्राप्त हो जाते हैं। ऐसा यदि न हो तो जीवन वहीं रुक सा जाता है। इन तीन गुणों का सम्यक सन्तुलन हमारे जीवन में नितान्त अनिवार्य है। ये तीन गुण हैं- 

सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण

तमोगुण नींद व आलस्य देता है। दिन के आठ घण्टे नींद आना भी आवश्यक है, यदि तमोगुण जागृत नहीं हुआ तो नींद नहीं आती है और नींद के लिए दवा लेनी पड़ती है। यदि योग मार्ग पर प्रतिष्ठित होने के कारण नींद कम हो जाती है तब तो स्वीकार्य है। 

प्राणायाम करने पर शरीर का आक्सीजन स्तर ऊपर उठने के कारण उनके (योगी के) स्नायु का पुनर्गठन बहुत कम समय में होने लगता है इसलिए योगी की नींद कम हो जाती है अन्यथा नींद का कम होना इङ्गित करता है कि हम तनाव में हैं। तनाव का कारण है कि हमारे दिमाग में निरन्तर कुछ न कुछ विचारों के चक्कर जारी रहते हैं और हमारा दिमाग एकाग्र नहीं हो पाता है। इसके अन्यान्य कारण को सकते हैं।

वर्तमान समय में एकाग्रता कम होने का मुख्य कारण है मोबाइल। मोबाइल पर रील देखते-देखते रात की नींद भी प्रभावित हो जाती है। इससे एकाग्रता कम होने लगती है। अब तो एकाग्रता का स्तर बहुत कम हो गया है, यहाँ तक कि किसी विषय पर अब मात्र तीस सेकेण्ड तक ही एकाग्र हो सकते हैं। इस सम्बन्ध में एक दृष्टान्त है-

 दस वर्ष पूर्व किसी विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बताया- 

“हमने यहाँ पर एक नई प्रणाली लागू की है। आने वाले समय में, भविष्य में सब काम कम्प्यूटर पर ही होगा इसलिए हमने अपने विद्यार्थियों को पुस्तक व नोट-बुक के स्थान पर टेबलेट उपलब्ध करा दिये हैं।“ 

 
इस पर तत्क्षण अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त हुई कि- 

“यह आपने उचित नहीं किया है।“
जिस पर प्रधानाचार्य कदापि सहमत नहीं हुए। प्रधानाचार्य के पुस्तक-नोटबुक आदि बन्द किये जाने का परिणाम यह हुआ कि तीन-चार वर्ष में वह विद्यालय ही बन्द हो गया। ऐसा इसलिए हुआ कि प्रधानाचार्य ने अति कर दी थी। विद्यार्थियों को टेबलेट प्रदान करने से उनका स्क्रीन देखने का समय बहुत अधिक हो गया था। इस से विद्यार्थियों का तनाव का स्तर बहुत बढ़ गया था।

जीवन का तनाव बढ़ाने वाले अनेक कारणों में एक अति प्रमुख कारण है, स्क्रीन अधिक देखना इसलिए बालकों को लिए यह सुनिश्चित करना है कि वे बीस मिनट से अधिक मोबाइल स्क्रीन न देखें। हमारे लिए भी आवश्यक है कि हम भी अपना मोबाइल स्क्रीन देखने का समय कम करें। हमारे आहार, रहन-सहन और सब व्यवस्थाओं में अब परिवर्तन हो गया है। 

श्रीभगवान् ने इस सम्बन्ध में हमें मार्गदर्शित किया है-

"युक्ताहारविहारस्य, युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य, योगो भवति दुःखहा॥

6:17

हमारा आहार-विहार युक्त हो, हमारा कार्य युक्त व सन्तुलित हों। हमारे प्रयास व चेष्टा भी युक्त हों। हमें आठ घण्टे कार्य करना ही चाहिये, आठ घण्टे की ठीक नींद भी हो। ठीक नींद न हो पाने के कारण जीवन में तनाव आने लगता है और हम अनायास ही अनेकों रोगों को आमन्त्रण दे देते हैं।

हम अपने आहार को, अपने विहार अर्थात् व्यायाम को, अपने कार्य को अर्थात् कार्य के आठ घण्टों को और आठ घण्टे की नींद को युक्त कर लें। तदुपरान्त शेष आठ घण्टों में हम अपने उन्नयन हेतु प्रयासरत रहें|


नींद तमोगुण से ही आती है, इस प्रकार तमोगुण भी हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण है। हम श्रीभगवान् के साथ-साथ प्रकृति की भी सन्तान हैं। प्रकृति-पुरुष दोनों के ही हम पुत्र हैं क्योंकि पुरुष अर्थात् परमात्मा से हमें आत्मा प्राप्त है। श्रीभगवान् कहते हैं- 

अहं(म्) बीजप्रदः(फ्) पिता- मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ।

ममैवांशोजीवलोके जीवभूतः(स्)सनातनः परमात्मा का अंश आत्मा रुप में हमारे अन्दर विद्यमान है।

हमारा शरीर पञ्च महाभूतों से निर्मित है- हमारी पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाँ, हमारी पाॅंच कर्मेन्द्रियाँ, हमारा मन, बुद्धि, अहङ्कार और अन्त:करण ये सभी प्रकृति से प्राप्त हैं। हमारा शरीर प्रकृति से प्राप्त हुआ है। 

प्रकृति के दो गुण हैं- एक है जड़ और दूसरा है त्रिगुणों से परिपूर्णता। सत, रज और तम तीन गुण हैं इसलिए हमारा शरीर जड़ भी है और हमारे अन्दर ये तीनों गुण भी स्व:निर्मित साफ्ट-वेयर की भाॅंति रहते हैं। हमारे अन्दर यदि ये त्रय-गुण नहीं होते तो जीवन में दुःख ही दुःख होता, हम सो भी नहीं पाते।

ऐसा प्रयोग भी किया गया है कि जेल में कैदी का यदि सोना नहीं हो पाया तो दो-तीन दिन बाद वह कैदी छटपटाने लगा और उसके बाद तो आठ-दस दिन बाद वह पागल जैसा व्यवहार करने लगा। उसके बाद बीमार हो गया और लगभग पन्द्रह दिन में उसकी मृत्यु तक हो गयी। 

योगो भवति दुःखहा- नींद ठीक नहीं है यानि कुछ खो रहे हैं और नींद ठीक है अर्थात् हम योग मार्ग पर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं।

श्रीभगवान् ने आगे सत्त्वगुण बढ़ने पर, रजोगुण बढ़ने पर और तमोगुण बढ़ने पर क्या होता है- उसकी व्याख्या भी दी है। श्रीभगवान् ने मानो यह बात स्पष्ट कर दी कि चौबीस कैरेट के सोने से गहना नहीं बन सकता है।चौबीस कैरेट सोने के शुद्ध होने पर भी उससे गहना बन नहीं सकता है। गहना या अलङ्कार बनाने के लिये शद्ध सोने में अशुद्धियाँ मिश्रित करनी पड़ती हैं। ऐसे ही हमारे अन्दर विशुद्धात्मा होने पर भी प्रकृति से प्राप्त तमोगुण की अशुद्धि न हो तो जीवन आगे नहीं बढ़ेगा।

केवल तमोगुण ही यदि हमारे अन्दर बढ़ जाये तब तो हम कुम्भकर्ण ही बन जायेंगे। इसी प्रकार कुछ तमोगुणी लोग सोने के इतने आदि होते हैं कि बहुत जगाने पर भी नहीं जगते।

जीवन में कुछ लोग रावण की तरह होते हैं- उनको रुकना नहीं आता,  रुकना भी एक कला होती है। किसी को मारा, किसी से कुछ छीन लिया, वे इसी में लगे रहते हैं। प्राय: हम लोग भी रुकते नहीं। पैसे की होड़ में ही दौड़ते रहते हैं, भूल ही जाते हैं कि हमें जीवन को उन्नत बनाना है।

आप लोग भाग्यशाली हैं जो जीवन उन्नयन मार्ग पर आ गये हैं और भगवद्गीता सीखने के लिए आप नित्यप्रति चालीस मिनट का समय लगा रहे हैं ताकि जीवन को समग्रता के साथ समझ सकें।

रावण में ऐसी समझ नहीं थी। रावण के पास पञ्च कन्याओं में से एक अत्यन्त सुन्दर मन्दोदरी रानी थी। ऐसा होने पर भी वल्कल-धारी सीताजी पर जब रावण की दृष्टि पड़ी तो सीताजी के साथ विवाह कर ‘उसे सुख प्राप्त होगा’, इस सोच के साथ वह सीताजी का अपहरण कर लेता है। यह रजोगुण की बढ़ी हुई प्रवृति है। रावण ने सोने की लङ्का बना ली फिर भी सुखी नहीं, आनन्दित नहीं। रावण कुबेर को भी उठा कर ले आया, कुबेर की सारी सम्पत्ति, कुबेर का विमान भी छीन लाया। इसी विमान से रावण ने सीताजी का अपहरण किया। बाद में इसी विमान से श्रीरामजी अयोध्या वापस गये थे।

रावण ने सारे ग्रहों को भी अपने जेल खाने में बन्दी बना रखा था। इन्द्र आदि सभी देवता रावण से काँपते थे। रावण महापराक्रमी, सर्व वेदों का मर्मज्ञ, महाज्ञानी और सङ्गीत का मर्मज्ञ था। उसने वेदों की ऋचाएँ और शिव ताण्डव जैसा कठिनतम स्त्रोत लिखा।

अखर्व (अगर्व) सर्वमंगला कला कदम्ब मञ्जरी, 

रस प्रवाह माधुरी विज्र्म्भणामधुव्र्तम।

स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं, 

गजान्तकान्धकान्तकंतमन्तकान्तकं भजे ।।

जयत्वदभ्र्विभ्र्मभ्रमद्भुजन्गमश्वस, 

द्विनिर्गमतक्रमस्फूरत्करालभालहव्यवाट ।

धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृद्दंगतुंगमंगल,

 ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डव: शिव: ।।

रावण को समझ ही नहीं आया था कि रुकना कहाँ है? रावण भक्तों का शिरोमणि था। भगवान् महादेवजी की पूजा के लिए जब फूल नहीं आ पाये थे तब अपने मस्तक को काट-काट कर चढ़ाने वाला रावण, महादेवजी का प्रिय शिष्य था। रावण को महादेव भगवान् जी से ही वरदान स्वरूप खड्गहास नाम खड्ग (बड़ी सी तलवार) प्राप्त हुई थी। रावण अजेय था लेकिन रजोगुण बढ़ने के कारण उसमें अहङ्कार बढ़ता गया। उसकी कामनायेँ, वासनायेँ और अभिमान बढ़ते गए अन्तत: परिणाम स्वरूप रावण का अधोपतन हुआ और उसको मरना पड़ा।

कुम्भकर्ण तमोगुण का परिचायक है, रावण रजोगुण का परिचायक है और तीसरा भाई विभीषण सत्त्वगुण का परिचायक है।

सत्वगुण बढ़ने पर तीसरे भाई विभीषण अपने ही बड़े भाई रावण, जो समझाने पर भी नहीं समझ रहा था और लङ्का को त्याग कर श्रीरामजी के पास चले गये थे।

 हनुमानजी ने ही सबसे पहले विभीषण को पहचाना था। हनुमानजी ने छोटे वानर के रुप में रात्रि से भोर के समय तक पूरी लङ्का का भ्रमण कर लिया था। लङ्का में कहाँ पर क्या-क्या है, इसे पूरी तरह जान लिया था।

सूर्योदय के समय हनुमानजी ने देखा कि पवित्र आत्मा वाले विभीषण घर के आँगन में तुलसीजी को जल चढ़ाने के उपरान्त सूर्य भगवान् को र्अध्य अर्पित कर रहे हैं। हनुमानजी को ज्ञात हो गया कि विभीषण सात्त्विक प्रवृति के हैं। तब श्रीहनुमानजी ने विभीषण से मैत्री कर ली।

सत्त्वगुण से व्यक्ति सात्त्विक बन जाता है। विभीषण सतोगुणी हैं।
तीनों गुणों के बढ़ने से क्या होता है- यह श्रीभगवान् इस श्र्लोक में बताते हैं- 


14.7

रजो रागात्मकं(म्) विद्धि, तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय, कर्मसङ्गेन देहिनम्॥14.7॥

हे कुन्तीनन्दन! तृष्णा और आसक्ति को पैदा करने वाले रजोगुण को (तुम) रागस्वरूप समझो। वह कर्मों की आसक्ति से देही जीवात्मा को बाँधता है।


14.8

तमस्त्वज्ञानजं(म्) विद्धि, मोहनं(म्) सर्वदेहिनाम्।
प्रमादालस्यनिद्राभि:(स्), तन्निबध्नाति भारत॥14.8॥

हे भरतवंशी अर्जुन ! सम्पूर्ण देहधारियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तुम अज्ञान से उत्पन्न होने वाला समझो। वह प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा देहधारियों को बाँधता है


14.9

सत्त्वं(म्) सुखे सञ्जयति, रजः(ख्) कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः(फ्), प्रमादे सञ्जयत्युत॥14.9॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में (और) रजोगुण कर्म में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है। परन्तु तमोगुण ज्ञान को ढककर एवं प्रमाद में लगाकर (मनुष्य पर) विजय करता है।

विवेचन- सत्त्वगुण व्यक्ति को सुख में लगाता है जो आनन्द प्रदत्त है, विजय दिलाता है। रजोगुण काम में लगाता है। तमोगुण ज्ञान को आवृत कर देता है जिससे कि ज्ञान होने पर भी व्यक्ति अज्ञानी की भाॅंति काम करता है, व्यवहार करता है। तमोगुण बढ़ने पर, ज्ञान आवृत होने पर अज्ञान व्यक्ति को प्रमाद में लगा देता है। व्यक्ति से गलतियाँ कराता है, कामनाओं के पीछे लगवाता है और पूरी तरह से व्यक्ति का पतन करा देता है।

इस प्रकार यह तमोगुण आसुरी सम्पदा का परिचायक है। सोलहवें अध्याय में- श्रीभगवान् ने दैवीय सम्पदा बतायी है-                                  

अभयं(म्)सत्त्वसंशुद्धिः(र्), ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
                 
दानं(न्)दमश्च यज्ञश्च, स्वाध्यायस्तपआर्जवम्॥                        

अहिंसा सत्यमक्रोधः(स्), त्यागः(श्)शान्तिरपैशुनम्। दयाभूतेष्वलोलुप्त्वं(म्), मार्दवं(म्)ह्रीरचापलम्॥

तेजः क्षमाधृतिः(श्) शौचम्, अद्रोहोनातिमानिता।
भवन्तिसम्पदं(न्) दैवीम्, अभिजातस्यभारत॥

उसके बाद केवल छ: आसुरी सम्पदायें बतायी हैं जो समस्त तमोगुण से ही उत्पन्न होती हैं।

तमोगुण को कम करना पड़ता है। तमोगुण को कम कर हम रजोगुण की ओर बढ़ें फिर रजोगुण को कम कर और ऊपर उठें, सत्त्वगुण की ओर बढ़ें। फिर सत्त्वगुण पर भी रुकना नहीं है और आगे बढ़ना है। जब तक निचली सीढ़ी त्यागेंगे नहीं तब तक आगे की सीढ़ी पर बढ़ नहीं पायेंगे।

त्याग दैवीय सम्पदा है। इसी प्रकार दमन भी दैवीय सम्पदा है। मन को बिना दबाये (नियन्त्रित किये) रजोगुण से आगे बढ़ना कठिन है।

श्रीभगवान् कहते हैं कि हमें इन तीनों गुणों में रमे नहीं रहना है।

14.10

रजस्तमश्चाभिभूय, सत्त्वं(म्) भवति भारत।
रजः(स्) सत्त्वं(न्) तमश्चैव, तमः(स्) सत्त्वं(म्) रजस्तथा॥14.10॥

हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्व गुण बढ़ता है, सत्त्व गुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण (बढ़ता है) वैसे ही सत्त्वगुण (और) रजोगुण को दबाकर तमोगुण (बढ़ता है)।

विवेचन- रजोगुण और तमोगुण को जब दबाया जाता है तभी हम सत्त्वगुण की ओर उन्मुख होते हैं। दबाना अर्थात् दमन करना। हमारे यहाँ पर इसीलिए उपवास की पद्धति है। अपनी इच्छा को दबाना होता है, भोजन की इच्छा को दबाकर उपवास करते हैं। इससे मन को संयम में रहने की आदत हो जाती है और हम तमोगुण से रजोगुण की ओर बढ़ते हैं। इसी प्रकार रजोगुण को दबाकर सत्त्वगुण की और बढ़ते हैं।

यदि हम रजोगुण और सत्त्वगुण को दबाते हैं तो तमोगुण बढ़ता है। जब भी कोई भी दो गुणों को हम दबा देते हैं तब तीसरा गुण बढ़ने लगता है। जीवन में इस तरह तीनों गुण अपने आप सन्तुलित (बैलेंस) होते हैं।

अतएव हमें अपने विवेक, पूर्णता और जागृति के साथ इनको सन्तुलित (बैलेंस) करना है।

श्रीभगवान् ने हमें बताया है “समत्वं(य्ँ) योग उच्यते”- सन्तुलन (बैलेंस) करना ही योग है।

हम प्राय: कहते हैं कि हमारे घर में संस्कृति है। यहाँ संस्कृति शब्द का अभिप्राय है “सम्यक कृति”। हमारे प्रत्येक सम्बन्ध में कृति और हमारे जीवन में कृति-सन्तुलन (बैलेंस) होना चाहिये। मात्र किसी एक तरफ झुकाव नहीं रखना है वरन जीवन को समग्रता से जीना है। जीवन का आनन्द-उपभोग भी करना है लेकिन कहाँ पर रुकना है, यह ज्ञात होना चाहिये।

जब सन्तुलन (बैलेंस) करते हुए आगे बढ़ेंगे तो सहजता से तमोगुण से रजोगुण और रजोगुण से सत्त्वगुण की ओर बढ़ेंगे। जैसे वर्षा रुकने पर शीत आती है, शीत रुकने पर गर्मी आती है उसी प्रकार यदि तमोगुण को दबाते हैं तो रजोगुण ऊपर उठता है। तमोगुण ओर रजोगुण को दबाने पर सत्त्वगुण ऊपर उठता है।

राजहँस को यदि दूध ओर पानी मिलाकर दिया जाये तो वह केवल दूध ग्रहण करता है, पानी को छोड़ देता है। इसी प्रकार हमको बिना अचेत, बिना असुध रहकर, पूर्ण चेतनता, जागृति और क्षीर-विवेक के साथ जीवन को समग्रता से जीना है। भगवद्गीता हमको जीवन में यही सजगता धारण करना सिखाती है। भगवद्गीता जगाती है - “भागो नहीं-जागो।”

श्रीभगवान् आगे बताते हैं कि सत्त्वगुण बढ़ने पर क्या होता है-  

14.11

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्, प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं(म्) यदा तदा विद्याद्, विवृद्धं(म्) सत्त्वमित्युत॥14.11॥

जब इस मनुष्यशरीर में सब द्वारों (इन्द्रियों और अन्तःकरण) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

विवेचन- यह शरीर नौ द्वारों से बना है। दो आँखे, दो कान- ये चार बाहर झाँकने के द्वार हैं। दो नासिका पुट- बाहर की गन्ध को समझने के लिए हैं।पाँच ज्ञाननेन्द्रियाँ प्रदान की गयी हैं। ये कुल छ: द्वार हो जाते हैं। सातवाँ द्वार है- मुँह। मुँह एक है और इसके दो काम हैं- बोलना और खाना। यह सबसे जोखिम वाली और भयप्रद इन्द्रिय है। यदि कुछ भी गलत खा लिया जाये या कुछ भी गलत बोल दिया जाये- दोनों स्थितियों में सत्यानाश ही होता है। इन दोनों पर नियन्त्रण अत्यन्त दुष्कर है। यह उचित ही तो है कि इस एक मुँह को दो काम दिए गए हैं, फिर भी नियन्त्रण नहीं होता। मल-मूत्र उत्सर्जन के लिए दो द्वार दिए गए हैं- इस प्रकार नौ द्वार हैं।

सत्त्वगुण बढ़ने पर इन नौ द्वारों के अन्दर प्रकाश उपजता है। जिस समय शरीर में, अन्त:करण में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, सत्त्वगुण ऊपर उठता है, हमें तब समझना है कि हमारे अन्दर प्रकाश पहुँच रहा है। 

हम दीप-प्रज्वलन इसके प्रतीक के तौर पर ही करते हैं। हम प्रत्येक सत्र के प्रारम्भ में भी दीप-प्रज्वलन इसी भावना से करते हैं कि जो प्रकाश बाहर प्रज्वलित है, वही प्रकाश हमारे अन्दर भी प्रज्वलित हो जाये।

 हम दीप-प्रज्वलन के समय स्तुति भी करते हैं-

शुभम् करोति कल्याणम्, आरोग्यन् धन सम्पद:।
शत्रुबुद्धि विनाशाय , दीप ज्योति नमोस्तुते।।

अन्दर की शत्रुता वाली बुद्धि का मार्जन हो जाये, यह प्रार्थना करते हैं।

 श्रीभगवान् ने ग्यारहवें अध्याय में यही बात कही है-

“निर्वैरः(स्) सर्वभूतेषु, यः(स्) स मामेति पाण्डव”

“निर्वैर होकर युद्ध करो, तभी मुझे प्राप्त करोगे।“

हम लोग तो इतना वैर अपने अन्दर प्रविष्ट किये रहते हैं कि वैर के कारण अशान्त होते हैं, तमोगुणी हो जाते हैं और क्रोधित हो जाते हैं। इसी कारण तमोगुण को कम करने के लिए, क्रोध को कम करने के लिए अपने को जाग्रत रखना होता है। अब जब भी क्रोध आता है तो दो, तीन दिन तक तत्क्षण क्रोध के कारण का विश्लेषण करना है कि क्रोध के आवेग का क्या कारण है? क्रोध के स्वरूप, प्रतिरूप, पैटर्न तब हमारी समझ में आ जायेंगे कि क्रोध क्यों आता है- किसी व्यक्ति विशेष के आगमन पर, अरुचिकर भोजन सामने आने पर, समय पर भोजन न मिलने पर, हमारी अपेक्षा अनुरूप कार्य न होने पर, कोई अरुचिकर घटना होने पर या हमारी आदत अनुरूप कार्य करने की प्रक्रिया में बाधा उपस्थिति होने पर; (जैसे स्नान हेतु गर्म पानी का उपलब्ध न होना (गीज़र  के बटन को चालू न करने के कारण) आदि।

हमें क्रोध के स्वरूप, प्रतिरूप और पैटर्न के समझ आ जाने पर, जाग्रत होने के लिए समत्व को अपने अन्दर समाहित करना है। श्रीभगवान् ने हमें मार्गदर्शित भी किया है-

“शीतोष्ण सुखदुःखेषु,समः(स्) सङ्गविवर्जितः”

गर्म के स्थान पर पानी ठण्डा हो तो भी पहले गहरी साँस लेकर मुस्कराना है “अरे वाह आज ठण्डा पानी है”। दो मिनट ठण्डा पानी व्यथित कर सकता है तत्पश्चात् ठण्डे पानी में भी आनन्द आने लगता है। क्रोध को रोकने के लिए रुकना पड़ता है। स्वयं को रोकना पड़ता है। तत्क्षण प्रतिक्रिया नहीं देनी है। प्रतिक्रिया नहीं प्रति उत्तर देना है (रीयेक्ट नहीं करना है, रेस्पांस देना है)। क्रोध नियन्त्रण हेतु यह (प्रतिक्रिया नहीं प्रतिउत्तर) अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, व्यवहारिक और उपयोगी विधि है।  

सुख दुःख में भी ऐसा ही करना है। हमें नियन्त्रण में रहना है।

अरुचिकर प्रसङ्ग उपस्थित होने के समय रुक जाना है फिर लम्बी, गहरी साँस लेनी है। गहरी साँस लेते समय दस बार श्रीभगवान् का नाम भी लेना है। हम जैसे ही गिनती गिनना प्रारम्भ करते हैं तब अपने आप ही हम रुक जाते हैं। उस समय मन थोड़ा रुक जाता है। मन को रोकना अनिवार्य है। मन जैसे ही रुक जाता है, क्रोध का आवेश मन्द होने लगता है।

प्रतिदिन रात में सोने से पहले हम लिखें कि हमने कितनी बार आज क्रोध किया। श्रीभगवान् से प्रार्थना करनी  है कि कल हमें कृप्या जाग्रत रखियेगा कि कल हम क्रोध नहीं करें। आज जितनी बार क्रोध किया, मान लेते हैं कि आठ बार क्रोध किया तो आठ गुणा दस यानि अस्सी (8x10=80) बार श्रीभगवान् का नाम रात्रि में लेना है। श्रीभगवान् से भी प्रार्थना करनी है कि प्रत्येक बार क्रोध आने पर श्रीभगवान् का नाम लेने की आदत पड़ जाये।


ऐसा करने पर आठ-दस दिन में ही चमत्कार हो जायेगा कि क्रोध आते ही स्मरण होगा कि श्रीभगवान् का नाम लेना है। इस प्रकार हम रुक जाते हैं। रुकना बहुत ही अनिवार्य है। हम तो दौड़ में ही लगे रहते हैं और रुकने की कला सीख ही नहीं रहे हैं। हम केवल विजय को ही सीखते रहते हैं। पराजय को स्वीकार करने की कला नहीं सीखते-सिखाते इसलिए छोटी-छोटी बात में आत्महत्या तक के प्रकरण घटित हो जाते हैं, यह अन्दर का तमोगुण है।

यदि हमारा सत्त्वगुण बढ़ता है तो हम प्रकाशवान हो जाते हैं। सारे द्वारों से प्रकाश उपजता है। हमारी आँखें चमकीली हो जाती हैं। हमारी आँखों में, वाणी में और चेहरे पर तेज निखरता है। जब हम सत्त्वगुण का आधार लेते हैं तब अङ्ग-प्रतिअङ्ग से तेजस्वी हो जाते हैं। प्रकाश का तात्पर्य है “जागृत मन”।

 पन्द्रह दिन में क्रोध प्रकट होने से पहले ही हम श्रीभगवान् का स्मरण कर, दस बार श्रीभगवान् का नाम लेकर, क्रोध का दमन कर देते हैं। 

दैवीय सम्पदा “दमन” से उसे दबा दिया तो क्रोध का आवेग रोकने की घटना घटेगी। तब हम तमोगुणी से रजोगुणी दिशा में अग्रसर होते हैं। उसके उपरान्त ही हम सत्त्वगुणी हो सकते हैं।

अधिक रजोगुणी भी नहीं होना है। यह श्रीभगवान् अगले श्र्लोक में बताते हैं।

14.12

लोभः(फ्) प्रवृत्तिरारम्भः(ख्), कर्मणामशमः(स्) स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे भरतर्षभ॥14.12॥

हे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

विवेचन- रजोगुण बढ़ने पर लोभ की प्रवृति बढ़ जाती है। हम सकाम भाव से कर्मों को आरम्भ करते हैं कि इस कार्य को करने से मुझे क्या प्राप्त होगा? प्रति कार्य उपरान्त मुझे कुछ चाहिये। यह आदत हमें बचपन से पड़ जाती है कि परीक्षा में नब्बे प्रतिशत अङ्क प्राप्त होगें तो बाईक मिल जायेगी। बाईक मिलेगी इसलिए नब्बे प्रतिशत लाने का प्रयास किया, सकाम कार्य किया। ज्ञान प्राप्ति के लिए नहीं मोटरसाइकिल की प्राप्ति के उद्देश्य से परीक्षा की तैयारी का कार्य किया।

रजोगुण से अशान्ति, विषय भोगों की लालसा उत्पन्न होती है। हम शान्त रह ही नहीं पाते। अभी तीन कमरे का फ़्लैट है, अब तो हमें पाँच कमरे का फ़्लैट चाहिये। पाँच कमरे का फ़्लैट हो गया तब भी हमारा मन नहीं भरता, हमें बङ्गला चाहिये। फिर यह बङ्गला नहीं, बड़े बगीचे वाला बङ्गला चाहिये। अभी जो मेरी कार है वह छोटी है, अब बड़ी कार लेनी है। "आडी चाहिये, मर्सिडीज चाहिये" आदि। 

हमारा दिमागी सन्तुलन बिगड़ा हुआ है क्योंकि हम रुकना नहीं जानते। हम अशान्त रहते हैं। रात्रि में भी वैसे ही स्वप्न देखते हैं। हमारा मन जैसा होगा, वैसे ही सपने आते हैं और तब हम उन्हीं सपनों में खो जाते हैं। रजोगुण से हम अपने अन्दर अशान्ति बढ़ाते हैं।

तमोगुण से क्या होता है? यह श्रीभगवान् आगे बताते हैं-

14.13

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च, प्रमादो मोह एव च।
तमस्येतानि जायन्ते, विवृद्धे कुरुनन्दन॥14.13॥

हे कुरुनन्दन! तमोगुण के बढ़ने पर अप्रकाश, अप्रवृत्ति तथा प्रमाद और मोह – ये वृत्तियाँ भी पैदा होती हैं।

विवेचन- तमोगुण के बढ़ने पर अन्त:करण में अप्रकाश होता है, अन्धकार छा जाता है। कर्त्तव्य-कर्मों में अप्रवृति हो जाती है। काम करना भूल जाते हैं। कर्त्तव्य-कर्म का भी विस्मरण हो जाता है। निद्रा, प्रमाद बढ़ जाते हैं। अन्त:करण की मोहिनी वृत्तियाँ जाग जाती हैं। अन्त:करण सो जाता है। अन्त:करण को कुछ पता नहीं लगता है। मन भी प्रतिक्रिया-प्रतिउत्तर नहीं करता/देता है। केवल सोते ही रहना है। तमोगुणी तनाव दूर करने का एक ही उपाय निकालता है कि मुझे केवल सोना है।

बहुत रजोगुणी व्यक्ति जो अतिक्रियाशील (हाइपर एक्टिव) होते हैं, ऐसे लोगों को भी रात्रि में नींद नहीं आती है इसलिए उन्हें नींद की दवा लेनी पड़ती है। मनोरूग्ण वाले डाक्टर के पास जाना पड़ता है, मनसो-उपचार दक्ष नींद की गोलियां देते हैं ताकि दवा देकर उस व्यक्ति को सुला दिया जाये। यह पाश्चात्य एलोपैथी का विज्ञान है।

हमारे यहाँ भारत ने “ब्रेक-डाउन सर्विस” नहीं “रेग्यूलर मेनटीनेंस को समझा” इसलिए हमारे यहाँ “त्रिकाल सन्ध्या” की पद्धति है। सन्धि-काल में सन्ध्या करनी है। जब सूर्योदय हो रहा है (रात्रि उपरान्त दिन प्रारम्भ हो रहा है), मध्यान्ह में (जब दिन मध्यान्ह में परिवर्तित हो रहा है), सन्ध्याकाल में (जब मध्यान्ह सायंकाल को अग्रसर है, सूर्यास्त हो रहा है) इन तीनों काल में सन्ध्या करनी है। तीनों सन्ध्या के समय प्राणायाम करना बताया गया है। अनुलोम-विलोम करना है। अनुलोम-विलोम से, हमारी दोनों नासिका पुट से अधिक साँस आये इसलिए सीधे बैठाते हैं। सीधे बैठने से डायफ्राम नीचे होता है तब फेफड़ों को ज्यादा फूलने की जगह मिलती है।

प्राणायाम में लम्बी गहरी साँस लेते हैं, इसको पूरक कहते हैंसाँस को रोकने को कुम्भक कहते हैंगहरी साँस को छोड़ना, इसको रेचक कहते हैंये तीनों क्रियाएँ नियन्त्रित हो इसे प्राणायाम कहते हैं


यह प्रणायाम कुछ मिनट ही करते हैं तो दोनों नासिका रन्ध्र खुला जाते हैं और दोनों तरफ के मस्तिष्क भी खुल जाते हैं। हमारे मस्तिष्क लगभग पाँच घण्टे तक खुले रहते हैं। पाँच मिनट का प्राणायाम, पाँच घण्टे के लिए लाभ-प्रद होता है इसलिए श्रीभगवान् हम लोगों को बार-बार योग मार्ग अपनाने को कहते हैं।

“तस्माद्योगी भवार्जुन”

श्रीभगवान् यह अर्जुन को ही नहीं, हमें भी कह रहे हैं ताकि तमोगुण नीचे हो जाये। प्राणायाम करने से रात्रि की नींद स्वत: ही कम होने लगती है। दवा लेकर नींद बढ़ाना और पतले होने के लिए इञ्जेक्शन देकर मोटापा घटाना। यह सब पाश्चात्य एलोपैथी के अन्तर्गत किया जाता है।

हमारे यहाँ मोटापा घटाने के लिए भी प्राणायाम बताया गया है कि सूर्य नाड़ी को खोलें। अपने शरीर का तापमान बढ़ाने से मोटापा घटने लगता है। शरीर दुबला-पतला है, वजन बढ़ाना है तब भी नासिका के दायें रन्ध्र-सूर्य नाड़ी को बन्द कर, बायें नासिका रन्ध्र-चन्द्र नाड़ी को खोलें। सत्ताईस बार ऊपर-नीचे साँस लें तो शरीर ठण्डा होने लगा जाता है और शरीर का मेटाबोलिज्म तब धीमा हो जायेगा। पाचन क्रिया धीमी हो जायेगी, इससे शरीर में अन्न अधिक देर तक रहेगा। अन्न फिर देर में शरीर में पहुँचेगा और शरीर का वजन बढ़ जायेगा। इस प्रकार वजन बढ़ाने-घटाने दोनों के लिए प्राणायाम बताये गये हैं। अद्भुत है यह योगयोग शास्त्र है भगवद्गीता। 

इसलिए ही तो प्रत्येक अध्याय के समाप्ति पर हम बोलते हैं-

“ॐ तत्सदिती  श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे.............”

श्रीभगवान् कहते हैं कि तीनों गुणों को संयमित (बैलेंस) करने की युक्ति श्रीभगवान् द्वारा ही बता दी गयी है। अन्तिम समय में हमारे अन्दर कौन सा गुण प्रमुख (प्रामिनेंट) है उसी पर हमारी मृत्योपरान्त आगे की गति निर्भर करती है। यह भी गुणों पर ही निर्भर करती है। श्रीभगवान् आगे कहते हैं-                      

14.14

यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु, प्रलयं(म्) याति देहभृत्।
तदोत्तमविदां(म्) लोकान्, अमलान्प्रतिपद्यते॥14.14॥

जिस समय सत्त्वगुण बढ़ा हो, उस समय यदि देहधारी मनुष्य मर जाता है (तो वह) उत्तमवेत्ताओं के निर्मल लोकों में जाता है।

विवेचन- जब मनुष्यों में सत्त्व गुणों की सतत वृद्धि होती रहती है और उस समय प्रलय यानि देह मृत्यु को प्राप्त होता है तो सारे उत्तम कर्म करने वाले वे लोग दिव्य लोकों में जाते हैं, स्वर्ग लोक को प्राप्त होते हैं। 

इस प्रकार यह स्वर्ग जाने का बहुत सहज मार्ग बताया गया है। यदि स्वर्ग लोक जाने के इच्छुक हैं तो हमें अपने सत्त्वगुण को बढ़ाना है।


ऐसे समझना है कि हमारे कार्ड में बैलेंस होना चाहिये। जिस दिन बैलेंस समाप्त होता है, हम फाईव स्टार होटल से बाहर कर दिये जाते हैं इसी तरह हम स्वर्गलोक से मृत्युलोक में वापस आ जाते हैं। कुछ दिन फाईव स्टार में ठहरने के लिए कार्ड मैं बैलेंस होना अनिवार्य है। यह कार्ड का बैलेंस धन का नहीं वरन् हमारी अध्यात्मिकता का बैलेंस है। यदि स्वर्ग जाना है तो मृत्यु के समय सत्त्वगुण का बैलेंस होना चाहिये। सत्त्वगुण ऊपर उठाता है।

घर में समृद्धि है तो मेहमान के आने पर खुशी से बहुत अच्छा स्वागत-सत्कार होगा। इसके विपरीत यदि घर में अभाव है तो सब मटियामेट हो जाता है, हमें भी आनन्द नहीं मिलता है।  

यदि मृत्यु के समय सत्त्वगुण भरा है तब मृत्यु का आना अच्छा लगेगा। यदि सत्त्वगुण का बैलेंस ही नहीं है, रजोगुण है या तमोगुण है और मृत्यु आ जाये तब क्या होगा? यह श्रीभगवान् आगे के श्लोक में बताते हैं-

14.15

रजसि प्रलयं(ङ्) गत्वा, कर्मसङ्गिषु जायते।
तथा प्रलीनस्तमसि, मूढयोनिषु जायते॥14.15॥

रजोगुण के बढ़ने पर मरने वाला प्राणी कर्मसंगी मनुष्य योनि में जन्म लेता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरने वाला मूढ़ योनियों में जन्म लेता है।

विवेचन- यदि रजोगुण भरा हुआ है और मृत्यु आ जाये तब कर्मों में आसक्ति वाली योनि अर्थात् मनुष्य योनि में उसका जन्म होता है।

 
यदि तमोगुण भरा हुआ है और मृत्यु आ जाये तब बुद्धिहीन योनि अर्थात् कीट-पतङ्गे की योनि में अगला जन्म होता है। इस योनि के जीव केवल खाना-पीना, सोना, प्रजोत्पादन के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जानते हैं। यदि हमारे अन्दर तमस बढ़ जाता है तो फिर मूढ़ योनि में ही जन्मते हैं।

 
तूफ़ान आने पर सभी वस्तुएं उड़ जाती हैं। बकरी जो कुछ भी मिले खाती ही जाती है। ऐसे ही जो व्यक्ति भोग-उपभोग करता ही रहता है। व्यवसाय अच्छे से हो रहा है फिर भी व्यवसाय और बढ़ाना है। सतत यही सब विचार दिमाग में जारी होते रहते हैं, रजोगुण की बहुल्यता रहती है तब वह नरक में तो नहीं जायेगा लेकिन तमोगुणी तो अन्त निश्चित तौर पर नरक में ही जायेगा।

 
हमारे यहाँ स्वर्ग-नरक अन्तिम उद्देश्य/गन्तव्य नहीं है।
यदि स्वर्ग में जाना भी है तो ऐसे समझते हैं कि भिखारी को यदि राजप्रसाद के लिए ले जाते हैं तो राजमहल में पञ्च पकवानों के परोसे जाने पर भी उस भिखारी को उसमें रास नहीं आता है। भिखारी बासी रोटी खाने का इतना आदि है कि राजप्रसाद परोसे जाने पर भी वह बासी रोटी ही माँगता है। ऐसे कुछ लोग भी होते हैं जो बासी रोटी ही खाने के आदि होते हैं, स्वादिष्ट नहीं भाता। इसी प्रकार तमोगुणी को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती।

 
सत्त्वगुणी स्वर्ग जाता तो है लेकिन बैलेंस समाप्त होने पर उसे वापस मृत्यु लोक आना ही पड़ता है।

 
पहले जमाने में बरात बैलगाड़ी में चलती थी। एक अतिरिक्त बैलगाड़ी भी साथ में होती थी जिसमें बैलों का चारा-पानी होता था। सभी बराती जब गुलाब जामुन खा रहे थे, एक बच्चे के मन में आया कि यह बैल भी तो बराती है तो इस बैल को भी गुलाब जामुन खिला दें। बैल को उसने गुलाब जामुन खिला दिये। अगले दिन बैल अस्वस्थ हो गया, बैल का पाचन गड़बड़ हो गया उसे पेचिश हो गयी। वैसे ही तमोगुणी को अच्छाई नहीं भाती। अब श्रीभगवान् अगले श्र्लोकों में अवगत कराते हैं-

14.16

कर्मणः(स्) सुकृतस्याहुः(स्), सात्त्विकं(न्) निर्मलं(म्) फलम्।
रजसस्तु फलं(न्) दुःखम्, अज्ञानं(न्) तमसः(फ्) फलम्॥14.16॥

विवेकी पुरुषों ने – शुभ कर्म का तो सात्त्विक निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख (कहा है और) तामस कर्म का फल अज्ञान (मूढ़ता) कहा है।

विवेचन- जिसने सुकृत्य किये हैं उसको सात्त्विक और निर्मल फल की प्राप्ति होती है, उसको सुख, ज्ञान और वैराग्य प्राप्त होता है। जो रजोगुणी है उसको दुःख प्राप्त होगा। जो तमोगुणी हैं उनको अज्ञान ही प्राप्त होता है। सुख की अपेक्षा उतना ही अधिक दुःख मिलता है।

किसी ने समस्त इलेक्ट्रॉनिक के संसाधनों/उपकरणों से सुसज्जित भव्य भवन बना लिया, घर का द्वार भी इलेक्ट्रॉनिक है अङ्गूठा स्पर्श कराने से दरवाजा खुलता है। एक दिन अचानक बिजली का सञ्चार बाधित हो जाता है तब घर का दरवाजा भी नहीं खुल पाता है। इतना बढ़िया घर लेकिन दरवाजा न खुल पाने के कारण व्यर्थ हो गया।

इसी प्रकार हम जितनी सुख की कामनाओं में रमते हैं, उतना ही दुःख प्राप्त होता है। राजस कर्म दुःख देता है।

तामस कर्म अज्ञान की तरफ ले जाता है।

अज्ञान “विज्ञान” का विलोम है। ज्ञान का कोई विलोम नहीं होता है। विज्ञान बदलता रहता है।

ज्ञान सदा से ही है। सनातन है- जो पहले था, आज भी वही है। ज्ञान  सत्त्वगुण से ही प्राप्त होने की ही सम्भावना है। ऐसा ज्ञान होने के बाद मनुष्य सत्त्वगुण से भी ऊपर उठ जायेगा, तब वह कहाँ पहुँचेगा? 

यह बताने के पहले श्रीभगवान् हमें याद दिलाते हैं कि-  

14.17

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं(म्), रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो, भवतोऽज्ञानमेव च॥14.17॥

सत्त्वगुण से ज्ञान और रजोगुण से लोभ (आदि) ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुण से प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होते हैं।

विवेचन- सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान ही प्राप्त होता है।

14.18

ऊर्ध्वं(ङ्) गच्छन्ति सत्त्वस्था, मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः।
जघन्यगुणवृत्तिस्था, अधो गच्छन्ति तामसाः॥14.18॥

सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य ऊर्ध्वलोकों में जाते हैं, रजोगुण में स्थित मनुष्य मृत्युलोक में जन्म लेते हैं (और) निन्दनीय तमोगुण की वृत्ति में स्थित तामस मनुष्य अधोगति में जाते हैं।

विवेचन- सत्त्वगुणी ऊपर की ओर उठता है, उसका सतत विकास होता रहता है और वह प्रकाश की ओर उन्मुख होता रहता है। जो राजस हैं वे लोग मध्य में ही रह जाते हैं, वे न तो ऊपर जाते हैं और न नीचे ही जाते हैं। जो तमोगुणी हैं उनकी अधोगति होती है, जघन्य गति हो जाती है। वे लोग पाताल की ओर नीच योनियों में जाते हैं।

इन तीनों गुणों से भी ऊपर हम उठ सकते हैं, तब कहाँ पहुँचते हैं?

तब जैसे कि हम फाइव स्टार से सेवेन स्टार में स्थाई तौर पर चले जाते हैं। इस अध्याय का नाम तो गुणत्रयविभागयोग है लेकिन इन तीन गुणों से भी ऊपर कुछ और भी है, जिसके बारे में अब श्रीभगवान् बताते हैं-

14.19

नान्यं(ङ्) गुणेभ्यः(ख्) कर्तारं(म्), यदा द्रष्टानुपश्यति।
गुणेभ्यश्च परं(म्) वेत्ति, मद्भावं(म्) सोऽधिगच्छति॥14.19॥

जब विवेकी (विचार कुशल) मनुष्य तीनों गुणों के (सिवाय) अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और (अपने को) गुणों से पर अनुभव करता है, (तब) वह मेरे सत्स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

विवेचन- जिस समय हम दृष्टा हो जाते हैं, प्रेक्षक की तरह हो जाते हैं। जैसे कि जब हम चलचित्र देखते हैं वहाँ हमारा कोई अधिकार नहीं होता, जो भी चलचित्र में प्रदर्शित है उस पर हमारा कोई भी नियन्त्रण नहीं होता, हम जो भी उसमें दर्शित है; रुचिकर-अरुचिकर सब केवल प्रेक्षक और दृष्टा की भाॅंति देखते हैं । 

ऐसे ही जो अपने जीवन को साक्षी भाव से देखने लग जाता है वह तीनों गुणों से ऊपर उठ जाता है। वह किसी अन्य को भी कर्ता नहीं देखता और स्वयं को भी नहीं। वह तीनों गुणों के परे परमात्मा के सच्चिदानन्द स्वरुप को जान लेता है। तत्पश्चात् उसको भगवद् स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है।

“स्वर्गवासी” कहना अच्छी बात नहीं है। हम ‘भगवद् पद” की प्राप्ति करें। हम उस लोक को जायें जहाँ पर प्रत्यक्ष श्रीभगवान् ही निवास कर रहें हैं। यदि उस प्रकाश में ही हम विलीन हो जायें, उस भगवद्तत्व की प्राप्ति कर लें तो हम इस जन्म-मरण की यातना से भी बच जाते हैं। तब हमारा पुनर्जन्म भी नहीं होता है।  

14.20

गुणानेतानतीत्य त्रीन्, देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखै:(र्), विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥14.20॥

देहधारी (विवेकी मनुष्य) देह को उत्पन्न करने वाले इन तीनों गुणों का अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्था रूप दुःखों से रहित हुआ अमरता का अनुभव करता है।

विवेचन- ऐसे पुरुष सत्त्वगुण से भी ऊपर उठ कर साक्षी बन गये और गुणातीत हो गये अर्थात् उनके गुण अतीत हो गये (गुण पीछे छूट गये)। जिनका गुण भी भूतकाल बन गया, उन्हें गुणातीत कहते हैं। ऐसे गुणातीत तीनों गुणों से ऊपर उठकर जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और व्याधि आदि के दुःख से मुक्त होकर श्रीभगवान् को प्राप्त करते हैं। अब प्रश्न है कि हम गुणातीत कैसे बन सकते हैं?

14.21

अर्जुन उवाच
कैर्लिंगैस्त्रीन्गुणानेतान्, अतीतो भवति प्रभो।
किमाचारः(ख्) कथं(ञ्) चैतांस्, त्रीन्गुणानतिवर्तते॥14.21॥

अर्जुन बोले – हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत हुआ मनुष्य किन लक्षणों से (युक्त) होता है? उसके आचरण कैसे होते हैं? और इन तीनों गुणों का अतिक्रमण कैसे किया जा सकता है?

विवेचन- अर्जुन ने श्रीभगवान् से पूछ ही लिया कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है? उस गुणातीत पुरुष का आचरण कैसा होता है? किन उपायों से वह पुरुष गुणातीत हो पाता है? 

14.22

श्रीभगवानुवाच
प्रकाशं(ञ्) च प्रवृत्तिं(ञ्) च, मोहमेव च पाण्डव।
न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि, न निवृत्तानि काङ्क्षति॥14.22॥

श्री भगवान बोले – हे पाण्डव! प्रकाश और प्रवृति तथा मोह – (ये सभी) अच्छी तरह से प्रवृत्त हो जायँ तो भी (गुणातीत मनुष्य) इनसे द्वेष नहीं करता और (ये सभी) निवृत्त हो जायँ तो (इनकी) इच्छा नहीं करता।

विवेचन- श्रीभगवान् कहते हैं कि जो सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के फल के प्रवृत होने पर उनसे द्वेष नहीं करता है और यदि इनसे निवृति हो जाये तो उनकी आकाङ्क्षा भी नहीं करता है। प्रत्येक स्थिति को सहजता से स्वीकार्य कर लेता है, वह इसी सहज मार्ग से आगे गुणातीत अवस्था की ओर अग्रसर होता है। वह अपने जीवन को सन्तुलित (बैलेन्स) कर लेता है।  

14.23

उदासीनवदासीनो, गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव, योऽवतिष्ठति नेङ्गते॥14.23॥

जो उदासीन की तरह स्थित है (और) (जो) गुणों के द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता (तथा) गुण ही (गुणों में) बरत रहे हैं – इस भाव से जो (अपने स्वरूप में ही) स्थित रहता है (और स्वयं कोई भी) चेष्टा नहीं करता।

विवेचन- जो साक्षी बन जाता है कि यह प्रकृति से प्राप्त शरीर है और तीनों गुण प्रकृति द्वारा प्रदत्त हैं इसलिए उसका भाव रहता है कि “मैं तो साक्षी बन गया हूँ और ये तीनों गुण मुझे सहज स्वीकार्य हैं“ इसलिए अब वह इन तीनों गुणों से विचलित भी नहीं होता क्योंकि यह ज्ञान हो गया है कि गुण ही गुण को बरतते हैं। ऐसा समझता हुआ परमात्मा में ही एकीभाव से स्थित रहता है। जो भी उसे प्राप्त है उसमें सन्तुष्ट रहता है।

“सन्तुष्टः(स्)सततं(य्ँ)योगी,यतात्मादृढनिश्चयः”

इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हमें पराक्रम नहीं करना है। हमें पराक्रम करना है और अपने को उन्नत करना है। अर्जुन को युद्ध करना है और विजयी होना है इसलिए तो श्रीभगवान् ने अर्जुन को गीताजी सुनाई थीं। 

हमें धन भी खूब कमाना है लेकिन साक्षी भाव में रहना है, धन को मन-मस्तिष्क में नहीं रखना है। धन का विनियोग विवेक से ही करना है। हमारा विवेक जागृत रहना चाहिये अन्यथा धन कमा लिया और फिर दोषपूर्ण सङ्गत कर ली तो सब व्यर्थ है। रम, रमा और रमी (ताश पत्ते खेलना) में लिप्त हो गये, यह कदापि नहीं ही करना है। ये सब अन्धकार में ले जाते हैं इसलिए धन तो कमाना है लेकिन उसको निवेश करने और उपयोग-उपभोग करने में विवेक को जागृत रखना है। सत्त्वगुण को अपनाते हुए ऊपर उठना है। ऐसा होने पर व्यक्ति धन आने-जाने से फिर विचलित नहीं होता। अब श्रीभगवान् बताते हैं कि गुणातीत व्यक्ति के साथ क्या घटित होता है?

14.24

समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीर:(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥14.24॥

जो धीर मनुष्य सुख-दुःख में सम (तथा) अपने स्वरूप में स्थित रहता है; जो मिट्टी के ढेले, पत्थर और सोने में सम रहता है, जो प्रिय-अप्रिय में सम रहता है। जो अपनी निन्दा-स्तुति में सम रहता है; जो मान-अपमान में सम रहता है; जो मित्र-शत्रु के पक्ष में सम रहता है (और) जो सम्पूर्ण कर्मों के आरम्भ का त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है। (14.24-14.25)


14.25

मानापमानयोस्तुल्य:(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी, गुणातीतः(स्) स उच्यते॥14.25॥

विवेचन- गुणातीत व्यक्ति सुख आये या दुःख आये, किसी से प्रभावित नहीं होता। सुख से हर्षित नहीं होता और दुःख से दुखी नहीं होता। “सुख-दुःख बाहर से आये हैं, स्थाई नहीं है” यह सोच कर विचलित नहीं होता।

                                   समदुःखसुखः(स्) स्वस्थः(स्), समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
                                        तुल्यप्रियाप्रियो धीरः(स्), तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।।

                                        मानापमानयोस्तुल्यः(स्), तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
                                     सर्वारम्भपरित्यागी,गुणातीतः(स्) स उच्यते ।।

समलोष्टाश्मकाञ्चनः - उसके लिए सोना-पत्थर में कोई भेद नहीं। सोने के लिए कोई राग नहीं और पत्थर से भी कोई द्वेष नहीं। उसमें भी समत्व भाव है।

तुल्यप्रियाप्रियो - प्रिय और अप्रिय प्रसङ्ग दोनों स्थिति में तुल्य (समान) रहता है।

तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः - निन्दा हो या स्तुति किसी से भी प्रभावित नहीं होता। वह स्थिति-प्रज्ञ बन जाता है। स्थिति-प्रज्ञ बनना ही गुणातीत की ओर ले जाता है

मानापमानयोस्तुल्यः(स्) - कोई मान दे या कोई अपमान कर दे, उसका उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं होता। वह दोनों स्थिति में समान रहता है।

तुल्यो मित्रारिपक्षयोः - मित्र और शत्रु में भी समत्व स्थिति बनाये रखता है। शत्रु को भी देखकर मुस्कराहट से स्वागत करना हमें सीखना है।   

सर्वारम्भपरित्यागी - गुणातीत में कार्य करने का अहम् भाव नहीं होता। हमें भी इस भाव का त्याग करना है कि मैंने किया।

14.26

मां(ञ्) च योऽव्यभिचारेण, भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान्समतीत्यैतान्, ब्रह्मभूयाय कल्पते॥14.26॥

और जो मनुष्य अव्यभिचारी भक्तियोग के द्वारा मेरा सेवन करता है, वह इन गुणों का अतिक्रमण करके ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है।

विवेचन- हमें बिना किसी अपेक्षा के शुद्ध अव्यभिचारी भक्ति करनी है। निष्काम भक्ति से जो भी श्रीभगवान् को प्रेम करेगा और जीवन को सन्तुलित (बैलेंस) करेगा, वह ब्रह्म लोक को प्राप्त करेगा।  

14.27

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्, अमृतस्याव्ययस्य च।
शाश्वतस्य च धर्मस्य, सुखस्यैकान्तिकस्य च॥14.27॥

क्योंकि ब्रह्म का और अविनाशी अमृत का तथा शाश्वत धर्म का और ऐकान्तिक सुख का आश्रय मैं (ही हूँ)।

विवेचन- हमें श्रीभगवान् को प्राप्त करने का प्रयास करना है। श्रीभगवान् के अनन्त रूप हैं- श्रीराम, श्रीकृष्ण सब वही हैं। श्रीभगवान् ने गुणातीत के सारे रहस्य खोल दिये हैं।

 हम गुणातीत अवस्था सहित निष्काम भाव से भक्ति करके श्रीभगवान् को प्राप्त कर सकते हैं। श्रीभगवान् कहते हैं कि ऐश्वर्यता, अविनाशी परब्रह्म, अमृत, नित्य धर्म, अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय श्रीभगवान् ही हैं”। इसके साथ ही चौदहवें अध्याय का विवेचन सत्र समाप्त हुआ।  

प्रश्नोत्तर सत्र

प्रश्नकर्ता- शान्ति बालिगा दीदी
प्रश्न- श्रीमद्भगवद्गीता श्रीभगवान् ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में अकेले में बतायी, फिर यह हमारे तक कैसे आयी?
उत्तर- आप न्यूजीलैण्ड में हो रहे मैच को टीवी का स्विच ऑन करते ही देख लेते हैं। उसी प्रकार महर्षि व्यास जी को एक दिव्य दृष्टि का उपक्रम प्राप्त था और उनका दूसरा दिव्य दृष्टि का सेट सञ्जय के पास था। दिव्य दृष्टि के उपक्रम से वह सब देखकर धृतराष्ट्र को बता रहे थे। इस प्रकार महर्षि व्यास जी, धृतराष्ट्र और सञ्जय तीनों ही कुरुक्षेत्र की गतिविधि को देख/सुन पा रहे थे। इसके अलावा श्रीहनुमानजी अर्जुन के रथ पर शीर्ष पर थे और उन्होंने भी श्रीभगवान् द्वारा उद्बोधित गीता को तत्समय ही सुना था। केवल अर्जुन ने नहीं, इन सभी ने गीता को उसी समय सुना था। बाद में महर्षि व्यास जी ने महाभारत की रचना की और उसमें भगवद्गीता को भी समाहित किया।

प्रश्नकर्ता- मीनाक्षी दीदी 
प्रश्न- आपने बताया कि मृत्यु के समय जिसका जैसा भाव होता है, उसे अगले जन्म में उसी प्रकार का जन्म प्राप्त होता है। कई बार ऐसा होता है कि व्यक्ति गुणातीत भी हो गया हो पर अन्तिम समय में वह कोमा में चला जाता है। कई बार इतना बीमार हो जाता है कि अन्त समय में उसे कोई भान ही नहीं रहता। इस प्रकार के व्यक्ति अगले जन्म में किस प्रकार की योनि प्राप्त करेंगे और उनका अगला जन्म कैसा होगा?

उत्तर- ऐसी अवस्था में बीमारी की स्थिति में जाने से पहले मनुष्य की कैसी स्थिति थी, यह उस पर निर्भर करेगा। जब उसकी चेतना रुक गई, वह गहरी नींद में चला गया या उसे नींद में डाल दिया गया जिससे उसे कम वेदना हो, उससे पहले की स्थिति पर निर्भर करेगा कि उस चेतना के रुकने से पहले उसका कैसा भाव था। जहाँ पर उसका चेतन रुक गया वहाँ से गणना (count) की जायेगी।

हमारे यहाँ कहा गया है कि पूरी चेतना में मृत्यु आए तो वह सबसे उत्तम है। जब तक चेतना रहती है तब तक ध्यान रखना चाहिये कि हमें श्रीभगवान् का नाम स्मरण करना है और निरन्तर ॐ का जाप करना है। 

मृत्यु के समय यदि ऊॅं का जाप हो जाए और श्रीभगवान् का ध्यान आ जाए तो उस से उत्तम कुछ नहीं है। यदि श्रीभगवान् का स्वरूप स्मरण हो जाए तो उससे अच्छा कुछ नहीं है। 

यदि किसी को बीमारी के कारण गहरी निद्रा में डालना हो तो उससे पहले उसे श्रीभगवान् का दर्शन जरूर करवाएँ और ऊॅं का जाप करवाएँ। 

यदि वह स्वयं ऊॅं का उच्चारण कर सकते हैं तो बहुत अच्छा है। यदि वह नहीं कर सकते तो हम अपना मुँह उनके कान के पास ले जाएं और उन्हें ॐ का उच्चारण सुनाएँ। इससे उनके अन्दर की सुप्त चेतना जागृत हो जायेगी।

ऐसे व्यक्ति के कोमा में जाने से पहले या गहरी नींद में जाने से पहले की स्थिति से उनके अगले जन्म का निर्धारण होगा।

प्रश्नकर्ता- रामकृष्ण भैय्या 
प्रश्न- हम जानते हैं कि महाभारत युद्ध में धर्म की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण भगवान् ने अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित किया था और वह युद्ध अस्त्र-शस्त्र से लड़ा गया था। आज के समय में भी हमारे धर्म की बहुत हानि हो रही है। हम रोजाना ही समाचार पत्र में इस तरह की बातें पढ़ते हैं लेकिन हमें शस्त्र उठाने की आज्ञा क्यों नहीं है? हम भी अर्जुन बनाकर धर्म की रक्षा क्यों न करें?
उत्तर- आपका प्रश्न बहुत सुन्दर है। श्रीभगवान् ने अर्जुन को अस्त्र-शस्त्र उठाने के लिए कहा क्योंकि वे क्षत्रिय हैं। उस काल में क्षत्रियों को शस्त्र धारण करने का अधिकार था। आज के समय में क्षत्रिय हमारी पुलिस और सेना है। हमारे संविधान में उन्हें शस्त्र उठाने का अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार उन्हें ही प्राप्त है, मुझे और आपको नहीं है। 

यदि श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर हम यह समझें कि श्रीभगवान् ने हमें अधर्म का नाश करने के लिए शस्त्र उठाने की आज्ञा दे दी है तो यह गलत है। यह उपदेश हमारे लिए नहीं दिया गया है, यह एक क्षत्रिय के लिए उपदेश है। इस स्थिति में हमारा कर्त्तव्य है कि हम समाज को जागरुक रखने का प्रयास करें। हमारा काम जाग्रति पैदा करना हो सकता है। अस्त्र शस्त्र और धनुष उठाकर किसी को मारने का अधिकार हमें नहीं है। 

यदि इस प्रकार की घटना कहीं हो रही है तो हमारी जागरूकता और आसपास के लोगों की जागरूकता से उसे दूर किया जा सकता है या रोका जा सकता है। हम लोगों को इन बातों की चर्चा करते रहना चाहिये। 

विवेचक जी कुछ समय पहले तमिलनाडु गये थे। वहाँ एक व्यक्ति से वे मिलते जुलते रहते थे पर इस बार जब वे उसके घर गये तो वहाँ पर परधर्म की कुछ चीजें देखीं। जब उससे पूछा यह कहाँ से आ गया तो वह बोला कि हम कन्वर्ट (convert) हो गये हैं। विवेचक जी ने उनसे काफी देर तक बात की और उनकी आँखें खोलीं। यह जगाने का काम हमें करते रहना होगा। 

आप सभी अपने विद्यालय में, अपने आसपास के लोगों के साथ, इस तरह की बातें करिये और ध्यान रखिये। अपने घर में इसकी चर्चा कीजिये और हमारे आसपास जो षड्यन्त्र रचे जा रहे हैं, उन पर ध्यान दीजिए। इन षड्यन्त्रों में हमारे बच्चे फँसते जा रहे हैं, हमें लोगों के मन का जागरण करना होगा जिससे कोई इस तरीके के दुष्प्रचार में नहीं फँसे। लोगों को जाग्रत करके ही हम इस प्रकार की घटनाओँ को रोक पायेंगे। इसका यही उपाय है। अस्त्र-शस्त्र उठाना इसका उपाय नहीं है और यह अधिकार भी हमें प्राप्त नहीं है। 

आप चुनाव में वोट देते वक्त यह ध्यान रखना चाहिये कि कौन सा व्यक्ति आपकी भारतीयता और सनातनता को बढ़ावा देगा। उसी पक्ष को मतदान करें जो सनातनता को मानता हो, यही उपाय है। 

श्रीभगवान् की वाणी विवेक जगाती है। इस विवेक को जगाने का कार्य निरन्तर चल रहा है। हम गीता परिवार में भी इस विवेक को जगाने का कार्य कर रहे हैं।

प्रश्नकर्ता- चिन्मया दीदी 
प्रश्न- यज्ञ का अभिप्राय है? 
उत्तर- यज्ञ का अभिप्राय है- श्रीभगवान् को, समाज को कुछ अर्पित करना। समाज को और व्यक्ति को कुछ अर्पित करना दान कहलाता है और श्रीभगवान को कुछ अर्पित करना यज्ञ कहलाता है। आहुति देना ही केवल यज्ञ नहीं है। श्रीभगवान् ने चतुर्थ अध्याय में विभिन्न प्रकार के यज्ञ बताये हैं-

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा, योगयज्ञास्तथापरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च, यतयः(स्) संशितव्रताः।।

प्रश्न- भगवद्गीता में ‘परन्तप” और ” वार्ष्णेय” का क्या अर्थ है?
उत्तर- ‘परन्तप’ अर्जुन का नाम है क्योंकि अर्जुन महातपस्वी भी थे।
”वार्ष्णेय” श्रीभगवान् का नाम है क्योंकि ‘वृन्शी’ कुल में उनका जन्म हुआ था।

प्रश्नकर्ता- रश्मि दीदी
प्रश्न- यह कहा जाता है कि हमारे जीवन का सब कुछ पूर्व से लिखा रहता है। क्या यह सही है?
उत्तर- यह ठीक है लेकिन यह श्रीभगवान् नहीं लिखते। हम स्वयं जन्म-जन्मान्तर से अपने कर्मों द्वारा ही उसको लिखते हैं।

प्रश्न- जब श्रीभगवान् सब करते हैं फिर संसार में गलत कार्य कैसे होते हैं?
उत्तर- श्रीभगवान ने गीताजी में बताया है कि-

“मयाध्यक्षेण प्रकृतिः(स्), सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय, जगद्विपरिवर्तते”

अर्थात् हम सब श्रीभगवान् के अध्यक्षता में कार्य करते हैं लेकिन कार्य करने के लिए हमको बुद्धि-विवेक का प्रयोग करने की स्वतन्त्रता प्राप्त है। अतएव सही-गलत कार्य करने की जिम्मेदारी करने वाले की ही होती है, इसमें श्रीभगवान् का कोई रोल नहीं होता।

प्रश्नकर्ता- अर्चना दीदी
प्रश्न- तीर्थ यात्रा में यदि कोई दिवङ्गत हो जाता है तो क्या वह श्रीभगवान् के धाम को जाता है?
उत्तर- कुछ तीर्थ स्थलों के लिए ऐसी मान्यता है- जैसे कि वाराणसी इसलिए उस दिवङ्गत आत्मा का अन्तिम संस्कार उसी स्थल पर करने का भी प्रावधान है। अन्तिम समय में हमारे विचारों के अनुसार ही हमारी मृत्यु उपरान्त की गति तय होती है। तीर्थ स्थान के लिए विशेष माना जाता है कि दिवङ्गत आत्मा के मन में उस तीर्थ स्थान विशेष से सम्बन्धित विचार रहे होगें तो निश्चय ही उनकी अच्छी ही गति होगी। तीर्थ स्थल पर भी दिवङ्गत आत्मा के मन में यदि सांसारिक प्रपञ्च रहा तब उत्तम गति प्राप्त होने में संशय अवश्य ही रहेगा।

प्रभु वन्दन, धन्यवाद ज्ञापन और श्रीहनुमान चालीसा पाठ के साथ आज के विवेचन सत्र का समापन हुआ।

ॐ श्री कृष्णार्पणमस्तु

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां(म्) योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे गुणत्रयविभागयोगो नाम चतुर्दशोऽध्याय:।।

इस प्रकार ॐ तत् सत् - इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषदरूप श्रीकृष्णार्जुनसंवाद में ‘गुणत्रयविभागयोग’ नामक चौदहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।