विवेचन सारांश
परमात्मा का सर्वव्यापक स्वरूप
भगवान की असीम कृपा हम पर बरस रही है। पुर्वजों के सुकृत तथा इस जन्म के कर्म से, संतो के कृपा - आशीर्वाद से हम सब भगवद्गीता का चिंतन, मनन कर रहे हैं। एक बार गीता भवन-ऋषिकेश में स्वामी
रामसुखदास जी ने अपने प्रवचन में कहा था कि वहाँ उपस्थित सभी की भगवत् प्राप्ति निश्चित है। सभी आश्चर्यचकित हो गए, हतप्रभ रह गए। तब स्वामी जी ने कहा कि इस जन्म में, अगले जन्म में या कितने जन्म के बाद भगवद् प्राप्ती होगी यह निश्चित नहीं परंतु होगी यह निश्चित है। जैसे गंतव्य निश्चित होने पर भी समय सीमा तो वाहन पर ही निर्भर करेगी, परंतु पहुँचना निश्चित है। भगवद्गीता के माध्यम से हमें मार्ग मिल गया है। हमें तन्मयता से इस पर निरंतर चलते रहना है तभी हम अपने अंतिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर पायेंगे। छठे अध्याय में भगवान ने अर्जुन को स्पष्ट रुप से संदेश दिया- '
तस्माद्योगी भवार्जुन
जिस का तात्पर्य है कि भगवान अर्जुन से कर्मयोगी बनने की बात कहते हैं। भगवद्गीता ने सभी मार्ग बतलाए हैं परंतु सब साधनों में अपने लिए प्रधान साधन कौन सा है यह हमें स्वयं निश्चित करना है। इसके लिए हमें गंतव्य की ओर लक्ष्य केंद्रित करना चाहिए किंतु हम मार्ग के आग्रही बन जाते हैं। जैसे हमें दिल्ली पहुँचना है तो बस, कार, रेल या हवाई जहाज कैसे भी जाएं, वहां पहुंचने पर मार्ग का उतना महत्व नहीं रह जाता।
छठे अध्याय में भगवान ने अर्जुन को श्रद्धा का महत्व भी बताया फिर सातवें अध्याय से ज्ञानयोग का आरंभ किया। सातवाँ अध्याय- ज्ञानविज्ञानयोग अत्यंत गूढ़ अध्याय है।
7.1
श्रीभगवानुवाच
मय्यासक्तमनाः(फ्) पार्थ, योगं(म्) युञ्जन्मदाश्रयः।
असंशयं(म्) समग्रं(म्) मां(म्), यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥1॥
श्रीभगवान् बोले - हे पृथानन्दन ! मुझमें आसक्त मनवाला, मेरे आश्रित होकर योग का अभ्यास करता हुआ (तू) मेरे (जिस) समग्र रूप को निःसन्देह जिस प्रकार से जानेगा, उसको (उसी प्रकार से) सुन।
विवेचन: पहले श्लोक में भगवान ने अतिशय भक्तियुक्त वचन कहे हैं। भगवद्गीता में वेदव्यास जी कहते हैं,
मैं उस कृष्ण की जगद्गुरु के रूप में उपासना करता हूँ जो वसुदेव के सुत, देवकी का आनंद बढ़ाने वाले, कंस- चाणूर का वध करने वाले हैं। वही वेदव्यास जी श्रीमद्भागवत महापुराण में कहते हैं :-
जो सत्-चित्त-आनंद के स्वरूप है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कारण हैं जिनके तापत्रय से उत्पत्ति और विनाश होता है उन श्रीकृष्ण को मैं नमन करता हूँ। महाभारत के एक लाख श्लोकों में से भीष्म पर्व के गीता जी के सभी श्लोकों में श्रीभगवान का यह संबोधन आया है। एक बार अर्जुन ने भगवान से आग्रह किया कि वह भगवद्गीता को फिर से सुनना चाहते हैं, तब भगवान ने कहा, "मैंने तो यह सब ब्रह्मभाव में कह दिया था। इसे पुनः सुनाना असंभव है । इसी से भगवद्गीता की महत्ता को जाना जा सकता है। माम् शब्द का तात्पर्य परम ब्रह्म परमात्मा से है।
भगवान यहाँ भक्तों के 6 लक्षण बताते हैं।
मय्यासक्त - जिसका मन संसार से हटकर मुझ में लग जाए।
मदाश्रयः - मेरे आश्रित होना। शरणागति के पर्याय इस प्रकार बताते हैं - आश्रय, अवलंबन, अधीनता, प्रपत्ती और सहारा।
योगं युञ्जन् - प्रत्येक क्रिया भगवान से जोड़ने वाली हो जाए।
समग्र - भगवान ही सब कुछ है और असंख्य - भक्त वही है जिसे भगवान पर पूर्ण विश्वास हो।
अनन्य भक्ति - गोस्वामी तुलसीदास जी अनन्य भक्ति का प्रमाण है।
एक बार गोस्वामी जी वृंदावन गए। सुंदर-सुंदर कृष्ण की मूर्तियां देखी ।पर उनके मन में तो राम बसे थे। वे कहने लगे
अचानक बिजली चमकी और सभी भक्तों ने राम जी के दर्शन किए।
यह अनन्यता की उच्चतम सीमा है।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्।
देवकीपरमानंदं कृष्णम् वंदे जगद्गुरूम्॥
देवकीपरमानंदं कृष्णम् वंदे जगद्गुरूम्॥
मैं उस कृष्ण की जगद्गुरु के रूप में उपासना करता हूँ जो वसुदेव के सुत, देवकी का आनंद बढ़ाने वाले, कंस- चाणूर का वध करने वाले हैं। वही वेदव्यास जी श्रीमद्भागवत महापुराण में कहते हैं :-
सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे।
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः॥
तापत्रय विनाशाय श्री कृष्णाय वयं नुमः॥
जो सत्-चित्त-आनंद के स्वरूप है, जो संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति के कारण हैं जिनके तापत्रय से उत्पत्ति और विनाश होता है उन श्रीकृष्ण को मैं नमन करता हूँ। महाभारत के एक लाख श्लोकों में से भीष्म पर्व के गीता जी के सभी श्लोकों में श्रीभगवान का यह संबोधन आया है। एक बार अर्जुन ने भगवान से आग्रह किया कि वह भगवद्गीता को फिर से सुनना चाहते हैं, तब भगवान ने कहा, "मैंने तो यह सब ब्रह्मभाव में कह दिया था। इसे पुनः सुनाना असंभव है । इसी से भगवद्गीता की महत्ता को जाना जा सकता है। माम् शब्द का तात्पर्य परम ब्रह्म परमात्मा से है।
भगवान यहाँ भक्तों के 6 लक्षण बताते हैं।
मय्यासक्त - जिसका मन संसार से हटकर मुझ में लग जाए।
मदाश्रयः - मेरे आश्रित होना। शरणागति के पर्याय इस प्रकार बताते हैं - आश्रय, अवलंबन, अधीनता, प्रपत्ती और सहारा।
योगं युञ्जन् - प्रत्येक क्रिया भगवान से जोड़ने वाली हो जाए।
समग्र - भगवान ही सब कुछ है और असंख्य - भक्त वही है जिसे भगवान पर पूर्ण विश्वास हो।
अनन्य भक्ति - गोस्वामी तुलसीदास जी अनन्य भक्ति का प्रमाण है।
एक बार गोस्वामी जी वृंदावन गए। सुंदर-सुंदर कृष्ण की मूर्तियां देखी ।पर उनके मन में तो राम बसे थे। वे कहने लगे
कहा कहों छवि आज की, भले बने हो नाथ।
तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण लो हाथ॥
तुलसी मस्तक नवत है, धनुष बाण लो हाथ॥
अचानक बिजली चमकी और सभी भक्तों ने राम जी के दर्शन किए।
कित मुरली कित चंद्रिका, कित गोपीयन का साथ।
अपने जन के कारने, कृष्ण बने रघुनाथ।
अपने जन के कारने, कृष्ण बने रघुनाथ।
यह अनन्यता की उच्चतम सीमा है।
ज्ञानं(न्) तेऽहं(म्) सविज्ञानम्, इदं(म्) वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्, ज्ञातव्यमवशिष्यते॥2॥
तेरे लिये मैं यह विज्ञान सहित ज्ञान सम्पूर्णता से कहूँगा, जिसको जानने के बाद फिर इस विषय में जानने योग्य अन्य (कुछ भी) शेष नहीं रहेगा।
विवेचन: भगवान कहते हैं, अर्जुन मैं तुम्हें विज्ञान सहित ज्ञान कहूंगा। सभी आचार्यों ने ज्ञान की अलग-अलग परिभाषा की है। शंकराचार्य जी कहते हैं - जो गुरु से, बड़ों से शिक्षा प्राप्त होती है वह ज्ञान है और जो अनुभव से प्राप्त होता है वह विज्ञान है। रामानुजाचार्य जी कहते हैं- जिसकी दृष्टि नामरूप में रहती है वह ज्ञानी है लेकिन जिसकी तत्व दृष्टि हो गई उसे विज्ञान कहते हैं। ज्ञानेश्वर जी महाराज ज्ञान का अर्थ आत्मज्ञान तथा विज्ञान का अर्थ प्रपंच का ज्ञान बताते हैं। बाल गंगाधर तिलक जी ने समष्टि ज्ञान को ज्ञान तथा व्यष्टि के ज्ञान को विज्ञान कहा है। जीवन में देखने सुनने से कई गुना अधिक ज्ञान, अनुभव से प्राप्त होता है, यह एक कथा के माध्यम से बताया गया।
एक गाँव में बहुत से बंदर रहते थे। गाँववालों ने बंदरों को भगाने के लिए जाल लगाए। एक बूढ़ा और एक युवा बंदर बात करते-करते उस गाँव में पहुँचे। गाँव के बाहर एक वृक्ष फलों से लदा हुआ दिखाई पड़ा। युवा बंदर प्रसन्न हो गया। फल खाने की इच्छा से वह आगे बढ़ा। बूढ़े बंदर ने समझाया, रुक जाओ मुझे संशय हो रहा है। इसके पास कोई पक्षी नहीं है, बच्चों ने भी यह फल क्यों नहीं तोड़े, इस वृक्ष के फल खाना ठीक नहीं। परंतु युवा बंदर ने उसकी बात न मानी। बूढा बंदर आगे चला गया। एक महिला ने रोटी दी, दूसरी ने केला खिलाया। लौटने पर उसने देखा कि युवा बंदर मृत पडा था। उस वृक्ष के फल विषैले थे। युवा बंदर ने अपनी बुद्धि को अपने ज्ञान को श्रेष्ठ माना और उसका जीवन समाप्त हो गया।उस बूढ़े बंदर के अनुभव को महत्व दिया। अपनी विशेष प्रतिभा के क्षेत्र में ज्ञान पाना प्राप्त करना ही उत्तम है। यदि हम अन्य सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने की होड़ में लग जाए तो सारा काम चौपट हो सकता है।
एक गाँव में बहुत से बंदर रहते थे। गाँववालों ने बंदरों को भगाने के लिए जाल लगाए। एक बूढ़ा और एक युवा बंदर बात करते-करते उस गाँव में पहुँचे। गाँव के बाहर एक वृक्ष फलों से लदा हुआ दिखाई पड़ा। युवा बंदर प्रसन्न हो गया। फल खाने की इच्छा से वह आगे बढ़ा। बूढ़े बंदर ने समझाया, रुक जाओ मुझे संशय हो रहा है। इसके पास कोई पक्षी नहीं है, बच्चों ने भी यह फल क्यों नहीं तोड़े, इस वृक्ष के फल खाना ठीक नहीं। परंतु युवा बंदर ने उसकी बात न मानी। बूढा बंदर आगे चला गया। एक महिला ने रोटी दी, दूसरी ने केला खिलाया। लौटने पर उसने देखा कि युवा बंदर मृत पडा था। उस वृक्ष के फल विषैले थे। युवा बंदर ने अपनी बुद्धि को अपने ज्ञान को श्रेष्ठ माना और उसका जीवन समाप्त हो गया।उस बूढ़े बंदर के अनुभव को महत्व दिया। अपनी विशेष प्रतिभा के क्षेत्र में ज्ञान पाना प्राप्त करना ही उत्तम है। यदि हम अन्य सभी प्रकार का ज्ञान प्राप्त करने की होड़ में लग जाए तो सारा काम चौपट हो सकता है।
एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय।
इसे एक प्रसंग द्वारा बताया गया। किसी स्थान पर जलापूर्ति के लिये 100 फ़ीट गहरा गड्ढा खोदने की आवश्यकता थी।प रन्तु किसान के 100 फ़ीट एकसाथ खोदने में कठिनाई दर्शाने पर उसे नित्य 5-5 फ़ीट की खुदाई से 20 दिनों में कार्य पूर्ण करने का परामर्श दिया गया। परन्तु 20 दिन पश्चात किसान अपने परामर्शदाता के पास पुन: अपनी जलापूर्ति की समस्या को हल करने की प्रार्थना के साथ जा पहुँचा। स्थान के निरीक्षण पर पाया गया कि किसान ने प्रथम दिन खोदे हुए गड्ढे पर कार्य को आगे ना बढ़ाते हुए नित्य भिन्न -भिन्न स्थानों पर 5 -5 फ़ीट के गड्ढे खोदे। एक ही गड्ढे पर नित्य कार्य करते रहने पर वह 100 फ़ीट गहरी खुदाई द्वारा जलापूर्ति के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता था इसी प्रकार पानी के लिए 100 फीट या उससे ज्यादा एक ही जगह से गड्ढा खोदना ज्ञान और विज्ञान सहित है परंतु अलग-अलग जगह पर गड्ढा खोदना मूर्खता है। परंतु ऐसे बहुत से विद्याओं को जान भी लिया तो परमात्मा को ना जान कर वास्तव में कुछ नहीं जाना है। तत्व से भगवान को जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता है।
मनुष्याणां(म्) सहस्रेषु, कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां(ङ्), कश्चिन्मां(म्) वेत्ति तत्त्वतः॥3॥
हजारों मनुष्यों में कोई (एक) सिद्धि (कल्याण) के लिये यत्न करता है (और) (उन) यत्न करने वाले सिद्धों (मुक्त पुरुषों) में कोई (एक) ही मुझे यथार्थ रूप से जानता है।
विवेचन: भगवान कहते हैं, अर्जुन! हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है उनमें से भी कोई एक ही मुझे प्राप्त कर पाता है। यह मार्ग इतना सरल नहीं है। इस पर नित्य ही रत रहना पड़ता है।
भूमिरापोऽनलो वायुः(ख्), खं(म्) मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं(म्) मे, भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥4॥
पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश - (ये पंच महाभूत) और मन, बुद्धि तथा अहंकार - इस प्रकार यह आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहो ! इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी परा प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है। (7.4-7.5)
7.4 writeup
अपरेयमितस्त्वन्यां(म्), प्रकृतिं(म्) विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां(म्) महाबाहो, ययेदं(न्) धार्यते जगत्॥5॥
विवेचन: प्रकृति का विभाजन दो प्रकार से किया गया है -परा और अपरा। पंचमहाभूत (पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु व आकाश) तथा मन, बुद्धि, अहंकार इनसे स्थूल सृष्टि बनती है। यह आठ प्रकार से विभाजित अपरा प्रकृति परिवर्तनशील है। परा यानी चेतन, सूक्ष्म सृष्टि है। यह परा प्रकृति स्वयं भगवान का ही रूप है।
एतद्योनीनि भूतानि, सर्वाणीत्युपधारय।
अहं(ङ्) कृत्स्नस्य जगतः(फ्), प्रभवः(फ्) प्रलयस्तथा॥6॥
सम्पूर्ण प्राणियों के (उत्पन्न होने में) अपरा और परा - इन दोनों प्रकृतियों का संयोग ही कारण है - ऐसा तुम समझो। मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ।
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं सारे भूत, पदार्थ, प्राणी सब कुछ मेरे कारण है। एक सुंदर भजन द्वारा भगवान की व्यापकता से अवगत कराया गया। भजन की लिंक
https://drive.google.com/file/d/1z8N3IdIcDd0MMXM8f_6ekP5aiAZGYeuH/view?usp=sharing
एक साधु महाराज के उदाहरण द्वारा भगवान ही सब कुछ होने का प्रमाण मिलता है। एक साधु हलवाई की दुकान के सामने से जा रहे थे। उन्होंने उस से दूध की मांग की। हलवाई ने बुरा-भला कहकर बाट फेंक कर मारा। साधु महाराज के सिर से खून निकल आया। वहाँ से जा रहे एक सज्जन पुरुष ने उन्हे बैठाया और हलवाई से रबड़ी युक्त दूध बनवा कर पिलाया। साधु महाराज जी ऊपर की तरफ देख कर हॅंसने लगे। वे सोच रहे थे, भगवान ने स्वयं पहले पत्थर मरवाया और फिर उन्होंने ही किसी को भेजकर उन्हें रबड़ी पिलाई। इस प्रकार ज्ञानी पुरुष अच्छा- बुरा, उत्पत्ति- विनाश सबका एक ही कारण, केवल भगवान को ही जानते हैं।
https://drive.google.com/file/d/1z8N3IdIcDd0MMXM8f_6ekP5aiAZGYeuH/view?usp=sharing
एक साधु महाराज के उदाहरण द्वारा भगवान ही सब कुछ होने का प्रमाण मिलता है। एक साधु हलवाई की दुकान के सामने से जा रहे थे। उन्होंने उस से दूध की मांग की। हलवाई ने बुरा-भला कहकर बाट फेंक कर मारा। साधु महाराज के सिर से खून निकल आया। वहाँ से जा रहे एक सज्जन पुरुष ने उन्हे बैठाया और हलवाई से रबड़ी युक्त दूध बनवा कर पिलाया। साधु महाराज जी ऊपर की तरफ देख कर हॅंसने लगे। वे सोच रहे थे, भगवान ने स्वयं पहले पत्थर मरवाया और फिर उन्होंने ही किसी को भेजकर उन्हें रबड़ी पिलाई। इस प्रकार ज्ञानी पुरुष अच्छा- बुरा, उत्पत्ति- विनाश सबका एक ही कारण, केवल भगवान को ही जानते हैं।
मत्तः(फ्) परतरं(न्) नान्यत्, किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं(म्) प्रोतं(म्), सूत्रे मणिगणा इव॥7॥
इसलिये हे धनञ्जय ! मेरे सिवाय (इस जगत का) दूसरा कोई किंचिन्मात्र भी (कारण तथा कार्य) नहीं है। (जैसे सूत की) मणियाँ सूत के धागे में (पिरोयी हुई होती हैं), ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत मेरे में (ही) ओत-प्रोत है।
विवेचन: श्रीभगवान कहते हैं -इस ब्रह्मांड में जो भी दिखता है वह मुझसे ही व्याप्त है। जैसे सूत में सूत की मणियाँ पिरोई गई हो तो दिखने में मणियाँ और सूत अलग अलग दिखते हैं पर वास्तव में उनमें सूत एक ही होता है। ऐसे ही संसार में जितने प्राणी हैं नाम ,रूप, आकृति से अलग दिखते हैं पर उनमें व्याप्त चेतन तत्व एक ही है। बेसन से बने कढ़ी, पकौड़ी, रोटी, हलवा अलग-अलग रूप होने पर भी उनमें मूल तत्व चना एक ही है।
रसोऽहमप्सु कौन्तेय, प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः(स्) सर्ववेदेषु, शब्दः(ख्) खे पौरुषं(न्) नृषु॥8॥
हे कुन्तीनन्दन! जलों में रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदों में प्रणव (ओंकार), आकाश में शब्द (और) मनुष्यों में पुरुषार्थ (मैं हूँ)।
विवेचन: हे कुन्तीनन्दन ! जलों में रस मैं हूँ,चन्द्रमा और सूर्य में प्रभा मैं हूँ।सम्पूर्ण वेदों में प्रणव,आकाश में शब्द और मनुष्यों में पुरुषार्थ मैं हूँ।
पुण्यो गन्धः(फ्) पृथिव्यां(ञ्) च, तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं(म्) सर्वभूतेषु, तपश्चास्मि तपस्विषु॥9॥
पृथ्वी में पवित्र गन्ध (मैं हूँ), और अग्नि में तेज मैं हूँ तथा सम्पूर्ण प्राणियों में जीवनी शक्ति (मैं हूँ) और तपस्वियों में तपस्या मैं हूँ।
विवेचन: पृथ्वी में पवित्र गन्ध मैं हूँ। अग्नि में तेज भी मैं ही हूँ। संपूर्ण प्राणी मात्र में जो प्राणशक्ति है वह मैं हूँ। परमात्मा तत्व की प्राप्ति के लिए जो तपस्या करते हैं ऐसे उन तपस्वीयों में तप भी मैं ही हूँ।
बीजं(म्) मां(म्) सर्वभूतानां(म्), विद्धि पार्थ सनातनम्।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि, तेजस्तेजस्विनामहम्॥10॥
हे पृथानन्दन ! सम्पूर्ण प्राणियों का अनादि बीज मुझे जान। बुद्धिमानों में बुद्धि (और) तेजस्वियों में तेज मैं हूँ।
विवेचन: हे पार्थ ! संपूर्ण प्राणियों का सनातन, अविनाशी बीज मैं हूँ। बुद्धिमानों में बुद्धि और तेजस्वीओ में तेज भी मैं ही हूँ।
बलं(म्) बलवतां(ञ्) चाहं(ङ्), कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु, कामोऽस्मि भरतर्षभ॥11॥
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालों में काम और राग से रहित बल मैं हूँ और प्राणियों में धर्म से अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।
विवेचन: अर्जुन बलशाली में काम और राग से रहित बल मैं हूँ। मनुष्य में धर्मयुक्त काम मेरा ही स्वरूप है। इस प्रकार 8वें से 11वें श्लोक में भगवान अपने अलग-अलग विभूतियों का वर्णन करते हैं और अपनी व्यापकता सिद्ध करते हैं।
ये चैव सात्त्विका भावा, राजसास्तामसाश्च ये।
मत्त एवेति तान्विद्धि, न त्वहं(न्) तेषु ते मयि॥12॥
और तो क्या कहूँ - जितने भी सात्त्विक भाव हैं (और) जितने भी राजस तथा तामस (भाव हैं, वे सब) मुझ से ही होते हैं - ऐसा उनको समझो। परन्तु मैं उनमें (और) वे मुझमें नहीं हैं।
विवेचन: सत्व ,रज, तम तीनों भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं परंतु मैं उनमें और वह मुझ में नहीं है। परछाई बनती तो सूर्य के कारण है परंतु उसमें सूर्य नहीं है। इसी प्रकार सब कुछ परमात्मा के कारण होता है परंतु परमात्मा उनमें नहीं और वह परमात्मा में नहीं है।
हरि नाम संकीर्तन द्वारा इस सुन्दर सत्र का समापन किया गया।
हरि नाम संकीर्तन द्वारा इस सुन्दर सत्र का समापन किया गया।